Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
195
अध्याय 195 / 232

Adhyaya 195

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अध्याय १९५

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे श्रीपतिविवाहवर्णनं नाम चतुर्नवत्युत्तरशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १९५ युधिष्ठिर उवाच: देवतीर्थे तु किं नाम माहात्म्यं समुदाहृतम् ।फलं किं स्नानदानादिकारिणां जायते मुने

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe śrīpativivāhavarṇanaṃ nāma caturnavatyuttaraśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 195 yudhiṣṭhira uvāca: devatīrthe tu kiṃ nāma māhātmyaṃ samudāhṛtam / phalaṃ kiṃ snānadānādikāriṇāṃ jāyate mune

हिन्दी अर्थ

चतुर्देशे तु पर्याये भौतस्याप्यन्तरे मनोः । देवतानां गणाः पदच्च प्रोक्ता ये तु भविष्यति ११० चाक्षुपाश्न कनिष्ठाश्न पविनत्रा भाजरास्तथा । वाचावद्धाश् इत्येते पत्च देवगणाः स्पृताः (अलअना पक ननानानानमक॒०+फान४क-+ ता हनन हनन + "के प-आनामनाआ आम 3 बन पानापनन

English

All these are the sons of the noble-souled Kasyapa, the son of Marici who exists now. They will be born in the Savarna Manvantara.

अध्याय १९५

श्लोक 2

मार्कण्डेय उवाच: पृथिव्यां यानि तीर्थानि देवैर्मुनिगणैरपि ।सेवितानि महाबाहो तानि ध्यातानि विष्णुना

mārkaṇḍeya uvāca: pṛthivyāṃ yāni tīrthāni devairmunigaṇairapi / sevitāni mahābāho tāni dhyātāni viṣṇunā

हिन्दी अर्थ

एवं ब्रह्मा के मानसिक पुत्र कहे जाते हैं। उनके नाम हैं, सुत्रामा, सुरषर्मा, और सुकर्मा ये ही भावी मन्वध्तर में सोमरस पान करनेवाले देवताओं के पदों पर प्रतिष्ठत होते हैं । यज्ञकर्त्ताओं के समेत इस मन्वन्तर में देव- ताओं की कुल्न संख्या तेतीस होती हैं ।६८-१०२। आज्य, पृषदाज्य, ग्रहश्नेष्ठ एवं अन्याय देवगणों को मिलाकर भी वह देवसंख्या तेतीस ही होती है। इनका अलग अलग वर्णन कर रहा है, सुनिये। सम्प्रति प्रयाज और

English

He who was formerly Bali, the son of Virocana, will become their Indra. Nine sons will be born to Savarna Manu, viz. Viravan, Avarlyan, Nirmoha, Satyavak, Krti, Carisnurajya, Visnu, Vaca and Sumati.

अध्याय १९५

श्लोक 3

समागतान्येकतां वै तत्र तीर्थे युधिष्ठिर ।तत् तीर्थं वैष्णवं पुण्यं देवतीर्थम् इति श्रुतम्

samāgatānyekatāṃ vai tatra tīrthe yudhiṣṭhira / tat tīrthaṃ vaiṣṇavaṃ puṇyaṃ devatīrtham iti śrutam

हिन्दी अर्थ

आज्यप नाम से प्रसिद्ध सभी देवगण सुत्रामा नामक गण के अधीन हैं । अनुयाज्य और पृषदाज्याशी देवगण सुकर्मा नामक गण के अन्तर्गत हैं ॥१०३- १०५॥। उपयाज्य नामक देवगण सभधर्मा नामक गण के अधीन कहे गये हैं । इन सब देवगणों के स्वामी इन्द्र महाबलवान् दिवस्पति होंगे ।०५। रुचि के इन पृुत्रणणों को पुलह के पोत्र जानना चाहिए । अज्धिरा पुत्र धृतिमान्, पुलस्त्यगोत्रीय पथ्यवान्, पुलह स्वरूप - ये सात तेरहवें मन्वन्तर के ऋषि कहे जाते हैं। चित्रसेन, विचित्र, तपोधर्म, धृत, भव, अनेकबद्ध, क्षत्दद्ध, सुरस, निभेय और पृथ--ये रौच्य मन्वन्तरीय मनु के पुत्र कहे जाते हैं

English

I shall mention nine more in the other Savarna Manvantaras. Other Savarna Manus will be born as Brahma's (future) sons. They are seen as Merusavarnis by those end¬ owed with divine vision. They are the grandsons of Daksa, the sons of his beloved daughter.

अध्याय १९५

श्लोक 4

कुरुक्षेत्रं भुवि परमन्तरिक्षे त्रिपुष्करम् ।पुरुषोत्तमं दिवि परं देवतीर्थं परात्परम्

kurukṣetraṃ bhuvi paramantarikṣe tripuṣkaram / puruṣottamaṃ divi paraṃ devatīrthaṃ parātparam

हिन्दी अर्थ

चौदहवें भौत्य नामक मन्वन्तर में देवताओं के पाँच गण कहे जाते हैं उनमें नाम हैं, भाजर और वाचावृद्ध । परवर्ती मनु के सातों पुत्रों को ही चाक्षुष देवगण जानो, पण्डित

English

They are endowed with great penance and great splendour. They live on the ridges of Meru. They are pro¬ created by Brahma and other (Devas) as well as by the intelli¬ gent Daksa.

अध्याय १९५

श्लोक 5

देवतीर्थसमं नास्ति तीर्थम् अत्र परत्र च ।यत्प्राप्य मनुजस्तप्येन्न कदाचिद् युधिष्ठिर

devatīrthasamaṃ nāsti tīrtham atra paratra ca / yatprāpya manujastapyenna kadācid yudhiṣṭhira

हिन्दी अर्थ

इत आरभ्य विद्धि चाक्ष॒षानित्यन्तप्न्थो घ, पुस्तके तास्ति । शंततमोष्ण्योयः है७७

English

They were bom in the previous Caksusa Manvantara. These noble persons had been in the Maharloka. After return¬ ing from there they will resort to Meru.

अध्याय १९५

श्लोक 6

देवैरुक्तानि तीर्थानि यो ऽत्र स्नानं समाचरेत् ।देवतीर्थे स सर्वत्र स्नातो भवति मानवः

devairuktāni tīrthāni yo 'tra snānaṃ samācaret / devatīrthe sa sarvatra snāto bhavati mānavaḥ

हिन्दी अर्थ

सप्त लोकाः परित्रास्ते भाजिराः सप्त सिन्धवः

English

How were the sons procreated by Daksa in his own daughter? How were they created by Bhava, Dharma and Brahma the noble souls?

अध्याय १९५

श्लोक 7

एवमस्त्विति तैरुक्ता देवा ऋषिगणा अपि ।संतुष्टाः श्रीशमभ्यर्च्य स्वं स्वं स्थानं तु भेजिरे

evamastviti tairuktā devā ṛṣigaṇā api / saṃtuṣṭāḥ śrīśamabhyarcya svaṃ svaṃ sthānaṃ tu bhejire

हिन्दी अर्थ

लेजसा तपसा बुद्ध्या बलभ्रुतपराक़मे:। अलोक्ये यानि सत्त्वानि गतिमन्ति पश्रुवाणि च॥ स्वशः स्वर्गुणस्तानि इस्द्रास्तेडभिभवन्ति वे क्‍ ३११४ अग्नोध्नः काश्यपश्चंव पोौलस्त्यो मागधश्व यः । भागंवो हाग्निबाहुश्न शुचिराजड्िरसस्तथा ॥

English

After bowing to Pracetas, henceforth, I shall mention the future Manus who are the Savarna Manus, their origin as well as their prowess.

अध्याय १९५

श्लोक 8

सूर्यग्रहे ऽत्र वै क्षेत्रे स्नात्वा यत्फलमश्नुते ।स्नात्वा श्रीशं समभ्यर्च्य समुपोष्य यथाविधि

sūryagrahe 'tra vai kṣetre snātvā yatphalamaśnute / snātvā śrīśaṃ samabhyarcya samupoṣya yathāvidhi

हिन्दी अर्थ

सावर्णा सनवो होते चत्वारों ब्रह्मणः सुता:। एकौ वेवस्व॒तश्चेव सावर्णो मनुरुच्यते

English

When a short period of Caksusa Manvantara remained and the Vaivasvata Manvantara had begun, those who will be the Manus in the future Manvantara were born.

अध्याय १९५

श्लोक 9

यद्ददाति हिरण्यानि दानानि विधिवन्नृप ।तदनन्तफलं सर्वं सूर्यस्य ग्रहणे यथा

yaddadāti hiraṇyāni dānāni vidhivannṛpa / tadanantaphalaṃ sarvaṃ sūryasya grahaṇe yathā

हिन्दी अर्थ

को ही सात्ष कनिष्ठ देवगण बतलाते हैँ। सातों लोक पवित्र (परित्रस्त) एवं सातों समुद्र भाजर (भाजिर) नाम से बतलाये जाते हैं ।!१०-११२। सातों ऋषियों को वाचाधृद्ध देवता जानो । स्वायम्भृव मनु से लेकर सभी मनुओं के अधिकार काल में जितने इन्द्र होते हैं, उन सबको एक ही प्रकार के स्वभाव, मर्यादा एवं प्रभाव सम्पन्न जानना चाहिए अपने तेज, तपस्या, बुद्धि, झ्ास्त्रीय ज्ञान, बल, पराक्रम एवं गुणों से वे इन्द्रणण इस श्रेलोक्य में जितने भी स्थावर जद्भम जीवनिकाय हैं, सब का अतिक्रमण करते हैं, अर्थात् उनके समान कोई अन्य नहीं होता । केवल ब्रह्म सत्य है ।१ १३-११४। समस्त स्थावर जंगमाध्मक जगत् मिथ्या है, इन भूतों की कोई सत्ता नहीं है--ऐसे मतवाले भूतापवादी हैं, और वे हो सच्चे अर्थों में प्रसन्नचित रहते हैं, ये जीव जगत सब नित्य एवं अनित्य-दोनों हैं, वे भृतवादी हैं, उन्हें मध्यफोटि का समझना चाहिए, संसार एवं उसकी वस्तुएं सभी नित्य

English

Of those Manus who are the daughter's sons of Pracetasa Daksa, the five named Savarnas and four are born from great sages.

अध्याय १९५

श्लोक 10

भूमिदानं धेनुदानं स्वर्णदानमनन्तकम् ।वज्रदानमनन्तं च फलं प्राह शतक्रतुः

bhūmidānaṃ dhenudānaṃ svarṇadānamanantakam / vajradānamanantaṃ ca phalaṃ prāha śatakratuḥ

हिन्दी अर्थ

एवं अविनश्वर हैं ऐसा जानकर जो उसी में भनुरक्त रहते हैं, वे भूतानुवादी हैं, उत्कृष्ट पण्डितों द्वारा जगत की ये तीन व्याख्याएं की जाती हैं। अग्नीधज, काश्यप, पौलस्त्य, माग्रध, भागवें, अग्निबाहु, अंगिरसू, शुचि और परम तेजस्वी सुबल--ये भौत्यमनु के अधिकार काल में उत्पन्न होनेवाले उनके पूत्र हैं ।१ १५-११६। उपर्थक्त ये चार मनु गण, जो सावण्ण मनु के नाम से बिख्यात हैं, बे ब्रद्मादि चारों देवताओं के पुत्र हैं, विवस्वान् सूर्य के पुत्र

English

One Savarna is the son of Samjna born of Vivasvan (the Sun-god). The eldest son of Samjna is Lord Manu, son of the Sun-god (Vivasvan)

अध्याय १९५

श्लोक 11

सोमो वै वस्त्रदानेन मौक्तिकानां च भार्गवः ।सुवर्णस्य रविर्दानं धर्मराजो ह्यनन्तकम्

somo vai vastradānena mauktikānāṃ ca bhārgavaḥ / suvarṇasya ravirdānaṃ dharmarājo hyanantakam

हिन्दी अर्थ

एक वैवस्वत मनु भी स्रावर्ण मनु कहे जाते हैं। रोच्य और भोत्य--ये दो पुलह और भागंव गोत्रीय हैं । इन्हों भौत्य मनु के अधिकार काल में कल्प की परिसमाप्ति हो जाती है + एसदर्धस्थाने सप्त तांस्तान्भागान्विद्धि चाक्षुषसंज्ञकात्तिति क. पुस्तके । ग. डः« पुस्तकयेरेतदर्ध॑ त्रुटित- मस्ति । अन्राध्यायसमाप्ति: ख, पुस्तके ।

English

Their auspicious manifestation was (took place) at the advent of the Vaivasvata Manvantara. The fourteen Manus are glorified as the enhancer of fame.

अध्याय १९५

श्लोक 12

देवतीर्थे तु यद्दानं श्रद्धायुक्तेन दीयते ।तदनन्तफलं प्राह बृहस्पतिरुदारधीः

devatīrthe tu yaddānaṃ śraddhāyuktena dīyate / tadanantaphalaṃ prāha bṛhaspatirudāradhīḥ

हिन्दी अर्थ

हैजद रा वायुपुराणम्

English

These Manus are described in the Vedas, Srutis* and Puranas as very powerful Prajapatis. All of them were the lords of all living beings.

अध्याय १९५

श्लोक 13

देवतीर्थे भृगुक्षेत्रे सर्वतीर्थाधिक नृप ।देवतीर्थे नरः स्नात्वा श्रीपतिं यो ऽनुपश्यति

devatīrthe bhṛgukṣetre sarvatīrthādhika nṛpa / devatīrthe naraḥ snātvā śrīpatiṃ yo 'nupaśyati

हिन्दी अर्थ

सप्तेते भागंवा देवा अन्ते मस्वन्तरे तदा। भुक्त्वा प्रैलोक्यमध्यस्था युगारुयां होकसप्ततिम् महलोंकि गमिष्यन्ति त्यकत्वा त्रेलोक्यमीश्वराः । ततस्तेषु गतेषध्यं क्षीणे मन्वस्तरे तदा

English

The entire Earth consisting of the seven continents and mountains is to be protected by these kings for a full thousand Yugas.

अध्याय १९५

श्लोक 14

सोमग्रहे कुलशतं स समुद्धृत्य नाकभाक् ।दानानि द्विजमुख्येभ्यो देवतीर्थे नराधिप

somagrahe kulaśataṃ sa samuddhṛtya nākabhāk / dānāni dvijamukhyebhyo devatīrthe narādhipa

हिन्दी अर्थ

ततः स्थानानि शुन्‍्यानि स्थानिनां तानि वे द्विजाः । प्रश्नश्यन्ति विमुक्तानि ताराऋक्षग्रहैसतथा ॥ ततस्तेषु व्यतीतेषु तैलोक्यस्येश्वरेष्विह । सेन्द्रास्तेषु महलोंकि यस्मिस्ते कल्पवासिनः.... श्र

English

Their details will be mentioned along with their progeny

अध्याय १९५

श्लोक 15

यैर्दत्तानि नरैर्भोगभागिनः प्रेत्य चेह ते ।देवतीर्थे विप्रभोज्यं हरिम् उद्दिश्य यश्चरेत्

yairdattāni narairbhogabhāginaḥ pretya ceha te / devatīrthe viprabhojyaṃ harim uddiśya yaścaret

हिन्दी अर्थ

जिताधांश्च गणा हात्र चाक्षुषान्ताश्रतुर्देश । मस्वस्तरेषु सर्वेषु देवास्ते वे महौजसः. ततस्तेषु गतेषूध्व॑ं सायो (यु) ज्यं कल्पवासिनाम् । समेत्य देवास्ते सर्वे प्राप्त संकलने तदरा ४१२६ महलोंक परित्यज्य गणास्ते वे चतु्दंश सशरीराश्च श्रूयन्ते जनलोक सहानुगाः... 0१ २७

English

They hold office as the presiding Authorities in the Manvantaras only once each. After the tenure of their office they resort to Maharloka.

अध्याय १९५

श्लोक 16

स सर्वाह्लादमाप्नोति स्वर्गलोके युधिष्ठिर ।देवतीर्थे नरो नारी स्नात्वा नियतमानसौ

sa sarvāhlādamāpnoti svargaloke yudhiṣṭhira / devatīrthe naro nārī snātvā niyatamānasau

हिन्दी अर्थ

एवं देवेष्वतीतेषु महलोंकाज्जन प्रति । भूतादिष्ववशिष्टेषु स्थावरान्तेषु चाप्युत. ... , "१२८ ) शुन्येषु लोकस्थानेषु महान्तेषु भूरादिषु । देवेषु च गतेषध्वं सायो (यु) ज्यं कल्पवासिनामू

English

(Defective verse) Among them eight have already ceased to operate; (excepting) six more Manus are the others who will come in the future. At present it is Lord Vaivasvata Manu who rules.

अध्याय १९५

श्लोक 17

उपोष्यैकादशीं भक्त्या पूजयेद् यः श्रियः पतिम् ।रात्रौ जागरणं कृत्वा घृतेनोद्बोध्य दीपकम्

upoṣyaikādaśīṃ bhaktyā pūjayed yaḥ śriyaḥ patim / rātrau jāgaraṇaṃ kṛtvā ghṛtenodbodhya dīpakam

हिन्दी अर्थ

सूत बोले :--ऋषिवृन्द ! सभी मल्वन्तर जब समाप्त हो जाते हैं ओर उनमें अनेक युग व्यतीत हो जाते हैं, तब सुष्ठि का संहार होता है--ऐसा कहां जाता है। भन्तिम मन्वन्तर में ये सात भूगुवंशोत्पन्न देवगण इकदृत्तर युगों तक समस्त त्ैलोक्य में विराजमान रह कर समस्त भोगों का उपभोग करेंगे और अन्त में पितरों, म्ुनियों, सप्तधियों, अस्यान्य यज्ञ पद यजमानों एवं भक्तों के साथ तीनों लोकों का परित्याग करके वे सवंशक्ति सम्पन्न देवगण महलोंक को चले जायंगे ।११९-१२१३। इस भकार जब वे सब छोड़ कर मस्वन्तर को समाप्ति हो जाने पर चले जायेंगे तब यह भंलोक्‍्य निराधार हो जायगा । द्विजवुन्द ! उस समय सभी स्थान शुन्य हो जायगा, स्थानी ( अभिमानी ) देवगण भी अपने अपने स्थान छोड़ देंगे । तारायें, नक्षत्र, ग्रहादि निरवलम्ब होकर विध्वंस हो जाते हैं (२२-११३॥। ेलोक्य के समस्त

English

I shall mention those who remain, those who are the future Brahmanas (Manus), along with Devas, Danavas and sages as well as their (other) creation of the subjects.

अध्याय १९५

श्लोक 18

द्वादश्यां प्रातरुत्थाय तथा वै नर्मदाजले ।विप्रदाम्पत्यम् अभ्यर्च्य विधिवत्कुरुनन्दन

dvādaśyāṃ prātarutthāya tathā vai narmadājale / vipradāmpatyam abhyarcya vidhivatkurunandana

हिन्दी अर्थ

पामथ्यंसम्पन्न॒ शक्तियों के समाप्त हो जाने पर इल्द्रादि प्रमुख देवगण, चाक्षुपादि समस्त भनृगण एवं अन्याय महान् तेजस्वी देवगण--सभी महलकि में जाकर वहाँ कल्पपयंन्त स्थिर निवास करनेवाले

English

The details of the creation of these Manus are to be known through the creative activity of Vaivasvata Manu, since they are neither inferior nor superior to those of Vaivasvata Manu.

अध्याय १९५

श्लोक 19

वस्त्राभरणताम्बूलपुष्पधूपविलेपनैः ।अक्षये विष्णुलोके ऽसौ मोदते चरितव्रतः

vastrābharaṇatāmbūlapuṣpadhūpavilepanaiḥ / akṣaye viṣṇuloke 'sau modate caritavrataḥ

हिन्दी अर्थ

. मिलने पर जब प्रलय का जोर बहुत अधिक बढ़ जायगा, तब वे चौददों मनुगण अपने सहमामी अनुचरादि के साथ सदारीर जनलोक चले जाते हैं--ऐसा सुना जाता है ।१२४-१२७ देवताओं के महलुकि से जनलोंकि में चले जाने पर जब केवल स्थावर जीवनिकाय शेष रह जाते हैं, मह, भू आदि सभी शोगीं के स्थान शूत्य हो जाते हैं, देवगण कल्पपर्यध्त निवास करनेवाले अन्यान्य देवताओं के समान स्थान प्राप्तकर ऊपर चले संहृत्य तांस्तता ब्रह्मा वेबधिपितृदानवान् । संस्थापयति वे सर्ग महन्दृष्टवा युगंक्षये

English

I am not recounting their details for fear of repetition

अध्याय १९५

श्लोक 20

यः सदैकादशीतिथौ स्नात्वोपोष्यार्चयेद्धरिम् ।रात्रौ जागरणं कुर्याद् वेदशास्त्रविधानतः

yaḥ sadaikādaśītithau snātvopoṣyārcayeddharim / rātrau jāgaraṇaṃ kuryād vedaśāstravidhānataḥ

हिन्दी अर्थ

मेमिशिकः प्राकृतिको यश्चेबाउउत्यस्तिकोर्यतः त्रिविधः सर्वभृतानामित्येष प्रतिसंचरः .

English

I shall mention them, the creative activities in the different families only partially. The remaining things should be known through their details and in order.

अध्याय १९५

श्लोक 21

धर्मराजकृतां पापां न स पश्यति यातनाम् ।पञ्चरात्रविधानेन श्रीपतिं यो ऽर्चयिष्यति

dharmarājakṛtāṃ pāpāṃ na sa paśyati yātanām / pañcarātravidhānena śrīpatiṃ yo 'rcayiṣyati

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मो नेसित्तिकस्तस्य कल्पदाहः प्रसंयमः । प्रतिसगें तु भूतानां प्राकृतः करणक्षयः.. शानाचउचा55त्यन्तिकः प्रोक्त: कारणानामसंभवः । ततः संहृत्य तान्ब्रह्मा देवांस्त्रेलोक्यवासिनः

English

Daksa had a pious daughter who was well known as Suvrata. Although she was the youngest of the daughters, she was the most excellent and the most pious. Once the father took her with him and approached Brahma.

अध्याय १९५

श्लोक 22

दीक्षामवाप्य विधिवद्वैष्णवीं पापनाशिनीम् ।स्वर्गमोक्षप्रदां पुण्यां भोगदां वित्तदामथ

dīkṣāmavāpya vidhivadvaiṣṇavīṃ pāpanāśinīm / svargamokṣapradāṃ puṇyāṃ bhogadāṃ vittadāmatha

हिन्दी अर्थ

ततो युगसहस्रास्ते संप्राप्ते चर युगक्षये । तत्रा5पत्मस्थाः प्रजा: कर्तु प्रपेदे स प्रजापतिः

English

He was in the Vairaja region seated along with Dharma and Bhava. Brahma spoke to Daksa in the presence of Dharma and Bhava.

अध्याय १९५

श्लोक 23

राज्यदां वा महाभाग पुत्रदां भाग्यदाम् अथ ।सुकलत्रप्रदां वापि विष्णोर् भक्तिप्रदाम् इति

rājyadāṃ vā mahābhāga putradāṃ bhāgyadām atha / sukalatrapradāṃ vāpi viṣṇor bhaktipradām iti

हिन्दी अर्थ

तदा भवत्यनावृष्टिस्तदा सा शतवाधिकी । तथा यएयल्पसाराणि सत्त्वानि पथिवीतलि. जाते हैं, उस समय ब्रह्मा देवताओं, ऋषियाँ, पितरों, दानवॉ--सब का संहार कर युगक्षय पर महती वृष्टि के द्वारा सृष्टि की पुनः स्थापना करते हैं ॥!२८-१३०। एक सहस्र चतुर्युग का ब्रह्मा का एक दिन बतलाया जाता है और इसी प्रकार एक सहख्र चतुर्यूण कौ उनकी रात्रि, दिन रात्रि के नाम को जानने वाले ज्योतिषी लोग जानते हैं। नैमित्तिक, प्राकृतिक एवं आत्यन्तिक-जीवों के ये तीन प्रकार के प्रलय जतलाये जाते हैं,

English

"O Daksa, this, your daughter Suvrata will give birth to four sons who will become the auspicious Manus and stabilise the discipline of four castes."

अध्याय १९५

श्लोक 24

तरिष्यति भवाम्भोधिं स नरः कुरुनन्दन ।यो ऽर्चयिष्यति तत्रैव देवतीर्थे श्रियः पतिम्

tariṣyati bhavāmbhodhiṃ sa naraḥ kurunandana / yo 'rcayiṣyati tatraiva devatīrthe śriyaḥ patim

हिन्दी अर्थ

अर्थानुसार इनकी चरिताथंता होती है। इनमें ब्रह्मा द्वारा किया गया कल्पदाह प्रसंयम और नैमित्तिक है ।. जिन प्रलय में भूतों के कारणों ( असाधारण कारणों ) का क्षय हो जाता है उसको प्राकृतिक प्रलय कहते हैं ॥३१-१२३। अच्छी तरह जान बूझकर किये गये उस महान प्रलय को, जिसके बाद कारणीभूत उपादानों का अस्तित्व एक दम नष्ट हो जाता है, वे असम्भव हो जाते हैं, आत्यन्तिक प्रलय कहते हैं। त्रेलोक्य-

English

On hearing the words of Brahma, the three—Daksa, Dharma and Bhava approached that girl mentally along with Brahma.

अध्याय १९५

श्लोक 25

विश्वरूपमथो सम्यङ्मूलश्रीपतिमेव वा ।नारायणगिरिं वापि गृहे वैकादशीतिथौ

viśvarūpamatho samyaṅmūlaśrīpatimeva vā / nārāyaṇagiriṃ vāpi gṛhe vaikādaśītithau

हिन्दी अर्थ

वासी उन देवताओं का संहार करने के उपरान्त अपने एक दिन के बाद पुनः सृष्टि का प्रतलय करते हैं । उस समय शयन करने को इच्छा से भगवान् ब्रह्मा प्रजाओं का संहार करते हैं। इस प्रकार एक सहस्त युग के व्यतीत हो जाने के उपरान्त युवक्षय के प्राप्त होने पर प्रजापति आत्मस्थ समस्त प्रजाओं का विस्तार करने में प्रवत्त होते हैं ।३४-१३६। उस समय सी वर्ष व्यापी घोर अनावष्टि होती है, जिससे प्रथ्वीतल में जो अल्पसार प्राणी शेष रह जाते हैं, वे भी विनष्ट होकर प्रृथ्वी रूप में परिणत हो जाते हैं । विभावसु सात विशिष्ट रदिमयों से समन्वित होकर उदित होते हैं, और अपनी तीवण रश्मियों से जलराशि का शोषण करते हैं । उस समय उनकी रश्मियों का तेज असह्य हो जाता है वे रहिमयाँ हरित वर्ण की एवं परम तेजोमयी होती हैं, उनका सात भाग होता है ।१३७-१३६९। वे शन

English

The girl immediately gave birth to four sons who were similar to and befitting those four divine personages as they were of truthful meditation.

अध्याय १९५

श्लोक 26

भक्तिमाञ्छ्रद्धया युक्तः क्षीरैस्तीर्थोदकैरपि ।सुसूक्ष्मैर् अहतैर् वस्त्रैर् महाकौशेयकैर् नृप

bhaktimāñchraddhayā yuktaḥ kṣīraistīrthodakairapi / susūkṣmair ahatair vastrair mahākauśeyakair nṛpa

हिन्दी अर्थ

+ इत आरम्य प्रतिसंचर इत्यन्तग्रन्थो ड. पुस्तके नास्ति ।

English

Those sons were born fully endowed with physical bodies, born in a trice but capable of all enjoyment, and com¬ petent to perform all activities. They were endowed with glory.

अध्याय १९५

श्लोक 27

विचित्रैर् नेत्रजैर् वापि धूपैरगुरुचन्दनैः ।गुग्गुलैर् घृतमिश्रैश्च नैवेद्यैर् विविधैर् अपि

vicitrair netrajair vāpi dhūpairagurucandanaiḥ / guggulair ghṛtamiśraiśca naivedyair vividhair api

हिन्दी अर्थ

भूय एव विवतंस्ते ध्याप्नुवस्तों बने शने:। भौस काष्ठ धनं तेजो भृशमडिस्तु दीप्पते १४० तस्मादुदक सूर्स्थ तपतो5पि हि कथ्यते । नावुष्द्या तपते सूर्यो नावष्टया परिविष्यते.. ततस्ते रश्मयः सप्त सूर्य भूताश्नतुदिशम् । चतुर्लोकमिसं सर्व दहस्ति शिखिनस्तदा १४४ प्राप्तुतष्ति ल भाभिस्तु ऊध्वे चाधश्व रश्मिभिः। दीप्यन्ते भास्कराः सप्त युगान्ताग्निप्रतापिनः ॥

English

On seeing them, those deities who had realised Brahman began to claim "This is my son, This is my son 5 '. They began to tug at them furiously.

अध्याय १९५

श्लोक 28

पायसाद्यैर् मनुष्येन्द्र पयसा वा युधिष्ठिर ।पिष्टदीपैः सुविमलैर् वर्धमानैर् मनोहरैः

pāyasādyair manuṣyendra payasā vā yudhiṣṭhira / piṣṭadīpaiḥ suvimalair vardhamānair manoharaiḥ

हिन्दी अर्थ

शनेः पृथ्वीस्थ समस्त जल राशि में व्याप्त होकर अधिकाचिक विवतित हो जाती हैं। भौम, काष्ठ, वन, तेज प्रभ्नति में पुनः पुनः परिव्याप्त होकर वे रदिमयाँ जल से बहुत अधिक प्रदीष्त हो उठती हैं ज्वलनात्मक सूर्य के अधिक ताप का कारण इसी लिए जल कहा जाता है, अनावष्टि से सूर्य तप्त नहीं होते और न अनावष्टि से उनके मण्डल सन्निवेश आदि में ही कोई विशेष दीप्ति होती है, यही नहीं बल्कि

English

Since they mentally created sons through meditation, they said to one another: "Let us select that boy as our respec¬ tive son who is similar to us physically.

अध्याय १९५

श्लोक 29

पूजयित्वा नरो याति यथा तच्छृणु भारत ।शङ्खी चक्री गदी पद्मी भूत्वासौ गरुडध्वजः

pūjayitvā naro yāti yathā tacchṛṇu bhārata / śaṅkhī cakrī gadī padmī bhūtvāsau garuḍadhvajaḥ

हिन्दी अर्थ

अनावुष्टि से उनकी रहदिमयाँ प्रृथ्वीस्थ पदार्थों के श्सादि का संचयन नहीं कर पाती हैं । केवल जल से रवि उह्ीप्त होते हैं.। अपनी किरणों द्वारा जलराधशि का पान करते हुए वे आकाश मण्डल में प्रकाशित होते हैं। उनकी वे सातों किरणें समुद्र से जल का पान करती हैं । उस जल रूप आहार से संदीप्त होकर सूर्य सात हो जाते हैं ॥!४०-१४३। इस प्रकार उनकी वे सातों रश्मियाँ सूर्य रूप हो चारों दिल्लाओं में व्याप्त होकर चारों लोकों को अग्नि की भाँति दस्घ कर देती हैं। नीचे ऊपर सर्वत्र अपनी उन प्रखर तेजस्विनी किरणों द्वारा युगास्तकालीन अग्नि के समान परम उद्दीप्त वे सातों भास्कर परम तप्त हो उठते हैं ।१४४-१४५॥। जलराशि के पान करने के कारण उत्तरोत्तर अधिक उद्दीप्त होनेवाली अनेक सहस्र रदिभयों से समन्वित वे सूरयवन्द समस्त वसुन्धरा को दग्ध करते हुए सारे आकाश मण्डल में प्रकाशित होते हैं। उन सभों के परम

English

If a boy is similar to one in features, prowess and name as well as complexion, one shall take him as one's gentle son.

अध्याय १९५

श्लोक 30

देवलोकान् अतिक्रम्य विष्णुलोकं प्रपद्यते ।यस्तु वै परया भक्त्या श्रीपतेः पादपङ्कजम्

devalokān atikramya viṣṇulokaṃ prapadyate / yastu vai parayā bhaktyā śrīpateḥ pādapaṅkajam

हिन्दी अर्थ

प्रखर प्रताप से दग्घ होती हुईं वसुन्धरा पर्वतों, नदियों एवं समुद्रों समेत सूखी हो जायगी, कहीं पर आहर्ता के चिह्न भी शेष न रहेंगे । चारों ओर से विचित्र रंग बिरंगी परम तेजस्विनी उन सूर्य रश्मियों से समस्त पृथ्वी मण्डल, ऊपर नीचे सरव्ंत्र व्याप्त हो जाता है ।१४६-१४८! सूर्य के भ्रताप से उत्पन्न होने बाली अग्नियाँ इस

English

A son emulates the features of his father invariably. Hence the son is born taking after the father and the mother."

अध्याय १९५

श्लोक 31

चतुर्धाधिष्ठितं पश्येच्छ्रियं त्रैलोक्यमातरम् ।नृत्यगीतविनोदेन मुच्यते पातकर्ध्रुवम्

caturdhādhiṣṭhitaṃ paśyecchriyaṃ trailokyamātaram / nṛtyagītavinodena mucyate pātakardhruvam

हिन्दी अर्थ

सर्वलोकप्रणाशं च सोउग्निर्भुत्वा तु सण्डलो । चतुर्लोकलिदं सर्व निर्दहत्याशु तेजसा तलः संवर्तक: शेलानतिक़म्प महांस्तया । लोकास्संहरते दौप्तो घोरः संवर्तकोश्नलः

English

After coming to terms like this, they took those boys who were similar in complexion ( Savarna ) to them. Since the boys were similar in complexion to god Brahma and others, they are called Savarna. Since they were meditated upon and were accepted respectfully, they are remembered as Manus.

अध्याय १९५

श्लोक 32

नीराजने तु देवस्य प्रातर्मध्ये दिने तथा ।सायं च नियतो नित्यं यः पश्येत् पूजयेद्धरिम्

nīrājane tu devasya prātarmadhye dine tathā / sāyaṃ ca niyato nityaṃ yaḥ paśyet pūjayeddharim

हिन्दी अर्थ

लत: स पृथिवीं भिस्वा रसातलमशोषयत् । निर्देहा तांस्तु पातालान्नागलोकमथादहत् ११५७ अधस्तात्पूथियीं दग्ध्या ऊध्वं स वहते दिवम्। योजनानां सहक्राणि अयुतास्यबृंदानि च ॥१र८

English

When the Caksu?a Manvantara expired and the Vaivasvata Manvantara set in, a son named Raucya was born to Ruci, the Prajapati.

अध्याय १९५

श्लोक 33

स तीर्त्वा ह्यापदं दुर्गां नैवार्तिं समवाप्नुयात् ।आयुःश्रीवर्धनं पुंसां चक्षुषाम् अपि पूरकम्

sa tīrtvā hyāpadaṃ durgāṃ naivārtiṃ samavāpnuyāt / āyuḥśrīvardhanaṃ puṃsāṃ cakṣuṣām api pūrakam

हिन्दी अर्थ

ग्रकार जब बहुत अधिक वृद्धि को प्राप्त हो जाती हैं, तब परस्पर मिल कण एक ज्वाला के रूप में परिणत ही. जाती है। एक मण्डलाकार स्वरूप धारणकर वह भग्नि चारों लोकों को अपने परम तेज से शीघ्र ही भस्म कर हि देती है, उस समय सभी लोकों का विनाश हो जाता हैं, सभी स्थावर जंगम जीवनिकाय विलीन हो जाते हैं, 'वृथ्वी वृक्षों एवं ठृणों से विहीन होकर कच्छप की पीठ की भाँति हों जाती है ।१४९-१५४१ । चारों ओर से इस प्रकार वक्षादि रहित जगत् एक भाड़ की तरह दिखाई पड़ता है, सारा आकाश मण्डल ज्वालाओं से देदीप्यमान हो जाता है, पाताल में जो जीव समूह रहते हैं, महान समुद्रों में जिन जन्तुओं का निवास रहता है, वे भी विलीन होकर पृथ्वी रूप में परिणत हो जाते हैं ।१५२-१४५२। सभी जीवों में व्याप्त रहने वाले अग्निदेव सातों द्वीपों, प्रवंतों, समस्त वर्षों दिक्षों) एवं महासमुद्रों तक को भस्म कर देते हैं। सवत्र व्याप्त अग्नि उस समय

English

He who was born of Bhuti became known by the name Bhautya. In the Vaivasvata Manvantara two sons were born to Vivasvan.

अध्याय १९५

श्लोक 34

उपपापहरं चैव सदा नीराजनं हरेः ।तदा नीराजनाकाले यो हरेः पठति स्तवम्

upapāpaharaṃ caiva sadā nīrājanaṃ hareḥ / tadā nīrājanākāle yo hareḥ paṭhati stavam

हिन्दी अर्थ

जब समुद्रों, नदियों, पातालस्थ प्रदेशों से जलरासि का पान करते हुए परम जाज्ज्वल्यमान होकर प्रथ्वी का आश्रय लेती है, तब महान् संवतंक नामक अश्नि पर्वतों का अतिक्रमण कर घोर रूप हो समस्त लोकों का विनाझ करने लगती है। पृथ्वी का भेदन कर वह रसातल को शुष्क कर देती है, पाताल के सभी प्रदेशों को भस्म कर वह नाभों का लोक जला देती है ।११४-१५७। निम्न भूमण्डल का दहन करने के उपरान्त ऊपर आकाशस्थ

English

One is well known as Vaivasvata Manu and the other as Savarna. The learned Lord Vaivasvata Manu was the eldest son of Sarhjna.

अध्याय १९५

श्लोक 35

स धन्यो देवदेवस्य प्रसन्नेनान्तरात्मना ।हरेर् नीराजनाशेषं पाणिभ्यां यः प्रयच्छति

sa dhanyo devadevasya prasannenāntarātmanā / harer nīrājanāśeṣaṃ pāṇibhyāṃ yaḥ prayacchati

हिन्दी अर्थ

प्रदेशों एवं पिडों का दहत करती है, उस समय महान् संवर्तक की ज्वालाएँ सहस्रों, लाखों अरबों योजनों तक ऊपर को उठती हैं। गन्धवों, पिशाचों, सर्पों एवं राक्षसों के था श्रयों को सर्वाशतः भस्म करने के उपरान्त गोलोक को भी वह भस्म कर देती है ।१५८-१५९। इस प्रकार कालाग्नि घोर स्वरूप धारण कर भू, भुव स्व एवं मह-- केगर क्‍ .. बापूपुराणम्

English

The other Vaivasvata Manu was the son of Savarna (i.e. Chaya, the shadow of Sarhjna). The four Savarna Manus born of the great sages will be equipping themselves with (the power of) penance. They will achieve all their tasks in their respective future Manvantaras.

अध्याय १९५

श्लोक 36

संगृह्य चक्षुषी तेन योजयेन् मार्जयन्मुखम् ।तिमिरादीनक्षिरोगान् नाशयेद् दीप्तिमन्मुखम्

saṃgṛhya cakṣuṣī tena yojayen mārjayanmukham / timirādīnakṣirogān nāśayed dīptimanmukham

हिन्दी अर्थ

चूलोक तु भुवर्लोक स्थलॉक व महस्तथा। घोरो दहति कालाग्निरेवं लॉकचतुष्टयम्

English

(Defective verse) The sons of the first Merusavarni Manu who was the son of Daksa were the three groups, Marlci- garbhas, Susarmans and Paras. All these noble-souled ones were born in the Vaivasvata Manvantara. They are the sons of Rohita, the Prajapati, the son of Daksa. In future each of these groups will consist of twelve Devas.

अध्याय १९५

श्लोक 37

भवत्य् अशेषदुष्टानां नाशायालं नरोत्तम ।दीपप्रज्वलनं यस्य नित्यमग्रे श्रियः पतेः

bhavaty aśeṣaduṣṭānāṃ nāśāyālaṃ narottama / dīpaprajvalanaṃ yasya nityamagre śriyaḥ pateḥ

हिन्दी अर्थ

व्याप्तेषु तेषु लोकेंबु तियंगरष्वंभधारिनना । तत्तेजः समनृप्राप्तं कृत्स्नं जगविवं शनेः । अयोगुडनिभ सब तदा होब॑ प्रकाशते... क्‍ ततो गजगुलाकारास्तडिख्िः समलंकृताः । उत्तिष्ठन्ति तदा धोरा व्योम्नि संवर्तका घनाः

English

(Defective) Aisvarya-Sangraha, Raha, Bahuvasa (and the remaining) should be known as twelve Para gods. Under¬ stand the later ones.

अध्याय १९५

श्लोक 38

स्नात्वा रेवाजले पुण्ये प्रदद्यादधिकं व्रती ।सप्तद्वीपवती तेन ससागरवनापगा

snātvā revājale puṇye pradadyādadhikaṃ vratī / saptadvīpavatī tena sasāgaravanāpagā

हिन्दी अर्थ

केचिप्तीलोत्पलश्यामा केचित्कुसुदसंनिभाः । केचिहवदूयंसंकाशा इखनोलतनिभाः परे . (१६३ शद्भुकुरदनिभाश्वान्ये जात्यअ्जननिभास्तथा । घूज्वर्णा घनाः केचित्केचित्पीताः पयोधराः

English

Vajiya, Vajijit, Prabhuti, KakudI (?), Dadhikrava, Ayapakva, Pranita, Vijaya, Madhu, Tejasman and two Nathavas—these twelve constitute the Maricis. I shall re¬ count the Susarmans mentioning the names. Listen to (them) and understand. Varna, Anga, Visva, Muranya, Vrajana, Amita, Dravaketu, Jambhostha, Ajasra, Sakraka, Sunemi and Dyuta- pas—these twelve constitute SuSarmans. Their future Indra will be known by the name Adbhuta.

अध्याय १९५

श्लोक 39

प्रदक्षिणीकृता स्याद्वै धरणी शङ्करो ऽब्रवीत् ।इदं यः पठ्यमानं तु शृणुयात् पठते ऽपि वा

pradakṣiṇīkṛtā syādvai dharaṇī śaṅkaro 'bravīt / idaṃ yaḥ paṭhyamānaṃ tu śṛṇuyāt paṭhate 'pi vā

हिन्दी अर्थ

केथिद्रासभवर्णाभा लाक्षारकतनिभास्तथा । मनःशिलाभास्त्वपरे कपोताभास्तथाअस्ुदा: इच्त्रगोपनिभाः केचिदुत्तिष्ठस्ति घना दिवि। (केचित्पुरधराकाराः केचिवृगजकुलोपमाः १६६ केचित्पयं तसंकाशाः कैचित्स्थलनिभा धनताः) । कुण्डागारनिभाः केचित्केचित्मीनकुलोपमाः:

English

The seven sages in the Rohita Manvantara were— Skanda of fiery nature and resembling Soma and otherwise known as Kartikeya, Medhatithi of Pulastya lineage, Vasu of Kasyapa Gotra, Jyotisman of Bhrgu family, Dyutiman of Angiras lineage, Vasita of Vasistha Gotra, Havyavahana of Atri's Gotra and Sutapas of Paulava family.

अध्याय १९५

श्लोक 40

स्मरणं सो ऽतसमये विपाप्मा प्राप्नुयाद्धरेः ।इदं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं पितृगुणप्रियम्

smaraṇaṃ so 'tasamaye vipāpmā prāpnuyāddhareḥ / idaṃ yaśasyamāyuṣyaṃ svargyaṃ pitṛguṇapriyam

हिन्दी अर्थ

ततस्ते जलदा घोरा शाविणों भास्करात्मिकाः। सप्तथा संवृतात्मानस्तमग्नि शमयस्त्युत

English

In the tenth revolution (i.e. cycle of four Yugas?) the second Savarni, the son of Dharma, will be the Manu. In his Manvantara, there will be two groups of Devas, viz. Sukhamanas and Viruddhas. All of them will be Tvisivants ('highly effulgent') a hundred in number and mutually equal (?)—alike. They are said to be controlling the breath in (other?) persons by the sages. They will be the Devas at the time of the Manu, son of Dharma.

अध्याय १९५

श्लोक 41

माहात्म्यं श्रावयेद् विप्राञ्छ्रीपतेः श्राद्धकर्मणि ।घृतेन मधुना तेन तर्पिताः स्युः पितामहाः

māhātmyaṃ śrāvayed viprāñchrīpateḥ śrāddhakarmaṇi / ghṛtena madhunā tena tarpitāḥ syuḥ pitāmahāḥ

हिन्दी अर्थ

इन चारों लोकों को सर्वांशतः भस्मावशेष कर देती है। नीचे ऊपश॒ सत्र अग्नि से परिव्याप्त होकर धीरे-धीरे यह समस्त जगर्मण्डल तेजोमय होकर एक तपाये हुए लोहे के पिण्ड की भाँति प्रकाशमान होता है। उसके बाद हाथियों के समूहों के समान आकार वाले, विद्युतों से सुप्रकाशित संवर्तक नामक मेघगण घोररूप धारण कर आकाश भण्डल में उठ पड़ते हैं ।१६०-१६२। उनमें कुछ नीचे कमल के समान द्यामल धर्ण के, कुछ कुमुदिमी के समान श्वेत वर्ण के, कुछ वैदर्भ मणि के समान, कुछ इन्द्रतील के समान, कुछ कुल्द ओर हांख के समान अतिदाय धवेत, कुछ काजल के समान काले, कुछ धुएँ के समान अतिशय काले, कुछ पीले, कुछ गधे के समान घूसरित-रंगवाले, कुछ लाल के समान रक्तवर्ण वाले, कुछ मैनशिल के समान और कुछ कबूतरों के समान वर्ण वाले रहते हैं। १६३०१६५॥ यही नहीं, कुछ. इन्द्रमोप (एक बरसाती कीड़ा जो लाल रंग का होता है ।) के

English

Their Indra will be the great scholar Santi. The Seven Great Sages will be the glorious Havisman of the Pulaha family, Suklrti of Bhrgu race, Apomurti of Atri lineage, Apava (?) of Vasi$jha family, Pratipa of Pulastya family, Nabhaga of Kasyapa family and Abhimanyu of Angiras family.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 195
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
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