अध्याय २०१
श्लोक 1
॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे सावित्रीतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम द्विशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय २०१ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेन् महीपाल देवतीर्थमनुत्तमम् ।यत्र सिद्धा महाभागा देवाः सेन्द्रा युधिष्ठिर
|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe sāvitrītīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma dviśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 201 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchen mahīpāla devatīrthamanuttamam / yatra siddhā mahābhāgā devāḥ sendrā yudhiṣṭhira
हिन्दी अर्थ
वहाँ वे सर्वेथा ब्रह्मा की उपासना में निरत रहते हैं । इस ब्रह्मलोक से अण्ड ( ब्रह्माण्ड ) के ऊपर भाग का परिमाण एक कोटि पचास नियुत योजन एवं निम्न भाग का परिमाण चार कोटि पैंसठ नियुत योजन कहा जाता है । हस अंश के अधो भाग में भव की स्थिति भौर उसी में नक्षत्र ग्रहादिकों का विचरण होता है ऊपरी भागों में किसी को भी गति नहीं सुनी जाती है। मैंने जिस प्रकार सुना था उसी प्रकार योजनों द्वारा उषयु क्त लोकों को दूरी आदि का वर्णन भ्रवलोक से ऊपर स्थित आप लोगों के सम्मुख कर चका । अब इसके उपरान्त अधोगति को प्राप्त होनेवाले जीवों के निवास स्थलों का वर्णन कर रहा हूं, जहाँ पर घोर पाप कर्म करनेवाले पापात्मा' अपने कर्मों के अनुसार गमन करते. हैं ।१४२-१४५। रौरबव, रोध सूकर, ताल, तप्तकुम्भ, महा ज्वाल, शबल, विमोचन, कमी, कृमिभक्ष, लानाभक्ष, विशंसन, अध!शिरा, पयबह,
English
They are of sublimated sexuality. They traverse a path of no return. The purity they have attained by means of the practice of holy rites is supplemented by the knowledge of Vedantas.