Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
202
अध्याय 202 / 232

Adhyaya 202

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पूर्ण अध्याय पाठ7 श्लोक

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अध्याय २०२

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे देवतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नामैकोत्तरद्विशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय २०२ मार्कण्डेय उवाच: तस्यैवानन्तरं चान्यच्छिखितीर्थमनुत्तमम् ।प्रधानं सर्वतीर्थानां पञ्चायतनमुत्तमम्

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe devatīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāmaikottaradviśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 202 mārkaṇḍeya uvāca: tasyaivānantaraṃ cānyacchikhitīrthamanuttamam / pradhānaṃ sarvatīrthānāṃ pañcāyatanamuttamam

हिन्दी अर्थ

रोधे गोध्नो भ्रूणहा च अग्निदाता पुरस्य चर । सुकरे ब्रह्महा मज्जेत्सुरापः स्वर्णतस्करः:. ताले पतेक्क्षत्रियहा हत्वा बैश्यं च दुर्गतिम् । ब्रह्मह॒त्यां च यः कुयच्िश्व स्थादग्ुरतल्पपः.

English

O excellent one, whence is this Parardha (Infinite, Infinity)? What is this called Para (the greatest)? We wish to know this. Please speak.

अध्याय २०२

श्लोक 2

तत्र तीर्थे तपस्तप्त्वा शिखार्थं हव्यवाहनः ।शिखां प्राप्य शिखी भूत्वा शिखाख्यं स्थापयञ्छिवम्

tatra tīrthe tapastaptvā śikhārthaṃ havyavāhanaḥ / śikhāṃ prāpya śikhī bhūtvā śikhākhyaṃ sthāpayañchivam

हिन्दी अर्थ

साध्वीविक्रयकर्ता च वस्तु भक्त परित्यजेत् । महाज्वाले दुहितरं स्नुषां गच्छति यस्तु व ४११५५

English

Listen from me the definition of Parardha 1 and

अध्याय २०२

श्लोक 3

प्रतिपच्छुक्लपक्षे या भवेदाश्वयुजे नृप ।तदा तीर्थवरे गत्वा स्नात्वा वै नर्मदाजले

pratipacchuklapakṣe yā bhavedāśvayuje nṛpa / tadā tīrthavare gatvā snātvā vai narmadājale

हिन्दी अर्थ

दुरिष्तं कुरुते यस्तु कौठलोहूं प्रपद्यते । ( देवब्नाह्मणविद्वेष्ठा गुरूर्णा चाप्यपुजकः ॥ पर्यश्नाति य एको5न्यो ब्राह्मणीं सुहृदः सताम् ) । लालाभक्षे स पतति दुर्गन्‍्धे नरके गतः.

English

Learned men call a thousand crores a Kharua and ten times a Kharua make a jVikharva.

अध्याय २०२

श्लोक 4

देवान् ऋषीन् पित्ःंश्चान्यांस् तर्पयेत् तिलवारिणा ।हिरण्यं ब्राह्मणे दद्यात् संतर्प्य च हुताशनम्

devān ṛṣīn pitḥṃścānyāṃs tarpayet tilavāriṇā / hiraṇyaṃ brāhmaṇe dadyāt saṃtarpya ca hutāśanam

हिन्दी अर्थ

लगाने वाला पापी मनुष्य रोध नामक नरक में गिरता है । जो ब्राह्मण की ह॒त्या करता है, सुरापान करता है, सुवर्ण को चोरी करता है, वह पापात्मा सूकर नामक नरक में पतित होता है । जो किसी क्षत्रिय की हत्या करता है, अथवा किसी ब्राह्मण या वैश्य की हत्या करता है, गुरु की शय्या ( स्त्री के साथ ) पर गमन करता है, वह पापों मनुष्य घोर ताल नामक नरक में निपतित होंता है। जो पापात्मा बहिन के साथ

English

A huudred thousand Kofis make (what is called) Sanku. People who know numbers (and calculation) say that a thous¬ and times thousand Kofis multiplied by ten make a Samudra (i.e. Jaladhi). Ten thousand times a thousand Kotis is called Madhya. A hundred thousand times a thousand Kofis is termed Anta (Antya).

अध्याय २०२

श्लोक 5

गन्धमाल्यैस् तथा धूपैस् ततः सम्पूजयेच्छिवम् ।अनेन विधिनाभ्यर्च्य शिखितीर्थे महेश्वरम्

gandhamālyais tathā dhūpais tataḥ sampūjayecchivam / anena vidhinābhyarcya śikhitīrthe maheśvaram

हिन्दी अर्थ

व्यभिचार करता है, राजा की हत्या करता है वह तप्तकुम्भ नामक नरक लोक में निवास करता है। दुबरे के अश्व को चुराकर विक्रय करनेबाला तथा अन्याय पूर्वक किसी को बाँघने ( फेंसाने ) वाला पापी पुरुष तप्तलोह यामक नरक में निवास करता है। जो अपनी पतिन्नता स्त्री को बेचता है, तथा अपने अनुगामी भक्त को छोड़ देता है, अपनी पुत्री अथवा पुत्रवध् के साथ समागम करता है, वह पापात्मा मनुष्य महाज्वाल नामक नरक में पतिज्ञ होता है ।१५२-६५४५। जो वेदों का विक्रय करता है, अथवा वेद को निन्‍दा करता है, अपने गुरुजनों का अपमान करता है, उन्हें गाली देता है या मारता पीटता है, अथवा अगम्य स्थलों में ( पुत्री; पुत्रवध, भगिनी, गु्पत्नी आदि के साथ ) ममन करता है, वह पापात्मा शबल नामक भोर नरक में गिरता है। जो परद्रव्यापहारी पापात्मा किसी की मर्यादा ( प्राचीर, चहारदिवारी आदि ) में भेदत

English

A thousand crores multiplied by a crore iscalled Parardha. Learned men call twice a Parardha, a Para (great).

अध्याय २०२

श्लोक 6

विमानेनार्कवर्णेन ह्यप्सरोगणसंवृतः ।गीयमानस्तु गन्धर्वैर् रुद्रलोकं स गच्छति

vimānenārkavarṇena hyapsarogaṇasaṃvṛtaḥ / gīyamānastu gandharvair rudralokaṃ sa gacchati

हिन्दी अर्थ

करता है, वह विमोह नामक नरक में पतित होता है। जो किसी का अनिष्ट साधन करता है वह कीट लोह नामक नरक में निवास करता है । देवता और ब्राह्मण के साथ जो पापात्मा विद्वेष करता है, गुरुजनों कौ पूजा नहीं करता, तथा रत्न को दृषित करता है, वह कृमिभक्ष्य नामक घोणश नरक में, पहुंचता है ।१५६-१५८। जो पापात्मा किसी ब्राह्मणी, मित्रादि एवं कत्या के सामने उपस्थित रहने पर भी

English

The number hundred they say is Paridrdha ( Pari -. vrdha in Bd.P.). A thousand is Paripadmaka. Thereafter the other numbers (each number is multiplied by ten to get the next number) are Ayuta, jViyuta, Prayula, Arbuda, Nirbuda, Kharbuda, Kharua, Nikharva, Saiiku, Padma, Samudra, (Antya), Madhyama, Parardha and Para. In calculation these are the eighteen digits.

अध्याय २०२

श्लोक 7

शत्रुक्षयमवाप्नोति तेजस्वी जायते भुवि

śatrukṣayamavāpnoti tejasvī jāyate bhuvi

हिन्दी अर्थ

घनुश्चिह्नान्तगंतग्रन्थ: ख. पुस्तके नास्ति । काण्डकर्ता कुलालश्र निष्कहर्ता चिकित्सक: । आरामेष्बग्निदाता यः पतते स विशंसने

English

These are the terms given by sages. A Parardha (? yeais) from the beginning of creation constitutes a Kalpa (?) of Brahma (only a day). A period extending as much also remains, at the end of which there is Pratisarga. Thus Para and Parardha have been (calculated) explained by me.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 202
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.