Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
204
अध्याय 204 / 232

Adhyaya 204

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पूर्ण अध्याय पाठ16 श्लोक

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अध्याय २०४

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे कोटितीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम त्र्युत्तरद्विशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय २०४ श्रीमार्कण्डेय उवाच: भृगुतीर्थं ततो गच्छेत् तीर्थराजमनुत्तमम् ।पैतामहं महापुण्यं सर्वपातकनाशनम्

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe koṭitīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma tryuttaradviśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 204 śrīmārkaṇḍeya uvāca: bhṛgutīrthaṃ tato gacchet tīrtharājamanuttamam / paitāmahaṃ mahāpuṇyaṃ sarvapātakanāśanam

हिन्दी अर्थ

१०१० वायुपुराणम्

English

On hearing their words, Matarisvan (Vayu) of hum¬ ble speech spoke as follows in sweet words, in the proper order and in the same manner as was seen (by him).

अध्याय २०४

श्लोक 2

ब्रह्मणा तत्र तीर्थे तु पुरा वर्षशतत्रयम् ।आराधनं कृतं शम्भोः कस्मिंश्चित् कारणान्तरे

brahmaṇā tatra tīrthe tu purā varṣaśatatrayam / ārādhanaṃ kṛtaṃ śambhoḥ kasmiṃścit kāraṇāntare

हिन्दी अर्थ

मृषावादी नरो यश्व तथा चक्रोशकोइशुभः । पतति नरके घोरे मृत्राकीणं स पापक्ृत् १६८ मधुग्राहाभिहन्तारो यान्ति वेतरणीं नराः । उन्मत्ताश्वित्तभग्नाश्न शौचाचारघिवर्जिता: क्रोधना दुःखदाश्वेव कुहकाःकष्टगामितः । असिपनत्रवने छेंदी तथा झोरज्िकाश्व ये ॥

English

I shall recount this to you. Listen to what I intend to say. The Vyakla Bhaga (that which is manifest) is grosser than Avyakta.

अध्याय २०४

श्लोक 3

युधिष्ठिर उवाच: किमर्थं मुनिशार्दूल ब्रह्मा लोकपितामहः ।आराधयद् देवदेवं महाभक्त्या महेश्वरम्

yudhiṣṭhira uvāca: kimarthaṃ muniśārdūla brahmā lokapitāmahaḥ / ārādhayad devadevaṃ mahābhaktyā maheśvaram

हिन्दी अर्थ

आश्रमप्रत्यवसिता अग्निज्वाले पतन्ति वे। भोज्यम्ते श्यामशवले रयस्तुण्डेश्व वायसेः

English

There are ten parts of Mahat. The gross part is called Bhutaai (Ahamkarci or the Cosmic Ego). The magnitude of Paramdnu (an atom) is little more than the tenth part of Bhutadi (?)

अध्याय २०४

श्लोक 4

आराध्यः सर्वभूतानां जगद्भर्ता जगद्गुरुः ।श्रोतव्यं श्रोतुम् इच्छामि महदाश्चर्यमुत्तमम्

ārādhyaḥ sarvabhūtānāṃ jagadbhartā jagadguruḥ / śrotavyaṃ śrotum icchāmi mahadāścaryamuttamam

हिन्दी अर्थ

इज्याब्रतसमालोपात्संदंशे नरके पतेत् । स्कर्दते यदि वा स्वप्ने ब्रतिनो ब्रह्मचारिणः १७२ पुश्रेरध्यापिता ये च पुत्नेराज्ञापिताश्व ये । ते सर्वे नरके यान्ति नियतं तु श्वभोजने १७३ वर्णाश्रमविरुद्धाभिक्रोधहर्षसमन्विता: । कर्मामंणि ये तु कुबन्ति सर्वे निरयगामिनः (ण). ४१७४

English

A Paramdnu is very subtle. It cannot he seen by the (naked) eye. It can be imagined; what cannot be (ultimately) split in the world should be known as Paramdnu.

अध्याय २०४

श्लोक 5

धर्मपुत्रवचः श्रुत्वा मार्कण्डेयो मुनीश्वरः ।कथयामास तद्वृत्तमितिहासं पुरातनम्

dharmaputravacaḥ śrutvā mārkaṇḍeyo munīśvaraḥ / kathayāmāsa tadvṛttamitihāsaṃ purātanam

हिन्दी अर्थ

घोर विड्भुज नामक नरक में गिरते हें--इसमें सन्देह नहीं। जो मिथ्यावादी मनुष्य होता है तथा णो सबंथा दूसरे को अभिशाप अथवा गाली गलौज दिया करता है, अमांगलिक कार्यों में निरत रहता है, वह पापात्मा मूत्राकीणं नामक नरक में निवास करता है, जो पापात्मा मधुदान करने वाले को मारते हैं, अर्थात् अपने प्रति शुभ कम करनेवाले को भी मार डालते है, वे बंतरणी में जाते है। जो उन्मत्त है,

English

When the Sun's rays enter through the window, the subtlest dust particle that is seen is called Paramdnu It is the first among the units of magnitude. It is called Paramdnu.

अध्याय २०४

श्लोक 6

मार्कण्डेय उवाच: स्वपुत्रिकामभिगन्तुमिच्छन्पूर्वं पितामहः ।शप्तस्तु देवदेवेन कोपाविष्टेन सत्तम

mārkaṇḍeya uvāca: svaputrikāmabhigantumicchanpūrvaṃ pitāmahaḥ / śaptastu devadevena kopāviṣṭena sattama

हिन्दी अर्थ

जिनका चित्त विकृत एवं मस्तिष्क ठिकाने नहों रहता, पवित्रता एवं आचार से स्रो विहौन रहते हैं, भकारण फ्रोध करते हैं, दूसरों को सदा दुःख दिया करते हैं, जादू या इन्द्रजालादि से दुसरे को अपने वश में रखकर उनके साथ अत्याचार करते हैं, वे पापात्मा असिपत्रवत नामक घोर नरक में परम दारुण स्वभाववाले हिंस जस्तुओं द्वारा काट काट कर इधर उधर खींचे जाते हैं, दूसरों के शिर काटने वाले वापात्माओं की भी यही दशा होती है ।१६७-१७०। ब्रह्मचर्यादि आश्रमों को मर्यादा को भ्रष्टकरने वाले पापात्मा अग्निज्वाल नामक घोर नरक में पतित होते हैं, वहाँ पर लौहमय चोंच वाले इयाम एवं चितकबरे रंग के काग उनका शरीर नोंच-सोंच कर भक्षण करते हैं, यज्ञादि सत्कमं, ब्रतादि सदाचारों से विहीन होने पर पापात्मा प्राणी संदंश नामक नरक में बिरता है। जो ब्रती अथवा ब्रह्मवारी स्वप्तावस्था में भी स्ललित

English

When there is an aggregate of eight Paramdnus it is called Trasarenu or Padmarajas (pollen-dust of a lotus).

अध्याय २०४

श्लोक 7

वेदास्तव विनश्यन्ति ज्ञानं च कमलासन ।अपूज्यः सर्वलोकानां भविष्यसि न संशयः

vedāstava vinaśyanti jñānaṃ ca kamalāsana / apūjyaḥ sarvalokānāṃ bhaviṣyasi na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

हो जाते हैं, अथवा जो मनुष्य अपने पुत्रों द्वारा अध्ययन करते हैं, अथवा पुत्रों द्वारा अनुशासित होकर जीवन यापन करते हैं, वे सब भी श्वभोजन नामक घोर नरक में निवास फरते हैं। वर्णाश्रम की मर्यादा से विरहिंत अनायास क्रोध हर्षादि में आविष्ट होकर जो लोग बिना विचारे अदुसद् कार्य किया करते हैं, वे भी निरय (नरक) गामी होते हैं ।(७१-६७४। उपयुक्त रौरव नरक महान् विस्तृत एवं घोर है, ऊपर से शीतल

English

Twelve /%a/a-joints make a Vitasti and twentyone ii/a-joints make a Ratni (a cubit—the distance between the elbow and the closed fist).

अध्याय २०४

श्लोक 8

एवं दत्ते ततः शापे ब्रह्मा खेदावृतस्तदा ।रेवाया उत्तरे कूले स्नात्वा वर्षशतत्रयम् ।तोषयामास देवेशं तुष्टः प्रोवाच शङ्करः

evaṃ datte tataḥ śāpe brahmā khedāvṛtastadā / revāyā uttare kūle snātvā varṣaśatatrayam / toṣayāmāsa deveśaṃ tuṣṭaḥ provāca śaṅkaraḥ

हिन्दी अर्थ

और भीतर से अति उष्ण है, उसके निम्न प्रदेश में पश्म शीतल तप ? तम नामक नरक कहा जाता है, इस एवमादिक़मेणेव वण्यंमानान्निबोधत । भुमेरधस्तात्सप्तेव नरकाः परिकीरतिता:

English

Twentyfour Angulas form one Hasla (the distance bet¬ ween the elbow and the tip of the middle finger). Two Ratnis or fortytwo Angulas should be known as a Kisku.

अध्याय २०४

श्लोक 9

पूज्यस्त्वं भविता लोके प्राप्ते पर्वणि पर्वणि ।अहमत्र च वत्स्यामि देवैश्च पितृभिः सह

pūjyastvaṃ bhavitā loke prāpte parvaṇi parvaṇi / ahamatra ca vatsyāmi devaiśca pitṛbhiḥ saha

हिन्दी अर्थ

अधमंसूनवस्ते स्युरन्धतामित्नकादयः । रौरबवः प्रथमस्तेषां महारौरव एव च॑ १७७

English

Learned men say that ninetysix Angulas form one Dhanus (a bow). This Dhanus is a unit used in measuring Gavyuti (Explanation in verse 126).

अध्याय २०४

श्लोक 10

श्रीमार्कण्डेय उवाच: तदाप्रभृति तत्तीर्थं ख्यातिं प्राप्तं पितामहात् ।सर्वपापहरं पुण्यं सर्वतीर्थेष्वनुत्तमम्

śrīmārkaṇḍeya uvāca: tadāprabhṛti tattīrthaṃ khyātiṃ prāptaṃ pitāmahāt / sarvapāpaharaṃ puṇyaṃ sarvatīrtheṣvanuttamam

हिन्दी अर्थ

घोरत्वाद्ो रव:ः प्रोक्त: साम्भकों दहनः स्मृतः । सुदारुणस्तु शीतात्मा तस्याधस्तात्तमोइ्धमः सर्पो निक्ृन्तनः प्रोक्तः कालसुत्रेडतिदारुणः । अप्रतिष्ठे स्थितिर्नास्ति भ्रमस्तस्मिन्सुदारणः ॥

English

Dhanus, Dan<ja> Yuga and Nali —all these contain equal number of Angulas. Persons who know calculation say that three hundred Dhanus units make a Nalva.

अध्याय २०४

श्लोक 11

तत्र भाद्रपदे मासि कृष्णपक्षे विशेषतः ।अमावास्यां तु यः स्नात्वा तर्पयेत्पितृदेवताः

tatra bhādrapade māsi kṛṣṇapakṣe viśeṣataḥ / amāvāsyāṃ tu yaḥ snātvā tarpayetpitṛdevatāḥ

हिन्दी अर्थ

अवीचिर्दादणः प्रोक्तो यन्त्रसंपीडनाच्च सः । तस्मात्सुदारुणो लोहः करमंणां क्षयषणाच्च सः .

English

It is taught that two thousand Dhanus units make one Gavyuti. Eight thousand Dhanus units make one Yojana.

अध्याय २०४

श्लोक 12

पिण्डदानेन चैकेन तिलतोयेन वा नृप ।तृप्यन्ति द्वादशाब्दानि पितरो नात्र संशयः

piṇḍadānena caikena tilatoyena vā nṛpa / tṛpyanti dvādaśābdāni pitaro nātra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

तथाभूते (त) शरोरत्वादविये (घथि)भ्यस्तु स स्पृतः। पीडबन्धवधासड्भादप्रतीकारलक्षण: ऊध्वे लोक: समावेतौ निरालोकाश्च ते स्मृता: । दुःखोत्कषंस्तु सर्वेषु अधमंस्प निमित्ततःक

English

The measurement of the distance of a Yojana is based on this unit of Dhanus. It should be known that a thousand of these Dhanus make the distance of a Sakra-Krosa (or a Krosa ).

अध्याय २०४

श्लोक 13

कन्यागते तु यस्तत्र नित्यं श्राद्धप्रदो भवेत् ।अवाप्य तृप्तिं तत्पूर्वे वल्गन्ति च हसन्ति च

kanyāgate tu yastatra nityaṃ śrāddhaprado bhavet / avāpya tṛptiṃ tatpūrve valganti ca hasanti ca

हिन्दी अर्थ

भूमितल के निम्नप्रदेश में सात नरक लोक बतलाये जाते हैं, उन्हें क्रमानुरूप सुनिये । उन अधर्म से उत्पन्न होने वाले नरकों का नाम अन्धतामिस्न आदि हैं। उनमें रौरब सर्व प्रथम एवं महान् दारुण कष्ट पूर्ण है, दूसरा महा रोरव नामक है, तीसरा उसका निम्नप्रदेश में परम शीतल एवं अति उष्ण नरक स्मरण किया जाता है उसका नाम कालसूत्र है, वह तीसरा नरक है। उसका अपर नाम महाह॒वि विधि भी बतलाया जाता है। चौथा

English

Calculation in Yojanas is made by those who are experts in the knowledge of numbers. Listen to the distance of Brahma- loka, in so many Yojanas. 1

अध्याय २०४

श्लोक 14

सर्वेषु पितृतीर्थेषु श्राद्धं कृत्वास्ति यत्फलम् ।तत्फलं समवाप्नोति दर्शे तत्र न संशयः

sarveṣu pitṛtīrtheṣu śrāddhaṃ kṛtvāsti yatphalam / tatphalaṃ samavāpnoti darśe tatra na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

नरक अप्रतिष्ठ कहा जाता है, पाँचवा अवीची नामक नरक है। छठाँ लौह पृष्ठ नामक नरक है, सातवाँ अविधेय नाम से प्रस्यात है ।१७५-१७६। अतिशय घोर कष्ट प्रद होने के कारण प्रथम नरक का नाम रौरव पड़ा हैं। यह यद्यपि जलयुक्त है, पर परम ज्वलनात्मक है। उसके निम्नप्रदेश में परम शीतल, अति दारुण एवं अधम तम नामक नरक है ।१८०। कालसूत्र में डंसनेवाला सप॑ बतलाया जाता है-इसलिए वह परम दारुण है। अप्रतिष्ठ नरक में किसी प्रकार भी प्राणी ठहर नहीं सकता, क्योंकि उसमें अतिशय दारुण भंवरे उठती रहती हैं। यन्त्र द्वारा पीडित किया जाता है--इसी कारण से अवीचि नरक भी परम दारुण कहा जाता है। उससे भी दारुण लोपृष्ठ नामक है। उसमें जलकर मनुष्यों के समस्त कर्म विलीन हो जाते हैं, इसी कारण परम दारुण वह भी कहा जाता। सातवें अविधेय नामक नरक में तथाकथित अशरीरी रहने

English

Divakara (Sun) is a hundred thousand Yojanas above the surface of the Earth. jVifokara (Moon) is a thousand Yojanas above the disc of the Sun.

अध्याय २०४

श्लोक 15

पैतामहे नरः स्नात्वा पूजयन्पार्वतीपतिम् ।मुच्यते नात्र सन्देहः पातकैश्चोपपातकैः

paitāmahe naraḥ snātvā pūjayanpārvatīpatim / mucyate nātra sandehaḥ pātakaiścopapātakaiḥ

हिन्दी अर्थ

पर भी प्राणी को जिस बन्धन जबित पीड़ा एवं कष्ट को सहन करना पड़ता है वह परम अस्ह्य हो जाता है, उसके प्रतिकार का कोई उपाय नहीं दिखाता। ये चरक लोक सब के सब पवंतों के समान भीषणाकार एवं आलोक से सर्वदा विहीन कहें जाते हैं। अक्ष्म के कारण इन सत्रों में प्राणियों को असह्य

English

The entire stellar zone shines a full hundred thousand Yojanas above the Moon. Verses I28fif. give the distances from the earth to other planets and

अध्याय २०४

श्लोक 16

तत्र तीर्थे मृतानां तु नराणां भावितात्मनाम् ।अनिवर्तिका गती राजन्रुद्रलोकादसंशयम्

tatra tīrthe mṛtānāṃ tu narāṇāṃ bhāvitātmanām / anivartikā gatī rājanrudralokādasaṃśayam

हिन्दी अर्थ

धातना का अनुभव करना पड़ता है। इन सबों में दुःखों का प्राबल्य रहता है ।१5१०१८४॥ विशेषतया अन् ख घ पुस्तकयोरधिकमर्ध वर्तते तद्यथा सुखोत्कर्ष: स्पृतः सर्वे घर्मेस्य हिं: निमित्तत।। तथा ड़ पुस्तकेषपि 'दुःखोत्कर्ष: स्मृतः सर्वे धर्मेस्य हि निमित्ततः इति ।

English

The Mcru mountain is a hundred thousand Yojanas high. The distance between planets above the stellar zone is twice this (height) and they are one above the other

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 204
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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