Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
206
अध्याय 206 / 232

Adhyaya 206

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पूर्ण अध्याय पाठ10 श्लोक

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अध्याय २०६

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे कुर्कुरीतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम पञ्चाधिकद्विशततमो ऽध्यायः॥ र्क्व् अध्याय २०६ श्रीमार्कण्डेय उवाच: गच्छेत्ततः क्षोणिनाथ तीर्थं परमशोभनम् ।सर्वपापहरं पुण्यं दशकन्येति विश्रुतम् ।महादेवकृतं पुण्यं सर्वकामफलप्रदम्

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe kurkurītīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma pañcādhikadviśatatamo 'dhyāyaḥ|| rkv adhyāya 206 śrīmārkaṇḍeya uvāca: gacchettataḥ kṣoṇinātha tīrthaṃ paramaśobhanam / sarvapāpaharaṃ puṇyaṃ daśakanyeti viśrutam / mahādevakṛtaṃ puṇyaṃ sarvakāmaphalapradam

हिन्दी अर्थ

सर्वेषासेव मुतानां लोकालोकनिवासिनाम् । संसारे संसराग्तीहयावन्तः प्राणिनश्र तन् १६९३ ऊपर के दो लोक अस्य लोकों के समान होते हुए भी परम दारण अन्घकार मय होते हैं। इन नरकों में विविध कष्ठों के अनुभव करने में सक्षम शरीर को पूर्वक्ृत कर्मों के अनुस्तार धारण कर बे पापात्मा दुःख भोगते हैं। सभी नरकों में दुःख की अधिकता बतलाई जाती है । नरक निवासियों को दी जानेवाली उन यातनाओं की संख्या अगणित है। वहाँ विविध प्रकार के दुःखों का अनुभव कर लेने के उपरान्त

English

It is remembered that Tapoloka is forty million Yojanas above Janaloka. It is here that the Vairaja groups of Devas stay. They are exempt from the effects of burning of all living beings in the destruction of the universe.

अध्याय २०६

श्लोक 2

तत्र तीर्थे महादेवो दशकन्या गुणान्विताः ।ब्रह्मणो वरयामास ह्युद्वाहेन युयोज ह

tatra tīrthe mahādevo daśakanyā guṇānvitāḥ / brahmaṇo varayāmāsa hyudvāhena yuyoja ha

हिन्दी अर्थ

जब कर्मों का सबंधा नाश हो जाता है तब वे तियंक् योनियों में उत्पन्न होते हैं ।!५५-१८५७ ३। ऊपर रहने वाले समस्त देवताओं एवं निम्नप्रदेशों में रहते वाले नारकीय प्राणी ये सब अपने घ॒र्माधर्म के अनुसार शरीर धारण करते हैं इस उत्पत्ति के मूल उनके स्वयंक्ृत कर्म हैं, उनऔत्पत्तिक कर्मों के अनुसार फल भोगने के लिए ही वे शरीर घारण करते हैं। देवगण इन अधोभाग में अवस्थित नारकौय प्राणियों को अधोमुख हुए

English

Sixty million Yojanas from Tapoloka is Satyaloka. It is called Brahmaloka of those who are devoid of death and desire and so who never return to the Sarhsdra therefrom.

अध्याय २०६

श्लोक 3

तदाप्रभृति तत्तीर्थं दशकन्येति विश्रुतम् ।सर्वपापहरं पुण्यमक्षयं कीर्तितं फलम्

tadāprabhṛti tattīrthaṃ daśakanyeti viśrutam / sarvapāpaharaṃ puṇyamakṣayaṃ kīrtitaṃ phalam

हिन्दी अर्थ

देखते हैं इसी प्रकार वे नारकीय भी समस्त देवताओं को अधोमुख देखते हैं। उन लोकों में अग्रभाग एवं मूलभाग का कोई भेद नहीं है, उनकी स्थिति यों ही स्वाभाविक है, इसी कारण से लोकालोक में कोई ऊपर अथवा निम्न का भेद भाव नहीं है। लोका-लोक की यह स्वाभाविक संज्ञा प्रचलित है वायु की इन बातों के सुनने के उपरास्त यज्ञकर्ता ब्राह्मणों ने पुनः पुछा ।!5८४-१९२। ऋषियाँ ने कहा--भगवन् वायु देव ! उस लोका-लोक में निवास करने वाले समस्त प्राणियों की जितने इस संसार में विचरण करते हैं उनकी संख्या क्‍या है, वे कोन हैं ये सब बातें सम्पृर्णतया मुझे बंतलायें । ऋषियों की इस जिज्ञास्ता को सुनकर मारुत बोले

English

It is remembered (proclaimed) that the space above Brahmaloka upto the (upper crust of the) Cosmic Egg is a crore and fifty niyuta (a fifteen million) Yojanas.

अध्याय २०६

श्लोक 4

तत्र तीर्थे तु यः कन्यां ददाति समलंकृताम् ।प्राप्नोति पुरुषो दत्त्वा यथाशक्त्या स्वलंकृताम्

tatra tīrthe tu yaḥ kanyāṃ dadāti samalaṃkṛtām / prāpnoti puruṣo dattvā yathāśaktyā svalaṃkṛtām

हिन्दी अर्थ

न शक्‍्या जन्तवः कृत्स्ता: प्रसंख्यातुं क्थंचन । अनाचस्ताश्व संकीर्णा ह्प्युहेन व्यवस्थिता: ॥

English

The lower part extends to fortysix million five hundred thousand Yojanas. This lower half consists of movement (of stars, planets, etc.). In the upper half the movement

अध्याय २०६

श्लोक 5

तेन दानोत्थपुण्येन पूतात्मानो नराधिप ।वसन्ति रोमसंख्यानि वर्षाणि शिवसन्निधौ

tena dānotthapuṇyena pūtātmāno narādhipa / vasanti romasaṃkhyāni varṣāṇi śivasannidhau

हिन्दी अर्थ

गणना बिनिवृत्तेषामानन्त्येन प्रकीतिता: द अनाव्यानादवेद्त्वान्नव प्रश्नो विधोयते ब्रह्मणा संज्ञितं यत्तु संख्यया तन्निबोधत १६९७ यः सहख्रतमों भाग: स्थावराणां भवेदिह। पाथिवाः क्िमयस्तावत्संसेकाचेषु संभव: १६८ संसेकज्ञानाभावेन सहर््नेणेव संभिताः । औदका जन्तवः सर्वे निश्चयात्तद्विचारितम् १६६ सहख्रेणेव भावेन सत्त्वानां सलिलौकसाम् । घिहुंंगमास्तु विज्ञेया लौकिकास्ते च सर्वशः (२००

English

Now I shall mention the allotment of abodes to those living beings who deserve falling into hells due to their cruel actions.

अध्याय २०६

श्लोक 6

ततः कालेन महता त्विह लोके नरेश्वर ।मानुष्यं प्राप्य दुष्प्राप्यं धनकोटीपतिर्भवेत्

tataḥ kālena mahatā tviha loke nareśvara / mānuṣyaṃ prāpya duṣprāpyaṃ dhanakoṭīpatirbhavet

हिन्दी अर्थ

यः सहस्नतमों भास्तेषां बे पक्षिणां भवेत् । पशवस्तत्समा ज्ञेया लौकिकास्तु चतुष्पदाः २० १ चतुष्पदानां सर्वेषां सहस्नेणेव संमता: भागेन द्विपदा ज्ञेया लोकिके5स्मस्तु सर्वशः २०२ यः सहद्नतमों भागों भागे तु द्विपदां पुनः। धामिकास्तेन भामेन॑ विज्ञोयः संसिताः पुनः २०३

English

The following are the hells*: Raurava, Rodha Sukara, Tala, Taptakumbha, Mahajvdla, Sabala, Vimocana, ICrmi, Krmibhaksa, Lalabhaksa, Visamsana, AdhahSiras, Pdyavaha, Rudhirandha, Vailarana, ICrsna, Asipalravana, Agnijvdla, Mahaghora, SathdamSc, Svabliojana, Tamas, Krsnasutra, Loha, Asija, Apratistha, Vicyaiva and others.

अध्याय २०६

श्लोक 7

तत्र तीर्थे तु यो भक्त्या स्नात्वा विप्राय काञ्चनम् ।सम्प्रयच्छति शान्ताय सो ऽत्यन्तं सुखम् अश्नुते

tatra tīrthe tu yo bhaktyā snātvā viprāya kāñcanam / samprayacchati śāntāya so 'tyantaṃ sukham aśnute

हिन्दी अर्थ

वायु बोले--ऋषिवृल्द ! उन समस्त प्राणियों की संख्या बलताना किसी प्रकार भी हमसे सम्भव नहीं है । उनका प्रवाह अनादि है, अनन्त है, वे इतने परस्पर सद्भीर्ण हैं कि केवल अनुमान या तके से विचार किया जा सकता है । उनकी गणना किसी प्रकार भी सम्भव नहीं है, वे अनन्त हैं--ऐसा ही उनके विषय में कहा जाता है। दिव्य दृष्टि अथवा परम ज्ञान ढारा भी उनकी निश्चित संल््या नहीं जानी जा सकती । अतः है नर श्रेष्ठ व॒न्द ! मैं उनकी निश्चित संख्या इस चर्म चक्षु से किस प्रकार बतला सकते हैं- जो अचिन्तनीय एवं स्बंथा अज्ञात है--ऐसे प्रइन को नहीं करना चाहिए। ब्रह्मा ने इस विषय में जो सामान्यतया जातिगत संख्याएँ निश्चित कौ हैं, उसे सुनिये। इस संसार में स्थावर जीवों का जो सहस्रतम भाग है संख्या में उतने ही पाथिकृमि हैं, जो संपेक आदि से

English

All these dark and gloomy hells are under the juris¬ diction of Varna. -Vfcn of evil deeds fall into these severally

अध्याय २०६

श्लोक 8

वाचिकं मानसं वापि कर्मजं यत्पुरा कृतम् ।तत्सर्वं विलयं याति स्वर्णदानेन भारत

vācikaṃ mānasaṃ vāpi karmajaṃ yatpurā kṛtam / tatsarvaṃ vilayaṃ yāti svarṇadānena bhārata

हिन्दी अर्थ

उत्पन्न होते हैं। इन संसेकज जन्तुओं का सहद्रतम भाग जितना होता है, उतने समस्त जलीय जन्तु होते हैं, पह भलीभाँति निश्चित एवं सुविचारित मत है ।१६९५-१६६। इन जलनिवासी जन्तुओं का सहस्नतम भाग लोकिक विहद्भमों की संख्या के बराबर है। उन लौकिक विहज्भमों का सहत्रतम भाग जितना होता है उतना ही संख्या में समस्त चतृष्पद जीव होते हैं । उन समस्त चतुष्पदों का सहख्रतम भाग जितना होता है, उतने ही

English

All these hells Raurava etc. are reported to be beneath the Earth. A perjuror, a person taking up a side by making false statements and untruths falls into the hell Raurava of ruthless grasp.

अध्याय २०६

श्लोक 9

नरो दत्त्वा सुवर्णं चापि वालाग्रमात्रकम् ।तत्र तीर्थे दिवं याति मृतो नास्त्यत्र संशयः

naro dattvā suvarṇaṃ cāpi vālāgramātrakam / tatra tīrthe divaṃ yāti mṛto nāstyatra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

संख्या में द्विपद (मनुष्य) होते हैं। पुनः इन द्विपदों का जो सहखतम भाग होता है. उतने ही संख्या में सम्मान- नौय धार्मिक विचार वाले सत्पुरुष होते हैं। इन धामिकों का सहख्रतम भाग जितना होता हैं उतने स्वर्गीय १०१४ वायुपुराणम् - सहलेणेवभागेन घामिकेस्यों दिवं गताः। यः सहज्नतमों भागों धामिकाणां भवेदिवि ॥

English

A slayer of a cow, a destroyer of a foetus and one who commits arson in the city fall into the hell Rodha. A slayer of a Brahmana, a drink-addict and a stealer of gold fall into the hell Sukara. A slayer of a Ksatriya, of a Vaisya in miserable circumstances or of a Brahmana as well as a defiler of the preceptor's bed falls into the hell Tala.

अध्याय २०६

श्लोक 10

तत्र विद्याधरैः सिद्धैर्विमानवरमास्थितः ।पूज्यमानो वसेत् तावद् यावद् आभूतसम्प्लवम्

tatra vidyādharaiḥ siddhairvimānavaramāsthitaḥ / pūjyamāno vaset tāvad yāvad ābhūtasamplavam

हिन्दी अर्थ

संमितास्तेन भागेन मोक्षिणस्तावदेव हि द . परणद वर्गों पपादकस्तुल्या यातनास्थानवासिनः । पतिताः पापकर्माणों दुरात्मानों चियन्ति ये॥. ह रौरबे तामसे होते शीतोष्णं प्राप्नुवन्ति ते .

English

He who indulges in sexual intercourse with his sister and the soldier of a king (i.e. murderer of a king) fall into the hell Taptakumbha. A trader in (stolen) horses and protector of one who is kept in legal bondage fall into the hell Taplaloha.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 206
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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