अध्याय २०९
श्लोक 1
॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे ऋणमोचनतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नामाष्टोत्तरद्विशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय २०९ श्रीमार्कण्डेय उवाच: तस्यैवानन्तरं पार्थ पुष्कलीतीर्थमुत्तमम् ।तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा ह्यश्वमेधफलं लभेत्
|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe ṛṇamocanatīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāmāṣṭottaradviśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 209 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tasyaivānantaraṃ pārtha puṣkalītīrthamuttamam / tatra tīrthe naraḥ snātvā hyaśvamedhaphalaṃ labhet
हिन्दी अर्थ
लोक से भी ऊपर जो ब्रह्माण्ड का अंश विद्यमान है वह एक कोटि पचास नियुत योजन तक सुना जाता है । इस ब्रह्माण्ड के -ऊ्ण॑ भाव को सीमा इतनी ही है, उसके उपर किसी की गति नहीं है। नित्य, अपरिसंस्येय, परस्पर गुणाश्रमी, सूक्ष्म, प्रसवधर्मिणी प्रकृतियाँ कहीं गई हैं उन्हीं से ब्रह्म नामधघारी जगत्कर्ता क्षेत्रज्ञ का प्रादुर्भाव होता है । उन्हीं में प्रकृतिमय, सूक्ष, अक्षय, अविनष्वर, अनुत्पाद, अतंक्यं, अधिष्ठा- नात्मक, परमाण स्वरूप, परेक्षय, अमूर्त एवं सृतिमान, परम घाम परमेश्वर विराजमान रहता है।बह परमाण स्वरूप महेश्वर प्रादुर्भाव, तिरोभाव, स्थिति, अलुग्रह, एवं दयादि का भआाश्रय भूत है। इन सभी विधानों में अनृपम है । वह अपने परम तेजो बल एवं. प्रकाक्ष से पुरोवर्ती तमोराद्ि को प्रकाशित करने बाला है जो हिरण्यमय अण्ड समस्त सृष्टि का मूल रूप, सवपिक्षा महान् एवं आद्य, जोपतग्रिक सभी ओर से वृत्ताकार है,
English
The first hell is called Raurava because itis very terrible. Although it contains water, it is remembered as one that scorches. Beneath it is the hell Tapah that is terrible, cold and very