अध्याय २१०
श्लोक 1
॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे भारभूतितीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम नवाधिकद्विशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय २१० श्रीमार्कण्डेय उवाच: तस्यैवानन्तरं तात पुङ्खिलं तीर्थमुत्तमम् ।तत्र तीर्थे पुरा पुङ्खः पार्थ सिद्धिमुपागतः
|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe bhārabhūtitīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma navādhikadviśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 210 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tasyaivānantaraṃ tāta puṅkhilaṃ tīrthamuttamam / tatra tīrthe purā puṅkhaḥ pārtha siddhimupāgataḥ
हिन्दी अर्थ
इसका आदि काल नहीं है, चिरकाल से वह है। सृष्टि के आदिमकाल से लेकर विनाशकाल तक प्रकृति उस परमपुरुष को सन्निरुद्ध करके रखती है, उस अवस्था में पुरुष से अबुद्धिपूर्वक यह सृष्टि प्रवरतित होती है (१) उसे पुरुष का पुरुषाथ ही मानते हैं। जगत् की इस सृष्टि एबं संहार की इस प्रक्रिया को कोई तो ईश्वरकृत मानते हैं और कोई प्राधानिक अर्थात् प्रकृतिकृत । परन्तु सृष्टि का यह व्यापार अनादि एवं अनन्त है । जगत् को अभिमान पूर्वक वित्रासित करती हुईं वह प्रकृति प्राप्त होती है प्रकृति जन््य सृष्टि का यह तृत्तीय हेतु कहा जा चुका, इनमैं अत्यन्त निष्ठा रखने वाला मुक्ति प्राप्त करता है। (१) आप लोगों से इस प्रकार तीन प्रतिसर्गों की चर्चा मैं विस्तार पूर्वक क्रमशः कर चुका, अब आगे के लिये बतलाइये, मैं क्या
English
Because he knows (thoroughly) the Ksetra (the field i.e. the body) he is called Ksetrajna. Ksetrajna is auspicious because of the perception of Ksetra.