अध्याय २१४
श्लोक 1
॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे आमलेश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम त्रयोदशोत्तरद्विशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय २१४ श्रीमार्कण्डेय उवाच: चतुर्थं सम्प्रवक्ष्यामि देवस्य चरितं महत् ।श्रुतमात्रेण येनैव सर्वपापैः प्रमुच्यते
|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe āmaleśvaratīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma trayodaśottaradviśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 214 śrīmārkaṇḍeya uvāca: caturthaṃ sampravakṣyāmi devasya caritaṃ mahat / śrutamātreṇa yenaiva sarvapāpaiḥ pramucyate
हिन्दी अर्थ
के अवसर पर ब्राह्मणों को सुताता है। वह अपने पितरों को भूरि उपासना करता है । पुरा अर्थात् प्राचीन काल में इसकी प्रतिष्ठा थीं, अत: इसको पुराण कहते हैं, जो व्यक्ति पुराण की इस चिदक्ति का तात्पय॑ समझता है, वह समस्त पापकर्मों से मुक्त होता है । तोनों वर्णों में नो मनुष्य इस परम श्रेष्ठ इतिहास को सुनकर धर्म की ओर प्रवत्ति करता है, वह अपने शरीरस्थ रोमकूपों जितने करोड़ सहस्न वर्षों तक स्व में आनन्द का अनुभव करता है । समस्त पापों को दूर करनेवाले, पुृण्यप्रद, पविन्न, यशोदायक इस पुराण को भगवान् ब्रह्मा ने मातरिश्वा वायु के लिये प्रदान किया था, वायु से इसे शुक्राचाय ने प्राप्त किया, उनसे भी बृहस्पति को इश्की प्राप्ति हुई उसके उपरान्त बृहस्पति ने सविता को इसकी शिक्षा दी ।५३-५९। सविता ने मृत्यु से कहा, मृत्यु ने पुनः इन्द्र को इसकी शिक्षा दी । हृष्द् ने भी वशिष्ठ को और वसिष्ठ ने सारस्वत्त को इसे
English
God Brahma is of truthful conception. While he was meditating on the Sat, the Gunas Rajas, Sattva and Tamas though mutually dissimilar became manifest as caused by the Sat (the existent).