अध्याय २२२
श्लोक 1
॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे हंसेश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नामैकविंशदधिकद्विशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय २२२ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततः क्रोशान्तरे गच्छेत्तिलादं तीर्थमुत्तमम् ।तिलप्राशनकृद्यत्र जाबालिः शुद्धिमाप्तवान्
|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe haṃseśvaratīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāmaikaviṃśadadhikadviśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 222 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tataḥ krośāntare gacchettilādaṃ tīrthamuttamam / tilaprāśanakṛdyatra jābāliḥ śuddhimāptavān
हिन्दी अर्थ
उस मंगलमय स्तम्भ को ब्रह्मा के उत्तम सरोवर में बिमज्जित कर उसी में प्रतिष्ठित भी किया । यज्ञभूमि के चलायमान होने पर ब्रह्मा जी चकित होकर धर्मराज से बोले, यमराज तुम्हारे घर एक शिला है, उसे बिना किसी वितर्क के यहाँ लाओ और देत्य के शिर पर शीघ्र स्थापित करो-ऐसी मेरी आज्ञा है। असुरराज गय के शरीर को निशचल करने को अत्यावश्यक समझ कर यमराज ने शिला लाकर उसके मस्तक पर रखा,
English
My birth has become fruitful today. My penance has