Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
28
अध्याय 28 / 232

Adhyaya 28

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अध्याय २८

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे नर्मदामाहात्म्ये त्रिपुरक्षोभणवर्णनं नाम सप्तविंशो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय २८ मार्कण्डेय उवाच: एतस्मिन्न् अन्तरे रुद्रो नर्मदातटमास्थितः ।क्रीडते ह्युमया सार्द्धं नारदस् तत्र चागतः

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe narmadāmāhātmye tripurakṣobhaṇavarṇanaṃ nāma saptaviṃśo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 28 mārkaṇḍeya uvāca: etasminn antare rudro narmadātaṭamāsthitaḥ / krīḍate hyumayā sārddhaṃ nāradas tatra cāgataḥ

हिन्दी अर्थ

भूलोंक: प्रथमः पादो भुव्लोकस्ततः परम् ।) स्वलॉको हि तृतीयस्तु चतुर्थस्तु महः स्पृतः

English

Khyati bore to Bhrgu the holy lords Dhatr and Vidhatr living throughout the Manvantara. They were masters of happiness and misery and grant auspicious and inauspicious results to living beings.

अध्याय २८

श्लोक 2

प्रणम्य देवदेवेशमुमया सह शङ्करम् ।व्यज्ञापयत् तदा देवं यद् वृत्तं त्रिपुरे तदा

praṇamya devadeveśamumayā saha śaṅkaram / vyajñāpayat tadā devaṃ yad vṛttaṃ tripure tadā

हिन्दी अर्थ

तत्र लोक: पर स्थान पर तथोगिनां स्मृतम् (८६ मिर्मंसा निरहंकाराः कामक़ोधविवर्जिता: । द्रक्ष्यन्ते तहिदो युक्ता ध्यानतत्परयुध््जकाः

English

Their eldest sister, the chaste goddess Sri, the purifier of worlds, attained theauspicious lordNarayana as her husband, and gave birth to two sons: Bala (Strength) and Utsaha (Energy).

अध्याय २८

श्लोक 3

गतो ऽहं स्वामिनिर्देशाद् यत्र तद्बाणमन्दिरम् ।दृष्टा बाणं यथान्यायं गतो ह्यन्तःपुरं महत्

gato 'haṃ svāminirdeśād yatra tadbāṇamandiram / dṛṣṭā bāṇaṃ yathānyāyaṃ gato hyantaḥpuraṃ mahat

हिन्दी अर्थ

सोमश्च मन्त्रसंयुक्तो तस्मान्मम मुखाच्च्युतः जीवः प्राणमृतां ब्रह्मन्सर्वः पीत्वा स्तनेध् तनू धैघ तस्मात्सोममर्थ चेंतदमृतं चेंब संज्ञितम् । चतुष्पादा भविष्यस्ति श्वेतत्वं चास्य तैेन तत्

English

Those heaven-walkers who pilot the aerial chariots of Devas and meritorious beings, were born to her as mental sons.

अध्याय २८

श्लोक 4

तत्र भार्यासहस्राणि दृष्ट्वा बाणस्य धीमतः ।यथायोग्यं यथाकामम् आगतः क्षोभ्य तत्पुरम्

tatra bhāryāsahasrāṇi dṛṣṭvā bāṇasya dhīmataḥ / yathāyogyaṃ yathākāmam āgataḥ kṣobhya tatpuram

हिन्दी अर्थ

यस्माच्चेवं क्रिया भृत्वा द्विपादा वे महेश्वरी । दृष्टा पुमस्त्थया चेषा सावित्री लोकभाँविनी 0.

English

She had two daughters Ayati and Niyati who are remembered as the wives of Vidhatr and Dhatr. They had two sons Pandu and Mrkandu. They were firm in religious vows, eternal and the very storehouses of the Vedic learning. Mar- kandeya was born of Mrkandu from Manasvinl.

अध्याय २८

श्लोक 5

नारदस्य वचः श्रुत्वा साधु साध्विति पूजयन् ।चिन्तयामास देवेशो भ्रमणं त्रिपुरस्य हि

nāradasya vacaḥ śrutvā sādhu sādhviti pūjayan / cintayāmāsa deveśo bhramaṇaṃ tripurasya hi

हिन्दी अर्थ

तपसा भावितात्मानो ये वे द्रक्ष्यन्ति वे द्विजा:। ईशत्वे च शिवत्वें च स्बंगं सबंतः स्थिरमू

English

Vedasiras was his son born of Murdhanya. The sons born to Vedasiras in Pivari established the family line. They were known as Markandeyas. They were seers and masters of the Vedas.

अध्याय २८

श्लोक 6

करमुक्तं यथा चक्रं विष्णुना प्रभविष्णुना ।महावेगं महायामं रक्षितं तेजसा मम

karamuktaṃ yathā cakraṃ viṣṇunā prabhaviṣṇunā / mahāvegaṃ mahāyāmaṃ rakṣitaṃ tejasā mama

हिन्दी अर्थ

द्वारा प्राप्प है ।८६। जो निर्मम, निरहड्भार काम क्रोध-हीत, ध्यान-निष्ठ योगी हैं, वे ही उस लोक का अवलोकन कर संकते हैं। जिसलियें आपने चार पैर वाली सरस्वंती का साक्षात्कार किया है, इसी से आंपके सब पशु चार पैर वाले होंगे। इसी से उनके स्तन भी चार ही होंगे । ब्ह्मन् ! सभी प्राणियों का प्राणस्वरूप भन्त्रमय सोम हमारे मुख से व्युत हुआ है. इसी से जीवधारियों ते उसे पीकर स्तनों में धारण

English

Pandu begot of Pundarika a son, Dyutiman. Two sons were born to him, viz. Dyutimanta and Sjjavan. Their sons and grandsons had alliances with the descendants of Bhrgu.

अध्याय २८

श्लोक 7

स च मे भक्तिनिरतो बाणो लोके च विश्रुतः ।भारती च मया दत्ता ब्राह्मणानां विशेषतः

sa ca me bhaktinirato bāṇo loke ca viśrutaḥ / bhāratī ca mayā dattā brāhmaṇānāṃ viśeṣataḥ

हिन्दी अर्थ

किया है। इसी से वह सॉममय और अमृत भी कहुलाता है। सोम का वर्ण रवेत होता और उसके चार पाद होते हैं ।६७-९०। जिस कारण आपने लोकभात्रिनी महेश्वरी सावित्री को दो पेरों वाली देखा है, उसी प्रकार आपके द्वारा सृष्ट तरगण द्विपद और दो स्तन वाले होंगे ।९१। जौ सवंवर्णा, सर्वभूतधारिणी, महासत्त्वशालिनी, परम, जन्मरहित माहेश्वरी वेवी हैं, उत्तका आपने साक्षात्कार किया है, इसलियें अन्य देवगण विश्वरूप होगें द

English

Viraja's son Sudhaman was famous as learned Vairaja. The son of Sudhaman resorted to (and settled in) the eastern quarter.

अध्याय २८

श्लोक 8

एवं स सुचिरं कालं देवदेवो महेश्वरः ।चिन्तयित्वा सुनिर्वाणं कार्यं प्रति जनेश्वरः

evaṃ sa suciraṃ kālaṃ devadevo maheśvaraḥ / cintayitvā sunirvāṇaṃ kāryaṃ prati janeśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

और महांतेजस्वी अज भी विश्वरूप धारण करेंगे ।६२-६३। इनके मुख में अमोघरेता हुताशन रहेंगे इसलिये पशु रूपी हुताशम संवंगत और मेध्य होंगे। जो तपसस्‍्वी द्विज हमें सर्वंगामी ईश्वर शिव रूप में देखेंगे, वे रज और तेमोंगुण से मुक्त होकर भानव शरीर को छोड़ने के बाद हमारे समीप आवेंगे, जहाँ से कि वे फिर

English

He was the son of Gauri and a valorous, righteous ruler of the worlds. Parvasa had great fame and he was the most excellent of all Ganas.

अध्याय २८

श्लोक 9

ततो ऽसौ मन्दरं ध्यात्वा चापे कृत्वा गुणे महीम् ।विष्णुं सनातनं देवं बाणे ध्यात्वा त्रिलोचनः

tato 'sau mandaraṃ dhyātvā cāpe kṛtvā guṇe mahīm / viṣṇuṃ sanātanaṃ devaṃ bāṇe dhyātvā trilocanaḥ

हिन्दी अर्थ

इत्येबमुक्तों भगवान्त्रह्मा रंद्रेण वे द्विजा:। प्रण॒म्य प्रयतों भृत्वा पुनराह पिलाभहः ६७ क्‍ ब्रह्मोवाच द ह भगवन्देवदेवेश विश्वरूपो (१) महेश्वरः(र) । इसास्तव महादेव तनवो लोकवन्दिता: 0६८ विश्वरूप महासत्त्व कस्मिन्काले महाभुज । कस्यां वा युगसंभृत्यां ब्रक्यन्ति त्वां हिजातयः १६६

English

Parvasabcgot of Parvasa two glorious sons Yajnavama and Kasyapa. These two righteous sons established their race.

अध्याय २८

श्लोक 10

फले हुताशनं देवं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् ।सुपर्णं पुङ्खयोर् मध्ये जवे वायुं प्रकल्प्य च

phale hutāśanaṃ devaṃ jvalantaṃ sarvatomukham / suparṇaṃ puṅkhayor madhye jave vāyuṃ prakalpya ca

हिन्दी अर्थ

केन वा तत्त्वयोगेन ध्यानयोगेन केन बा । तनवस्ते महादेव शक़्या व्रष्दु द्विजातिलिः

English

Smrti, the wife of Angiras, gave birth to two sons and four daughters who were pious and renowned in the world. They (the daughters) were Sinivali, Kuhu, Raka and Anumati. The sons were two, viz. Bharatagni and Kirtiman.

अध्याय २८

श्लोक 11

रथं महीमयं कृत्वा धुरि तावश्विनावुभौ ।अक्षे सुरेश्वरं देवम् अग्रकील्यां धनाधिपम्

rathaṃ mahīmayaṃ kṛtvā dhuri tāvaśvināvubhau / akṣe sureśvaraṃ devam agrakīlyāṃ dhanādhipam

हिन्दी अर्थ

तथसा नैव योगेन दानधर्मफलेन वा। न तोर्थंफलयोगेन ऋतुभिर्वा सदक्षिणः

English

Samhuti gave birth to Agni's (Bharatagni's?) son, Lord Parjanya. Another Parjanya called Pliranyaroma was born of Marlci. He is known astheguardian of the world abiding upto the final dissolution of the world.

अध्याय २८

श्लोक 12

यमं तु दक्षिणे पार्श्वे वामे कालं सुदारुणम् ।आदित्यचन्द्रौ चक्रे तु गन्धर्वानारकादिषु

yamaṃ tu dakṣiṇe pārśve vāme kālaṃ sudāruṇam / ādityacandrau cakre tu gandharvānārakādiṣu

हिन्दी अर्थ

साध्वो नारायणश्चेव विष्णुस्त्रिभुवनेश्वर:। भविष्यतीह नास्‍्ना तु वाराहो नाम विश्युतः ॥हण्३े

English

To Kirtiman, Dhenuka bore two pious sons—Varistha and Dhrtiman. They were the most excellent of the descedants of Angiras.

अध्याय २८

श्लोक 13

यन्तारं च सुरज्येष्ठं वेदान्कृत्वा हयोत्तमान् ।खलीनादिषु चाङ्गानि रश्मींश्छन्दांसि चाकरोत्

yantāraṃ ca surajyeṣṭhaṃ vedānkṛtvā hayottamān / khalīnādiṣu cāṅgāni raśmīṃśchandāṃsi cākarot

हिन्दी अर्थ

चतुर्बाहुश्चतुष्पादश्चतुर्नेत्रश्चतुमुंखः । तदा संवत्सरो भृत्वा यज्ञरूपो भविष्यति ७

English

Their sons and grandsons who were in thousands have passed away. Anasuya gave birth to five sinless sons y Atri, and to a daughter called Sruti, the mother ofSankhapada. She was the wife of Kardama, son of Pulaha, the Patriarch. The live sons of Atri are glorified (enumerated) thus: Satyanetra, Havva, Apomurti, Sanisvara and the fifth was Soma. t end of Svayambhuva Manvantara they passed away along

अध्याय २८

श्लोक 14

कृत्वा प्रतोदम् ॐकारं मुखग्राह्यं महेश्वरः ।धातारं चाग्रतः कृत्वा विधातारं च पृष्ठतः

kṛtvā pratodam oṃkāraṃ mukhagrāhyaṃ maheśvaraḥ / dhātāraṃ cāgrataḥ kṛtvā vidhātāraṃ ca pṛṣṭhataḥ

हिन्दी अर्थ

कभी नहीं लौटेंगे ।६४-६६। है द्विजगण ! जब रुद्र ने भगवान् ब्रह्मा से इस प्रकार कहां, तंब पितामह ने नम्न होकर फिर कहा ।६७। द द

English

The descendants of Atri, their sons and grandsons were in hundreds and thousands. They lived upto the end of Svaya-

अध्याय २८

श्लोक 15

मारुतात्सर्वतो दिग्भ्य ऊर्ध्वयन्त्रे तथैव च ।महोरगपिशाचांश्च सिद्धविद्याधरांस्तथा

mārutātsarvato digbhya ūrdhvayantre tathaiva ca / mahoragapiśācāṃśca siddhavidyādharāṃstathā

हिन्दी अर्थ

ब्रह्म बोले - “देव ! देवेश ! भगव॑ंन् ! आप विध्वरपधारी महेइवर हैं। महादेव ! आपके ये शरीर लोकपूज्य हैं; किन्तु हम जानने की इच्छा करते हैं कि, विश्वरूप ! महासरव, महाभुज ! कब किस काल में और किस युग में हिजातिगण आपको देख सकेंगे ? महादेव ! किस तर्वयोग से, किस ध्यान धारंणा से द्विजातिगण आपकी मूर्ति का दर्शन कर सकेंगे ?”” ।९८-१००। ड़

English

Dattali was the son of Pulastya by his wife Priti. In his previous birth, in the Svayambhuva Manvantara, known as Agastya. Devabahu was themiddle and V.mta was the

अध्याय २८

श्लोक 16

गणांश्च भूतसङ्घांश्च सर्वे सर्वाङ्गसंधिषु ।युगमध्ये स्थितो मेरुर्युगस्याधो महागिरिः

gaṇāṃśca bhūtasaṅghāṃśca sarve sarvāṅgasaṃdhiṣu / yugamadhye sthito meruryugasyādho mahāgiriḥ

हिन्दी अर्थ

भगवान बंलि--' तपस्या, योग, दानधर्म के फल, तीर्थाटन, दक्षिणा सहित यज्ञ, वेदों का अध्यापन, धनों का दान आदि से नहीँ बल्कि केवल ध्यान के द्वारा ही मनुष्य हमें देख सकतें हैं १०१-१०२। : त्रिभवनपति नारायण विष्णु ही एक मातन्न साधनीय हैं। वे वाराह ताम से विश्रत होंगे ।१०३। उन्हें चार बाहु चार पैर, चार नेत्र और चार मुख होंगे। उस समय वे संवत्सर होकर यज्नस्वरूप होंगे । वे षडज़,

English

Their younger sister, via. Sadvad was well known. She is remembered as the splended and pure wife o g i ( • • Bharatagni) and mother of Parjanya.

अध्याय २८

श्लोक 17

सर्पा यन्त्रस्थिता घोराः शम्ये वरुणनैरृतौ ।गायत्री चैव सावित्री स्थिते ते रश्मिबन्धने

sarpā yantrasthitā ghorāḥ śamye varuṇanairṛtau / gāyatrī caiva sāvitrī sthite te raśmibandhane

हिन्दी अर्थ

तिशीषे, त्रिस्थान और त्रिशरीौरवान् होंगे ।१०४॥ कृत, त्रेता, दापर और कलिये चारों युग उनके चार पाद होंगे। सकल यज्ञ उनके अज्भू, चारों वेद चारों भुजायें, ऋतु और ऋतु»सन्धि उनके मुख, दोनों अयन और दोनों अयनमुख उनकी चारों आँखें, पर्व यानी फाहंगुनी, आषाढ़ी, कृत्तिका उनके ठीनों सिर, दिव्य,

English

The wife of Dattali, the saintly and intelligent son o

अध्याय २८

श्लोक 18

सत्यं रथध्वजे शौचं दमं रक्षां समन्ततः ।रथं देवमयं कृत्वा देवदेवो महेश्वरः

satyaṃ rathadhvaje śaucaṃ damaṃ rakṣāṃ samantataḥ / rathaṃ devamayaṃ kṛtvā devadevo maheśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

भुजाश्च वेदाश्चत्वार ऋतु: संधिमुखानि च । है मुखे है च अयने नेन्राश्च चत्रस्तथा

English

Ksama gave birth to ilie sons of 1 ulaha. 1 hey had fiery refulgence and they established theii reputation,

अध्याय २८

श्लोक 19

संनद्धः कवची खड्गी बद्धगोधाङ्गुलित्रवान् ।बद्धा परिकरं गाढं जटाजूटं नियम्य च

saṃnaddhaḥ kavacī khaḍgī baddhagodhāṅgulitravān / baddhā parikaraṃ gāḍhaṃ jaṭājūṭaṃ niyamya ca

हिन्दी अर्थ

शिरांसि त्रीणि पर्वाणि फाल्गुन्याबाढकृत्तिका:। दिव्यान्तरक्षिभौमानि त्रीणि स्थानानि यानि तु ॥

English

Thcv were Kardama, Ambarlsa, Sahisnu, Rsi and Dhanakaplvan. An auspicious daughter, Pivari, was also born.

अध्याय २८

श्लोक 20

सज्जं कृत्वा धनुर्दिव्यं योजयित्वा रथोत्तमम् ।रथमध्ये स्थितो देवः शुशुभे च युधिष्ठिर

sajjaṃ kṛtvā dhanurdivyaṃ yojayitvā rathottamam / rathamadhye sthito devaḥ śuśubhe ca yudhiṣṭhira

हिन्दी अर्थ

संभर्वः प्रलयश्चेव आश्रमो हो प्रकीतितौ द द १०७ स यदा कालरूपाभो वराहत्वे व्यवस्थित: । भविष्यति यदा साध्यो विष्णुर्नारायण: प्रभु:

English

Kardama's wife Sruth daughter of Atri, gave birth to a son Sankhapada and a daughter Kamya.

अध्याय २८

श्लोक 21

धनुषः शब्दनादेनाकम्पयच्च जगत्त्रयम् ।स्थानं कृत्वा तु वैशाखं निभृतं संस्थितो हरः

dhanuṣaḥ śabdanādenākampayacca jagattrayam / sthānaṃ kṛtvā tu vaiśākhaṃ nibhṛtaṃ saṃsthito haraḥ

हिन्दी अर्थ

तदा त्वमपि देवेश चतुर्वकत्रो व्यवस्थित: । ब्रह्मलोकनमस्कार्यों विष्णुर्नारायण: प्रभुः...

English

The glorious Sarikhapada was a Prajapati and the ruler of worlds. After giving Kamya (in marriage) to Priyavrata, he settled in the southern region.

अध्याय २८

श्लोक 22

निरीक्ष्य सुचिरं कालं कोपसंरक्तलोचनः ।ध्यात्वा तं परमं मन्त्रम् आत्मानं च निरुध्य सः

nirīkṣya suciraṃ kālaṃ kopasaṃraktalocanaḥ / dhyātvā taṃ paramaṃ mantram ātmānaṃ ca nirudhya saḥ

हिन्दी अर्थ

एकार्णवे प्लवे चेव शयान पुरुष हरिम्। यदा द्रक्यसि देवेशं ध्यानयुकतं सहामुनिम् ११०:

English

The sons Dhanakaplvan and Sahisnu became famous. So also Yasodharin, Kamadcva and Sumadhyama.

अध्याय २८

श्लोक 23

मुमोच सहसा बाणं पुरस्य वधकाङ्क्षया ।यदा त्रीणि समेतानि अन्तरिक्षस्थितानि तु

mumoca sahasā bāṇaṃ purasya vadhakāṅkṣayā / yadā trīṇi sametāni antarikṣasthitāni tu

हिन्दी अर्थ

एफकस्योदरस्थस्तु दृष्ट्वा लोकांश्वराचरान् । विस्म॒यं परम गत्वा ध्यानादृबुद्ध्वा तु समानुषो

English

From Rtu a son equal to Kratu was born and the progeny was auspicious. They did not marry and remained celibate. They were sixty thousand in number and known as Valakhilyas.

अध्याय २८

श्लोक 24

ततः कालनिमेषार्धं दृष्ट्वैक्यं त्रिपुरस्य च ।त्रिपर्वणा त्रिशल्येन ततस्तान्यवसादयत्

tataḥ kālanimeṣārdhaṃ dṛṣṭvaikyaṃ tripurasya ca / triparvaṇā triśalyena tatastānyavasādayat

हिन्दी अर्थ

ततस्तस्मिस्तदा कल्पे वाराहे सप्तमे प्रभो:। पुनविष्णुमंहातेजा: कालो लोकप्रकालन:

English

They surround the sun and go ahead of Aruna. They will remain fellow-travellers with the sun till the universe is finally dissolved.

अध्याय २८

श्लोक 25

ततो लोका भयत्रस्तास् त्रिपुरे भरतोत्तम ।सर्वासुरविनाशाय कालरूपा भयावहाः

tato lokā bhayatrastās tripure bharatottama / sarvāsuravināśāya kālarūpā bhayāvahāḥ

हिन्दी अर्थ

तदा चतुर्युगावस्थे कल्पे तस्मिन्थुगान्तके । भविष्यामि शिखायुक्तः श्वेतो नाम महामुनिः ४११५ हिमवच्छिखरे रम्ये छागले पव॑तोत्तमे । चतुःशिष्या: शिवयुक्ता भविष्यन्ति तदा मम

English

Two younger sisters were Punyatma and Sumati. They weie the daughters-in-law ofParvasa, son ofPurnamasa.

अध्याय २८

श्लोक 26

अट्टहासान् प्रमुञ्चन्ति कष्टरूपा नरास् तदा ।निमेषोन्मेषणं चैव कुर्वन्ति लिपिकर्मसु

aṭṭahāsān pramuñcanti kaṣṭarūpā narās tadā / nimeṣonmeṣaṇaṃ caiva kurvanti lipikarmasu

हिन्दी अर्थ

अन्तरिक्ष और भौम ये तीनों स्थान उनके मस्तकत्रय एवं उत्पत्ति और प्रलय उनका आश्रम कहलाता है ।१०५-१०७। वही प्रभु नारायण जब काल रूप से वाराह देह में प्रतिष्ठित होकर सबके द्वारा आराधनीय होंगे, तब देवेश ! आप भी चतुरानन होंगे। भगवान् नारायण तब ब्रहालोक निवासियों के लिये भी नमस्करणीय होंगे ।१०८-१०६। जब संसार एकार्णवीभूत हो जायगा, तब आप उस शभ्रवह के

English

Seven sons were born to Vasistha in Orja. Their eldest sister was the slender-waisted lady Puntjarika who was the mother of Dyutiman and the wife of Pandu. Her younger brothers were seven. They were famous as Vasisthas.

अध्याय २८

श्लोक 27

निष्पन्दनयना मर्त्याश्चित्रेष्वालिखिता इव ।देवायतनगा देवा रटन्ति प्रहसन्ति च ।स्वप्ने पश्यन्ति चात्मानं रक्ताम्बरविभूषितम्

niṣpandanayanā martyāścitreṣvālikhitā iva / devāyatanagā devā raṭanti prahasanti ca / svapne paśyanti cātmānaṃ raktāmbaravibhūṣitam

हिन्दी अर्थ

बीच पुरुषोत्तम हरि को ध्यानस्थ महामुनि की तरह शयन करते हुये देखेंगे ।((१०। उस समय हमारी माया से मोहित होकर आपकी चेतना नष्ट हो जायगी। रात होने के कारण आप दोनों ही एक दूसरे को नहीं जान सकेंगे, आपस में स्पर्द्धा करंगे। उस समय आप दोनों ही एक दूसरे के उदर में चराचर लोक को देखकर अत्यन्त विस्मित हो जायेंगे और ध्यान द्वारा अपने को मनुष्य समझने लगेंगे ।१११-११२। उस कल्प में आप

English

They were Rajas, Putra, Ardhabahu, Savana. Adhana, Sutapas and Sukla. They arc known as seven sages.

अध्याय २८

श्लोक 28

रक्तमाल्योत्तमाङ्गाश्च पतन्तः कार्दमे ह्रदे ।पश्यन्ति नाम चात्मानं सतैलाभ्यङ्गमस्तकम्

raktamālyottamāṅgāśca patantaḥ kārdame hrade / paśyanti nāma cātmānaṃ satailābhyaṅgamastakam

हिन्दी अर्थ

पद्मनाभि, पद्मजन्मा, पद्मार्धित भादि नामों से विपुल ख्याति प्राप्ति करंगे। प्रभु के उस सप्तम बाराह कल्प में विष्ण महातेजस्वी काल होकर संसार का संहार करेंगे। उस समय बैवस्वत मनु आपके पुत्र होंगे ।११३-११४। हम उस समय उस चतुर्युग के उपसंहारक कल्प में शिखायुक्त श्वेत नामक महामुनि होंगे

English

The famous daughter of Markanqleya bore to Rajas a

अध्याय २८

श्लोक 29

पश्यन्ति यानमारूढं रासभैश्च नृपोत्तम ।संवर्तको महावायुर्युगान्तप्रतिमो महान्

paśyanti yānamārūḍhaṃ rāsabhaiśca nṛpottama / saṃvartako mahāvāyuryugāntapratimo mahān

हिन्दी अर्थ

और दइ्बेतलोहित नामक चार शिष्य होंगे। ये चारों ही महात्मा ब्राह्मण बेदपारम ओर शिवध्यानानुरक्त

English

The famous daughter of Markanqleya bore to Rajas a

अध्याय २८

श्लोक 30

गृहान् उन्मूलयामास वृक्षजातीननेकशः ।भूमिकम्पाः सनिर्घाता उल्कापाताः सहस्रशः

gṛhān unmūlayāmāsa vṛkṣajātīnanekaśaḥ / bhūmikampāḥ sanirghātā ulkāpātāḥ sahasraśaḥ

हिन्दी अर्थ

ततस्ते ब्रह्ममूयिष्ठा दृष्द्वा ब्रह्मर्गत पराम् । तत्समीष॑ गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिडुलंभामू

English

The famous daughter of Markanqleya bore to Rajas a

अध्याय २८

श्लोक 31

रुधिरं वर्षते देवो मिश्रितं कर्करैर्बहु ।अग्निकुण्डेषु विप्राणां हुतः सम्यग्घुताशनः

rudhiraṃ varṣate devo miśritaṃ karkarairbahu / agnikuṇḍeṣu viprāṇāṃ hutaḥ samyagghutāśanaḥ

हिन्दी अर्थ

पुनस्तु मम देवेशो द्वितीयद्वापरे प्रभु: । प्रजापतियेदा व्यासः सत्यो नाम(भविष्यति 0११६ तदा लोकहितार्थाय सुतारो नाम नामतः। भविष्यामि कलो तस्समिल्लोकाजुप्रहकारणात्ु

English

The famous daughter of Markanqleya bore to Rajas a

अध्याय २८

श्लोक 32

ज्वलते धूमसंयुक्तो विस्फुलिङ्गकणैः सह ।कुंजरा विमदा जातास्तुरगाः सत्त्ववर्जिताः

jvalate dhūmasaṃyukto visphuliṅgakaṇaiḥ saha / kuṃjarā vimadā jātāsturagāḥ sattvavarjitāḥ

हिन्दी अर्थ

तत्रावि मम ते पुत्रा भविष्या नाम नामतः ) । दुन्दुभिः शतरूपश्व ऋचोकः केतुमांस्तथा ११२१

English

The famous daughter of Markanqleya bore to Rajas a

अध्याय २८

श्लोक 33

अवादितानि वाद्यन्ते वादित्राणि सहस्रशः ।ध्वजा ह्यकम्पिताः पेतुश्छत्राणि विविधानि च

avāditāni vādyante vāditrāṇi sahasraśaḥ / dhvajā hyakampitāḥ petuśchatrāṇi vividhāni ca

हिन्दी अर्थ

प्रांप्प योगं तथा ज्ञान ब्रह्म चेब सनातनम् । रुद्रलोक॑ गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्

English

The famous daughter of Markanqleya bore to Rajas a

अध्याय २८

श्लोक 34

ज्वलति पादपास्तत्र पर्णानि च सभं ततः ।सर्वं तद्व्याकुलीभूतं हाहाकारसमन्वितम्

jvalati pādapāstatra parṇāni ca sabhaṃ tataḥ / sarvaṃ tadvyākulībhūtaṃ hāhākārasamanvitam

हिन्दी अर्थ

तृतीये द्वापरे चेव यदा व्यासस्तु भागंवः । तदा हां भविष्यामि दमनस्तु युगान्तिके

English

The famous daughter of Markanqleya bore to Rajas a

अध्याय २८

श्लोक 35

उद्यानानि विचित्राणि प्रबभञ्ज प्रभञ्जनः ।तेन संप्रेरिताः सर्वे ज्वलन्ति विशिखाः शिखाः

udyānāni vicitrāṇi prababhañja prabhañjanaḥ / tena saṃpreritāḥ sarve jvalanti viśikhāḥ śikhāḥ

हिन्दी अर्थ

तत्नापि च भविष्यन्ति चत्वारों मम पुश्नका: । विशोकश्व विकेशश्च विशापः शापनाशन:ः ४१२४ तेडपि तेनैव सार्गेंग योगोक्‍्तेन सहौजसः । रुद्रलोक गमिष्यन्ति पुनरावत्तिदु्लेभम् १२५ चतुर्थ द्वापरे चेब यदा व्यासोडड्धिराः स्मृतः तदाःप्यहं भविष्यामि सुहोत्री नाम नामतः ॥

English

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अध्याय २८

श्लोक 36

वृक्षगुल्मलतावल्ल्यो गृहाणि च समन्ततः ।दिग्विभागैश्च सर्वैश्च प्रवृत्तो हव्यवाहनः

vṛkṣagulmalatāvallyo gṛhāṇi ca samantataḥ / digvibhāgaiśca sarvaiśca pravṛtto havyavāhanaḥ

हिन्दी अर्थ

होंगे। बे चारों ही ब्रह्मभूयिष्ठ ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ ब्रह्गति को देखकर ब्रह्म के समीप अर्थात् हमारे समीप आयेंगे, जहाँ से कि वे फिर नहीं लौटेंगे ।! १६-११८ जब द्वितीय द्वापर युग में प्रभु प्रजापति देव-देव सत्य व्यास नाम से अभिहित होंगे, तब हम संसार के कल्याण के लिये सुतार नाम ग्रहण करेंगे। उस कलिकाल

English

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अध्याय २८

श्लोक 37

सर्वं किंशुकपर्णाभं प्रज्वलच्चैव दृश्यते ।गृहाद्गृहं तदा गन्तुं नैव धूमेन शक्यते

sarvaṃ kiṃśukaparṇābhaṃ prajvalaccaiva dṛśyate / gṛhādgṛhaṃ tadā gantuṃ naiva dhūmena śakyate

हिन्दी अर्थ

में सांसारिकों पर अनुग्रद करने के लिये हमें दुन्दुभि, शतरूप, ऋचीक और केतुमान् नामक चार धुत होंगे । वे योग तथा ज्ञान को प्राप्त कर एवं सनातन ब्रह्म को जानकर रुद्लोक में गमन करेंगे, जहाँ से कि लौटा नहीं जाता है।११९-१२२। तृतीय द्वापर में जब भार्गव नाम से व्यास रहेंगे, तब हम उस थयुगान्त में दमन नाम से प्रसिद्ध होंगे ।१२३॥ उस समय भी हमें विशोक, विकरेश, विशाप और शापनाशन नामक चार पुत्र

English

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अध्याय २८

श्लोक 38

हरकोपाग्निनिर्दग्धाः क्रन्दन्ते त्रिपुरे जनाः ।प्रदीप्तं सर्वतो दिक्षु दह्यते त्रिपुरं परम्

harakopāgninirdagdhāḥ krandante tripure janāḥ / pradīptaṃ sarvato dikṣu dahyate tripuraṃ param

हिन्दी अर्थ

होंगे ।१२४। वे मह॒तेजस्वी पुत्रगण उसी योगविधान-पडित से, जहाँ से नहीं लौटा जाता है, उस रुद्रलोक में गमन करेंगे ।१२५। चतुर्थ द्वापर में जब व्यास अज्ञिरा कहलावंगे, तब हमारा सुहोत्री नाम होगा ।१२६। उस समय भी हमें सुमुख, दुर्मुख, दुर्देभ और दुरतिक्रम नामक चार तपस्वी पुत्र होंगे । थे चारों ही तपस्वी, योगी, दृढ़त्रत और द्विजश्रेष्ठ होंगे। वे योग की सुक्षम गति को प्राप्त कर निष्पाप और विमल हो जायेंगे और उसी

English

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अध्याय २८

श्लोक 39

पतन्ति शिखराग्राणि विशीर्णानि सहस्रशः ।पावको धूमसंपृक्तो दह्यमानः समन्ततः

patanti śikharāgrāṇi viśīrṇāni sahasraśaḥ / pāvako dhūmasaṃpṛkto dahyamānaḥ samantataḥ

हिन्दी अर्थ

मार्ग से वे भी रुद्रलोक गमन करेंगे ।१२७-१२८। पंचम द्वापर में जब व्यास सविता कहलायेंगे, तब हम

English

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अध्याय २८

श्लोक 40

नृत्यन्वै व्याप्तदिग्देशः कान्तारेष्वभिधावति ।देवागारेषु सर्वेषु गृहेष्वट्टालकेषु च

nṛtyanvai vyāptadigdeśaḥ kāntāreṣvabhidhāvati / devāgāreṣu sarveṣu gṛheṣvaṭṭālakeṣu ca

हिन्दी अर्थ

धनुदिच्वान्तगंतग्रन्थो ग. पुस्तके नास्ति ।

English

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अध्याय २८

श्लोक 41

प्रवृत्तो हुतभुक्तत्र पुरे कालप्रचोदितः ।ददाह लोकान्सर्वत्र हरकोपप्रकोपितः

pravṛtto hutabhuktatra pure kālapracoditaḥ / dadāha lokānsarvatra harakopaprakopitaḥ

हिन्दी अर्थ

अनुग्रहार्थ लोकानां योगात्मा नेककर मंक्ृत् । चत्वारस्तु महाभागा विरजाः शुद्धयोनयः

English

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अध्याय २८

श्लोक 42

दहते त्रैपुरं लोकं बालवृद्धसमन्वितम् ।सपुरं सगृहद्वारं सवाहनवनं नृप

dahate traipuraṃ lokaṃ bālavṛddhasamanvitam / sapuraṃ sagṛhadvāraṃ savāhanavanaṃ nṛpa

हिन्दी अर्थ

परिचतें पुनः षष्ठे मृत्युव्यासों यदा विभुः। तदाउप्यहं भविष्यामि लोकाक्षि्नाम नामतः. ॥१३३े शिष्याश्व मम ते दिव्या योगात्मानों दृढब्ताः। भविष्यन्ति महाभागाश्चत्वारों लोकसंमतः

English

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अध्याय २८

श्लोक 43

केचिद्भोजनसक्ताश्च पानासक्तास्तथापरे ।अपरा नृत्यगीतेषु संसक्ता वारयोषितः

kecidbhojanasaktāśca pānāsaktāstathāpare / aparā nṛtyagīteṣu saṃsaktā vārayoṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

विभुर्नाम महातेजाः पुबंधासोच्छतक्तु: । तदाध्प्यहे भविष्यासि कजौ तस्मिस्युगान्तिके

English

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अध्याय २८

श्लोक 44

अन्योन्यं च परिष्वज्य हुताशनशिखार्दिताः ।दह्यमाना नृपश्रेष्ठ सर्वे गच्छन्त्यचेतनाः

anyonyaṃ ca pariṣvajya hutāśanaśikhārditāḥ / dahyamānā nṛpaśreṣṭha sarve gacchantyacetanāḥ

हिन्दी अर्थ

भविष्यन्ति महात्मानों रुद्लोकपरायणएः वसिष्ठश्राष्टसे व्यसः+ ( परिवर्ते भबिष्यति

English

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अध्याय २८

श्लोक 45

अथान्ये दानवास्तत्र दह्यन्ते ऽग्निविमोहिताः ।न शक्ताश्चान्यतो गन्तुं धूमेनाकुलिताननाः ।हंसकारण्डवाकीर्णा नलिन्यो हेमपङ्कजाः

athānye dānavāstatra dahyante 'gnivimohitāḥ / na śaktāścānyato gantuṃ dhūmenākulitānanāḥ / haṃsakāraṇḍavākīrṇā nalinyo hemapaṅkajāḥ

हिन्दी अर्थ

कड्धू के नाम से महातपस्वी मुनि कहलायेंगे । २६। सांसारिकों के प्रति अनुग्रह करने के लिये हम उस समय अनेक कर्मों के कर्ता और योगात्मा होंगे। हमें चार पुत्र होंगे । थे विरजस्क, शुद्धथोनि, महाभाग, योगात्मा, दुढ़व्त, निमंम और निरहंकार होंगे। उनका नाम सनक, सनन्‍्दन ऋतु और सनत्कुमार होगा। ये भी

English

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अध्याय २८

श्लोक 46

दह्यन्ते विविधास् तत्र वाप्यः कूपाश्च भारत ।दृश्यन्ते ऽनलदग्धानि पुरोद्यानानि दीर्घिकाः ।अम्लानैः पङ्कजैश्छन्ना विस्तीर्णावसुयोजनाः

dahyante vividhās tatra vāpyaḥ kūpāśca bhārata / dṛśyante 'naladagdhāni purodyānāni dīrghikāḥ / amlānaiḥ paṅkajaiśchannā vistīrṇāvasuyojanāḥ

हिन्दी अर्थ

हमारे पास गमन करेंगे,

English

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अध्याय २८

श्लोक 47

गिरिकूटनिभास्तत्र प्रासादा रत्नशोभिताः ।दृश्यन्ते ऽनलसंदग्धा विशीर्णा धरणीतले

girikūṭanibhāstatra prāsādā ratnaśobhitāḥ / dṛśyante 'nalasaṃdagdhā viśīrṇā dharaṇītale

हिन्दी अर्थ

जहाँ से पुनरावृत्ति दुलंभ है।१३०-१३२। फिर छठ द्वापर में जब्र मृत्यु व्यास

English

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अध्याय २८

श्लोक 48

नरस्त्रीबालवृद्धेषु दह्यमानेषु सर्वतः ।निर्दयं ज्वलते वह्निर्हाहाकारो महानभूत् ।काचिच्च सुखसंसुप्ताप्रमत्तान्या नृपोत्तम

narastrībālavṛddheṣu dahyamāneṣu sarvataḥ / nirdayaṃ jvalate vahnirhāhākāro mahānabhūt / kācicca sukhasaṃsuptāpramattānyā nṛpottama

हिन्दी अर्थ

होगे तब हम लोकाक्षि के नाम से प्रसद्ध होंगे ।१३३॥। उस समय भी हमें चार शिष्य होंगे। वे सभी योगात्मा, दृढ़त्रतः लोकामान्य, महात्मा और निष्पाप होंगे। उनका नाभ सुधामा विरजा, शब्धेपाद और रव होगा । ये भी उसी मार्ग से जायेंगे इसमें कुछ संशय नहीं है ।१ ३४-१३ १५ पूर्व में जो महातेजस्त्री विभु शतक्रतु थे, वही सप्तम द्वापर में जब शतक्तु व्यास होंगे, तब हम उस युगान्तकाद में यागिश्रेष्ठ

English

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अध्याय २८

श्लोक 49

क्रीडित्वा च सुविस्तीर्णशयनस्था वराङ्गना ।काचित्सुप्ता विशालाक्षी हारावलिविभूषिता ।धूमेनाकुलिता दीना न्यपतद्धव्यवाहने

krīḍitvā ca suvistīrṇaśayanasthā varāṅganā / kācitsuptā viśālākṣī hārāvalivibhūṣitā / dhūmenākulitā dīnā nyapataddhavyavāhane

हिन्दी अर्थ

अऔैगिषय्य नाम से ख्यात होंगे ।!३६-१३७ उस युग में भी हमें चार पुत्र सारस्वत, सुमेध, वसुवाह और सुवाहन नाम के होंगे। वे महात्मा भी ध्यान-योग का अवलम्बन कर उसी मांग से रुद्रलोक गमत करेंगे। आठवें द्वापर में वसिष्ठ व्यास होंगे ।१३८-१४०। उस समय कपिल, आसुरि, पंचशिख और वाग्वलि नामक चार महात्मा मुनि उनके शिष्य होंगे। वे महातेजस्वी और महायोगी ध्यानबल से माहेश्वर योग को प्राप्त-

English

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अध्याय २८

श्लोक 50

काचित्तस्मिन्पुरे दीप्ते पुत्रस्नेहानुलालसा ।पुत्रम् आलिङ्गते गाढं दह्यते त्रिपुरे ऽग्निना

kācittasminpure dīpte putrasnehānulālasā / putram āliṅgate gāḍhaṃ dahyate tripure 'gninā

हिन्दी अर्थ

+ धनुश्चिह्नातर्ग तग्रन्थो ग. पुस्तके नास्ति ।

English

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अध्याय २८

श्लोक 51

काचित्कनकवर्णाभा इन्द्रनीलविभूषिता ।भर्तारं पतितं दृष्ट्वा पतिता तस्य चोपरि

kācitkanakavarṇābhā indranīlavibhūṣitā / bhartāraṃ patitaṃ dṛṣṭvā patitā tasya copari

हिन्दी अर्थ

भविष्यन्ति महात्मानो ब्राह्मणा वेदपारगा: । सर्जे तपोबलोस्कृष्टा: शापानुग्रहको विदा: १४५ तेषपि तेनेव मागेग योगोक्‍्तेन तपस्विनः । ध्यानसार्ग समासाद्य गमिष्यन्ति तथैव ते

English

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अध्याय २८

श्लोक 52

काचिदादित्यवर्णाभा प्रसुप्ता तु प्रियोपरि ।अग्निज्वालाहता गाढं कंठमालिङ्गते नृप

kācidādityavarṇābhā prasuptā tu priyopari / agnijvālāhatā gāḍhaṃ kaṃṭhamāliṅgate nṛpa

हिन्दी अर्थ

तत्रव मम ते पुत्रा भविष्यन्ति दृढब्रता: बलबस्धुनिरा(र)मित्रः केतुशइगस्तपोधनः

English

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अध्याय २८

श्लोक 53

मेधवर्णा परा नारी चलत्कनकमेखला ।श्वेतवस्त्रोत्तरीया तु पपात धरणीतले

medhavarṇā parā nārī calatkanakamekhalā / śvetavastrottarīyā tu papāta dharaṇītale

हिन्दी अर्थ

योगात्मानों महात्मानों ध्यानयोगसमन्विता: । रुद्रलोक॑ गसिष्यन्ति तपसा दग्धकल्मघा;:.

English

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अध्याय २८

श्लोक 54

काचित्कुन्देन्दुवर्णाभा नीलरत्नविभूषिता ।शिरसा प्राञ्जलिर् भूत्वा विज्ञापयति पावकम्

kācitkundenduvarṇābhā nīlaratnavibhūṣitā / śirasā prāñjalir bhūtvā vijñāpayati pāvakam

हिन्दी अर्थ

एकादशे द्वापरे तु तिष्ठदृव्यासों भविष्पति तदाषप्यहूं भविष्यामि गडगाद्वारे कले्धुरि.

English

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अध्याय २८

श्लोक 55

कस्याश्चिज्ज्वलते वस्त्रं केशाः कस्याश्च भारत ।ज्वलज्ज्वलनसङ्काशैर् हेमभाण्डैस्त्रसंहित च

kasyāścijjvalate vastraṃ keśāḥ kasyāśca bhārata / jvalajjvalanasaṅkāśair hemabhāṇḍaistrasaṃhita ca

हिन्दी अर्थ

उग्रा नाम महानादास्तत्रव मम पुत्रका: । भविष्यन्ति महौजस्काः सुवृत्ता लोकविश्वुता: १५२ लम्बोदरश्र लम्बश्न लम्बाक्षो लम्बकेशकः। प्राप्य महेश्वरं योगं श॒द्बलोकाय संस्थिता: ॥

English

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अध्याय २८

श्लोक 56

काचित्प्रभूतदुःखार्ता विललाप वराङ्गना ।भस्मीभूतं पतिं दृष्ट्वा क्रन्दन्ती कुररी यथा

kācitprabhūtaduḥkhārtā vilalāpa varāṅganā / bhasmībhūtaṃ patiṃ dṛṣṭvā krandantī kurarī yathā

हिन्दी अर्थ

कर निष्पाप हो जायेंगे और हमारे पास आ जायेंगे, जहाँ से कि फिर लौटना नहीं पड़ता है ।१४१-१४२॥। नवम परिवतंन में सारस्वत व्यास होंगे। उस समय हम ऋषभ नाम से विख्यात होंगे ।१४३॥ उस समय भी हमें महातेजस्वी पराशर, गाग्य, भागव और अड्धिरा नामक चार पुत्र होंगे। वे महात्मा ब्राह्मण वेदज्ञाता होंगे भौर तपोबलशाली होकर “ग्रह-अनुग्रह के भी ज्ञता होंगे ।(४४-१४२५। ये तपस्विगण उसी योगविधान-पद्धति

English

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अध्याय २८

श्लोक 57

आलिङ्ग्य गाढं सहसा पतिता तस्य मूर्धनि ।काचिच्च बहुदुःखार्ता व्यलपत्स्त्री स्ववेश्मनि

āliṅgya gāḍhaṃ sahasā patitā tasya mūrdhani / kācicca bahuduḥkhārtā vyalapatstrī svaveśmani

हिन्दी अर्थ

से ध्यान का अवलम्बन करके उसी प्रकार हमारे पास पहुंचेंगे, जिस प्रकार कि और पिछले युगों में हमारे पुत्र हमारे पास आये थे । दसवें द्वापर में त्रिधामा व्यास होंगे। उस समय हम नगोत्तम हिमालय के भृगरु नामक उन्नत और रम्य शिखर पर आविर्भेत होंगे ।((१४६-१४८।॥ उस काल में भी हमें बलबन्धु, निरामित्र, केतुशद्भ और तपोधन नामक चार पृत्र होंगे, जो ब्रत करने में दृढ़ योगासक्त, महात्मा और ध्यानावस्थित होंगे। ये

English

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अध्याय २८

श्लोक 58

भस्मसाच्च कृतं दृष्ट्वा क्रन्दते कुररी यथा ।मातरं पितरं काचिद्दृष्ट्वा विगतचेतनम्

bhasmasācca kṛtaṃ dṛṣṭvā krandate kurarī yathā / mātaraṃ pitaraṃ kāciddṛṣṭvā vigatacetanam

हिन्दी अर्थ

भी निष्पाप होकर रुद्लोक गमन करेंगे ।१५६-१५०। एकादशर्वे द्वापर में तिष्ठत् व्यास होंगे। उस समय हम कलि काल में गंगाद्वार में आविभूत होंगे। उस समय हमें उप्र नामक महानाद करने वाले अत्यन्त बलशाली लोकविस्यात लम्बोदर, लम्ब, लम्बाक्ष और लम्बकेश नामक चार पुत्र होंगे। ये भी माहेश्वर योग को प्राप्त कर रुद्रलोक के लिये उद्यत होंगे और उसी मांग से उत्तम गति को प्राप्त करेंगे ।१५१-१५३॥। बारहवें

English

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अध्याय २८

श्लोक 59

वेपते पतिता भूमौ खेदिता वडवा यथा ।इतश्चेतश्च काचिच्च दह्यमाना वराङ्गना

vepate patitā bhūmau kheditā vaḍavā yathā / itaścetaśca kācicca dahyamānā varāṅganā

हिन्दी अर्थ

द्वादशे परिव्ते तु शततेजा महामुनि:ः। भविष्यति महासत्तवों व्यासः कविवरोत्तमः

English

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अध्याय २८

श्लोक 60

नापश्यद्बालमुत्सङ्गे विपरीतमुखी स्थिता ।कुम्भिलस्य गृहं दग्धं पतितं धरणीतले

nāpaśyadbālamutsaṅge viparītamukhī sthitā / kumbhilasya gṛhaṃ dagdhaṃ patitaṃ dharaṇītale

हिन्दी अर्थ

ततोः्प्यहुं भविष्यामि अन्रिर्नाम युगान्तिके । हैमक वनमासाद्य योगमास्थाय भुृतले १५५ अत्रापि मम ते पुत्रा भस्मस्तानानुलेपना:। भणिष्यन्ति महायोगा रुद्रलोकपरायणा: १५६ सर्वेज्ञः समबुद्धिश्वच साध्य: स्वस्तथव च्। रुद्रलोक॑ गमिष्यन्ति ध्यानयोगपरायणाः.....

English

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अध्याय २८

श्लोक 61

कूष्माण्डस्य च धूम्रस्य कुहकस्य बकस्य च ।विरूपनयनस्यापि विरूपाक्षस्य चैव हि

kūṣmāṇḍasya ca dhūmrasya kuhakasya bakasya ca / virūpanayanasyāpi virūpākṣasya caiva hi

हिन्दी अर्थ

त्रयोदशे पुनः प्राप्ते परिव्ते क्रमेण तु । धर्मो नारायणो नाम व्यासस्तु भविता यदा १५८ तदाध्प्यहूं भविष्यामि वालिरनाम महामुनि:। वालि(ल)खिल्याश्रमे पुण्ये पते गन्धमादने

English

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अध्याय २८

श्लोक 62

शुम्भो डिम्भश्च रौद्रश्च प्रह्लादश्चासुरोत्तमः ।दण्डपाणिर् विपाणिश्च सिंहवक्त्रस् तथानघ

śumbho ḍimbhaśca raudraśca prahlādaścāsurottamaḥ / daṇḍapāṇir vipāṇiśca siṃhavaktras tathānagha

हिन्दी अर्थ

तत्रापि मस ते पुत्रा भविष्यन्ति तपोधना: । सुधामा काश्यपश्चेव वसिष्ठो विरजञास्तथा

English

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अध्याय २८

श्लोक 63

दुन्दुभश्चैव संह्रादो डिण्डिर्मुण्डिस् तथैव च ।बाणभ्राता च बाणश्च क्रव्यादव्याघ्रवक्त्रकौ

dundubhaścaiva saṃhrādo ḍiṇḍirmuṇḍis tathaiva ca / bāṇabhrātā ca bāṇaśca kravyādavyāghravaktrakau

हिन्दी अर्थ

यदा व्यास: सुरक्षस्तु पर्यायश्च चतुर्दंश । तन्नापि पुनरेवाहूं भविष्यासि युगान्तिके १६२

English

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अध्याय २८

श्लोक 64

एवमन्ये ऽपि ये केचिद्दानवा बलदर्पिताः ।तेषां गृहे तथा वह्निर्ज्वलते निर्दयो नृप ।दह्यमानाः स्त्रियस्तात विलपन्ति गृहे गृहे

evamanye 'pi ye keciddānavā baladarpitāḥ / teṣāṃ gṛhe tathā vahnirjvalate nirdayo nṛpa / dahyamānāḥ striyastāta vilapanti gṛhe gṛhe

हिन्दी अर्थ

योगात्मानों महात्मानों ध्यानयागपरायणा: । ते5पि तेनेव मार्गेण रुद्रलोकनिवासिन: १६५

English

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अध्याय २८

श्लोक 65

करुणाक्षरवादिन्यो निराधारा गताः शिवम् ।यदि वैरं सुरारेश्च पुरुषोपरिपावक

karuṇākṣaravādinyo nirādhārā gatāḥ śivam / yadi vairaṃ surāreśca puruṣoparipāvaka

हिन्दी अर्थ

द्वापर में शवतेजा महामुनि ब्यास होंगे। ये कवियों में श्रेष्ठ और महासत्त्वशली होंगे । उस युगान्‍्त में हम अत्रि नाम से विख्यात होंगे और महीतल के हैमक वन में योगसाधना करेंगे ।!५४-१५५॥ यहाँ भी हमें भस्म लगाये हुये, रुद्रलोकाभिलाषी महायोगी पुत्र होंगे। उनके नाम स्वेज्ञ, समवुद्धि, साथ्य और स्व होंगे। ये भी ध्यानयोग में आसक्त होकर रुद्रलोक गमन करेंगे।१५६-१५७। क्रम से जत्र तेरहवाँ द्वापर आवेगा।

English

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अध्याय २८

श्लोक 66

स्त्रियः किमपराध्यन्ति गृहपञ्जरकोकिलाः ।अनिर्दयो नृशंसस्त्वं कस्ते कोपः स्त्रियं प्रति

striyaḥ kimaparādhyanti gṛhapañjarakokilāḥ / anirdayo nṛśaṃsastvaṃ kaste kopaḥ striyaṃ prati

हिन्दी अर्थ

तब तारायणधर्म व्यास होंगे। तब हम गन्धमादन पर्बत के पवित्र बालखिल्याश्नम में बालि नामक महामुनि होंगे । उस समय हमें सुधामा, काश्यप, वसिष्ठ और विरजा नामक महायोगों, तपस्वी, ऊध्वरेता चार पुत्र हीगे ।१५५-१६०। ये भी उसी योगमार्ग से गमन करेंगे, इसमें संशय नहीं हैं। चौदहवें द्वापर में जब सुरक्ष व्यास होंगे, तब हम फिर उस युगान्त में अज्भिरा के बंश में गोंतम नामक श्रेष्ठयोगी होंगे। हमारा आश्रम

English

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अध्याय २८

श्लोक 67

किं त्वया न श्रुतं लोके अवध्याः सर्वथा स्त्रियः ।किं तु तुभ्यं गुणो ह्यस्ति दहने पवनेरितः

kiṃ tvayā na śrutaṃ loke avadhyāḥ sarvathā striyaḥ / kiṃ tu tubhyaṃ guṇo hyasti dahane pavaneritaḥ

हिन्दी अर्थ

बन तब से गौतमाश्रम के नाम से परिचित होगा ।१६१-१६३। फिर कलि के प्रारम्भ में हमें चार पृत्र उप्पन्न होंगे । अन्रि, उम्रतपा, श्रवण और श्रविष्टक उनके नाम होंगे । ये योगासक्त महात्मा ध्याननिष्ठ होकर पूर्वोक्त रूप से योगमार्ग का अवलम्बन करके रुद्रलोक में निवास करेंगे ।१६४-१६५। क्रम से पन्द्रहवें द्वापर के आने १र जब अरुणि प्रभु व्यास होंगे, तब हम वेदशिरा नाम से विख्यात होंगे । है द्विजगण ! उसी वेदशिरा

English

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अध्याय २८

श्लोक 68

न कारुण्यं त्वया किंचिद् दाक्षिण्यं च स्त्रियं प्रति ।दयां म्लेच्छा हि कुर्वन्ति वचनं वीक्ष्य योषिताम्

na kāruṇyaṃ tvayā kiṃcid dākṣiṇyaṃ ca striyaṃ prati / dayāṃ mlecchā hi kurvanti vacanaṃ vīkṣya yoṣitām

हिन्दी अर्थ

तदाध्प्यहं भविष्यामि नाम्ना वेदशिरा द्विजा:। तन्न वेदशिरा नाम अस्त्रं तत्पारमेश्वरम

English

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अध्याय २८

श्लोक 69

म्लेच्छानाम् अपि च म्लेच्छो दुर्निवार्यो ह्यचेतनः ।एवं विलपमानानां स्त्रीणां तत्रैव भारत

mlecchānām api ca mleccho durnivāryo hyacetanaḥ / evaṃ vilapamānānāṃ strīṇāṃ tatraiva bhārata

हिन्दी अर्थ

योगात्मानों महात्मानों ब्रह्मिष्ठाश्रोध्वेरेतस: । तेषपि तनेव सार्गेण रुद्लोक॑ गतास्तु ते

English

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अध्याय २८

श्लोक 70

ज्वालाकलापबहुलः प्रज्वलत्येव पावकः ।एवं दृष्ट्वा ततो बाणो दह्यमान उवाच ह

jvālākalāpabahulaḥ prajvalatyeva pāvakaḥ / evaṃ dṛṣṭvā tato bāṇo dahyamāna uvāca ha

हिन्दी अर्थ

तदाध्प्यहूं भविष्याम्ति गोकर्णो नाम नामतः । तस्माउडूविध्यते पुण्य गोकर्ण ताम तद्वनम्

English

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अध्याय २८

श्लोक 71

अवज्ञाय विनष्टो ऽहं पापात्मा हरमञ्जसा ।मया पापेन मूर्खेण ये लोका नाशिता ध्रुवम्

avajñāya vinaṣṭo 'haṃ pāpātmā haramañjasā / mayā pāpena mūrkheṇa ye lokā nāśitā dhruvam

हिन्दी अर्थ

तत्राधि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति महौजसः । काश्यपो ह्य शना चेव च्यवनो5थ बृहस्पति:

English

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अध्याय २८

श्लोक 72

गोब्राह्मणा हता नित्यमिह लोके परत्र च ।नाशितान्यन्नपानानि मठारामाश्रमास्तथा

gobrāhmaṇā hatā nityamiha loke paratra ca / nāśitānyannapānāni maṭhārāmāśramāstathā

हिन्दी अर्थ

ततः सप्तदशे चेत्र परिवर्ते क्रमागते । तदा भविष्यते व्यासों नाम्ना देवकृतकझूजय:

English

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अध्याय २८

श्लोक 73

ऋषीणामाश्रमाश्चैव देवारामा गणालयाः ।तेन पापेन मे ध्वंसस्तपसश्च बलस्य च

ṛṣīṇāmāśramāścaiva devārāmā gaṇālayāḥ / tena pāpena me dhvaṃsastapasaśca balasya ca

हिन्दी अर्थ

तदाध्प्यहु भविष्यासि गुहाबासोति नामतः। हिमवच्छिखरे चंब महातुड़' महालये

English

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अध्याय २८

श्लोक 74

किं धनेन करिष्यामि राज्येणान्तःपुरेण च

kiṃ dhanena kariṣyāmi rājyeṇāntaḥpureṇa ca

हिन्दी अर्थ

उतण्पो बामदेवश्च महाकालो महालय:। तेषां शतसहसत्र तु शिव्याणां ध्यानसाधनम्

English

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अध्याय २८

श्लोक 75

वरं शङ्करपादौ च शरणं यामि मूढधीः ।न माता न पिता चैव न बन्धुर् नापरो जनः

varaṃ śaṅkarapādau ca śaraṇaṃ yāmi mūḍhadhīḥ / na mātā na pitā caiva na bandhur nāparo janaḥ

हिन्दी अर्थ

ताम से मेरा महापराक्रमो शंव अस्त्र और एक वेदशी्ष नामक पव॑त भी विख्यात होगा। बहीं सरस्वती के तट पर नग्राधिराज हिमालय के पृष्ठभाग में हम आश्रम बनायेंगे ।१ ६६-१६८। वहाँ भी हमें कुणि, कुणिबाह, कुशरीर और कुनेत्रक न मक चार तपश्वी पुत्र होंगे। वे योगी महात्मा ब्रह्मिष्ठ और ऊध्वरेता होकर उसी मार्ग से रदलोक गमन करेंगे. जिससे पहले के लोग गये हैं।!६६ १७०। फिर क्रमागत सोलह॒वें द्वापर में

English

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अध्याय २८

श्लोक 76

मुक्त्वा चैव महेशानं परमार्तिहरं परम् ।आत्मना च कृतं पापमात्मनैव तु भुज्यते

muktvā caiva maheśānaṃ paramārtiharaṃ param / ātmanā ca kṛtaṃ pāpamātmanaiva tu bhujyate

हिन्दी अर्थ

संजय प्रभुव्यास होंगे। तब हम गोकर्ण नाम से विख्यात होंगे। इसलिये उस बन का भी नाम गोकर्ण होगा । ।(४१-१७२। वहां भी हमें काश्यप, उशना, च्यवन और बृहस्पति नामक मह।बलिष्ठ चार पुत्र होंगे। वे भी उत्ती मांगें से परम पद प्राप्त करेंगे ।१७३। जब क्रमपृवंक सतरहर्वाँ द्वापर लौटेगा, तब देव कृुतञ्जय व्यास होंगे। उस समय हमारा नाम ग्रुहावासी होगा । ऊँचे हिमालय के शिखर पर हमारा महापुण्यजनक सिद्धक्षेत्र

English

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अध्याय २८

श्लोक 77

अहं पुनः समस्तैश्च दह्यामि सह साधुभिः ।एवमुक्त्वा शिवं लिङ्गं कृत्वा तन्मस्तकोपरि

ahaṃ punaḥ samastaiśca dahyāmi saha sādhubhiḥ / evamuktvā śivaṃ liṅgaṃ kṛtvā tanmastakopari

हिन्दी अर्थ

प्रतिष्ठित होगा ।7७४-१७४५। वहाँ भी हमें उतथ्य, कामदेव, महाकाल और महालय नामक चार पुत्र होंगे। ये ब्रह्मत, योगवेत्ता, महात्मा, ममेंझन और निरहडूारी होंगे। इनके शत सहस्र संख्यक शिष्य ध्यानसाधना में तत्पर रहेंगे । इस कल्प में सभी ध्यानयोगी होंगे। वे योगासक्त होकर हृदय में महेब्वर को धारण कर महालय पद

English

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अध्याय २८

श्लोक 78

निर्जगाम गृहाच्छीघ्रं पावकेनावगुण्ठितः ।स खिन्नः स्विन्नगात्रस्तु प्रस्खलंस्तु मुहुर् मुहुः

nirjagāma gṛhācchīghraṃ pāvakenāvaguṇṭhitaḥ / sa khinnaḥ svinnagātrastu praskhalaṃstu muhur muhuḥ

हिन्दी अर्थ

ऋधनुश्चित्नान्तगंतग्रन्यो घ. पुस्तके नास्ति

English

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अध्याय २८

श्लोक 79

हरं गद्गदया वाचा स्तुवन्वै शरणं ययौ ।त्वत्कोपानलनिर्दग्धो यदि वध्यो ऽस्मि शङ्कर

haraṃ gadgadayā vācā stuvanvai śaraṇaṃ yayau / tvatkopānalanirdagdho yadi vadhyo 'smi śaṅkara

हिन्दी अर्थ

१४६ वायुपुराणम् ,

English

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अध्याय २८

श्लोक 80

त्वत्प्रसादान्महादेव मा मे लिङ्गं प्रणश्यतु ।अर्चितं मे सुरश्रेष्ठ ध्यातं भक्त्या मया विभो

tvatprasādānmahādeva mā me liṅgaṃ praṇaśyatu / arcitaṃ me suraśreṣṭha dhyātaṃ bhaktyā mayā vibho

हिन्दी अर्थ

भविष्यन्ति तदा कल्पे सर्वे ते ध्यानयुअ्जका: । ते तु संनिहिता योगे हृदि कृत्वा महेश्वरम् ॥

English

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अध्याय २८

श्लोक 81

प्राणादिष्टतमं देव तस्माद् रक्षितुम् अर्हसि ।यदि ते ऽहम् अनुग्राह्यो वध्यो वा सुरसत्तम

prāṇādiṣṭatamaṃ deva tasmād rakṣitum arhasi / yadi te 'ham anugrāhyo vadhyo vā surasattama

हिन्दी अर्थ

महालये पद शिप्त्वा प्रविष्टा: शिवमव्ययम्

English

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अध्याय २८

श्लोक 82

प्रतिजन्म महादेव त्वद्भक्तिरचलास्तु मे ।पशुकीटपतङ्गेषु तिर्यग्योनिगतेषु च ।स्वकर्मणा महादेव त्वद्भक्तिरचलास्तु मे

pratijanma mahādeva tvadbhaktiracalāstu me / paśukīṭapataṅgeṣu tiryagyonigateṣu ca / svakarmaṇā mahādeva tvadbhaktiracalāstu me

हिन्दी अर्थ

ये चान्येषपि महात्मानः काले तस्मिन्धुगान्तिके । ध्यानयुक्तेन सनसा विमला: शुद्धबुद्धयः ॥। गत्वा महालयं पुण्य दृष्ट्रवा माहेश्वरं पदम् । तूर्ण तारयते जन्तृन्दश पूर्वान्शशापरानू...

English

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अध्याय २८

श्लोक 83

एवमुक्त्वा महाभागो बाणो भक्तिमतां वरः ।स्तोत्रेण देवदेवेशं छन्दयामास भारत

evamuktvā mahābhāgo bāṇo bhaktimatāṃ varaḥ / stotreṇa devadeveśaṃ chandayāmāsa bhārata

हिन्दी अर्थ

आत्मानमेकाविशं च तारयित्वा महाणंवम् । मम प्रसादाद्यास्यन्ति रुद्रलोक॑ गतज्वराः १८० ततो5ष्टादशमश्चेव॒ प्रिवर्तो यदा भवेत् । तदा ऋतञ्जयो नाम व्यासस्तु भविता मुनिस॥ तदा5प्यहूं भविष्यापि शिखण्डी नाम नामतः १८१

English

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अध्याय २८

श्लोक 84

बाण उवाच: शिव शङ्कर सर्वहराय नमो भवभीतभयार्तिहराय नमः ।कुसुमायुधदेहविनाशंकर प्रमदाप्रियकामक देव नमः

bāṇa uvāca: śiva śaṅkara sarvaharāya namo bhavabhītabhayārtiharāya namaḥ / kusumāyudhadehavināśaṃkara pramadāpriyakāmaka deva namaḥ

हिन्दी अर्थ

. सिद्धक्षेत्र महापुण्ये देवदानवपुजिते । हिसवच्छिखरे पुण्ये शिखण्डी यत्र पर्वतः ॥ शिखण्डिनो वन चावि ऋषिसिद्धनिषेवितम् . हर

English

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अध्याय २८

श्लोक 85

जय पार्वतीश परमार्थसार जय विरचितभीमभुजङ्गहार ।जय निर्मलभस्मविलिप्तगात्र जय मन्त्रमूल जगदेकपात्र

jaya pārvatīśa paramārthasāra jaya viracitabhīmabhujaṅgahāra / jaya nirmalabhasmaviliptagātra jaya mantramūla jagadekapātra

हिन्दी अर्थ

ततस्त्वेकोर्नावशे तु प्रिव्ते क्रमागते । व्यासस्तु भविता नाम्ना भरद्वाजों महासुनिः

English

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अध्याय २८

श्लोक 86

जय विषधरकपिलजटाकलाप जय भैरवविघृतपिनाकचाप ।जय विषमनयनपरिमुक्तसङ्ग जय शङ्कर धृतगाङ्गतरङ्ग

jaya viṣadharakapilajaṭākalāpa jaya bhairavavighṛtapinākacāpa / jaya viṣamanayanaparimuktasaṅga jaya śaṅkara dhṛtagāṅgataraṅga

हिन्दी अर्थ

तत्राप्यह भविष्यामि जटामालीति नामतः । हिमवच्छिखरे रम्ये जटायुर्य॑त्र पर्वतः

English

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अध्याय २८

श्लोक 87

जय भीमरूप खट्वाङ्गहस्त शशिशेखर जय जगतां प्रशस्त ।जय सुखरेश सुरलोकसार जय सर्वसकलनिर्दग्धसार

jaya bhīmarūpa khaṭvāṅgahasta śaśiśekhara jaya jagatāṃ praśasta / jaya sukhareśa suralokasāra jaya sarvasakalanirdagdhasāra

हिन्दी अर्थ

तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति महौजसः । हिरण्यनामा कौशिल्यः काक्षीव: कुथुमित्तवा

English

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अध्याय २८

श्लोक 88

जय कीर्तनीय जगतां पवित्र जय वृषाङ्क बहुविधचरित्र ।जय विरचितनरकङ्कालमाल अघासुरदेहकङ्कालकाल

jaya kīrtanīya jagatāṃ pavitra jaya vṛṣāṅka bahuvidhacaritra / jaya viracitanarakaṅkālamāla aghāsuradehakaṅkālakāla

हिन्दी अर्थ

में वर्तमान रहकर अविनाशी शिव में प्रवेश कर जायेंगे ।१७६-१७५। इनके अतिरिक्त और भी जो महात्मा उस युगान्त काल में ध्यानयुक्त मन से विभल और शुद्धनबुद्धि होकर पवित्र महालय में गमन करेंगे और माहेश्वर पद का दहान करेंगे वे अपने साथ दस पीढ़ी आगे और दस पीछे इस तरह इक्क्रीस परीढ़ियों का उद्धार करेंगे । हमारे प्रसाद से वे बिना क्लेश-विपाक के रुद्रलोक गमन करेंगे ।१७६-१८००॥ जब अठारहरवाँ द्वापर

English

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अध्याय २८

श्लोक 89

जय नीलकंठ वरवृषभगमन जय सकललोकदुरितानुशमन ।जय सिद्धसुरासुरविनतचरण जय रुद्र रौद्रभवजलधितरण

jaya nīlakaṃṭha varavṛṣabhagamana jaya sakalalokaduritānuśamana / jaya siddhasurāsuravinatacaraṇa jaya rudra raudrabhavajaladhitaraṇa

हिन्दी अर्थ

आयेगा तब ऋतञू्जय मुनि व्यास होंगे। उस समय हमारा नाम शिखण्डी होगा । देव-दानव-पूजित हिमा- लय शिखर पर महापुण्य जनक सिद्धि क्षेत्र में हमारा निवास होगा। उस समय बह पर्वत शिखण्डी नाम से विख्यात होगा उस शिखण्डी पर्वत का वन ऋषि-पिद्धों द्वारा सेवित रहेगा । वहाँ भी हमें वःचश्नवा, ऋत्तींक, शावास और हढ़त्रत नामक चार तपस्वी पृत्र होंगे। वे योगी, महासत्त्व, वेदपारग, माहेश्वर योग को प्राप्त

English

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अध्याय २८

श्लोक 90

जय गिरिश सुरेश्वरमाननीय जय सूक्ष्मरूप संचितनीय ।जय दग्धत्रिपुर विश्वसत्त्व जय सकलशास्त्रपरमार्थतत्त्व

jaya giriśa sureśvaramānanīya jaya sūkṣmarūpa saṃcitanīya / jaya dagdhatripura viśvasattva jaya sakalaśāstraparamārthatattva

हिन्दी अर्थ

कर रुद्रलोक गमन करेंगे ।१८१-१८४। उन्नीसवें ढ्वापर के आने पर भारद्वाज नामक महामुनि व्यास होंगे और हमारा नाम जटामाली होगा। हिमालय के रम्य जटायु शिखर पर हमारा आश्रम होगा

English

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अध्याय २८

श्लोक 91

जय दुरवबोध संसारतार कलिकलुषमहार्णवघोरतार ।जय सुरासुरदेवगणेश नमो हयवानरसिंहगजेन्द्रमुख

jaya duravabodha saṃsāratāra kalikaluṣamahārṇavaghoratāra / jaya surāsuradevagaṇeśa namo hayavānarasiṃhagajendramukha

हिन्दी अर्थ

वहाँ भी हमें हिरण्य, कौशिल्य, काक्षीव और कुथुमि नामक महाबलशाली चार पृत्र होंगे । ये सभी ऐश्वयं-

English

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अध्याय २८

श्लोक 92

अतिह्रस्वस्थूलसुदीर्घतम उपलब्धिर् न शक्यते ते ह्यमरैः ।प्रणतो ऽस्मि निरञ्जन ते चरणौ जय साम्ब सुलोचनकान्तिहर

atihrasvasthūlasudīrghatama upalabdhir na śakyate te hyamaraiḥ / praṇato 'smi nirañjana te caraṇau jaya sāmba sulocanakāntihara

हिन्दी अर्थ

ईश्वरा योगधर्माणः सर्वे ते हा ध्वरेतसः । प्राप्प माहेश्वरं योगं गभिष्यन्ति न संशयः १८८

English

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अध्याय २८

श्लोक 93

अप्राप्य त्वां किम् अत्यन्तम् उच्छ्रयी न विनाशयेत् ।अतिप्रमाथि च तदा तपो महत्सुदारुणम्

aprāpya tvāṃ kim atyantam ucchrayī na vināśayet / atipramāthi ca tadā tapo mahatsudāruṇam

हिन्दी अर्थ

तदाष्प्पहूं भविष्यामि ह्ट्टहासेति नामतः । अट्वृहासप्रियाश्रापि भविष्यन्ति तदा नराः

English

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अध्याय २८

श्लोक 94

न पुत्रबान्धवा दारा न समस्तः सुहृज्जनः ।सङ्कटे ऽभ्युपगच्छन्ति व्रजन्तमेकगामिनम्

na putrabāndhavā dārā na samastaḥ suhṛjjanaḥ / saṅkaṭe 'bhyupagacchanti vrajantamekagāminam

हिन्दी अर्थ

तत्रेव हिमवत्पृष्ठे त्वट्नहासो महागिरिः भविष्यति महातेजाः सिद्धचारणसेवितः

English

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अध्याय २८

श्लोक 95

यदेव कर्म कैवल्यं कृतं तेन शुभाशुभम् ।तदेव सार्थवत् तस्य भवत्यग्रे तु गच्छतः

yadeva karma kaivalyaṃ kṛtaṃ tena śubhāśubham / tadeva sārthavat tasya bhavatyagre tu gacchataḥ

हिन्दी अर्थ

सुम॑न्तुबंबंरिविद्वान्सुबन्धु: कुशिकन्धर: । प्राप्य माहेश्वरं योगं रुद्रलोकाय ते गताः

English

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अध्याय २८

श्लोक 96

निर्धनस्यैव चरतो न भयं विद्यते क्वचित् ।धनीभयैर्न मुच्येत धनं तस्मात्त्यजाम्यहम्

nirdhanasyaiva carato na bhayaṃ vidyate kvacit / dhanībhayairna mucyeta dhanaṃ tasmāttyajāmyaham

हिन्दी अर्थ

एकविशे पुनः प्राप्ते परिवर्ते क्रोण तु । वाचस्पतिः स्पृतो व्यासो यदा स ऋषिसत्तमः १६४ तदाएप्यहूं भविष्यामि दारको नाम नामतः। तस्माडूविष्यते पुण्य देवदारुवनं महत् ३१६५ तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति सहौजसः । प्लक्षो दाक्षायणिश्चेव केतुमाली वकस्तथा

English

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अध्याय २८

श्लोक 97

लुब्धाः पापानि कुर्वन्ति शुद्धांशा नैव मानवाः ।श्रुत्वा धर्मस्य सर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्य तत्

lubdhāḥ pāpāni kurvanti śuddhāṃśā naiva mānavāḥ / śrutvā dharmasya sarvasvaṃ śrutvā caivāvadhārya tat

हिन्दी अर्थ

द्वाविशे परिवतें तु व्यासः शुक्लायनों यदा। तदाषप्यहूं भविष्यामि वाराणस्यां महासुनिः ४१६८ नास्‍ना थे लाड्रली भीमो यत्र देवाः सवासवः: । दक्ष्यन्ति मां कलौ तस्मिन्नवतीर्ण हलायुधम्

English

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अध्याय २८

श्लोक 98

त्वं विष्णुस्त्वं जगन्नाथो ब्रह्मरूपः सनातनः ।इन्द्रस्त्वं देवदेवेश सुरनाथ नमो ऽस्तु ते

tvaṃ viṣṇustvaṃ jagannātho brahmarūpaḥ sanātanaḥ / indrastvaṃ devadeveśa suranātha namo 'stu te

हिन्दी अर्थ

तत्रापि मम्त ते पुत्रा भविव्यन्ति सुधासिकाः । तुल्याचिमंधुविद्धाक्षः श्वेतकेतुस्तथव च १२००

English

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अध्याय २८

श्लोक 99

त्वं क्षितिर्वरुणश्चैव पवनस्त्वं हुताशनः ।त्वं दीक्षा यजमानश्च आकाशं सोम एव च

tvaṃ kṣitirvaruṇaścaiva pavanastvaṃ hutāśanaḥ / tvaṃ dīkṣā yajamānaśca ākāśaṃ soma eva ca

हिन्दी अर्थ

शाली योगी और उर्द्ध वरेता होकर माहेश्वर योग को प्राप्त करेगे एवं रुद्लोक गमन करेंगे, इसमें थोंड़ा भी सन्देह नहीं है ।१५७-१८८। फिर क्रम से जब बीसबाँ सर्ग लौटेगा, तब महामति वाच:ःश्रवा व्यास बनेंगे और हमारा नाम अट्टनहास होगा । उस समय के मानव भी अट्टृह स-प्रिय होंगे ।१८९-१९०। उसी हिमालय के पृष्ठ पर अट्टृह्ास नामक महागिरि है, जो अत्यन्त प्रकाशमान् और सिद्ध-चारणों द्वारा सेवित होगा। वहाँ भी

English

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अध्याय २८

श्लोक 100

त्वं सूर्यस्त्वं तु वित्तेशो यमस्त्वं गुरुरेव च ।त्वया व्याप्तं जगत्सर्वं त्रैलोक्यं भास्वता यथा

tvaṃ sūryastvaṃ tu vitteśo yamastvaṃ gurureva ca / tvayā vyāptaṃ jagatsarvaṃ trailokyaṃ bhāsvatā yathā

हिन्दी अर्थ

हमें अत्यन्त ओजस्वी, महासत्त्व ध्यानासक्त, युक्तात्मा और नि यमित रूप से ब्रत करने वाले सुमन्तु, वर्वेरि, सुबन्धु और कुशिकन्धर नामक चार विद्वान् पुत्र होंगे। ये भी माहेश्वर योग को प्राप्त कर रुदलोक गमन करेंगे ।१६ १-१६ ३। हकक्‍कीसवें द्वापर के आने पर ऋषिसत्तम वाचस्पति व्यास कहलायेंगे ।(१९४। उस समय हमारा नाम दारुक होगा । इसलिये वह महान् और पवित्र बन देवदारु बन कहलावेगा। वहाँ भी हमें प्लक्ष, दाक्षा-

English

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अध्याय २८

श्लोक 101

एतद्बाणकृतं स्तोत्रं श्रुत्वा देवो महेश्वरः ।क्रोधं मुक्त्वा प्रसन्नात्मा तदा वचनम् अब्रवीत्

etadbāṇakṛtaṃ stotraṃ śrutvā devo maheśvaraḥ / krodhaṃ muktvā prasannātmā tadā vacanam abravīt

हिन्दी अर्थ

यणि, केतुमाली और वक नामक अत्यन्त ओजिस्वी पुत्र उत्पन्न होंगे ।(१६५-१६६! ये योगात्मा, महतत्मा, यतचित्त और ऊद्ध'बरेता होकर योगावलम्बन द्वारा निष्पाप होकर रुद्र कौ प्राप्त करेंगे। बाईसवें परिवर्तन में जब शुक्लायन व्यास होंगे, तब हम वाराणसी में महामु्नि होंगे ।१६७-१६८। हमारा नाम लाजूली होगा और इन्द्रादि देवगण हमें उस कलिकाल में हलायुघ रूप में अवतीर्ण हुआ देखेंगे । वे वहाँ हमें सुधाभिक, तुल्याचि,

English

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अध्याय २८

श्लोक 102

ईश्वर उवाच: न भेतव्यं न भेतव्यमद्यप्रभृति दानव ।सौवर्णे भवने तिष्ठ मम पार्श्वे ऽथवा पुनः

īśvara uvāca: na bhetavyaṃ na bhetavyamadyaprabhṛti dānava / sauvarṇe bhavane tiṣṭha mama pārśve 'thavā punaḥ

हिन्दी अर्थ

मधुपिदज्भाज्ष और श्वेतकेतु नामक पुत्र उत्पन्न होंगे। वे रजोगुण रहित, ब्रह्मभूयिष्ठ, ध्यानपरायण दीकर

English

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अध्याय २८

श्लोक 103

पुत्रपौत्रप्रपौत्रैश्च बान्धवैः सह भार्यया ।अद्यप्रभृति वत्स त्वमवध्यः सर्वशत्रुषु

putrapautraprapautraiśca bāndhavaiḥ saha bhāryayā / adyaprabhṛti vatsa tvamavadhyaḥ sarvaśatruṣu

हिन्दी अर्थ

तेपि माहेश्वरं योग प्राप्य ध्यानपरायणा: । विराजा ब्रह्मभ्रुथिष्ठा रुद्रलोकाय संस्थिताः .

English

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अध्याय २८

श्लोक 104

मार्कण्डेय उवाच: भूयस्तस्य वरो दत्तो देवदेवेन भारत ।स्वर्गे मर्त्ये च पाताले पूजितः ससुरासुरैः

mārkaṇḍeya uvāca: bhūyastasya varo datto devadevena bhārata / svarge martye ca pātāle pūjitaḥ sasurāsuraiḥ

हिन्दी अर्थ

प्रिवते त्रयोविशे तृणविन्दुयंदा मुनिः व्यासो भविष्यति ब्रह्मा तदा5हूं भविता पुनः

English

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अध्याय २८

श्लोक 105

अक्षयश्चाव्ययश्चैव वस त्वं वै यथासुखम् ।ततो निवारयामास रुद्रः सप्तशिखं तदा

akṣayaścāvyayaścaiva vasa tvaṃ vai yathāsukham / tato nivārayāmāsa rudraḥ saptaśikhaṃ tadā

हिन्दी अर्थ

श्वेतो नाम महाकायो सुनिपुत्र: सुधामिकः .

English

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अध्याय २८

श्लोक 106

तृतीयं रक्षितं तस्य पुरं देवेन शम्भुना ।ज्वालामालाकुलं चान्यत्पतितं धरणीतले

tṛtīyaṃ rakṣitaṃ tasya puraṃ devena śambhunā / jvālāmālākulaṃ cānyatpatitaṃ dharaṇītale

हिन्दी अर्थ

'तत्न काल जरिष्यासि तदा गिरिवरोत्तमे । तेन कालंजरो नाम भविष्यति स पबृ॑तः

English

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अध्याय २८

श्लोक 107

अर्धेन प्रस्थितादूर्ध्वं तस्य ज्वाला दिवं गताः ।हाहाकारो महांस्तत्र ऋषिसङ्घैरुदीरितः

ardhena prasthitādūrdhvaṃ tasya jvālā divaṃ gatāḥ / hāhākāro mahāṃstatra ṛṣisaṅghairudīritaḥ

हिन्दी अर्थ

तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति महाजस:। ऊसिजो बृह॒दुध्यश्व देवलः कविरेव च ॥

English

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अध्याय २८

श्लोक 108

दैवतैश्च महाभागैः सिद्धविद्याधरादिभिः ।एकं तु पतितं तत्र श्रीशैले खण्डमुत्तरम्

daivataiśca mahābhāgaiḥ siddhavidyādharādibhiḥ / ekaṃ tu patitaṃ tatra śrīśaile khaṇḍamuttaram

हिन्दी अर्थ

प्राप्प माहेश्वरं योगं रुद्रलोक॑ गता हि ते “

English

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अध्याय २८

श्लोक 109

द्वितीयं पतितं राजञ्छैले ह्यमरकण्टके ।प्रज्वलत्पतितं तत्र तेन ज्वालेश्वरं स्मृतम्

dvitīyaṃ patitaṃ rājañchaile hyamarakaṇṭake / prajvalatpatitaṃ tatra tena jvāleśvaraṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

परिवर्तेंचतुविंश ऋक्षो व्यासों भविष्यति तन्नाहूं भविता ब्रह्मन्कलो तस्मिन्युगान्तिके ॥।

English

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अध्याय २८

श्लोक 110

दग्धे तु त्रिपुरे राजन्पतिते खण्ड उत्तमे ।रुद्रो देवः स्थितस्तत्र ज्वालामालानिवारकः

dagdhe tu tripure rājanpatite khaṇḍa uttame / rudro devaḥ sthitastatra jvālāmālānivārakaḥ

हिन्दी अर्थ

तदाइप्यहूं भविष्यामि दण्डी सुण्डीश्वर: प्रभु: । कोटिवर्ष समासाद्य नगरं देवपुजितम्

English

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अध्याय २८

श्लोक 111

हाहाकारपराणां तु ऋषीणां रक्षणाय च ।स्वयं मूर्तिर्महेशान् उमावृषभसंयुतः

hāhākāraparāṇāṃ tu ṛṣīṇāṃ rakṣaṇāya ca / svayaṃ mūrtirmaheśān umāvṛṣabhasaṃyutaḥ

हिन्दी अर्थ

छगल: कुम्भकर्षाश्यः कुम्भश्चेव प्रवाहुक: । प्राप्य माहेश्वरं योगं गमिष्यन्ति तथव ते

English

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अध्याय २८

श्लोक 112

मनसापि स्मरेद् यस्तु भक्त्या ह्यमरकण्टकम् ।चान्द्रायणाधिकं पुण्यं स लभेन्नात्र संशयः

manasāpi smared yastu bhaktyā hyamarakaṇṭakam / cāndrāyaṇādhikaṃ puṇyaṃ sa labhennātra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

माहेश्वर योग को प्राप्त करेंगे और रुद्रलोक में निवास करंगे। तेईसवबें परिवर्तत में जब तृणविन्दु नामक मुनि व्यास होंगे, तब हम श्वेत नामक महाकाय सुधामिक मुनि-पुत्र होंगे ।१९९-२०३॥ उस समय हम एक उत्तम गिरिवर पर समय बितायेंगे; इसलिये उस पर्वत का नाम कालेजर होगा वहाँ भी हमें ऊसिज, बृह- दुक्ध्य, देवल और कवि नाम के चार ओजस्वी पुत्र होंगे। ये सब भी माहेश्वर योग प्राप्त कर रुद्रलोक गमन

English

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अध्याय २८

श्लोक 113

अतिपुण्यो गिरिश्रेष्ठो यस्माद् भरतसत्तम ।अस्मान्नित्यं भवेद् राजन्सर्वपापक्षयंकरः

atipuṇyo giriśreṣṭho yasmād bharatasattama / asmānnityaṃ bhaved rājansarvapāpakṣayaṃkaraḥ

हिन्दी अर्थ

करंगे ।२०४-२०५। चौबीसवों द्वापर में ऋक्ष व्यास होगे। है ब्रह्मा! उस कलियुगादि में हम योगियों द्वारा सेबित नौमिषारण्य में शुली नामक महायोगी होकर प्रादुभू त होंगे ।२०६। वहाँ भी हमें शालिहोत्र, अग्निवेश्म, युवनाश्व और दारद्रसु नामक चार तपरवी पुत्र उत्पन्न होंगे। ये सब भी ब्रत करते हुये योगबल से रुद्रलोक गमन करंगे ।२०७। फिर यथाक्रम से जब पचीसतवें द्वापर का परिवतंन होगा, तब वष्तिष्ठशक्ति नामक व्यास

English

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अध्याय २८

श्लोक 114

नानाद्रुमलताकीर्णो नानापुष्पोपशोभितः ।नानागुल्मलताकीर्णो नानावल्लीभिर् आवृतः

nānādrumalatākīrṇo nānāpuṣpopaśobhitaḥ / nānāgulmalatākīrṇo nānāvallībhir āvṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

होंगें और हम प्रभु दण्डी मुण्डीशबर होकर देवपूजित कोटिवर्ष नभर में प्रातुर्भूत होंगे । उस समय हमें छगल, कुम्भकर्षाइय, कुम्भ और प्रवाहुक नामक क्रमायत चार पुत्र होगे। ये महात्मा, योगात्मा और ऊद्धं वरेता माहेश्बर योग को प्राप्त कर रुद्रलोक गमन करेंगे।२०५-२११। छब्बीसवें द्वापर के आने पर जब पराशर

English

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अध्याय २८

श्लोक 115

सिंहव्याघ्रसमाकीर्णो मृगयूथैरलंकृतः ।श्वापदानां च घोषेण नित्यं प्रमुदितो ऽभवत्

siṃhavyāghrasamākīrṇo mṛgayūthairalaṃkṛtaḥ / śvāpadānāṃ ca ghoṣeṇa nityaṃ pramudito 'bhavat

हिन्दी अर्थ

त्रयोविशोष्ष्याय: है

English

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अध्याय २८

श्लोक 116

ब्रह्मेन्द्रविष्णुप्रमुखैर्ह्यमरैश्च सहस्रशः ।सेव्यते देवदेवेशः शङ्करस्तत्र पर्वते

brahmendraviṣṇupramukhairhyamaraiśca sahasraśaḥ / sevyate devadeveśaḥ śaṅkarastatra parvate

हिन्दी अर्थ

पुण्य॑ चद्रवर्ट प्राप्प कलौ तस्सिन्युगान्तिके (२१२ ततन्नापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति सुधार्मिकाः । उलको बंद्युतश्चेव शर्वकों ह्याश्वलायन:ः ॥॥

English

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अध्याय २८

श्लोक 117

पतनं कुरुते यो ऽस्मिन्पर्वते ऽमरकण्टके ।क्रीडते क्रमशो राजन्भुवनानि चतुर्दश

patanaṃ kurute yo 'sminparvate 'marakaṇṭake / krīḍate kramaśo rājanbhuvanāni caturdaśa

हिन्दी अर्थ

सप्तविशतिमे भ्राप्ते परिवर्ते कमागते । जातुकर्ण्यों यदा व्यासो भविष्यति तपोधनः

English

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अध्याय २८

श्लोक 118

ऐन्द्रं वाह्नं च कौबेरं वायव्यं याम्यमेव च ।नैरृत्यं वारुणं चैव सौम्यं सौरं तथैव च

aindraṃ vāhnaṃ ca kauberaṃ vāyavyaṃ yāmyameva ca / nairṛtyaṃ vāruṇaṃ caiva saumyaṃ sauraṃ tathaiva ca

हिन्दी अर्थ

तदा5प्यहूं भविष्याभि सोमशर्मा द्विजोत्तमाः । प्रभासं तीर्थंभासाद्य योगात्मा लोकविश्युतः

English

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अध्याय २८

श्लोक 119

ब्राह्मं च पदमक्लिष्टं वैष्णवं तदनन्तरम् ।उमारुद्रं महाभाग ऐश्वरं तदनन्तरम्

brāhmaṃ ca padamakliṣṭaṃ vaiṣṇavaṃ tadanantaram / umārudraṃ mahābhāga aiśvaraṃ tadanantaram

हिन्दी अर्थ

तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति तपोधनाः । अक्षपादः कणादश्व उलको वत्स एव च १२१६ योगात्मानों महात्मानो विमला: शुद्धबुद्धयः प्राप्य साहेश्वरं योगं रुद्लोक॑ ततो गताः ॥ अष्टाविशे पुनः प्राप्ते परिवर्ते क्मागते । पराशरसुतः श्रीमान्विष्णुलकिपितामह:

English

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अध्याय २८

श्लोक 120

परं सदाशिवं शान्तं सूक्ष्मं ज्योतिरतीन्द्रियम् ।तस्मिन्याति लयं धीरो विधिना नात्र संशयः

paraṃ sadāśivaṃ śāntaṃ sūkṣmaṃ jyotiratīndriyam / tasminyāti layaṃ dhīro vidhinā nātra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

बासुदेवाद्यदुश्ने ष्ठो वासुदेवो भविष्यति २१८ तदा चाहूं भविष्यामि योगात्मा योगमायया (लोकविस्मयनार्थाय ब्रह्मचचारिशरोरक:.

English

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अध्याय २८

श्लोक 121

युधिष्ठिर उवाच: को ऽप्यत्र विधिरुद्दिष्टः पतने ऋषिसत्तम ।एतन्मे सर्वमाचक्ष्व संशयो ऽस्ति महामुने

yudhiṣṭhira uvāca: ko 'pyatra vidhiruddiṣṭaḥ patane ṛṣisattama / etanme sarvamācakṣva saṃśayo 'sti mahāmune

हिन्दी अर्थ

श्मशाने मृतमुत्सुष्टं दृष्ट्वा लोकमनाथकम् । ब्राह्मणानां हितार्थाय प्रविष्टो योगमायया) ४२२०

English

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अध्याय २८

श्लोक 122

श्रीमार्कण्डेय उवाच: शृणुष्व कथयिष्यामि तं विधिं पाण्डुनन्दन ।यत्कृत्वा प्रथमं कर्म निपतेत्तदनन्तरम्

śrīmārkaṇḍeya uvāca: śṛṇuṣva kathayiṣyāmi taṃ vidhiṃ pāṇḍunandana / yatkṛtvā prathamaṃ karma nipatettadanantaram

हिन्दी अर्थ

व्यास होंगे, अब हम सद्िष्णि के नाम से विख्यात होंगें। उस कलियुग के आदि में हमारा पवित्र रुद्रवन में निवास होगा। वहाँ भी हमें घमंनिष्ठ उलूक, वंद्युग, शर्वक और आश्वलायन नामक पुत्र होंगे, जो माहेश्वर योग को प्राप्त कर रुद्रलोक को जायेंगे ।२१२-२१३॥ क्रम से जब सत्ताइसवें द्वापर का परिवर्तन होगा । तब तपोधन जातुकण्य व्यास होंगे। हम भी तब द्विजोत्तम सोमशर्मा होंगे । प्रभास तीर्थ में आश्रय

English

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अध्याय २८

श्लोक 123

कृत्वा कृच्छ्रत्रयं पूर्वं जप्त्वा लक्षं दशैव तु ।शाकयावकभुक्चैव शुचिस्त्रिषवणो नृप

kṛtvā kṛcchratrayaṃ pūrvaṃ japtvā lakṣaṃ daśaiva tu / śākayāvakabhukcaiva śucistriṣavaṇo nṛpa

हिन्दी अर्थ

ग्रहण करगे और यगात्मा होकर संसार में प्रसिद्ध ६ोंगे ।॥११४-२१५। वहाँ भी हमें अक्षपाद, कणाद, उलूक

English

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अध्याय २८

श्लोक 124

त्रिकालमर्चयेदीशं देवदेवं त्रिलोचनम् ।दशांशेन तु राजेन्द्र होमं तत्रैव कारयेत्

trikālamarcayedīśaṃ devadevaṃ trilocanam / daśāṃśena tu rājendra homaṃ tatraiva kārayet

हिन्दी अर्थ

माहेश्वर योग को. प्राप्त कर रुद्रलोक को जायेंगे । क्रम से जब अठाईसवें द्वापर का परिवर्तन होगा और लोकपितामाह पराशरसुत श्रीमान् विष्ण हंपायन व्यास होंगें, तब यदृश्नेष्ठ पुरुषोत्तम क्ृष्ण छ॒ठें अश से वासुदेव के रूप में वसुदेव से प्रादुर्भत होंगे ।२१६-२१८। उस समय हम योगात्मा होकर योगमाया द्वारा लोगों को विस्मित करने के लिये ब्रह्मचारी देह में प्रादर्भूत होंगे ।२१६। मृत अनाथ लोगों को इ्मशान में

English

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अध्याय २८

श्लोक 125

लक्षवारं जपेद्देवं गन्धमाल्यैश्च पूजयेत् ।रात्रौ स्वप्ने तदा पश्येद्विमानस्थं ततः क्षिपेत्

lakṣavāraṃ japeddevaṃ gandhamālyaiśca pūjayet / rātrau svapne tadā paśyedvimānasthaṃ tataḥ kṣipet

हिन्दी अर्थ

निक्षिप्त होते देखकर ब्राह्मणों के हित के लिये हम योगमाया-बल से आप एवं विष्णु के साथ दिव्य ओर पवित्र

English

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अध्याय २८

श्लोक 126

अनेनैव विधानेन आत्मानं यस्तु निक्षिपेत् ।स्वर्गलोकमनुप्राप्य क्रीडते त्रिदशैः सह

anenaiva vidhānena ātmānaṃ yastu nikṣipet / svargalokamanuprāpya krīḍate tridaśaiḥ saha

हिन्दी अर्थ

धनुदिचिद्वान्तगंतग्रन्थ: ख. घ. पुस्तकेषु नास्ति

English

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अध्याय २८

श्लोक 127

त्रिंशद्वर्षसहस्राणि त्रिंशत्कोट्यस् तथैव च ।मुक्त्वा मनोरमान्भोगांस् तदा गच्छेन्महीतलम्

triṃśadvarṣasahasrāṇi triṃśatkoṭyas tathaiva ca / muktvā manoramānbhogāṃs tadā gacchenmahītalam

हिन्दी अर्थ

१६० वायुपु राणम्

English

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अध्याय २८

श्लोक 128

पृथिवीमेकच्छत्रेण भुनक्ति लोकपूजितः ।व्याधिशोकविनिर्मुक्तो जीवेच्च शरदां शतम्

pṛthivīmekacchatreṇa bhunakti lokapūjitaḥ / vyādhiśokavinirmukto jīvecca śaradāṃ śatam

हिन्दी अर्थ

दिव्यां मेरुगुहां पुण्यां त्वया सार्थ च विष्णुना । भविष्यामि तदा ब्रह्मन्कुली नाम नामतः

English

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अध्याय २८

श्लोक 129

ज्वालेश्वरं तु तत्तीर्थं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।तत्र ज्वाला नदी पार्थ प्रस्रुता शिवनिर्मिता

jvāleśvaraṃ tu tattīrthaṃ triṣu lokeṣu viśrutam / tatra jvālā nadī pārtha prasrutā śivanirmitā

हिन्दी अर्थ

कायारोहणमित्येवं सिद्धक्षेत्रं च वे तदा । भविष्यति तु विख्यातं यावद्भूमिधेरिष्यति ॥ै२२२ तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति तपस्वितः । कुशिकश्चेव गाय्येश्व मित्रको रुष्ट एवं च ॥

English

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अध्याय २८

श्लोक 130

निर्वाप्य तद् बाणपुरं रेवया सह संगता ।तत्र स्नात्वा महाराज विधिना मन्त्रसंयुतः

nirvāpya tad bāṇapuraṃ revayā saha saṃgatā / tatra snātvā mahārāja vidhinā mantrasaṃyutaḥ

हिन्दी अर्थ

रुद्रलोक॑ गभिष्यामि पुनरावत्तिदुलभम् ..... रर४ इत्येतद्वे मया प्रोक्तमवतारेषु लक्षणम् । मन्वादिकृष्णपर्यन्तमष्टाविशयुगक्रमात्

English

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अध्याय २८

श्लोक 131

तिलसंमिश्रतोयेन तर्पयेत् पितृदेवताः ।पिण्डदानेन च पित्ःन् पैण्डरीकफलं लभेत्

tilasaṃmiśratoyena tarpayet pitṛdevatāḥ / piṇḍadānena ca pitḥn paiṇḍarīkaphalaṃ labhet

हिन्दी अर्थ

- भविष्यति तदा कल्पे कृष्णद्वेपायनो यदा तत्र स्मृतिसमृहानां विभागों धर्मेलक्षणम्

English

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अध्याय २८

श्लोक 132

अनाशकं तु यः कुर्यात्तस्मिंस्तीर्थे नराधिप ।मुच्यते सर्वपापेभ्यो रुद्रलोकं स गच्छति

anāśakaṃ tu yaḥ kuryāttasmiṃstīrthe narādhipa / mucyate sarvapāpebhyo rudralokaṃ sa gacchati

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्ते माहेश्वरावतारयोगो ताम त्रयोविशोष्ध्यायः

English

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अध्याय २८

श्लोक 133

अमराणां शतैश्चैव सेवितो ह्यमरेश्वरः ।तथैव ऋषिसङ्घैश्च तेन पुण्यतमो महान्

amarāṇāṃ śataiścaiva sevito hyamareśvaraḥ / tathaiva ṛṣisaṅghaiśca tena puṇyatamo mahān

हिन्दी अर्थ

मेरुगुहा में प्रविष्ट होंगे । है ब्रह्म ! उस समय हमारा नाम नकुली होगा +१२०-२२१। जितने दिनों तक पृथ्वी रहेगी, उतने दिन तक हमारे द्वारा अधिष्ठित स्थान कायारोहण नाम से सिद्धि क्षेत्र होकर विरुयात होगा । वहाँ भी हमें कुशिक, गाग्यें, मित्रक और रुष्ट नामक चार तपस्वी पुत्र होंगे । ये योगात्मा, महात्मा, ब्राह्मण और वेदपारग होंगें। ये ऊर््ध बरेता माहेश्वर योग को प्राप्त कर रुद्रलोक जायेंगे, जहाँ से कि पुनरा-

English

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अध्याय २८

श्लोक 134

समन्ताद्योजनं तीर्थं पुण्यं ह्य् अमरकण्टकम् ।रुद्रकोटिसमोपेतं तेन तत्पुण्यमुत्तमम्

samantādyojanaṃ tīrthaṃ puṇyaṃ hy amarakaṇṭakam / rudrakoṭisamopetaṃ tena tatpuṇyamuttamam

हिन्दी अर्थ

बतंन नहीं होता है।२२२-२२४॥ यह हमने मनु से लेकर कृष्ण पर्यन्त क्रम से अठाईसों योग के अवतारों का लक्षण कहा। जिस कल्प में इंष्णइंपायन होंगे, उसमें धर्मलक्षण के अनुसार स्मृतियों का विभाग

English

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अध्याय २८

श्लोक 135

तस्य पर्वतराजस्य यः करोति प्रदक्षिणम् ।प्रदक्षिणीकृता तेन पृथिवी नात्र संशयः

tasya parvatarājasya yaḥ karoti pradakṣiṇam / pradakṣiṇīkṛtā tena pṛthivī nātra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

+- इदमध नास्ति क “ पुस्तके ।

English

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अध्याय २८

श्लोक 136

वाचिकं मानसं चैव कायिकं त्रिविधं च यत् ।नश्यते पातकं सर्वमित्येवं शङ्करो ऽब्रवीत्

vācikaṃ mānasaṃ caiva kāyikaṃ trividhaṃ ca yat / naśyate pātakaṃ sarvamityevaṃ śaṅkaro 'bravīt

हिन्दी अर्थ

चत्वारि भारते बचे युगानि मुनयो विदुः ऊृत॑ त्रेता द्वापरं च तिष्थ॑ चेति चतुर्युगम् है एतत्सहत्नपयन्तमहयंद्ब्रह्मणः स्मृतम् । यामाआयस्तु गणाः सप्त रोमवन्तश्रतुदंश

English

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अध्याय २८

श्लोक 137

अमरेश्वरपार्श्वे च तीर्थं शक्रेश्वरं नृप ।तपस् तप्त्वा पुरा तत्र शक्रेण स्थापितं किल

amareśvarapārśve ca tīrthaṃ śakreśvaraṃ nṛpa / tapas taptvā purā tatra śakreṇa sthāpitaṃ kila

हिन्दी अर्थ

सशरीरा श्रयन्ते सम जनलोक॑ सहानुगाः । एवं देबेष्बतीतेषु महलोंकाज्जनं तपः 0३ मन्वन्तरेष्वतीतेषु देवा: सर्वे महौजसः । ततस्तेषु गतेष्ध्व॑ सायुज्यं कल्पवासिनाम् द पड समेत्य देवेस्ते देवाः प्राप्ते संकालने तदा । सह॒लोंक॑ परित्यज्य गणसस्ते बे चतुदंश

English

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अध्याय २८

श्लोक 138

कुशावर्तं नाम तीर्थं ब्रह्मणा च कृतं शुभम् ।ब्रह्मकुण्डमिति ख्यातं हंसतीर्थं तथा परम्

kuśāvartaṃ nāma tīrthaṃ brahmaṇā ca kṛtaṃ śubham / brahmakuṇḍamiti khyātaṃ haṃsatīrthaṃ tathā param

हिन्दी अर्थ

सृतादिष्ववशिष्टेषु स्थावरान्तेषु वे तदा । शुन्येषु तेषु लोकेषु महान्तेषु भवादिषु ॥ देवेष्वथ गतेष॒ध्व॑ कल्पवासिषु वे जनम् १३६ तत्संहृत्य ततो ब्रह्मा देवधिगणदानवान् । संस्थापयति वे सर्वान्दाहवृष्ट्या युगक्षये

English

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अध्याय २८

श्लोक 139

अम्बरीषस्य तीर्थं च महाकालेश्वरं तथा ।कावेर्याः पूर्वभागे च तीर्थं वै मातृकेश्वरम्

ambarīṣasya tīrthaṃ ca mahākāleśvaraṃ tathā / kāveryāḥ pūrvabhāge ca tīrthaṃ vai mātṛkeśvaram

हिन्दी अर्थ

चायु बेोले-- मुतियों ने कहा है कि, भारतवर्ष में करत, त्रेता, द्वापर और कलि नामक चार युग होते हैं। इन हजार युगों का ब्रह्मा का एक दितः होता है । इस दिनावसान में यामादि सप्तगण और रोमवाले चौदह गण अनुचरों के साथ जनलोक में सशरीर आश्रय ग्रहण करते हैं ।१५२१। इस प्रकार फिर चौयुगी के नाश होने पर वे देवता पहले जन और तपो लोक को प्रस्थान करते हैं। मन्वन्तरों के बौत जानें

English

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अध्याय २८

श्लोक 140

एतानि दक्षिणे तीरे रेवाया भरतर्षभ ।संसेवनस्नानदानैः पापसङ्घहराणि च

etāni dakṣiṇe tīre revāyā bharatarṣabha / saṃsevanasnānadānaiḥ pāpasaṅghaharāṇi ca

हिन्दी अर्थ

पर बलशाली देवगण भी ऊ्द्ध बगामी होते हैं और वे ऊपर गये हुये कह्पवासियों का सामीप्य ग्रहण करते हैं (३-४॥ फिर जब प्रलय उपस्थित होता है, तब वे चौदहों देवगण अन्‍य देवों के साथ महलोंक का त्याग करके जनलोक का आश्रय ग्रहण करते हैं। उस समय स्थाबराब्त अवशिष्ट भूतादि नष्ट हो जाते हैं, महान भुवादि लोक शून्य हो जाते हैं ओर कल्पवासियों के साथ देवगण ऊपर चले जाते हैं ।(-६। दाह और

English

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अध्याय २८

श्लोक 141

भृगुतुङ्गे महाराज प्रसिद्धो भैरवः शिवः ।तस्य याम्यविभागे च तीर्थं वै चपलेश्वरम्

bhṛgutuṅge mahārāja prasiddho bhairavaḥ śivaḥ / tasya yāmyavibhāge ca tīrthaṃ vai capaleśvaram

हिन्दी अर्थ

वृष्टि से जब युगक्षय हो जाता है, तब ब्रह्मा सब का संहार करके देब-दानव ऋषियों को फिर से संस्थ।पित

English

The famous daughter of Markanqleya bore to Rajas a

अध्याय २८

श्लोक 142

एतौ स्थितौ दुःखहरौ रेवाया उत्तरे तटे ।तावभ्यर्च्य तथा नत्वा सम्यग् यात्राफलं भवेत् ।अदृष्टपूजितौ तौ हि नराणां विघ्नकारकौ

etau sthitau duḥkhaharau revāyā uttare taṭe / tāvabhyarcya tathā natvā samyag yātrāphalaṃ bhavet / adṛṣṭapūjitau tau hi narāṇāṃ vighnakārakau

हिन्दी अर्थ

योइतीत: सप्तमा कल्पो सथा व: परिकीरतित: । ससुद्रः सप्तर्भिर्गाढ्मेकीभुत मं हाणंवः ॥।

English

The famous daughter of Markanqleya bore to Rajas a

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 28
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
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