अध्याय ३७
श्लोक 1
॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे दारुकतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम षट्त्रिंशो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय ३७ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेत राजेन्द्र देवतीर्थमनुत्तमम् ।येन देवास्त्रयस्त्रिंशत् स्नात्वा सिद्धिं परां गताः
|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe dārukatīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma ṣaṭtriṃśo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 37 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gaccheta rājendra devatīrthamanuttamam / yena devāstrayastriṃśat snātvā siddhiṃ parāṃ gatāḥ
हिन्दी अर्थ
को / पक: हस्तुकदना, परू-सुल्दरी, प्रियदर्शना, कमलहस्ता कन्या उतन्न हुई। उसे देखते ही दौनों दत्यों के प्रकद्व सूक्क गये. 4४६३-अह्या ने उस कन्या से मधुर शब्दों में कहा-- यथाथ सुन्दरि, कहो तुम कौन हो, मैं तुकदें+कका छमझ् ?' उस कन्या ने वेदोक्त विधि से ब्रह्मा की पूजा कर हाथ जोड़कर कहा--मुझे आप विध्णु की आज्ञानुवतिनी मोहिनी माया समझें। ब्रह्म ! आपने मेरा स्म'ण किया; इसलिये मैं शीघ्र ही यहाँ पहुँच
English
The valleys between Sitanta and Kumuflja* ranges are no:sy with birds and resorted to by innumerable creatures.