Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
38
अध्याय 38 / 232

Adhyaya 38

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अध्याय ३८

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे देवतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम सप्तविंशो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय ३८ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेत राजेन्द्र गुहावासीति चोत्तमम् ।यत्र सिद्धो महादेवो गुहावासी समार्बुदम्

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe devatīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma saptaviṃśo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 38 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gaccheta rājendra guhāvāsīti cottamam / yatra siddho mahādevo guhāvāsī samārbudam

हिन्दी अर्थ

सा का करें? ।५७-५९। विष्णु बोले -स्वरणवर्ण कमलयोनि ब्रह्मा ! अच्छा, आप मेरी बात सुनिये । पुत्राभि- लाषी होकर आपने जो महादेव से वरदान प्राप्त किया है, उसे सफल कीजिये और ऋगमुक्त होइये । आप खूरों प्रकार से जीवों की सृष्टि और उनका विनाश कीजिये! ।६०-६१। पद्मयोनि पितामह ब्रह्मा गोविन्द से ज्ञान प्राप्त कर प्रजा की सृष्टि करने के लिये अत्यन्त उग्र तप करने लगे । इस प्रकार दीघंकाल तक तपस्या

English

I shall now describe the valleys of the southern quarter, frequented by the Siddhas. Listen to them in due order.

अध्याय ३८

श्लोक 2

युधिष्ठिर उवाच: केन कार्येण भो तात महादेवो जगद्गुरुः ।गुहायाम् अनयत्कालं सुदीर्घं द्विजसत्तम

yudhiṣṭhira uvāca: kena kāryeṇa bho tāta mahādevo jagadguruḥ / guhāyām anayatkālaṃ sudīrghaṃ dvijasattama

हिन्दी अर्थ

करने पर भी कुछ नहीं हुआ, तब उन्हें दुःख हुआ। उस समय उनके क्रोध-सम्पन्न नेत्रों से अश्वुबिन्दु छलक पड़े । उन अश्रुविन्दुओं से वातपित्तकफात्मक महाविष वाले सप उत्पन्न हुये ।६२-६४। वे सप॑ बड़ेन्‍बड़े फन धारण ; किये हुये थे, स्वस्तिक और लम्बे केशों से समलंकृत एवं महासत्त्व थे। सबसे पहले सर्पों को ही उत्पन्न होते: देखकर ब्रह्म अपनी निन्‍दा करने लगे कि मेरी तपस्या को धिक्‍क्रार है जिसका फल ऐसा हुआ

English

In the midst of the leading mountain Sisira and Patanga, there is the charming forest of Udumbara. 2 Its ground is gloriously smooth and polished. The creepers there embrace (twine round) the trees. It shines with huge trees with lofty tops. It is resorted to by the flocks of birds.

अध्याय ३८

श्लोक 3

एतद्विस्तरतः सर्वं कथयस्व ममानघ ।श्रोतुमिच्छाम्यहं सर्वपरं कौतूहलं हि मे

etadvistarataḥ sarvaṃ kathayasva mamānagha / śrotumicchāmyahaṃ sarvaparaṃ kautūhalaṃ hi me

हिन्दी अर्थ

कि प्रारम्भ में ही मैंने लोकविनाश-कारक जीब्ों की हो सृष्टि की ।६५-६६। क्रोध से उन्हें भयद्भूर मूर्च्छा हो गयी। मरूच्छितावस्था में ही प्रजापति ने अपना प्राण त्याग दिया। तब अनृपमेय पराक्रमी ब्रह्मा की देह से करुणापूर्वक- रोते हुये एक साथ एकादश रुद्र उसन्न हुये । रोने के ही कारण. वे रंद् हुये और उन्होंने रुद्रत्व प्राप्त किया । जो रुद्र हैं, वे हो प्राण हैं और जो प्राण हैं, वे ही रुद्व हैं। प्राणधारी सभी भूतों में वे ही प्राण

English

The glittering forest shines with ripe fruits as big as great pitchers. They are ripe, coral-coloured, charming and full of honey.

अध्याय ३८

श्लोक 4

मार्कण्डेय उवाच: साधु प्रश्नो महाराज पृष्टो यो वै त्वयोत्तमः ।पुराणे विस्तरो ह्यस्य न शक्यो हि मयाधुना

mārkaṇḍeya uvāca: sādhu praśno mahārāja pṛṣṭo yo vai tvayottamaḥ / purāṇe vistaro hyasya na śakyo hi mayādhunā

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मण: सो5ददात्प्राणानात्मज: स तदा प्रभः । प्रहष्टवदनो रुद्र:ः किचित्प्रत्यागतासवम् (? )

English

Siddhas, Yaksas, Gandharvas, * Kinnaras, Serpents and jolly Vidyadharas subsist themselves perpetually on them.

अध्याय ३८

श्लोक 5

कथितुं वृद्धभावत्वादतीतो बहुकालिकः ।संक्षेपात् तेन ते तात कथयामि निबोध मे

kathituṃ vṛddhabhāvatvādatīto bahukālikaḥ / saṃkṣepāt tena te tāta kathayāmi nibodha me

हिन्दी अर्थ

अभ्यभाषत्तदा देवों ब्रह्माण परम वचः ७१ उपयाचस्व मां ब्रह्मनस्मर्त महेंसि चाइघत्सनः । मां च वेत्थातमज रुद्र प्रसाद कुरु में प्रभो १७२

English

There, the rivers contain ample water, clear and sweet. There are lakes all round with tasty pure water.

अध्याय ३८

श्लोक 6

पुरा कृतयुगे राजन्नासीद् दारुवनं महत् ।नानाद्रुमलताकीर्णं नानावल्ल्युपशोभितम्

purā kṛtayuge rājannāsīd dāruvanaṃ mahat / nānādrumalatākīrṇaṃ nānāvallyupaśobhitam

हिन्दी अर्थ

ततः प्रत्यागतप्राण: स्निग्धगम्भी रया गिरा । उवाच भगवान्त्रह्मा शुद्धजाम्वुनदप्रभः ७४ भो भो वद सहाभाग आनन्दयसि से सनः। को भवान्विश्वमु तिस्त्वं स्थित एकादशात्मकः ७५ एवमुक्तो भगवता ब्रह्मणाइनन्‍्ततेजसा ततः प्रत्यवदद्र॒द्रों ह्याभिवाद्याउधत्मजः सह ७६ यत्ते बरमहं ब्रह्मन्याचितो विष्णुना सह । पुत्रो से भव देवेति त्वत्तुत्यों वाइपि धवहः ७७

English

There is a charming hermitage of the holy lord Kar- dama Prajapati, where Devas live. All around, it is surrounded

अध्याय ३८

श्लोक 7

सिंहव्याघ्रवराहैश्च गजैः खड्गैर्निषेवितम् ।बहुपक्षियुतं दिव्यं यथा चैत्ररथं वनम्

siṃhavyāghravarāhaiśca gajaiḥ khaḍgairniṣevitam / bahupakṣiyutaṃ divyaṃ yathā caitrarathaṃ vanam

हिन्दी अर्थ

लोकेषु विश्व॒तेः कार्य सर्वेविश्वात्मसंभवेः । विषादं त्यज देवेश लोकांस्त्वं स्रष्टुमहेंसि (७८ एवं स भगवानुक्तो ब्रह्मा प्रीतमता भवत् । रुद्रं प्रत्यवदद्भूयों लोकान्ते नीललोहितम् ७९ साहाय्यं मम कार्यार्थ प्रजा: सुज मया सह । बीजी त्वं सब भूतानां तत्पपन्नस्तथा भव 0

English

M. Ali locates this region to the outer slopes ofMt. Kunlun and the subjacent range, the Altin Tagh. The region is on the southern border of the Tarim basin.

अध्याय ३८

श्लोक 8

तत्र केचिन् महाप्राज्ञा वसन्ति संशितव्रताः ।वसन्ति परया भक्त्या चतुराश्रमभाविताः

tatra kecin mahāprājñā vasanti saṃśitavratāḥ / vasanti parayā bhaktyā caturāśramabhāvitāḥ

हिन्दी अर्थ

बाठमित्येव तां वाणों प्रतिजग्राए शंकर: ८०

English

Sisiia and Patanga—mountains to the south of the Manasa Lake— GGEIL

अध्याय ३८

श्लोक 9

ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थो यतिस् तथा ।स्वधर्मनिरताः सर्वे वाञ्छन्तः परमं पदम्

brahmacārī gṛhasthaśca vānaprastho yatis tathā / svadharmaniratāḥ sarve vāñchantaḥ paramaṃ padam

हिन्दी अर्थ

रूप से स्थित हैं। पद्मययोनि के ललाट से उत्पन्न एकादशात्मक प्रभु त्रिशुलधारी नीललोहित ने साधु आचरण करनेवाले अतिशय महान् ब्रह्मा को फिर प्राणदान दिया । आत्मज स्वरूप प्रसन्नवदन प्रभु रुद्र ने ब्रह्मा को प्राणदान दिया और. प्राण के लौट आने पर ब्रह्म से कहा ।६७-७१। “ब्रह्मन् ! अपने को स्मरण कीजिये, हमसे याचना कीजिये और हम ( रुद्र ) को अपना पुत्र समझिये, हम पर प्रसन्न होइये ।” रुद्र के इस मनो-

English

Between the mountains Tamravarna and Patanva there is a highly sacred lake, a hundred Yojanas wide and two hundred Yojanas long. It is beautified with white lotuses as refulgent as the midday sun and full-blown red big lotuses with thousand petals. The water therein shines with sweet-smelling blooming, red and blue lilies with the honey bees resting within. The lake is resorted to by Devas, Danavas and great serpents. It is decorated with clusters of blue lotus flowers.

अध्याय ३८

श्लोक 10

तावद्वसन्तसमये कस्मिंश्चित् कारणान्तरे ।विमानस्थो महादेवो गच्छन्वै ह्युमया सह

tāvadvasantasamaye kasmiṃścit kāraṇāntare / vimānastho mahādevo gacchanvai hyumayā saha

हिन्दी अर्थ

नुकूल वचन को सुनकर ब्रह्मा अत्यन्त प्रसन्न हो गये । उनके दोनों नेत्र विकसित कमल की तरह खिल गये । तपाये हुये सोने की तरह देदीप्यमान भगवान् ब्रह्मा ने प्राण के लौठ आने पर स्तिग्ध-गम्भीर स्वर में कहा--महाभाग ! आप कौन हैं, जो हमारे मन को आनन्दित कर रहे हैं? भाप गिनती में ग्यारह और विश्वमूत्ति की तरह विराजमान हैं ? आप स्पष्ट शब्दों में कहिये । अनन्त तेजस्वी भगवान् ब्रह्मा ने जब इस

English

There is a country within, a hundred Yojanas long and thirty Yojanas wide. It is embellished with red minerals.

अध्याय ३८

श्लोक 11

ददर्श तोय आवासमृक्सामयजुर्नादितम् ।अलक्ष्यागतनिर्गम्यं सर्वपापक्षयंकरम्

dadarśa toya āvāsamṛksāmayajurnāditam / alakṣyāgatanirgamyaṃ sarvapāpakṣayaṃkaram

हिन्दी अर्थ

प्रकार कहा, तब रुद्र ने आत्मजों के साथ उनका अभिवादन करके कहा ।७२-७६। आपने विष्णु के साथ जो हमसे वर माँगा था कि देव ! आप हमारे उपयुक्त पुत्र हों अथवा आपकी तरह सुयोग्य पुत्र हों, विश्वात्मसम्भव ! लोकप्रसिद्ध उन्हीं पुत्रों के द्वारा हम कार्य सम्पादन करंगे अतः देवेश, विषाद को छोड़िये । आप संसार की सृष्टि करने के योग्य हैं।७७-०८। इन बातों को सुनकर ब्रह्मा प्रसन्न हो गये और प्रलय में

English

There is a flourishing city with beautiful ramparts and high archways. It is teeming with men and women. The houses have turrets with stable sloping roofs studded diversely and separately with jewels. The grounds are paved with gem- slabs of various colours. There are bed-coverings smooth and variegated. There are rows of mansions excellent and lofty. Such a beautiful city of Vidyadharas splendidly shines there.

अध्याय ३८

श्लोक 12

तं दृष्ट्वा मुदिता देवी हर्षगङ्गदया गिरा ।पप्रच्छ देवदेवेशं शशाङ्ककृतभूषणम्

taṃ dṛṣṭvā muditā devī harṣagaṅgadayā girā / papraccha devadeveśaṃ śaśāṅkakṛtabhūṣaṇam

हिन्दी अर्थ

नीललोहित स्वरूप में व्यक्त होने वाले रुद्र से कहा-आप हमारे काय में सहायता दीजिये ओर हमारे साथ प्रजा को सृष्टि कीजिये। आप निखिल भूत और जगत् के कारण हैं; अतएवं इस काय के लिये उद्यत होइये । शंकर ने “ऐसा ही हो” कहकर ब्रह्मा की बात को मान लिया ।७९-८०। अन्तर कृष्ण मृगचर्म से

English

The famous lord of Vidyadharas, Puloman, is there. His dress and features are variegated. He wears garlands. His lustre resembles the splendour of Lord Indra.

अध्याय ३८

श्लोक 13

देव्युवाच: कस्यायमाश्रमो देव वेदध्वनिनिनादितः ।यं दृष्ट्वा क्षुत्पिपासाद्यैः श्रमैश्च परिहीयते

devyuvāca: kasyāyamāśramo deva vedadhvaninināditaḥ / yaṃ dṛṣṭvā kṣutpipāsādyaiḥ śramaiśca parihīyate

हिन्दी अर्थ

ततः स भगवान्त्रह्मा कृष्णजिनविभूषितः । मनोअग्ने सोइसुजट्रेबों भूतानां धारणां ततः ॥

English

He is the emperor of thousands of resplendent Vidya¬ dharas having the splendour comparable to the sun, wearing variegated dresses.

अध्याय ३८

श्लोक 14

महेश्वर उवाच: किं त्वया न श्रुतं देवि महादारुवनं महत् ।बहुविप्रजनो यत्र गृहधर्मेण वर्तते

maheśvara uvāca: kiṃ tvayā na śrutaṃ devi mahādāruvanaṃ mahat / bahuviprajano yatra gṛhadharmeṇa vartate

हिन्दी अर्थ

ओंकारप्रमुखान्वेदानभिमान्याश्र देवता: । एवमेतान्यथा प्रोक्तानब्रह्मा लोकपितामह:ः ८ दक्षाद्यान्मानसास्पुत्रान्त्रोवाच भगवान्प्रभु:। प्रजा: सजत भद्रं वो रुद्रेण सह धीमता अनुगम्य महात्मान प्रजानां पतथस्तदा वयमिच्छामहे देव प्रजा: ख्रष्टं त्वया सह ॥।

English

Between the great mountain Visakha and Patahga, on the eastern bank of the lake Tamravarna is the famousmango

अध्याय ३८

श्लोक 15

अत्र यः स्त्रीजनः कश्चिद् भर्तृशुश्रूषणे रतः ।नान्यो देवो न वै धर्मो ज्ञायते शैलनन्दिनि

atra yaḥ strījanaḥ kaścid bhartṛśuśrūṣaṇe rataḥ / nānyo devo na vai dharmo jñāyate śailanandini

हिन्दी अर्थ

ब्रह्म गस्त्वेष संदेशस्तव चेच महेश्वर ८६ तरेवमुक्तो भगवान्रद्र: प्रोवाघ ताश्थभु:। बह्यणाउप्त्मजा महा' प्राणान्गृह्य च वे सुराः १८७ कृत्वा5ग्रजो5ग्रजानेतान्ब्राह्मणाचा त्मजान्मस । ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तान्सप्त लोकान्ममा (दा )त्मकान् ॥।

English

O Brahmanas, between the lordly mountain Sumula and Vasudhara, there is a Bilvasthall, fifty Yojanas long and thirty Yojanas wide. It is a level land sweet-smelling and flouri¬ shing. It is lovely due to the presence of birds. It is pure. The trees bear fruits which are hanging very low.

अध्याय ३८

श्लोक 16

एतच्छ्रुत्वा परं वाक्यं देवदेवेन भाषितम् ।कौतूहलसमाविष्टा शङ्करं पुनरब्रवीत्

etacchrutvā paraṃ vākyaṃ devadevena bhāṣitam / kautūhalasamāviṣṭā śaṅkaraṃ punarabravīt

हिन्दी अर्थ

तेनेयमुक्ता: प्रत्यूच रुद्रमाद्यं त्रिशुलिनम् । यथाउ5न्नापयसे देव तथा तह्है भविष्यति ८६ अनुमान्य महादेव॑ प्रजानां पतय्सतदा ऊचुदक्ष महात्मानं भवाडमश्रेष्ठ: प्रजापति: ॥ विभूषित होकर ब्रह्मा ने पहले मन को फिर भूतों की धारणा को और उसके बाद जिह्वानिवासिनी विश्व- रूपिणी सरस्त्रती को बनाया। अनन्तर भूृगु , अंगिरा, दक्ष, पुलस्त्य, पुलह, ऋतु, वसिष्ठ आदि सात महातेजस्वी मानस पुत्रों को बनाया ॥५१-८२। इनके अतिरिक्त अनेकानेक जगत्-कर्ता पुत्रों की सृष्ठि करने के बाद उनके मुख से गौओं की सृष्टि हुई। उसके बाद ओंकार प्रमुख वेद और उनके

English

The soil on the ground is wet and damp with the shat¬ tering and shattered sweet Bilva fruits resembling coral (in colour) and comparatively large.

अध्याय ३८

श्लोक 17

यत्त्वयोक्तं महादेव पतिधर्मरताः स्त्रियः ।तासां त्वं मदनो भूत्वा चारित्रं क्षोभय प्रभो

yattvayoktaṃ mahādeva patidharmaratāḥ striyaḥ / tāsāṃ tvaṃ madano bhūtvā cāritraṃ kṣobhaya prabho

हिन्दी अर्थ

अभिमानी देवता बने । तब पितामह ब्रह्मा ने पूर्वोक्त वक्षादि मानस पुत्रों से कहां--आपका कल्याण हो । आप लोग धोमान् रुद्र के साथ मिलकर प्रजा की सृष्टि करें।” ८३-८५। तब प्रजापतिगण रुद्र के अनुगामी होकर बोले--'देव ! हम लोग आपके साथ मिलकर प्रजा की सृष्टि करना चाहते हैं। महेश्वर ! आपके प्रति ब्रह्मा का यही सन्देश है ।८६। उन लोगों के द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर भगवान् रुद्र ने उन

English

Yaksas, Gandharvas, Kinnaras, Siddhas and Nagas mostly eating only the Bilva fruits, live in that natural region.

अध्याय ३८

श्लोक 18

ईश्वर उवाच: यत्त्वयोक्तं च वचनं न हि मे रोचते प्रिये ।ब्राह्मणा हि महद्भूतं न चैषां विप्रियं चरेत्

īśvara uvāca: yattvayoktaṃ ca vacanaṃ na hi me rocate priye / brāhmaṇā hi mahadbhūtaṃ na caiṣāṃ vipriyaṃ caret

हिन्दी अर्थ

लोगों से कहा--““ब्रह्मनन्दन देवगण ! आपकमें जो अग्नज हैं, वे हमसे प्राण ग्रहणकर और ब्रह्मतनयों को साथ लेकर ब्रह्मा से लेकर तृण पर्यन्त सातों लोकों की सृष्टि करें । आप लोग हमारी आज्ञा से ऐसा कर सकते हैं! आप सबका कल्याण हो ।” ।5७-८८। यह सुनकर उन लोगों ने त्रिशुलधारी रुद्र से कहा-देव ! जैसे आप कहते हैं, वेसा ही होगा । इस प्रकार प्रजापतियों ने महादेव का अनुमोदन कर महात्मा दक्ष से कहा-- एचमस्त्विति वे दक्षः प्रत्यपद्यत भाषितम् ॥ तेः सह खष्टुमारेमे प्रजाकामः प्रजापति: ॥

English

In between Vasudhara and Ratnadhara is the beautiful fragrant forest of KirhSuka ( Buteafrondosa) a hundred Yojanas long and thirty Yojanas wide, where the trees always bloom. 'With the rich growth of flowers, it seems to be blazing all round.

अध्याय ३८

श्लोक 19

मन्युप्रहरणा विप्राश्चक्रप्रहरणो हरिः ।चक्रात्क्रूरतरो मन्युस् तस्माद् विप्रं न कोपयेत्

manyupraharaṇā viprāścakrapraharaṇo hariḥ / cakrātkrūrataro manyus tasmād vipraṃ na kopayet

हिन्दी अर्थ

सर्गस्थिते ततः स्थाणों ब्रह्मा सर्वमथासृजत्

English

By its divine fragrance the whole region is sweetened upto a hundred Yojanas in the forests all round.

अध्याय ३८

श्लोक 20

न ते देवा न ते लोका न ते नगा न चासुराः ।दृश्यन्ते त्रिषु लोकेषु ये तैर्दृष्टैर् न नाशिताः

na te devā na te lokā na te nagā na cāsurāḥ / dṛśyante triṣu lokeṣu ye tairdṛṣṭair na nāśitāḥ

हिन्दी अर्थ

अथास्य सप्तमेडतीते कल्पे वे संबभुवतुः। ऋभुः सनत्कुमारश्च तपोलोकनिवासिनों ॥ इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्ते मधुकैटभोत्पत्तिविनाशवर्णनं नाम पञझुचर्विशोष्ध्याय:

English

There is a great brilliant abode of lord Aditya there. Every month Prajapati Surya descends there.

अध्याय ३८

श्लोक 21

तेषां मोक्षस् तथा स्वर्गो भूमिर्मर्त्ये फलानि च ।येषां तुष्टा महाभागा ब्राह्मणाः क्षितिदेवताः

teṣāṃ mokṣas tathā svargo bhūmirmartye phalāni ca / yeṣāṃ tuṣṭā mahābhāgā brāhmaṇāḥ kṣitidevatāḥ

हिन्दी अर्थ

“आप ही श्रेष्ठ प्रजापति हैं। आपकी जय हो ! आपको ही आगे कर हम लोग प्रजा की सृष्टि करेंगे” । ।८६-६०। दक्ष ने भी “ऐसा ही हो” कहकर उनके भाषण का अनुमोदन किया ओर उन लोगों के साथ मिलकर. प्रजाभिलाषी प्रजापति ने सुष्टि-रचना प्रारम्भ की। रुद्र देव को इस प्रकार सृष्टिकाय में तत्पर होते देख कर ब्रह्मा भी सृष्टि करने लगे। सप्तम कल्प के अतीत हो जाने पर फिर तब तपोलोक निवासी

English

There, multitudes of Siddhas bow to the thousand-rayed excellent lord Sun who is honoured by all the worlds and who is the creator of Time.

अध्याय ३८

श्लोक 22

एवं ज्ञात्वा महाभागे असद्ग्राहं परित्यज ।तत्र लोके विरुद्धं वै कुप्यन्ते येन वै द्विजाः

evaṃ jñātvā mahābhāge asadgrāhaṃ parityaja / tatra loke viruddhaṃ vai kupyante yena vai dvijāḥ

हिन्दी अर्थ

ऋभ् और सनत्कुमार उत्पन्न हये। उसके बाद ब्रह्मा ने और भी ऋषि आदि मानस पुत्रों को उत्पन्न वैद5 वायुपुराणम्

English

In between the mountains of Pancakuta and Kailasa is an impassable land, a hundred Yojanas long and thirty-six Yojanas wide. Small animals cannot live there. It is as white as a swan all round. No animal can cross it. It is awe-inspiring.

अध्याय ३८

श्लोक 23

देव्युवाच: नाहं ते दयिता देव नाहं ते वशवर्तिनी ।अकृत्वाधश्व वै तासां मानं सुरसुपूजितम्

devyuvāca: nāhaṃ te dayitā deva nāhaṃ te vaśavartinī / akṛtvādhaśva vai tāsāṃ mānaṃ surasupūjitam

हिन्दी अर्थ

अहो विस्मयनीयानि रहस्यानि महामते । त्वयोक्तानि यथातत्त्वं लोकानुग्रहकारणात् द १ तत्न वे संशयों महामवतारेषु शूलिनः। कि कारणं महादेव: कलि प्राप्य सुदारुणम् ॥ हित्वा युगानि पुर्बाणि अवतारं करोति वे

English

Thus the valleys in the southern tract have been enu¬ merated in due order, wholly. They are resorted to by the groups of Siddhas.

अध्याय ३८

श्लोक 24

लोकलोके महादेव अशक्यं नास्ति ते प्रभो ।क्रियतां मम चैवैकम् एतत् कार्यं सुरोत्तम

lokaloke mahādeva aśakyaṃ nāsti te prabho / kriyatāṃ mama caivaikam etat kāryaṃ surottama

हिन्दी अर्थ

अस्मिन्मन्वन्तरे चेव प्राप्ते बेवस्वते प्रभो । अवतारं कथ्थ चक्के एतदिच्छामि वेदितुम् ३ न तेउस्त्यविदितं किचिदिह लोके परत्र च। भक्तानामुपदेशार्थ विनयात्यूच्छतो मम ॥ एवं पृष्टोथ भगवान्वायुलोकिहिते रतः इदमाह महातेजा वायुलकिनमस्कृतः

English

O excellent Brahmanas! Now listen to the description of the valleys which are located on the west.

अध्याय ३८

श्लोक 25

एवमुक्तो महादेवो देव्या वाक्यहिते रतः ।कृत्वा कापालिकं रूपं ययौ दारुवनं प्रति

evamukto mahādevo devyā vākyahite rataḥ / kṛtvā kāpālikaṃ rūpaṃ yayau dāruvanaṃ prati

हिन्दी अर्थ

सूतज्ी बोले--महामति ! आपने संसारवासियों पर दया करके जिन विस्मयकारक रहस्यों को तत्त्वतः कहा है, उनमें महादेघ के अवलार के संबन्ध में कुछ हमें सन्देह रह गया है।?१ है। बया कारण है कि, अम्य पूर्व युगों को "छोड़कर महादेव कठिन कलिकाल में अवतार ग्रहण करते हैं ? प्रभो! इस ववस्वत मन्वस्तर के प्राप्त होने पर वे क्‍यों अवतार ग्रहण करते हैं, हम यह जानना चाहते हैं

English

In the central part between Suvaksa and Sikhisaila mountains, is a rocky and stony stretch of land extending to one hundred Yojanas on all sides. 1

अध्याय ३८

श्लोक 26

महाहितजटाजूटं नियम्य शशिभूषणम् ।कण्ठत्राणं परं कृत्वा धारयन् कर्णकुण्डले

mahāhitajaṭājūṭaṃ niyamya śaśibhūṣaṇam / kaṇṭhatrāṇaṃ paraṃ kṛtvā dhārayan karṇakuṇḍale

हिन्दी अर्थ

प्रलोक या इस लोक की कोई भी बात आपसे छिपी नहीं है । महामति ! महापण्डित ! हम विनय- प्वेक आपसे पूछते हैं। भक्तों को उपदेश देने के लिये यह हमें क हिये, यदि आप सुनाना उचित लोमश ऋषि बोकषे--इस प्रकार पूछे जानेपर लोककल्याणकर्ता भगवान् वायु ने कहा-- गाधेय ! आपने जो हमसे पूछा है, वह अत्यन्त गुप्त कथा है; किन्तु हम उसे यथा्रम कहते हैं, उसे आप सनिये !

English

Verses.37-44: This is the Kulyab region in Tajikistan (USSR), Near

अध्याय ३८

श्लोक 27

व्याघ्रचर्मपरीधानो मेखलाहारभूषितः ।नूपुरध्वनिनिघोषैः कम्पयन् वै वसुंधराम्

vyāghracarmaparīdhāno mekhalāhārabhūṣitaḥ / nūpuradhvaninighoṣaiḥ kampayan vai vasuṃdharām

हिन्दी अर्थ

एतद्गुप्ततमं लोके यय्मां त्वं परिपृच्छसि । तत्सवें शूणु गाधेय उच्यमान यथाक़रमम्

English

It is alway hot. People are afraid of touching that sur¬ face. It produces horripilation. It is inaccessible to creatures. It is terrible even tc gods.

अध्याय ३८

श्लोक 28

महानूर्द्ध्वजटामाली कृत्तिभस्मानुलेपनः ।कृत्वा हस्ते कपालं तु ब्रह्मणश्च महात्मनः

mahānūrddhvajaṭāmālī kṛttibhasmānulepanaḥ / kṛtvā haste kapālaṃ tu brahmaṇaśca mahātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

पुरा हवा फाणंवे वृत्ते दिव्ये वर्ष सहुस्नके । ख्रष्टुकासः प्रजा ब्रह्मा चिन्तयामास दुःखितः . अशब्दस्पर्शरूपां तापगनन्‍्धां रसवर्जिताम् । श्रृति हा दीरयन्देवो यामविन्दच्चतु्मुखः ३९ ततस्तु ध्यानसयुक्तस्तप आस्थाय भरवस् । चिन्तयामास मनसा ब्रितयं को न्वयं त्विति १०

English

In the central part of that rocky surface, the zone of which is thirty Yojanas, there is a terrible abode of the Fire-god where thousands of flames are thrown out.

अध्याय ३८

श्लोक 29

महाडमरुघोषेण कम्पयन् वै वसुंधराम् ।प्रभातसमये प्राप्तो महादारुवनं प्रति

mahāḍamarughoṣeṇa kampayan vai vasuṃdharām / prabhātasamaye prāpto mahādāruvanaṃ prati

हिन्दी अर्थ

अथोत्तमं स लोकेषु स्वमूर्ति चापि पश्यति । ध्यायन्त स तदा देवमथन पश्यते पुनः...

English

There the Fire-god is always burning without any fuel. He blazes there perpetually.

अध्याय ३८

श्लोक 30

तावत् पुण्यजनः सर्वपुष्पपत्रफलार्थिकः ।निर्गतो बहुभिः सार्द्धं पवमानः समन्ततः

tāvat puṇyajanaḥ sarvapuṣpapatraphalārthikaḥ / nirgato bahubhiḥ sārddhaṃ pavamānaḥ samantataḥ

हिन्दी अर्थ

एकसात्रो महाघोषः श्वेतवर्ण: सुनिमंलः । स ओंकारो भवेद्देदः अ(दो ह् )क्षरं वे सहेश्वरः ततश्रिन्तयमानस्य त्वक्षरं वे स्वयंठव: प्रादुर्भतं तु रक्त तु स देवः प्रथमः स्मृतः (१६ ऋग्वेदं प्रथम तस्य त्वग्निमीले पुरोहितम्। एतां दृष्ट्वा ऋचे ब्रह्मा चिस्तयामास बे पुनः ॥

English

That i Saiiwartaka (the fire that ultimately destroys the world) blazes there eternally. As tutelary deity it receives its share in the sacrifice.

अध्याय ३८

श्लोक 31

तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यं रूपं देवस्य भारत ।युवतीनां मनस् तासां कामेन कलुषीकृतम्

tad dṛṣṭvā mahadāścaryaṃ rūpaṃ devasya bhārata / yuvatīnāṃ manas tāsāṃ kāmena kaluṣīkṛtam

हिन्दी अर्थ

तदक्षरं महातेजा: किमेतदिति लोककृत् ३१७

English

Between the two great mountains there is an auspicious pond of Devas (Deva-vapI 1?). There is a tract (of land) of ten Yojanas known as Matulinga.

अध्याय ३८

श्लोक 32

शोभनं पुरुषं दृष्ट्वा सर्वा अपि वराङ्गनाः ।क्लेदभावं ततो जग्मुर्मुदा दारुवनस्त्रियः

śobhanaṃ puruṣaṃ dṛṣṭvā sarvā api varāṅganāḥ / kledabhāvaṃ tato jagmurmudā dāruvanastriyaḥ

हिन्दी अर्थ

पहले जब दिव्य हजार वर्ष पयन्त जगत् एकाणंवाकार था, तब भ्रजा की सृष्टि करने की अभिलाषा से ब्रह्मा दुखी होकर चिन्ता करने लगे। उनके चिन्ता करते ही एक कुमार उत्पन्न हुआ। बह दिव्यगन्धी और सुधापेक्षी था, जो दिव्य श्रूति का उच्चारण कर रहा था ।५-5। चतुर्मख ब्रह्मा ने तब अद्ाब्द स्पशेरूपा, अगन्धा और रसवर्जिता श्रुति का उच्चारण करके उसे प्राप्त किया। फिर वे ध्यान लगाकर भयद्भुंर तप करने लगे और चिन्ता करने लगे कि यह कुमार कौन है और इसके द्वारा उच्चारित यह त्रिमूर्ति क्या है १ उनके चिन्तन करते हो दाब्द स्पर्ण रूप रस गन्ध रहित अक्षर प्रादुर्भत हुआ इनके बाद ब्रह्मा ने लोक में अक्षर और अपनी मूर्ति का दर्शन किया ।९-११३० ध्यान करते हुये ब्रह्मा ने फिर देखा कि देवस्वरूप अक्षर इवेत, कृष्ण, रक्त और पीत है और वह न स्त्री हैं न नपुंसक ।१०२-१ उन रम्पूर्ण अक्षरों को अच्छी तरह

English

That great region is wholly splendid with ripe fruits of golden lustre and juice sweet as honey.

अध्याय ३८

श्लोक 33

विकारा बहवस्तासां देवं दृष्ट्वा महाद्भुतम् ।संजाता विप्रपत्नीनां तदा तासु नरोत्तम

vikārā bahavastāsāṃ devaṃ dṛṣṭvā mahādbhutam / saṃjātā viprapatnīnāṃ tadā tāsu narottama

हिन्दी अर्थ

जान कर ब्रह्मा चिन्त! कर रहे थे कि उनके कण्ठ से एकमात्र, महाघोष, सुनिर्मल, श्वेतबर्ण अक्षर प्रकट हुआ । वही अक्षर ओंकार, वेद या साक्षात् महेब्वर था।१५॥ भगवान् स्वयम्भू फिर अक्षर-विषयक्र चिन्ता करने लगे, तो एक रक्त अक्षर उत्पन्न हुआ। यही शक्त अक्षर आदि देबता और ऋग्वेद का आदि मन्त्र-- “अग्निमीले पुरोहितम” कहलाता है । इस ऋचा को देखकर ब्रह्मा फिर चिन्ता करने लगे कि यह क्या हैं !

English

The holy hermitage of Bfhaspati is there. It is resorted to by saints. It gives pleasure and fulfils desires.

अध्याय ३८

श्लोक 34

परिधानं न जानन्ति काश्चिद् दृष्ट्वा वराङ्गनाः ।उत्तरीयं तथा चान्या महामोहसमन्विताः

paridhānaṃ na jānanti kāścid dṛṣṭvā varāṅganāḥ / uttarīyaṃ tathā cānyā mahāmohasamanvitāḥ

हिन्दी अर्थ

१६०... वायुपुराणम् तस्य चिन्तयमानस्थ ओंकारः संब भव हु । ततस्तदक्षरं ब्रह्मा ओंकारं समचिन्तयत्

English

Verses 45-48: This vniw u *'

अध्याय ३८

श्लोक 35

केशभारपरिभ्रष्टा काचिदेवासनोत्थिता ।दातुकामा तदा भैक्ष्यं चेष्टितुं नैव चाशकत्

keśabhāraparibhraṣṭā kācidevāsanotthitā / dātukāmā tadā bhaikṣyaṃ ceṣṭituṃ naiva cāśakat

हिन्दी अर्थ

त्रिवर्ण यत्त्रिषवणम्ोकारं ब्रह्मसंज्ञितम् २४ ततश्चेब त्रिसंयोगात्त्रिवर्ण तु तदक्षरम् । ( ८ लक्ष्यालक्ष्यप्रदृश्यं च सहित॑ त्रिदियं त्रिकम्

English

The great resplendent temple of Visnu, the leader of the Devas, is there. It is well-known in three worlds and res- pected by all.

अध्याय ३८

श्लोक 36

काचिद् दृष्ट्वा महादेवं रूपयौवनगर्विता ।उत्सङ्गे संस्थितं बालं विस्मृता पायितुम् स्तनम्

kācid dṛṣṭvā mahādevaṃ rūpayauvanagarvitā / utsaṅge saṃsthitaṃ bālaṃ vismṛtā pāyitum stanam

हिन्दी अर्थ

त्रिमात्रं त्रिपदं चेव त्रियोगं चेव शाश्वतम् ।) तस्मात्तदक्षरं ब्रह्मा चिन्तयामास वे प्रभुः तस्मात्तदक्षरं सो5थ ब्रह्म रूप स्वयं भुव: । चतुर्दशमुखं देव पश्यते दीप्ततेजसम् ॥

English

In the middle of the excellent mountains Krsna and Pandura, there is a single tract of smooth rocky land nine tyYoja- nas in length and thirty Yojanas in width. 1 It is devoid of trees and creepers. There walking is easy and pleasurable because the surface is nowhere uneven.

अध्याय ३८

श्लोक 37

कामबाणहता चान्या बाहुभ्यां पीड्य सुस्तनौ ।निःश्वसन्ती तदा चोष्णं न किंचित् प्रतिजल्पति

kāmabāṇahatā cānyā bāhubhyāṃ pīḍya sustanau / niḥśvasantī tadā coṣṇaṃ na kiṃcit pratijalpati

हिन्दी अर्थ

तमोंकारं स कृत्वा55दौ विज्ञेयः स स्वयंभुवः

English

In the middle there is a charminggrovcof land-lotuses. It is decorated with full-blown lotuses of thousand petals of the size of huge umbrellas.

अध्याय ३८

श्लोक 38

एवं संक्षोभ्य तं सर्वं स्त्रीजनं परमेश्वरः ।जगाम तत्र वै तासां क्षोभं कृत्वा महाद्भुतम्

evaṃ saṃkṣobhya taṃ sarvaṃ strījanaṃ parameśvaraḥ / jagāma tatra vai tāsāṃ kṣobhaṃ kṛtvā mahādbhutam

हिन्दी अर्थ

लोकनिर्माता तेजस्वी ब्रह्मा इस प्रकार चिन्ता कर रहे थे कि, प्रभुत्व-सम्पन्न द्विमात्र अक्षररूप महेश्वर भाविर्भूत हुये ।(६-१८। फिर वे द्विमात्र अक्षर विषयक चिन्ता करते लगे कि, ऋकछ॑दयुक्त रक्ताक्षर यजु: प्रकट हुआ । जिसके आदि में “'इषे त्वोज'” इत्यादि मन्त्र है। ऋग्वेद एक मात्र हैं और यजुः द्विमात्र फिर उस अक्षर और वेद को देखकर स्वामी ब्रह्मा द्िमात्राक्षर की चिन्ता करने लगे ॥१६-२१। ब्रह्मा चिन्ता कर रहे थे कि ओंकार समुदभूत हुआ । तब ब्रह्मा उस अविनाशी अक्षर ओंकार की चिन्ता करने लगे । तब उन्होंने एक पीतऋचा को देखा--''अग्न आयाहि वीतये ।” तब महातेजस्वी ब्रह्मा वेद को उपस्थित देखकर ब्रह्मासंजित, त्रिवर्णात्मक ऑंकार का त्रिस्ंध्य ध्यान करने लगे। यह ओंक्ार रूप अक्षर तीन बर्णों के संयोग में होते के कारण त्रिवर्ण, लक्ष्यालक्ष्य-प्रदृश्य, संहित, त्रिदिव स्वरूप, त्रिक, त्रिमात्र, त्रिपद, त्रियोग और

English

That extensive grove of land-lotuses is frequented by Yaksas, Gandharvas, and resorted to by Siddhas and Caranas. Hovering round these flowers, the inebriated honey bees hum and buzz. Kinnaras with voices of sweet and choked throats sing the glory of the flowers. There are white lotuses of charm¬ ing appearance, fragrant hundred-petalled lilies and full blown flowers with blue petals.

अध्याय ३८

श्लोक 39

तावत् ते ब्राह्मणाः सर्वे भ्रमित्वा काननं महत् ।आगताः स्वगृहे दारान् ददृशुश् च हतौजसः

tāvat te brāhmaṇāḥ sarve bhramitvā kānanaṃ mahat / āgatāḥ svagṛhe dārān dadṛśuś ca hataujasaḥ

हिन्दी अर्थ

शाव्वत है। इसलिये प्रभु ब्रह्मा उसी अक्षर की चिन्ता करने लगे ।२२-२६। भगवान् स्वयम्भू ने उस प्रदींप्त तेजस्क, आत्मरूप ओकाराक्षर को चोदह मुँहबाला देखा। प्रारम्भ में उन्होंने ओंकार को बनाया इसी से वे स्ववम्भू कहलाये ।२७। फिर चलुर्मुख ब्रह्मा के मुखों से नाना वर्णात्मक॒ चौदह स्वर और आशद्य दिव्य अक्षर

English

In the midst of that lotus-grove, there is aNyagrodha tree extending over an area of five Yojanas. It has stout trunk and various steps of ascent (several branches). There, the glorious moon-lustred lord Visnu is worshipped by Yaksas, Gandharvas and Vidyadharas. The lord has a thousand faces. He is the destroyer of the enemies of Devas. He wears blue clothes. His face resembles the full moon. He wears the garland of lotuses. He is blessed and ever victorious.

अध्याय ३८

श्लोक 40

यासां पूर्वतरा भक्तिः पातिव्रत्ये पतीन्प्रति ।चलितास्ता विदित्वाशु निर्जग्मुर्द्विजसत्तमाः

yāsāṃ pūrvatarā bhaktiḥ pātivratye patīnprati / calitāstā viditvāśu nirjagmurdvijasattamāḥ

हिन्दी अर्थ

पुनरिति पद नात्ति ख. ग. घ. ड. पुस्तकेष । +इंदमर्ध नास्ति ख. पुस्तके । » धनुश्चिह्नास्त्मतग्रन्थो घ. पुस्तके नास्ति । । ्््ि तस्मात्त्रिषष्टिवर्णा वे अकारप्रभवाः स्घृता: ॥

English

In that abode the immortal Visnu himself is worshipp¬ ed by Siddhas and Caranas with different lotuses as presents.

अध्याय ३८

श्लोक 41

संविदं परमां कृत्वा ज्ञात्वा देवं महेश्वरम् ।क्षोभयित्वा मनस्तासां ततश्चादर्शनं गतम्

saṃvidaṃ paramāṃ kṛtvā jñātvā devaṃ maheśvaram / kṣobhayitvā manastāsāṃ tataścādarśanaṃ gatam

हिन्दी अर्थ

चतुर्दशमुखो यश्व अकारो ब्रह्मसंज्ञित:। ब्रह्मकल्प: समाख्यातः सर्वेवर्ण: प्रजापति: ३१ मुखात्त प्रथमात्तस्य सनुः स्वायं मुवः स्मृतः । अकारस्तुस विज्ेयः स्वेतवर्ण: स्वयं मुबः

English

That place is known in all the world as the home of Ananta ( Ananta-Sadas ). It is brightened with garlands of lotuses and other flowers suspended there-in.

अध्याय ३८

श्लोक 42

क्रोधाविष्टो द्विजः कश्चिद् दण्डमुद्यम्य धावति ।कल्माषयष्टिमन्ये च तथान्ये दर्भमुष्टिकाम्

krodhāviṣṭo dvijaḥ kaścid daṇḍamudyamya dhāvati / kalmāṣayaṣṭimanye ca tathānye darbhamuṣṭikām

हिन्दी अर्थ

द्वितीयात्त मुखात्तस्य (आकारो व॑ मुखः स्मृतः। नाम्ना स्वारोचिषो नाम वर्ण: पाण्डुर उच्यते ॥३ २ तृतीयात्तु मुखात्तस्प) इकारो यजुबां वरः यजुर्मयः स चा5दित्यो यजुर्वेदो यतः स्मृतः ३४ ईकार: स मनुज्ञेयो रक्तवर्ण: प्रतापवान् । ततः क्षत्रं प्रवर्तेत तस्माद्रक्तस्तु क्षत्रियः चतुर्थात्तु मुखात्तस्य उकार: स्वर उच्यते । वर्णतस्तु स्मृतस्ताम्र: स मनुस्तामसः स्मृतः, ७३६ पत्नमात्तु सुखात्तस्य ऊकारो नाम जायते। पीतको वर्णतश्चेव सनुश्रापि चरिष्णव: १३७

English

In the central part of Sahasra-sikhara and Kumuda 2

अध्याय ३८

श्लोक 43

इतश्चेतश्च ते सर्वे भ्रमित्वा काननं नृप ।एकीभूत्वा महात्मानो व्याजह्रुश्च रुषा गिरम्

itaścetaśca te sarve bhramitvā kānanaṃ nṛpa / ekībhūtvā mahātmāno vyājahruśca ruṣā giram

हिन्दी अर्थ

सप्तमात्तु मुखात्तस्थ सुतो वेवस्वतो मनु: ॥ ऋकारश्र स्वरस्तत्र वर्णतः कृष्ण उच्यते ३६

English

Verses 49-59 describes the basin of the lower Surkhan. The Ananta-Sadas (the home of Ananta) in v.59 is somewhere near modern Termez (AGP 9°).

अध्याय ३८

श्लोक 44

यद् इदं च हुतं किंचिद् गुरवस् तोषिता यदि ।तेन सत्येन देवस्य लिङ्गं पततु चोत्तमम्

yad idaṃ ca hutaṃ kiṃcid guravas toṣitā yadi / tena satyena devasya liṅgaṃ patatu cottamam

हिन्दी अर्थ

अष्टमात्तु मुखात्तस्य ऋकारः श्यामवर्णतः । श्यामाक्षरसवर्णश्र॒ ततः सावर्णिरुच्यते ११४० प्रकट हुये । ये सब वर्ण अकार से प्रादुर्भूत हुये ओर साधारणयता इन वर्णों की संख्या तिरसठ है

English

This peak is the snowcovered peak Bazzengi (16456 feet) at the meeting place of the Hissar and Zarafshan ranges (Kumuda and bahasra- Sikhara)—AGP 96.

अध्याय ३८

श्लोक 45

आश्रमाद् आश्रमं सर्वे न त्यजामो विधिक्रमात् ।तेन सत्येन देवस्य लिङ्गं पततु भूतले

āśramād āśramaṃ sarve na tyajāmo vidhikramāt / tena satyena devasya liṅgaṃ patatu bhūtale

हिन्दी अर्थ

स्वयम्भू ने जिन साधारण वर्णों को देखा, उनके आदि में वे आकार रूप से स्थित हुये ओर वही प्रथम स्वर हुआ । फिर उन चौदहों स्वरों में मन्वन्तराधिपति दिव्य प्रधान चौदह मनु उत्पन्न हुये ।१६९-३०। अकार हो चतुर्दश मुखवाला ब्रह्म, ब्रह्मकल्प, सवंवर्ण और प्रजापति के रूप में ख्यात है। उनके मुख से पहले स्वायम्भुव मनु उत्पन्न हुये । ये स्वयम्भू के अकार स्वरूप हैं । इसी प्रकार द्वितीय मुख से आकार हूप स्वारोचिष मनु

English

The highly meritorious and well-known hermitage of Sukra of holy rites is there. It is resplendent and resorted to by multitudes of sages and gods.

अध्याय ३८

श्लोक 46

एवं सत्यप्रभावेन त्रिरुक्तेन द्विजन्मनाम् ।शिवस्य पश्यतो लिङ्गं पतितं धरणीतले

evaṃ satyaprabhāvena triruktena dvijanmanām / śivasya paśyato liṅgaṃ patitaṃ dharaṇītale

हिन्दी अर्थ

उत्पन्न हुये । ये पाण्डुर वर्ण हैं ।३१-३३॥ फिर तीसरे मुख से इकार उत्पन्न हुआ। यह यजु:श्रष्ठ, यजुमय, आदित्य स्वरूप और यही यजुर्वेद कहलाता है। ईकार भ्रतापवान् साक्षात् मनु स्वरूप है। यह रक्त वर्ण है । इसी से रक्त वर्ण क्षत्रकुल प्रवरतित हुआ है ।३४-३४५। फिर चौथे मुख से जो स्वर उत्पन्न हुआ वह उकार कहलाता है। यह ताम्र वर्ण का है और मनु तामस कहलाता है ।३६। पञ्चम मुह से ऊकार उत्पन्न हुआ । यह पीत वर्ण का है और मनु चरिष्णु कहलाते हैं । छठे मुख से कपिल वर्ण ओोंकार उद्धू त हुआ । यह महातपा वरिष्ठ विजय मनु कहलाता है ।३७-३८। सप्तम मुख से कृष्ण वर्ण ऋक स्वरूप वेवस्वत मनु उत्पन्न हुये ।३९। आठवें मुँह से श्याम वर्ण ऋकारात्मक सावरणि मनु उत्पन्न हुये । ये श्यामाक्षर तुल्य हैं

English

Between mountains Sankukuta and Vrsabha, there is a beautiful region of Parusaka (Grewia Asialica?) which extends to many Yojanas.

अध्याय ३८

श्लोक 47

हाहाकारो महानासील्लोकालोके ऽपि भारत ।देवस्य पतिते लिङ्गे जगतश्च महाक्षये

hāhākāro mahānāsīllokāloke 'pi bhārata / devasya patite liṅge jagataśca mahākṣaye

हिन्दी अर्थ

+धनुश्चिह्वान्तगंतग्रन्थो घ. पुस्तके नास्ति।

English

The ground is moistened with the fruits ofParusas fallen from their stalks. They arc as big as Bilvas. They are auspicious, sweet and fragrant.

अध्याय ३८

श्लोक 48

पतमानस्य लिङ्गस्य शब्दो ऽभूच्च सुदारुणः ।उल्कापाता दिशां हाहा भूमिकम्पाश्च दारुणाः

patamānasya liṅgasya śabdo 'bhūcca sudāruṇaḥ / ulkāpātā diśāṃ hāhā bhūmikampāśca dāruṇāḥ

हिन्दी अर्थ

मुखात्तु नवमात्तस्य लुकार: नवमः स्मृतः । धूज्नो वे वर्णतश्वापि धृश्नश्न मनुरुच्यते (३४ १ दशमात्तु मुखात्तस्य लुकारः प्र तुरुच्यते । समश्चव सबर्ण श्र बभो सावणिको मनुः ॥ै४२ सुखादेकादशात्तस्य एकारो मनुरुच्यते । पिशड्भो वर्णतश्चंब पिशज्भो वर्ण उच्यते (४३ ढादशात्तु सुखात्तस्य ऐकारो नाम उच्यते । पिशज्भो भस्मवर्णाभः पिशड्भो सनुरुच्यते... ४४ त्रथोदशान्परुखात्तस्य ओकारो वर्ण उच्चते । ( + पत्चवर्णंसमायुक्त ओकारो वर्ण उत्तम: ४४५ चतुर्द शान्मुखात्तस्य औकारो वर्ण उच्यते । कर्बूरो वर्णतश्चेव मनुः सावणिरुच्यते ) ४६

English

Kinnaras, serpents and Saints live in that region. They are elated by the juice of Parusaka. The Caranas thereof are highly honoured.

अध्याय ३८

श्लोक 49

पतन्ति पर्वताग्राणि शोषं यान्ति च सागराः ।देवस्य पतिते लिङ्गे देवा विमनसो ऽभवन्

patanti parvatāgrāṇi śoṣaṃ yānti ca sāgarāḥ / devasya patite liṅge devā vimanaso 'bhavan

हिन्दी अर्थ

परस्परतवर्णाश्व स्व॒रा यस्मादवुता हि वे। तस्मात्तेषां सवर्णत्वादन्वयस्तु प्रकीतित: ४८

English

In the middle of Kapinjala and Naga moun¬ tains, there is a beautiful region two hundred Yojanas long and a hundred Yojanas wide. It is decorated with various forests and endowed with various flowers and fruits. It is resorted to by Kinnaras andUragas (serpents).

अध्याय ३८

श्लोक 50

समेत्य सहिताः सर्वे ब्रह्माणं परमेष्ठिनम् ।कृताञ्जलिपुटाः सर्वे स्तुवन्ति विविधैः स्तवैः

sametya sahitāḥ sarve brahmāṇaṃ parameṣṭhinam / kṛtāñjalipuṭāḥ sarve stuvanti vividhaiḥ stavaiḥ

हिन्दी अर्थ

सवर्णा: सदृशाश्चंव यस्माज्जातास्तु कल्पजाः । तस्मात्प्रजानां लोकेउस्मिन्सवर्णा: सर्वसंघयः. इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्‍्ते स्वरोत्यत्ति्नाम षड्विशोष्ध्याय:ः

English

he lakes, chasms, forests and regions are of various sizes—ten, twelve/seven, eight, twenty or thirty Yojanas.

अध्याय ३८

श्लोक 51

ततस् तुष्टो जगन्नाथश् चतुर्वदनपङ्कजः ।आर्तान्प्राह सुरान्सर्वान्मा विषादं गमिष्यथ

tatas tuṣṭo jagannāthaś caturvadanapaṅkajaḥ / ārtānprāha surānsarvānmā viṣādaṃ gamiṣyatha

हिन्दी अर्थ

"2६4 490: ५४ हा पाती था. 3-४ पहनना» गा 'मयाहनन नम. पम्प मनाह नमन शप्मा नम मान तह मम पा न भा भगत नहह न ाल्‍ग ५५" +क्‍यनषा वन" तर भवन भा या कृत नाफ मनन वयमना न्‍न्‍ राशन पह का पका ५ ५ आम २३४४५ ४० नमन. वनान्‍मााला "४ क० ५५ "ना "पापा" आ्नक॒नन-"“ज-न्‍न-“नन»त»«भ

English

Some of them are dark and terrible. The caves of the mountains are never touched by the rays of the sun. They are always cold and inaccessible.

अध्याय ३८

श्लोक 52

ब्रह्मशापाभिभूतो ऽसौ देवदेवस्त्रिलोचनः ।तुष्टैस्तैस्तपसा युक्तैः पुनर्मोक्षं गमिष्यति

brahmaśāpābhibhūto 'sau devadevastrilocanaḥ / tuṣṭaistaistapasā yuktaiḥ punarmokṣaṃ gamiṣyati

हिन्दी अर्थ

।४०। नवम मुख से नोवाँ लकार उत्पन्न हुआ। यह धूम्र वर्ण है और मनु भी धम्र कहलाता है दसवें मुंह से लकार उत्पन्न हुआ यह भी लुकार के तुल्य धूम्र वर्ण है और सावर्णिक मनु कहलाता है

English

O Excellent Brahmanas, there are lakes with hot water within the mountains, hundreds and thousands in number.

अध्याय ३८

श्लोक 53

एतच्छ्रुत्वा ययुर्देवा यथागतमरिन्दम ।भावयित्वा ततः सर्वे मुनयश्चैव भारत

etacchrutvā yayurdevā yathāgatamarindama / bhāvayitvā tataḥ sarve munayaścaiva bhārata

हिन्दी अर्थ

एकादशर्ब मुख से पिशद्भ वर्ण एकार उत्पन्न हुआ और वर्णानुरूप पिशज्ञी मनु हुआ ।४३। बारहवें मुख से पिशज्भ वर्ण और भस्मतुल्य ऐकार उत्पन्न हुआ एवं पिशंगी मनु कहलाया ।४४। तेरह॒वें मुख से पञ्च वर्ण से युक्त उत्तम वण ओंकार की उत्पत्ति हुई और मनु उत्तम हुये ।४४। चौदह॒वें मुख से कर्ब्र वर्ण ओंकार उत्पन्न हुआ और मनु सावर्ण ।४६। कल्प-कल्प में इसी भाँति मनु और स्वर वर्ण का ऐसा ही रूप रहता है

English

O Excellent Brahmanas, there are lakes with hot water within the mountains, hundreds and thousands in number.

अध्याय ३८

श्लोक 54

विश्वामित्रवसिष्ठाद्या जाबालिरथ कश्यपः ।समेत्य सहिताः सर्वे तमूचुस् त्रिपुरान्तकम्

viśvāmitravasiṣṭhādyā jābāliratha kaśyapaḥ / sametya sahitāḥ sarve tamūcus tripurāntakam

हिन्दी अर्थ

जो स्वर और वर्ण के अनुसार यथातत्त्व जानने योग्य हैं ।४७। चूँकि से स्वर परस्पर समात वर्ण के अनुसार हैं इसलिये वर्ण की समानता के कारण उनका परस्पर अन्वय होता है और प्रत्येक कल्पों में इनका समान आकार और वर्ण होता है इसलिये इस प्रजालोक में सब सन्धियाँ सबर्ण होती हैं, भविष्य में भी स्वभाव ओर अर्थ के अनुसार ये एक प्रकृति के होंगे इसलिये उच्चारण की शीघत्रता के कारण इन स्वरों में संधियाँ +धनुशिचन्वान्तगंतग्रन्थ: ख. ग. घ. पुस्तकेषु नास्ति ।

English

O Excellent Brahmanas, there are lakes with hot water within the mountains, hundreds and thousands in number.

अध्याय ३८

श्लोक 55

ब्रह्मतेजो हि बलवद्द्विजानां हि सुरेश्वर ।क्षान्तियुक्तस्तपस्तप्त्वा भविष्यसि गतक्लमः

brahmatejo hi balavaddvijānāṃ hi sureśvara / kṣāntiyuktastapastaptvā bhaviṣyasi gataklamaḥ

हिन्दी अर्थ

अस्मिन्कल्पे त्वया चोक्तः प्रादुर्भावो महात्मनः । महादेवस्थ रुद्रस्य साधकंमुनिभिः सह

English

O Excellent Brahmanas, there are lakes with hot water within the mountains, hundreds and thousands in number.

अध्याय ३८

श्लोक 56

यतः क्षोभादृषीणां च तदेवं लिङ्गमुत्तमम् ।पतितं ते महादेव न तत्पूज्यं भविष्यति

yataḥ kṣobhādṛṣīṇāṃ ca tadevaṃ liṅgamuttamam / patitaṃ te mahādeva na tatpūjyaṃ bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

पत्नीषु जनयामास महादेव: सुतान्ब॒हुन् । कल्पेउष्टमे व्यतीते तु यस्मिन्कल्पे तु तच्छृणु कल्पादो चा55त्मनस्तुल्यं सुत॑ प्रध्यायतः प्रभो: । प्रादुरासीत्ततोषडकेडस्य कुमारो नीललोहितः॥ -

English

O Excellent Brahmanas, there are lakes with hot water within the mountains, hundreds and thousands in number.

अध्याय ३८

श्लोक 57

न तच्छ्रेयो ऽग्निहोत्रेण नाग्निष्टोमेन लभ्यते ।प्राप्नुवन्ति च यच्छ्रेयो मानवा लिङ्गपूजने

na tacchreyo 'gnihotreṇa nāgniṣṭomena labhyate / prāpnuvanti ca yacchreyo mānavā liṅgapūjane

हिन्दी अर्थ

दुष्ट्वा रुक्‍न्‍तं सहसा कुमारं नीललोहितम् । कि रोदिषि कुमारेति ब्रह्मा त॑ं प्रत्यभाषत सो5ब्रवीदेहि मे नाम प्रथम वे पितामह । रुद्रस्त्वं देव नाम्नासि इत्युक्तः सोरुदत्पुन

English

O Excellent Brahmanas, there are lakes with hot water within the mountains, hundreds and thousands in number.

अध्याय ३८

श्लोक 58

देवदानवयक्षाणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।वचनेन तु विप्राणाम् एतत् पूज्यं भविष्यति

devadānavayakṣāṇāṃ gandharvoragarakṣasām / vacanena tu viprāṇām etat pūjyaṃ bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

ऋषि गण बोले--हे सूत ! इस कल्प में आपने साधक मुनियों के साथ महात्मा महादेव रुद्र का प्रादर्भाव बताया है

English

O Excellent Brahmanas, there are lakes with hot water within the mountains, hundreds and thousands in number.

अध्याय ३८

श्लोक 59

ब्रह्मविष्ण्विन्द्रचन्द्राणाम् एतत् पूज्यं भविष्यति ।यत्फलं तव लिङ्गस्य इह लोके परत्र च

brahmaviṣṇvindracandrāṇām etat pūjyaṃ bhaviṣyati / yatphalaṃ tava liṅgasya iha loke paratra ca

हिन्दी अर्थ

सूत जी बोले -मैंने संक्षेप में आदि सर्ग की उत्पत्ति बताई। अब विस्तार के साथ महादेव के नामों . को उनके विभिन्न शरीरों के साथ कह रहा हूँ ।२। अष्टम कल्प के बीत जाने पर जिस कल्प में महादेव ने अपनी पत्नियों में अनेक पुत्रों को उत्पन्न किया, उसको अब सुनिये।३। कल्प के आदि में प्रभु ब्रह्मा आत्मतुल्य पुत्र का ध्यान कर रहे थे कि उनकी गोद में एक नीललोहित कुमार प्रकट हो गया। उन्होंने ह

English

O Excellent Brahmanas, there are lakes with hot water within the mountains, hundreds and thousands in number.

अध्याय ३८

श्लोक 60

एवमुक्तो जगन्नाथः प्रणिपत्य द्विजोत्तमान् ।मुदा परमया युक्तः कृताञ्जलिर् अभाषत

evamukto jagannāthaḥ praṇipatya dvijottamān / mudā paramayā yuktaḥ kṛtāñjalir abhāṣata

हिन्दी अर्थ

उस कुमार को तेज द्वारा दग्ध करके घोर और सुस्वर बना दिया ।४॥ उस नोललोहित कुमार को सहसा रोते देखकर ब्रह्मा ने पूुछा--क्यों रोते हो ? ॥१५। कुमार ने कहा--हे पितामह, आप पंहले हमारा नामकरण महादेव के शरीर का वर्णन

English

O Excellent Brahmanas, there are lakes with hot water within the mountains, hundreds and thousands in number.

अध्याय ३८

श्लोक 61

ब्राह्मणा जङ्गमं तीर्थं निर्जलं सार्वकामिकम् ।येषां वाक्योदकेनैव शुध्यन्ति मलिनो जनाः

brāhmaṇā jaṅgamaṃ tīrthaṃ nirjalaṃ sārvakāmikam / yeṣāṃ vākyodakenaiva śudhyanti malino janāḥ

हिन्दी अर्थ

कि रोदिषीति त॑ ब्रह्म रुबन्तं पुनरग्रवीत् । नाम देहि द्वितीय से इत्युवाच स्वयंभुवम्

English

O Excellent Brahmanas, there are lakes with hot water within the mountains, hundreds and thousands in number.

अध्याय ३८

श्लोक 62

न तत्क्षेत्रं न तत्तीर्थमूषरं पुष्कराणि च ।ब्राह्मणे मन्युमुत्पाद्य यत्र गत्वा स शुध्यति

na tatkṣetraṃ na tattīrthamūṣaraṃ puṣkarāṇi ca / brāhmaṇe manyumutpādya yatra gatvā sa śudhyati

हिन्दी अर्थ

भवस्त्वं देव नाम्नाइसि इत्युक्तः सो5रुदत्पुनः । कि रोदिषीति त॑ ब्रह्म प्रत्युवाचाथ शंकरम्ू ॥ तृतोय॑ देहि मे नाम इत्युक्तः प्रत्युवाच तम् । शिवस्त्वं देव नाम्नाइसि इत्युक्तः सो5रुदत्पुनः ३६ कि रोदिषोति त॑ ब्रह्मा रुदन्तं पुनरत्रबीत् । चतुर्थ देहि मे नाम इत्युवाच स्वयंभुवस् १० पशुनां त्यं पतिदव इत्युक्तः सो5रदत्पुन: कि रोदिषीतितं ब्रह्मा रुदनन्‍्तं पुनरब्रवीत् ११ पतअमं देही मे नाम इत्युक्तः प्रत्युवाच तम् । ईशस्त्वं देव नाम्माउसि इत्युक्तः सोडरुदत्पुनन ४१२

English

O Excellent Brahmanas, there are lakes with hot water within the mountains, hundreds and thousands in number.

अध्याय ३८

श्लोक 63

न तच्छास्त्रं यन्न विप्रप्रणीतं न तद् दानं यन्न विप्रप्रदेयम् ।न तत्सौख्यं यन्नविप्रप्रसादान्न तद्दुःखं यन्न विप्रप्रकोपात्

na tacchāstraṃ yanna viprapraṇītaṃ na tad dānaṃ yanna viprapradeyam / na tatsaukhyaṃ yannavipraprasādānna tadduḥkhaṃ yanna vipraprakopāt

हिन्दी अर्थ

कि रोविषोति त॑ ब्रह्मा रुदन्त पुनरब्रवोत् । षष्ठ मे नाम देहीति इत्युवाचाथ त॑ प्रभुम्

English

O Excellent Brahmanas, there are lakes with hot water within the mountains, hundreds and thousands in number.

अध्याय ३८

श्लोक 64

पृथिव्यां यानि तीर्थानि गङ्गाद्याः सरितस् तथा ।एकस्य विप्रवाक्यस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्

pṛthivyāṃ yāni tīrthāni gaṅgādyāḥ saritas tathā / ekasya vipravākyasya kalāṃ nārhanti ṣoḍaśīm

हिन्दी अर्थ

भीमस्थ्वं देव नाम्ताइसि इत्युक्तः सो5रुदत्पुनः कि रोदिषीति त॑ ब्रह्मा रुदन्तं पुनरम्रश्नीत्ु. सध्तमं देहि में नाम हइत्युक्तः प्रत्युवाच तम् । उप्रस्त्वं देव माम्नाउसि इत्युक्तः सो5रुदत्पुनः १४५ कि रोदिषोति त॑ ब्रह्मा रुवन्‍तं पुनरत्रवीत् । अष्टम देहि से नाम त्वं विभो पुनरक्षबोत् ॥

English

O Excellent Brahmanas, there are lakes with hot water within the mountains, hundreds and thousands in number.

अध्याय ३८

श्लोक 65

अभिनन्द्य द्विजान्सर्वाननुज्ञातो महर्षिभिः ।ततो ऽगमत् तदा देवो नर्मदातटमुत्तमम्

abhinandya dvijānsarvānanujñāto maharṣibhiḥ / tato 'gamat tadā devo narmadātaṭamuttamam

हिन्दी अर्थ

महादेवस्तु ताम्नासि इत्युक्तो विरराम ह

English

O Excellent Brahmanas, there are lakes with hot water within the mountains, hundreds and thousands in number.

अध्याय ३८

श्लोक 66

परमं व्रतमास्थाय गुहावासी समार्बुदम् ।तपश्चचार भगवाञ्जपस्नानरतः सदा

paramaṃ vratamāsthāya guhāvāsī samārbudam / tapaścacāra bhagavāñjapasnānarataḥ sadā

हिन्दी अर्थ

लब्ध्वा नामानि चतानि ब्रह्मणो नोललोहित:ः। प्रोवाच नाम्नामेतेषां स्थानानि प्रदशितिह कीजिये । पितामह ने कहा--तुम्हारा नाम रुद्र होगा। वह फिर रोने लगा।६। और पूछे जाने पर दूसरा नाम रखने लिये कहा । यह सुनकर ब्रह्मा ने कहा---/तुम्हा रा दूसरा नाम भव होगा ।” पुनः उसको रोते देखकर ब्रहाय ने उस शंकर से कहा, तुम क्‍यों रो रहे हो ? ।॥3-८। शंकर ने कहा' “'भेरा तीसरा नाम रखिये” यह् सुनकर उन्होंने कहा तुम्हारा तीसरा नाम शिव होगा'। पुनः वह रोने लगा। चौथी बार उसको रोते

English

O Excellent Brahmanas, there are lakes with hot water within the mountains, hundreds and thousands in number.

अध्याय ३८

श्लोक 67

समाप्ते नियमे तात स्थापयित्वा महेश्वरम् ।वन्द्यमानः सुरैः सार्द्धं कैलासमगमत् प्रभुः

samāpte niyame tāta sthāpayitvā maheśvaram / vandyamānaḥ suraiḥ sārddhaṃ kailāsamagamat prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

देखकर ब्रह्मा ने पूछा “अब क्‍यों रो रहे हो ?” "मेरा चौथा नाम रखिये! 'तुम पशुओं ( प्राणियों ) के पति अर्थात् पशुपति नाम से प्रसिद्ध होगे”! यह चौथा नामकरण होने पर भी वह रोने लगा । उसको इस प्रकार रोदन करते देख ब्रह्मा ने पुनः रोने का कारण पूछा ।६-११। तब उसने कहा 'मेरा पाँचवाँ नाम रखिये।' “देव ! तुम्हारा पाँचवाँ नाम ईश होगा” । यह सुनकर वह पुनः रोने लगा। छठें बार उसको रोते देखकर'

English

O Excellent Brahmanas, there are lakes with hot water within the mountains, hundreds and thousands in number.

अध्याय ३८

श्लोक 68

नर्मदायास् तटे तेन स्थापितः परमेश्वरः ।तेनैव कारणेनासौ नर्मदेश्वर उच्यते

narmadāyās taṭe tena sthāpitaḥ parameśvaraḥ / tenaiva kāraṇenāsau narmadeśvara ucyate

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मा ने पुनः पूछा तुम अब क्‍यों रो रहे हो ? 'मेरा छठा माम रखिये' उसने ब्रह्मा से कहा । १२-१३। ब्रह्मा ने कहा-- देव ! तुम्हारा छठा नाम भीम होगा ।/ छठा नाम सुनकर भी वह रोता ही रहा । उसको रोते देखकर पुनः ब्रह्मा ने पूछा अब क्यों रो रहे हो? ।१४। उसने कहा--'मेरा सातवाँ नाम रखिये।' तब ब्रह्मा ने कहा--देव ! तुम्हारा सातवाँ नाम उम्र होगा ।” सातवाँ नाम सुनकर भी वह रोता ही रहा । उसको पुनः रोते देखकर ब्रह्मा ने पूछा--'भब क्‍यों रो रहे हो ?' उसने उत्तर दिया 'मेरा आठवाँ नाम रखिये! । ब्रह्मा ने कहा--दिव तुम्हारा आठवाँ नाम महादेव होंगा!। यह कहकर ब्रह्मा चुप हो गये

English

O Excellent Brahmanas, there are lakes with hot water within the mountains, hundreds and thousands in number.

अध्याय ३८

श्लोक 69

यो ऽर्चयेन्नर्मदेशानं यतिर् वै संजितेन्द्रियः ।स्नात्वा चैव महादेवम् अश्वमेधफलं लभेत्

yo 'rcayennarmadeśānaṃ yatir vai saṃjitendriyaḥ / snātvā caiva mahādevam aśvamedhaphalaṃ labhet

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मा से इस प्रकार आठ नामों को प्राप्त कर मीललोहित ने कहा कि अब आप इम नामों का स्थान

English

O Excellent Brahmanas, there are lakes with hot water within the mountains, hundreds and thousands in number.

अध्याय ३८

श्लोक 70

ददाति यः पितृभ्यस्तु तिलपुष्पकुशोदकम् ।त्रिःसप्तपूर्वजास्तस्य स्वर्गे मोदन्ति पाण्डव

dadāti yaḥ pitṛbhyastu tilapuṣpakuśodakam / triḥsaptapūrvajāstasya svarge modanti pāṇḍava

हिन्दी अर्थ

ततो5भिसृष्टास्तनव एपां नास्‍्नां स्थयंभुवा । सूर्यो मही जल॑ वह्हिवायुराकाशमेव च दीक्षितों आ्राह्मणभ्रन्द्र इत्येते ब्रह्मघातव:ः । तेषु पुज्यश्र वन्य: स्याद्रुद्रस्तान्न हिनस्ति वे

English

O Excellent Brahmanas, there are lakes with hot water within the mountains, hundreds and thousands in number.

अध्याय ३८

श्लोक 71

यस्तु भोजयते विप्रांस् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप ।पायसं घृतमिश्रं तु स लभेत् कोटिजं फलम्

yastu bhojayate viprāṃs tasmiṃstīrthe narādhipa / pāyasaṃ ghṛtamiśraṃ tu sa labhet koṭijaṃ phalam

हिन्दी अर्थ

ततो5ब्रवीत्पुनब्ंह्या तं देव नीललोहितम् । द्वितीयं नामध्धेयं ते मया प्रोक्त भवेति यत् ॥

English

O Excellent Brahmanas, there are lakes with hot water within the mountains, hundreds and thousands in number.

अध्याय ३८

श्लोक 72

सुवर्णं रजतं वापि ब्राह्मणेभ्यो युधिष्ठिर ।ददाति तोयमध्यस्थः सो ऽग्निष्टोमफलं लभेत्

suvarṇaṃ rajataṃ vāpi brāhmaṇebhyo yudhiṣṭhira / dadāti toyamadhyasthaḥ so 'gniṣṭomaphalaṃ labhet

हिन्दी अर्थ

मैथुन नेब सेवेत शिरःस्नानं व वर्जयेत् । न प्रीतः परिचक्षीत वहुन्न संस्थितो5पि वा ३२४ मेध्यामेध्यशरी रत्वान्नैव दुष्यन्त्यप: क्वचित् । विवर्णरसगन्धाश्न अल्पाश्व परिव्जयेत्ू... अपां योनि: समुद्रश्व॒ तस्मात्तं कामयन्ति ता: । मेध्याश्चेबामृताश्चेव भवन्ति प्राप्य सागरमू

English

O Excellent Brahmanas, there are lakes with hot water within the mountains, hundreds and thousands in number.

अध्याय ३८

श्लोक 73

अष्टम्यांवा चतुर्दश्यां निराहारो वसेत् तु यः ।नर्मदेश्वरमासाद्य प्राप्नुयाज्जन्मनः फलम्

aṣṭamyāṃvā caturdaśyāṃ nirāhāro vaset tu yaḥ / narmadeśvaramāsādya prāpnuyājjanmanaḥ phalam

हिन्दी अर्थ

तस्मादपों न रन्धीत समुद्रं कामयन्ति ताः। न हिनस्ति भवो देवः सेव योअ्प्सु बतते ३२७ ततो5ब्रवीत्पुनश्नद्या तं देवं कृष्णलोहितम् । शबंस्त्वमिति यज्नाम तृतीय समुदाहृतम् ॥

English

O Excellent Brahmanas, there are lakes with hot water within the mountains, hundreds and thousands in number.

अध्याय ३८

श्लोक 74

अग्निप्रवेशं यः कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप ।तस्य व्याधिभयं न स्यात् सप्तजन्मसु भारत

agnipraveśaṃ yaḥ kuryāt tasmiṃstīrthe narādhipa / tasya vyādhibhayaṃ na syāt saptajanmasu bhārata

हिन्दी अर्थ

निर्देश कर दें । तब स्वयम्भू ने सूर्य, मही, जल, वल्लि, वायु, आकाश, दीक्षित ब्राह्मण और चन्द्र आदि आठ नाम के लिये भाठ मूर्तियों की सृष्टि की ये मूर्तियाँ ब्रह्मा रूप है। इन मूर्तियों में जो रुद्र की पूजाया वन्दना करते हैं, रुद्रदेवता उनकी हिंसा नहीं करते हैं ।(७-१६। इसके बाद ब्रह्मा ने नीललोहित से कहा-- आपका दूसरा नाम मैंने भव रखा है, इसलिये आपका दूसरा शरीर जल होगा। इतना कहने पर उनके शरीर में स्थित जो रस रूप जल था, उसमें जल प्रवेश कर गयया। तब जल भी भव मूर्ति हो गया २०-२१। जल से सम्पूर्ण भूतसमूह उत्पन्न होता है और वह सबको उत्पन्न करता है, अतः भवन-भावन सम्बन्ध होने के कारण जल जीवों का सम्भव कहलाता है ।२२। इसलिये जल में मल-मूत्र त्याग नहीं करता चाहिए तू थकला चाहिए और ते नग्न होकर स्तान ही करता चाहिए ।२३। जल में मैथुन न करे और न शिरःस्नाव

English

O Excellent Brahmanas, there are lakes with hot water within the mountains, hundreds and thousands in number.

अध्याय ३८

श्लोक 75

अनाशकं तु यः कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप ।अनिवर्तिका गतिस् तस्य रुद्रलोके भविष्यति

anāśakaṃ tu yaḥ kuryāt tasmiṃstīrthe narādhipa / anivartikā gatis tasya rudraloke bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

(उलटा स्नान) करे। स्थिर या बहते हुये जल के प्रति कोई अभप्रीतिजनक बात भी नहीं कहनी चाहिए । पवित्र या अपवित्र ्वरीर के स्पर्श से जल कभी भी दूषित नहीं होता है; किन्तु मटमैला, विरस, दुर्गन्धित और थोड़े जल को उपयोग में नहीं लाना चाहिए ।२४-२५। समुद्र जल का उत्पत्ति-स्थान है। इसलिये जलराशि समुद्र की कामना करती है। जल समुद्र को प्राप्त कर पविन्न और अमृतमय हो जाता है। बहते हुये जल को रोकना

English

O Excellent Brahmanas, there are lakes with hot water within the mountains, hundreds and thousands in number.

अध्याय ३८

श्लोक 76

एष ते विधिर् उद्दिष्टस् तस्योत्पत्तिर् नरोत्तम ।पुराणे विहिता तात संज्ञा तस्य तु विस्तरात्

eṣa te vidhir uddiṣṭas tasyotpattir narottama / purāṇe vihitā tāta saṃjñā tasya tu vistarāt

हिन्दी अर्थ

नहीं चाहिए; क्‍योंकि वह समुद्र में जाना चाहता है। इस प्रकार जलतत्त्व को जानकर जो जल में रहता है, उसकी हिंसा भव देवता नहीं करते हैं ।२६-२७। इसके बाद ब्रह्मा ने फिर नीललोहित से कहा--आपका . तस्मात्कुर्वीत नो विद्वान्पुरीषं मृत्रमेव वा । न चछायायीं न सोपाने स्वच्छायां नापि सेहयेतू.

English

O Excellent Brahmanas, there are lakes with hot water within the mountains, hundreds and thousands in number.

अध्याय ३८

श्लोक 77

एतं कीर्तयते यस्तु नर्मदेश्वरसम्भवम् ।भक्त्या शृणोति च नरः सो ऽपि स्नानफलं लभेत्

etaṃ kīrtayate yastu narmadeśvarasambhavam / bhaktyā śṛṇoti ca naraḥ so 'pi snānaphalaṃ labhet

हिन्दी अर्थ

ततो5ब्रवीत्पुनब्ह्मा तं देव नीललोहितम् । ईशान इति यत्प्रोक्‍्तं चतुर्थ नाम ते सया.

English

O Excellent Brahmanas, there are lakes with hot water within the mountains, hundreds and thousands in number.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 38
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
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