Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
43
अध्याय 43 / 232

Adhyaya 43

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अध्याय ४३

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे नर्मदामाहात्म्ये पिप्पलादतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम द्विचत्वारिंशो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय ४३ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र विमलेश्वरम् उत्तमम् ।तत्र देवशिला रम्या स्वयं देवैर् विनिर्मिता

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe narmadāmāhātmye pippalādatīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma dvicatvāriṃśo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 43 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchettu rājendra vimaleśvaram uttamam / tatra devaśilā ramyā svayaṃ devair vinirmitā

हिन्दी अर्थ

महाबलं महातेज॑ महापुरुषमीश्चरम् । विश्वह॒त् महाकाय॑ महान्यग्रोधमण्डलम् ॥

English

Near Gandhamadana there is a large and bulky boulder above, thirty-four thousand Yojanas long, and thirty- two thousand Yojanas wide, east to west. The residents of this area perform auspicious rites. They are well-known as Ketu- malas. The men are black in complexion. They are vigorous and powerful. The women have the lustrous complexion of the petals of a lotus. All of them have pleasing appearances.

अध्याय ४३

श्लोक 2

तत्र स्नात्वा तु यो भक्त्या ब्राह्मणान्पूजयेन् नृप ।स्वल्पेनापि हि दानेन तस्य चान्तो न विद्यते

tatra snātvā tu yo bhaktyā brāhmaṇānpūjayen nṛpa / svalpenāpi hi dānena tasya cānto na vidyate

हिन्दी अर्थ

युगान्तसूर्याग्निसह्रभासं सह्नचद्धामलकान्तिकान्तम् ॥ युगार्काभ सहावीय चारुनासं महाननम् । प्रचण्डगण्ड दीप्ताक्षमग्निज्वालाविलाननम् १३१ मृमेन्द्रकृत्तिदसन महाभुजगवेष्टित म् । उष्णीषिणं चन्द्रधरं क्यक्तिदुग्न क्यचित्समम्

English

There is a great divine Panasa (Jack-fruit) tree there. It has six tastes. It is the son of Brahma, capable of moving about according to its pleasure. It has the speed of mind. It is veritable svara himself. Imbibing its juice, the people there live for ten thousand years.

अध्याय ४३

श्लोक 3

युधिष्ठिर उवाच: कानि दानानि विप्रेन्द्र शस्तानि धरणीतले ।यानि दत्त्वा नरो भक्त्या मुच्यते सर्वपातकैः

yudhiṣṭhira uvāca: kāni dānāni viprendra śastāni dharaṇītale / yāni dattvā naro bhaktyā mucyate sarvapātakaiḥ

हिन्दी अर्थ

।१३१-१२३। शंख, चक्र, गदा ओर पालिश किये हुये धनुष को भी धारण किये हुये था । उसऊे हाथ में फरसा ओर खज़ू भी था। उसका रौद्र रूप देखने में भयावह जान पड़ता था; किल्तु उसका घोर रूप देदीप्यमान हो रहा था। वह अ्द्ध चन्द्र से भूषित था, रक्तमय बाघंबर पहने हुये था, उसके बड़े विकराल दाँत थे, ऊसका पेट और मुँह दोनों ही विशाल थे लम्बे ओठों के बीच उसकी जीभ बिजली की तरह लपलपा रही

English

Tiie men are fajr-complexioned, vigorous and powerful.

अध्याय ४३

श्लोक 4

श्रीमार्कण्डेय उवाच: सुवर्णं रजतं ताम्रं मणिमौक्तिकमेव च ।भूमिदानं च गोदानं मोचयत् पशुभान्नरम्

śrīmārkaṇḍeya uvāca: suvarṇaṃ rajataṃ tāmraṃ maṇimauktikameva ca / bhūmidānaṃ ca godānaṃ mocayat paśubhānnaram

हिन्दी अर्थ

थी। उसके कान भी बड़े-बड़े थे और वह दुरासद था ।१२४-१२६। वज्र॒से उसके हाथ चमक रहे थे और प्रभाधिकय के कारण केशराशि भी प्रदीप्त हो रही थी। ज्वालमाला की भाँति वह मुक्तामाला पहने हुये ओर प्रलयकालीन अग्नि की तरह अपनी कान्ति से दीप्त हो रहा था। उ्चधके मुंह कान तक फटे हुये थे, जिसमें चार भयानक दाँत दिखाई देते थे ।१२७-१२८। वह महाबली, महातेजस्वी महापुरुष ईश्वर, विश्वहर्ता और विशाल शरीर वाला था। महान् वटव॒क्ष की तरह उसका देह विस्तार था। यह शतचन्द्र के समान उज्ज्वल और कामाग्नि की तरह दीप्यमान था।१२ उसे चार बड़े बड़ मूँह थे जिसमें चमकते हुये दाँत थे । तेज, बल और पौरुष की अधिकता से वह अत्यन्त उग्र था। प्रलयक'लीन हजारों सूं और अग्नि की तरह वह भास्कर, सुमेरु कैलाश और हिमालय की तरह विशाल था. हजारों चन्द्र की निर्मल कान्ति की

English

They have the complexion and lustre cf the moon and their faces resemble the full moon. Their bodies are as cool as tncmoon. They have the fragrance of lotuses.

अध्याय ४३

श्लोक 5

तत्र तीर्थे तु यः कश्चित्कुरुते प्राणसंक्षयम् ।रुद्रलोके वसेत् तावद् यावद् आ भूतसम्प्लवम्

tatra tīrthe tu yaḥ kaścitkurute prāṇasaṃkṣayam / rudraloke vaset tāvad yāvad ā bhūtasamplavam

हिन्दी अर्थ

तरह वहू कमतीय था और निखिल ओषधियों से युक्त मन्दराचल की तरह प्रदीष्ण था।!३०। वह युगास्त- कालीन सूर्य की तरह आभावाला, महाबली, सुन्दर नासिका युक्त, महानन प्रचण्ड-गण्ड, दीप्ताक्ष, ज्वालामुखी की तरह मुखगह्नरवाला, व्याप्न चर्मधारी, विशाल साँपों से वेष्टित, पगड़ी पहने हुये, चन्द्रधारी, उच्चावच,

English

Their span of ale is ten thousand years. They are free from ailments. Imbibing the juice of the black mangoes, they enjoy perpetual youth.

अध्याय ४३

श्लोक 6

ततः पुष्करिणीं गच्छेत् सर्वपापक्षयंकरीम् ।तत्र स्नात्वार्चयेद्देवं तेजोराशिं दिवाकरम्

tataḥ puṣkariṇīṃ gacchet sarvapāpakṣayaṃkarīm / tatra snātvārcayeddevaṃ tejorāśiṃ divākaram

हिन्दी अर्थ

कर्णिकारखजं दीप्तं क्रोधादुद्श्रान्ततोचनम् । क्वचिश्रृत्यति चित्राइुर्ग क्वचिद्ददति सुस्वरम ॥ जानुभ्यामर्वान गत्वा प्रणतः प्राज्जलिः स्थित: । आज्ञांपय त्वं देवेश कि कार्य करवाणि ते

English

The magnitude, lustre and the span of life oT the people of all the four great continents have been explained precisely ancl succinctly, but not in detail.

अध्याय ४३

श्लोक 7

ऋचमेकां जपेत् साम्नः सामवेदफलं लभेत् ।यजुर्वेदस्य जपनाद् ऋग्वेदस्य तथैव च

ṛcamekāṃ japet sāmnaḥ sāmavedaphalaṃ labhet / yajurvedasya japanād ṛgvedasya tathaiva ca

हिन्दी अर्थ

तमुवाचा55क्षिप मख्ख॑ दक्षस्येह महेश्वर:। देवस्यानुमति श्रुत्वा बीरभद्रों महाबलः ॥॥

English

O Sages of enhancing reputation! The characteristics of the people of Bhadrasva mentioned by me are what have been cited by earlier Siddhas. Now listen to them in detail.

अध्याय ४३

श्लोक 8

अक्षरं वा जपेन् मन्त्रं ध्यायमानो दिवाकरम् ।आदित्यहृदयं जप्त्वा मुच्यते सर्वकिल्बिषैः

akṣaraṃ vā japen mantraṃ dhyāyamāno divākaram / ādityahṛdayaṃ japtvā mucyate sarvakilbiṣaiḥ

हिन्दी अर्थ

प्रणभ्य शिरशा पादो देवेशस्य उमापते: ततो बन्धात्प्रमुक्तेन सिहेनेवेह लीलया । देव्या मन्युक्ृतं मत्वा हतो दक्षस्थ स क़तुः १३६ मन्युना च महाभोमा भद्रकालोी महेश्वरी । आत्मन: सर्वंसाक्षित्वे तेन सार्थ सहानुगा

English

I shall narrate fully and in detail what I have seen and heard, of the five principal mountain ranges, countries and rivers which surround the famous Devakuta mountain.

अध्याय ४३

श्लोक 9

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा विधिना जपेद्द्विजान् ।तस्य कोटिगुणं पुण्यं जायते नात्र संशयः

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā vidhinā japeddvijān / tasya koṭiguṇaṃ puṇyaṃ jāyate nātra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

स एव भगवान्क़द्धः प्रेतावासकृतालयः । वीरभद्र इति ख्यातो देव्या मन्युप्रमाजंक: ....

English

The five principal mountains are Saivala, Varnama- lagra, the excellent mountain Koranja, Svetavarna and Nila.

अध्याय ४३

श्लोक 10

अनाशकेनाग्निगत्या जले वा देहपातनात् ।तस्मिंस्तीर्थे मृतो यस्तु स याति परमां गतिम्

anāśakenāgnigatyā jale vā dehapātanāt / tasmiṃstīrthe mṛto yastu sa yāti paramāṃ gatim

हिन्दी अर्थ

रंग-विरंगे फूलों से शिर को सजाये हुये, बहुविध गन्ध-चन्दन को लगाये हुये, विविध रत्नों से और कितने ही प्रकार के आभरणों से भूषित था ।१३१-१३३। वह कनेर की माला पहने हुये था और क्रोध से छसकी आँखें नाच रहो थीं। कभी वह विचित्र भाव भड़ी से नाच उठता था तो कभी मथुर स्वर में बोल उठता था, कभी वह योगावलम्बन करके ध्यान करता था, तो कभी मोटी चीजों को इधर-उधर हटाता था, कभी वह विद्वात्मा गाता था, तो कभी सिसकियाँ भरता था ।१३४-१३१५। ज्ञान, वेराग्य, ऐश्वयं, तप, सत्य, क्षमा, धघृति, प्रमुत्व, आत्मसंबोध और अधिष्ठान गुण से युक्त उसने भूमि पर घुटने टेक दिये और हाथ जोड़कर बोला -देवेश ! आज्ञा दीजिये कि, मैं आपका कौन सा कार्ये करूँ ।१३६-१३७। ह

English

There are hundreds, thousands and crores of small mountains besides, which are offshoots of these five ranges.

अध्याय ४३

श्लोक 11

ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो वा नृपसत्तम ।विहितं कर्म कुर्वाणः स गच्छेत् परमां गतिम्

brāhmaṇaḥ kṣatriyo vaiśyaḥ śūdro vā nṛpasattama / vihitaṃ karma kurvāṇaḥ sa gacchet paramāṃ gatim

हिन्दी अर्थ

प्रहादेव ने कह--तुम दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करो ।

English

(In and near these mountains) there are many lands and countries where a great variety of people live, which abound in various types of animals and which are looked after by many kings,

अध्याय ४३

श्लोक 12

युधिष्ठिर उवाच: व्याधिं सत्त्वक्षयं मोहं ज्ञात्वा वर्णा द्विजोत्तम ।पापेभ्यो विप्रमुच्यन्ते केन तत्साधनं वद

yudhiṣṭhira uvāca: vyādhiṃ sattvakṣayaṃ mohaṃ jñātvā varṇā dvijottama / pāpebhyo vipramucyante kena tatsādhanaṃ vada

हिन्दी अर्थ

महादेव की आज्ञा पाकर वह महाबली वीरभद्र देवेश उमापति के चरणों की वन्दना करके पिज्जरमुक्त पिह की तरह लीनापूर्वंक यह सोचता हुआ चला कि, “भगवती क्रद्ध हैं। अतः दक्ष के उस यज्ञ को विनष्ट ही समझना चाहिए, उसी समय देवी के क्रोध से एक महाभयद्भूर महेश्वरी भद्रकाली उत्पन्न हुई, जो साथी की भाँति वीरभद्र के साथ चली ।१३८-१४०। प्रेतावास में रहने वाले और उम। के क्रोध कारण को दूर करने वाले भगवान् वीरभद्र ने अपने रोमकप से रौद्र नामक असंख्य गणेद्वरों की सृष्टि को। वे रुद्र के अनुगामी, महाबली, रुद्र के तुल्य पराक्रमी, रुद्र के अनुचर और रुद्र के तुल्य कान्ति वाले थे । वे सौ-सो और हजार-हजार की संख्या में दल बाँध कर श्षीत्र ही यज्ञ दिशा की ओर दौड़ पड़े ।१४६-१४३। उनकी

English

Many kingdoms are established between the mountains in the lands whether plain or rugged and uneven. Their names are as follows:

अध्याय ४३

श्लोक 13

श्रीमार्कण्डेय उवाच: तिलोदकी तिलस्नायी कामक्रोधविवर्जितः ।ब्राह्मणो ऽनशनैः प्राणांस् त्यजल्लभति सद्गतिम्

śrīmārkaṇḍeya uvāca: tilodakī tilasnāyī kāmakrodhavivarjitaḥ / brāhmaṇo 'naśanaiḥ prāṇāṃs tyajallabhati sadgatim

हिन्दी अर्थ

ततः किलकिलाशब्द आकाश पुरयन्निव । तेन शब्देन महता त्रस्ता: सर्वे दिवौकसः (१४४

English

Sumahgalas, Suddhas, Candrakantas, Sunandanas, Vrajakas, Nllasaileyas, Sauvlras, Vijayasthalas, Mahasthalas,

अध्याय ४३

श्लोक 14

सङ्ग्रामे सद्गतिं तात क्षत्रियो निधने लभेत् ।तदभावान्महाप्राज्ञ सेवमानो लभेद् इति

saṅgrāme sadgatiṃ tāta kṣatriyo nidhane labhet / tadabhāvānmahāprājña sevamāno labhed iti

हिन्दी अर्थ

अग्नयो नव दीप्यन्ते न च दीप्यति भास्कर: । ग्रहा नेव प्रकाशन्ते नज्ञत्राणि न तारका: ऋषयो नाभ्यभाषन्त न देवा न च दानवाः एवं हि तिमिरीभुते निदहन्ति बिमभानिता:ः

English

They drink from the holy river Mahaganga 2 which was, in the beginning, known in the three worlds as Slta bearing down volumes of cold water.

अध्याय ४३

श्लोक 15

व्याधिग्रहगृहीतो वा वृद्धो वा विकलेन्द्रियः ।आत्मानं दाहयित्वाग्नौ विधिना सद्गतिं लभेत्

vyādhigrahagṛhīto vā vṛddho vā vikalendriyaḥ / ātmānaṃ dāhayitvāgnau vidhinā sadgatiṃ labhet

हिन्दी अर्थ

प्रमदंन्ति तथा चान्ये बिनुत्यन्ति तथा5परे । आधावन्ति प्रधादन्ति वायुबेगा मनोजवाः

English

The other rivers are Hariisavasati, Mahacakra, Cakra, Vaktra, Kaiici, the excellent river Surasa, Sakhavatl, IndranadI, Megha, Maiigaravahini, Kaveri, Haritoya, Soma- varta, Satahrada, Vanamala, Vasumatl, Pampa, Pampavati, Suvarna, Paiicavarna, the holy Vapusmati, Manivapra, Suva- pra, Brahmabhaga, Silasinl, Kpsnatoya, Punyoda, the auspi¬ cious Nagapadi, SaivalinI, Manitata, Ksaroda, Arunavatl, Visnupadx, Mahapunyil, Mahanadi, Hiranyavahinl, Nila, Skandamala, Suravatl, Vamoda, Pataka, Vetali and Mahanadi Ganga and these rivers are glorified as the heroines (important rivers). Besides there are other rivers small and innumerable— hundreds and thousands.

अध्याय ४३

श्लोक 16

वैश्यो ऽपि हि त्यजन्प्राणानेवं वै शुभभाग् भवेत् ।जले वा शुद्धभावेन त्यक्त्वा प्राणाञ्छिवो भवेत्

vaiśyo 'pi hi tyajanprāṇānevaṃ vai śubhabhāg bhavet / jale vā śuddhabhāvena tyaktvā prāṇāñchivo bhavet

हिन्दी अर्थ

चण्यंन्ते यज्ञपात्राणि यागस्थाइड्यतनानि अल । शीर्येमाणानि दृश्यन्ते तारा इब नभसस्‍्तलात्ू मधुमण्डोदका दिव्या: खण्डशर्क रवालुका:

English

Thus the holy rivers in the eastern continent have been enumerated to you. A person becomes sanctified by merely enumerating them.

अध्याय ४३

श्लोक 17

शूद्रो ऽपि द्विजशुश्रूषुस्तोषयित्वा महेश्वरम् ।विमुच्य नान्यथा पापः पतते नरके ध्रुवम्

śūdro 'pi dvijaśuśrūṣustoṣayitvā maheśvaram / vimucya nānyathā pāpaḥ patate narake dhruvam

हिन्दी अर्थ

पडसाप्निवहन्त्यन्या गुडकुल्या मनोरमाः । उच्चावचानि मांसानि भक्ष्यणि विविधानिच

English

The kingdom is flourishing and prosperous. It consists of many provinces where trees and forests grow in abundance. These are encircled by many hills.

अध्याय ४३

श्लोक 18

अथवा प्रणवाशक्तो द्विजेभ्यो गुरवे तथा ।पञ्चाग्नौ शोषयेद्देहमापृच्छ्य द्विजसत्तमान्

athavā praṇavāśakto dvijebhyo gurave tathā / pañcāgnau śoṣayeddehamāpṛcchya dvijasattamān

हिन्दी अर्थ

पानकानि च दिव्यानि लेहां चोष्यं तथाउपरे भुजते विविधवंक्त्रविलुण्ठन्ति( क्षिपन्ति च किलकारियों से आकाश गूंज उठा और उस बिकट शब्द से सभी देवगण भयभीत हो गये पहाड़ टुकड़े-टुकड़े हो गये, धरती काँप उठी, मेरु चंचल हो गया, समुद्र क्षुब्ध हो गये, अग्नि दीप्तिह्वीन, सूर्थ तेजोहीन और ग्रह-तक्षत्र तारकादि प्रकाशहीन हो गबे ।१४४-१४६॥। यज्ञ में उपस्थित ऋषि, देब, दानव आदि चुप हो गये, घना अन्धकार छा गया और विमानित उन रुद्र गणों ने सब को कष्ट देना प्रारम्भ किया । ने घोर रूप महा-

English

It is teeming with groups of men and women. The king¬ dom is auspicious and joyous. People are governed by many kings. They are rich in money and foodgrains. There are many mines of jewels, glorified in many ways.

अध्याय ४३

श्लोक 19

शान्तदान्तजितक्रोधाञ्छास्त्रयुक्तान् विचक्षणान् ।तेषां चैवोपदेशेन करीषाग्निं प्रसाधयेत्

śāntadāntajitakrodhāñchāstrayuktān vicakṣaṇān / teṣāṃ caivopadeśena karīṣāgniṃ prasādhayet

हिन्दी अर्थ

बली रुद्रगण सिहनाद करने लगे। किंसी ने यजश्ञागार को उखाड़ फेंका, तो कोई यज्ञयूप को पीड़ित करने लगा, तो कोई ताण्डव करने लगा। वायु और मन के तुल्य वेग धारण कर कितने तो कदने और दौड़ने लगे ।१४७-१४६। कितनों ने यज्ञ-पात्रों को और यज्ञशालाओं को तोड़-मरोड़ दिया, इससे बह बज्ञभूमि उसी प्रकार दिखाई पड़ने लगी, जिस प्रकार कि आकाझ्ष में तारागण बिखरे दीख पड़ते हैं।१५०। उन लोगों ने

English

In that country, men are said to be lustrous in complc-

अध्याय ४३

श्लोक 20

एवं वर्णा यथात्वेन मूढाहङ्कारमोहिताः ।पतन्ति नरके घोरे यथान्धो गिरिगह्वरे

evaṃ varṇā yathātvena mūḍhāhaṅkāramohitāḥ / patanti narake ghore yathāndho girigahvare

हिन्दी अर्थ

दिव्य भक्ष्य अन्नों के ढेर को, जलराशि को, क्षीर-नदी को, कीचड़ की तरह पड़े हुये घी और उसी तरह पड़ी हुई खीर को, दिव्य मधु और मण्डोदक को, बालुकाराशि की तरह चीनी को, षड्रसवाहिनी असंख्य गुड़कुल्या ( बड़े-बड़े नाद ) को, मांस के छोटे-बड़े ढेर को, विविध प्रकार के भक्ष्य वस्तुओं को, बढ़िया से बढ़िया पीने की चीजों को और चाटने चूसने की चीजों को अपने नाना प्रकार के मुखों से खाना प्रारम्भ कर दिया। उन्होंने कुछ को फेंक दिया और कुछ को उलट दिया ।१५१-१५३। रुद्र के कोप से उत्पन्न वे विशाल शरीर

English

They can meet, talk and associate with Devas and occupy the same seats with them.

अध्याय ४३

श्लोक 21

ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तन्ते कामचारतः ।कृमियोनिं प्रपद्यन्ते तेषां पिण्डो न च क्रिया

ye śāstravidhimutsṛjya vartante kāmacārataḥ / kṛmiyoniṃ prapadyante teṣāṃ piṇḍo na ca kriyā

हिन्दी अर्थ

धनुश्चिद्वान्तगं तग्रन्थ: क. पुस्तके नास्ति ।

English

Their span oflife is ten thousand years. There is no difference of Dharma and Adharma among them (all people are equal). They are naturally truthful and non-violent.

अध्याय ४३

श्लोक 22

श्रुतिस्मृत्युदितं धर्मं त्यक्त्वा यथेच्छाचारसेविनः ।अष्टाविंशतिर्वै कोट्यो नरकाणां युधिष्ठिर

śrutismṛtyuditaṃ dharmaṃ tyaktvā yathecchācārasevinaḥ / aṣṭāviṃśatirvai koṭyo narakāṇāṃ yudhiṣṭhira

हिन्दी अर्थ

रुद्रकोपान्महाकाया: कालाग्निसद्शोपभाः । सुरसंन्यानि मर्दन्‍्तो भीषयन्ति) च स्वंशः ॥॥ क़ीडन्ति विविधाकाराश्रिक्षिपु: सुरयोषितः १५४ रुद्रकोपप्रयुक्तास्तु सर्वेदेवः सुरक्षितम्। त॑ यज्षमहञ्शी क्र' रुद्रकल्या: समोपत: १५५ चक़्रन्ये तथा नाद'न्सवेभुतभयंकरान्ू । छित्त्वा शिरोष्न्ये यज्षस्थ विनदन्ति भयंकरा: १५६ दक्षो दक्षपतिश्चव देवो यज्ञपतिस्तथा । सृगरूपेण चा55काशे प्रपलायितुमारभत् ७१५७

English

Everyday they perform sacrifices, worships and obei¬ sance with devotion to Lord Sankara and Gauri, the great Vaisnavi (Sakti).

अध्याय ४३

श्लोक 23

प्रत्येकं वा पतन्त्येते मग्ना नरकसागरे ।दुर्लभं मानुषं जन्म बहुधर्मार्जितं नृप

pratyekaṃ vā patantyete magnā narakasāgare / durlabhaṃ mānuṣaṃ janma bahudharmārjitaṃ nṛpa

हिन्दी अर्थ

त्यस्त्रिशहेबतानां ताः कोटयो विमलात्मिकाः । पशेनाग्निबलेना5डशु बद्धा: सिहबलेन च.

English

Everyday they perform sacrifices, worships and obei¬ sance with devotion to Lord Sankara and Gauri, the great Vaisnavi (Sakti).

अध्याय ४३

श्लोक 24

तल्लब्ध्वा मदमात्सर्यं यो वै त्यजति मानवः ।संनियम्य सदात्मानं ज्ञानचक्षुर् नरो हि सः

tallabdhvā madamātsaryaṃ yo vai tyajati mānavaḥ / saṃniyamya sadātmānaṃ jñānacakṣur naro hi saḥ

हिन्दी अर्थ

ततो जम्मुमंहात्मानं सबें देवा महाबलस् । प्रसीद भगदन्‍्रुद्र भृत्यानां मा क्रुधः प्रभो १६१ ततो ब्रह्मादयो देवा दक्षश्चव प्रजापति: । ऊचुः प्रा्जलयो भृत्वा कथ्यता को भवानिति

English

Everyday they perform sacrifices, worships and obei¬ sance with devotion to Lord Sankara and Gauri, the great Vaisnavi (Sakti).

अध्याय ४३

श्लोक 25

अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानांजनशलाकया

ajñānatimirāndhasya jñānāṃjanaśalākayā

हिन्दी अर्थ

न॒ च देवो न चा55दित्यो न च भोक्तुमिहा55गतः । नेब द्रष्टुं हि देवेन्द्रान्न च कौतृहलान्बितः:

English

Everyday they perform sacrifices, worships and obei¬ sance with devotion to Lord Sankara and Gauri, the great Vaisnavi (Sakti).

अध्याय ४३

श्लोक 26

यस्य नोन्मीलितं चक्षुर्ज्ञेयो जात्यन्ध एव सः ।एतत्ते कथितं सर्वं यत्पृष्टं नृपसत्तम

yasya nonmīlitaṃ cakṣurjñeyo jātyandha eva saḥ / etatte kathitaṃ sarvaṃ yatpṛṣṭaṃ nṛpasattama

हिन्दी अर्थ

वाले, कालाभ्नि सदृश रुद्रगण देव सेना को रोदते हुए डराने लगे और विविध देह ध।रण कर कीड़ा करते हुए देव-पत्नियों को भी घसीटा ।१५४। रुद्रकोपोत्पन्न उन रुद्र तुल्य गणों ने देवों से रक्षित उस यज्ञ को उनके सामने ही नष्ट कर दिया। उनमें कुछ सब को त्रास उत्पन्न करने वाले भयद्भूर हाब्द करने लगे और किसी ने यक्ष के सिर को काट कर भयद्धूर चीत्कार क्रिया ।१५५-१५६। इस ध्वंस लाला में यज्ञपति दक्ष मृग रूप धारण कर आकाश की ओर भागे; किन्तु अप्रमेयात्मा वीरभद्र ने दक्ष की शक्ति को समझ लिया और आकाश में ही जाकर उनके सिर को काट लिया ।१५७-१४५८। दक्ष प्रजापति नष्ट हो गये, उनकी चेतना विलुप्त हो गई और क्रुद्ध वीरभद्र ने उनके सिर को पैरों से रौंद दिया । वृद्ध दक्ष प्रजापति पृथ्वी पर लोट गये ।१५६। इधर विमल आत्मा वाले तेंतीस करोड़ देवता भी भग्नि तुल्य प्रदीप्त दढ़ पाश में बंध गये । तब

English

Everyday they perform sacrifices, worships and obei¬ sance with devotion to Lord Sankara and Gauri, the great Vaisnavi (Sakti).

अध्याय ४३

श्लोक 27

तथानिष्टतराणां हि रुद्रस्य वचनं यथा ।नर्मदा सरितां श्रेष्ठा रुद्रदेहाद् विनिःसृता

tathāniṣṭatarāṇāṃ hi rudrasya vacanaṃ yathā / narmadā saritāṃ śreṣṭhā rudradehād viniḥsṛtā

हिन्दी अर्थ

वे सब देवता महाबली महात्मा वीरभद्र के पास गये और बोले--भगवन् ! रुद्र प्रसन्न हो जाये। प्रभु! दासों पर क्रोध मत करें। तब ब्रह्मदि देवता और दक्ष प्रजापति हाथ जोड़ कर बोले--महाराज, आप कौन हैं!

English

Everyday they perform sacrifices, worships and obei¬ sance with devotion to Lord Sankara and Gauri, the great Vaisnavi (Sakti).

अध्याय ४३

श्लोक 28

तारयेत् सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च ।सर्वदेवाधिदेवेन ईश्वरेण महात्मना

tārayet sarvabhūtāni sthāvarāṇi carāṇi ca / sarvadevādhidevena īśvareṇa mahātmanā

हिन्दी अर्थ

बीरभद्र बोले--न हम देब हैंत आदित्य हैं, न भोजन की इच्छा से आये हैं और न कुतृहलवश दक्षयज्ञविनाशार्थ संप्राप्त विद्धि भामिह्त । वीरभद्र इति ख्यातं रुद्रकोपाहिनिरगंतम्

English

Everyday they perform sacrifices, worships and obei¬ sance with devotion to Lord Sankara and Gauri, the great Vaisnavi (Sakti).

अध्याय ४३

श्लोक 29

लोकानां च हितार्थाय महापुण्यावतारिता ।मानसं वाचिकं पापं स्नानान्नश्यति कर्मजम्

lokānāṃ ca hitārthāya mahāpuṇyāvatāritā / mānasaṃ vācikaṃ pāpaṃ snānānnaśyati karmajam

हिन्दी अर्थ

भद्राकाली च विज्ञेया देव्या: क्रोधाहिनिगंता प्रेषिता देवदेबेन यज्ञान्तिकसिहाइ5गता १६५ शरण गच्छ राजेन्द्र देवं तं त्वमुमापतिभ् । दर क्रोधो5पि रुद्रस्थ वरदानं न देवत:ः

English

Everyday they perform sacrifices, worships and obei¬ sance with devotion to Lord Sankara and Gauri, the great Vaisnavi (Sakti).

अध्याय ४३

श्लोक 30

रुद्रदेहाद्विनिष्क्रान्ता तेन पुण्यतमा हि सा ।प्रातरुत्थाय यो नित्यं भूमिमाक्रम्य भक्तितः

rudradehādviniṣkrāntā tena puṇyatamā hi sā / prātarutthāya yo nityaṃ bhūmimākramya bhaktitaḥ

हिन्दी अर्थ

वीरभद्रवच: श्र॒त्वा दक्षो धरंभृतां वर:। तोषायामास देवेशं शुलपाणि महेश्वरम् ॥ प्रदष्टे यज्ञवाटे तु विद्वतेषु द्विजातिषु । तारामृगमये दीप्ते रोदे भीममहानले १६८

English

Everyday they perform sacrifices, worships and obei¬ sance with devotion to Lord Sankara and Gauri, the great Vaisnavi (Sakti).

अध्याय ४३

श्लोक 31

एतन्मन्त्रं जपेत्तात स्नानस्य लभते फलम् ।नमः पुण्यजले देवि नमः सागरगामिनि

etanmantraṃ japettāta snānasya labhate phalam / namaḥ puṇyajale devi namaḥ sāgaragāmini

हिन्दी अर्थ

उत्पतदधि: पतड्िश्च गश्नरासिषगुध्नुभि: । पक्षपातविनिधूतेः शिवाशतनिनादिते: ११७०

English

Everyday they perform sacrifices, worships and obei¬ sance with devotion to Lord Sankara and Gauri, the great Vaisnavi (Sakti).

अध्याय ४३

श्लोक 32

नमोऽस्तु पापनिर्मोचे नमो देवि वरानने

namo'stu pāpanirmoce namo devi varānane

हिन्दी अर्थ

सहसा देवदेवेशस्त्वस्निकुण्डादुपागतः । चन्द्रसुयंसहस्नस्य तेज: संवर्तकोषमम् १७२ प्रहस्य चेन भगवानिदं वचनमत्नवीत् । नष्टस्तेज्ञानतो दक्ष प्रीतिस्ते मयि सांप्रतम् १७३ स्मितं कृत्वाइब्रवीद्ाक्य ब्रृहि कि करवाणि ते। श्रावितं च समाख्याय देवानां गुरुभिः सह॒ तमुवाचाञुजाल कृत्वा दक्षो देव प्रजापति: । भीतशड्धितवित्रस्त: शबाष्पवदनेक्षण:

English

Everyday they perform sacrifices, worships and obei¬ sance with devotion to Lord Sankara and Gauri, the great Vaisnavi (Sakti).

अध्याय ४३

श्लोक 33

नमो ऽस्तु ते ऋषिवरसङ्घसेविते नमो ऽस्तु ते त्रिनयनदेहनिःसृते ।नमो ऽस्तु ते सुकृतवतां सदा वरे नमो ऽस्तु ते सततपवित्रपावनि

namo 'stu te ṛṣivarasaṅghasevite namo 'stu te trinayanadehaniḥsṛte / namo 'stu te sukṛtavatāṃ sadā vare namo 'stu te satatapavitrapāvani

हिन्दी अर्थ

हमारा नाम वीरभद्र है ओर हम महादेव के कोप से उत्पन्न हुए हैं १६४।॥ यह भद्गकाली है जो देवी के क्रोध से उत्पन्न हुई है और महादेव द्वारा यह भी इस यज्ञभूमि की ओर भेजी गई है ।१६५। राजेन्द्र आप उन्हों उमापति की शरण में जाइये, जिनका क्रोध भी अन्य देवों के वरदान से उत्तम है ।१६६। वीरभद्र के वचन को सुन कर घर्मनिष्ठ दक्ष ने देवाधिदेव शुलधाणि महेश्वर को प्रसन्न किया ।१६७॥ उस समय यज्ञभूप्ति नष्ट-

English

Everyday they perform sacrifices, worships and obei¬ sance with devotion to Lord Sankara and Gauri, the great Vaisnavi (Sakti).

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 43
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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