अध्याय ४४
श्लोक 1
॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे विमलेश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम त्रिचत्वारिंशो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय ४४ श्रीमार्कण्डेय उवाच: तीर्थानां परमं तीर्थं तच्छृणुष्व नराधिप ।रेवाया दक्षिणे कूले निर्मितं शूलपाणिना
|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe vimaleśvaratīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma tricatvāriṃśo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 44 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tīrthānāṃ paramaṃ tīrthaṃ tacchṛṇuṣva narādhipa / revāyā dakṣiṇe kūle nirmitaṃ śūlapāṇinā
हिन्दी अर्थ
भ्रष्ट हो चुकी थी, यजत्र में दीक्षित द्विजातिगण भाग चुके थे, यज्ञीय महाअनल बुझ चुका था, तिश्यूल से चोट खाये हुए अनुचरगण इधर उधर कराह रहे थे, गाड़ा गया यज्ञयूप उखड़ा हुआ पड़ा था, मांस के लोभी गृध्र नौचे-ऊपर मंडरा रहे थे और जोर-जोर से डेने ( पंख ) हिला रहे थे तथा झुंड के झूंड गीदड़ चिल्ला रहे ये ।१६८-१७०। उसी समय शत्रु को दमन करने वाले बहुदुष्टि देवदेवेश प्राणापान को यत्नपूर्षक अपने स्थान में रोक कर ऑर इधर-उधर देखते हुए सहसा अग्निकुण्ड से बाहर निःल आये। संवर्तकतुल्य हजार सूर्य के समान तेजोमय शंकर ने हँस कर कहा--वक्ष, तुम्हारे अज्ञान से यज्ञ नष्ट हुआ। अब तुम्हारी प्रीति मुझसे हुईं। कहो, अब तुम्हारे लिये मैं क्या करू ? ।१७१-१७३३२। देवों और गुरुओं के साथ आपबीती को सुनाकर दक्ष प्रजापति ने जिनकी आँखों से आँसू टपक कर गालों पर आ रहे थे और वे भय तथा सन्देश से
English
The natural characteristics of the Bhadrasvas have been narrated precisely. Now Listen to a detailed description of Ketumala. 1 2