Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
51
अध्याय 51 / 232

Adhyaya 51

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अध्याय ५१

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे शूलभेदमाहात्म्ये पात्रापात्रपरीक्षादानादिनियमवर्णनं नाम पञ्चाशत्तमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय ५१ उत्तानपाद उवाच: काले तत्क्रियते कस्मिञ्छ्राद्धं दानं तथेश्वर ।यात्रा तत्र प्रकर्तव्या तिथौ यस्यां वदाशु तत्

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe śūlabhedamāhātmye pātrāpātraparīkṣādānādiniyamavarṇanaṃ nāma pañcāśattamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 51 uttānapāda uvāca: kāle tatkriyate kasmiñchrāddhaṃ dānaṃ tatheśvara / yātrā tatra prakartavyā tithau yasyāṃ vadāśu tat

हिन्दी अर्थ

तथा निषबशेलस्य देवशलस्य चोत्तरे । सह्लरथोजनायामा शतयोजनबिस्तृता २८ सर्बा ह्यकशिला मुभिव क्षवीरुद्विवर्जिता । आप्लुता पादमात्रेण ह्युदकेन समंततः

English

While narrating the details of Svayambhuva Manvan- tara, events of past and future have been narrated. Now I shall recount them in their proper order.

अध्याय ५१

श्लोक 2

ईश्वर उवाच: पितृतीर्थं यथा पुण्यं सर्वकामिकमुत्तमम् ।इदं तीर्थं तथा पुण्यं स्नानदानादितर्पणैः

īśvara uvāca: pitṛtīrthaṃ yathā puṇyaṃ sarvakāmikamuttamam / idaṃ tīrthaṃ tathā puṇyaṃ snānadānāditarpaṇaiḥ

हिन्दी अर्थ

इत्येता ह्मस्तरद्रोण्यो नानाकारा: प्रकीतिताः । मेरोः पूर्वेण विप्रेन्द्गरा यथावदनृपुर्वेशः इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्‍्ते भुवनविन्यास नाम सप्तत्रिशोड्ष्यायः

English

On hearing this, the sages asked Lomaharsana about the movements of the sun, the moon and the planets.

अध्याय ५१

श्लोक 3

विशेषेण तु कुर्वीत श्राद्धं सर्वयुगादिषु ।मन्वन्तरादयो वत्स श्रूयन्तां च चतुर्दश

viśeṣeṇa tu kurvīta śrāddhaṃ sarvayugādiṣu / manvantarādayo vatsa śrūyantāṃ ca caturdaśa

हिन्दी अर्थ

वहाँ के वक्ष भी कुसुद और अंजन पर्वत की ही तरह दृढ़ जान पड़ते हैं। उन दृढ़ पेड़ों का मूल भाग खूज मोटा और स्थिर है। सभी वुक्ष एक में सटे हुये हैं जिनमें सुगन्धित और रसीले फल लगे हुये हैं । सिद्धनण इस फलों को खाया कते हैं ।२४। इन्द्र के गजरगाज ऐरावत का वासस्थान यही वन कहा गया है। यह बात तीनों लोकों में प्रसिद्ध है ।२५। वेणमस्त और सुमेध पर्वतों के बीच सत्तर हजार योजन लम्बा और सौ योजन

English

How do these luminary bodies revolve in the firma¬ ment? They all move in circular orbits and laterally. Still they do not collide with one another. Who makes them revolve?Or do they revolve of their own accord?

अध्याय ५१

श्लोक 4

अश्वयुक्छुक्लनवमी द्वादशी कार्त्तिकस्य च ।तृतीया चैत्रमासस्य तथा भाद्रपदस्य च

aśvayukchuklanavamī dvādaśī kārttikasya ca / tṛtīyā caitramāsasya tathā bhādrapadasya ca

हिन्दी अर्थ

चौड़ा एक मैदान है, जहाँ वृक्ष, गुल्म, लता निरुंज आदि कुछ भी नहीं हैं, जीवजन्तुओं का निव!स भी वहाँ नहीं है। वहाँ केवल हरी-हरी दूबें उगी हुई हैं। निषधशेल और देवशल के उत्तर में हजार योजन लम्बी ओर सौ योजन चौड़ी एक शिलाखण्डमय भूमि है। यहाँ भी वृक्षलता आदि नहीं है। हाँ थोड़ा सा पानी सभी जगह फैला हुआ है। ब्राह्मणों ! मैंने उन नाना आकर प्रकार की स्तर द्रोणियों को क्रमशः बता दिया जो मेरू के पूव में स्थित हैं ।

English

O excellent one, we wish to know this. Narrate it to us. This is a matter that deludes living beings. We have a desire to hear about this.

अध्याय ५१

श्लोक 5

आषाढस्यैव दशमी माघस्यैव तु सप्तमी ।श्रावणस्याष्टमी कृष्णा तथाषाढस्य पूर्णिमा

āṣāḍhasyaiva daśamī māghasyaiva tu saptamī / śrāvaṇasyāṣṭamī kṛṣṇā tathāṣāḍhasya pūrṇimā

हिन्दी अर्थ

२८० क्‍ वायुपुराणम्

English

Listen to and know this wonderful thing which though very clear and visible, deludes people.

अध्याय ५१

श्लोक 6

फाल्गुनस्य त्वमावास्या पौषस्यैकादशी सिता ।कार्त्तिकी फाल्गुनी चैत्री ज्यैष्ठी पञ्चदशी तथा

phālgunasya tvamāvāsyā pauṣasyaikādaśī sitā / kārttikī phālgunī caitrī jyaiṣṭhī pañcadaśī tathā

हिन्दी अर्थ

पकक्‍्वेविद्ुमसंकाशमं धुपूर्णे मंनो रमैः । ज्वलितं तद्नं भाति महाकुम्भोपमैः फल: ४ प्रसन्नस्वादुसलिलास्तत्र नद्यो बहुदका: सुरसामलतोयास्ताः सरांसि च समन्ततः १६ समन्‍ताद्योजनशतं तद्दनं परिसण्डलम् ह द

English

It is Dhruva, son of Uttanapada, who is stationed at the tail-end of what appears like the Gangetic porpoise with tails

अध्याय ५१

श्लोक 7

मन्वन्तरादयश्चैते अनन्तफलदाः स्मृताः ।अयने चोत्तरे राजन्दक्षिणे श्राद्धमाचरेत्

manvantarādayaścaite anantaphaladāḥ smṛtāḥ / ayane cottare rājandakṣiṇe śrāddhamācaret

हिन्दी अर्थ

सुतजी बोले--अब भागे हम दक्षिण दिशा की उन द्रोणियों का जहां सिद्ध गण सदा आसन जमाये रहते हैं-“-कमछा: वर्णन कर रहे हैं, सुनिये ।!। शिक्षिर और पतज्भ पर्वतों के मध्य में एक रमणीय उदुम्बर-बन है। वहाँ की भूमि चिकनी है, लताएँ पादपों पर चढ़ी हुई हैं, ऊंचे शिखर वाले स्थूल वृक्षों पर पक्षिव॒न्द बसेरा लिये हुये हैं, मूँगे की तरह लाल-लाल पके हुये रसीले बड़े-बड़े मनोहर फलों से बह बन जगमग हो रहा

English

It revolves itself and makes the sun and the moon revolve along with the planets. While it revolves like a wheel, the stars follow it.

अध्याय ५१

श्लोक 8

कार्त्तिकी च तथा माघी वैशाखस्य तृतीयिका ।पौर्णमासी च चैत्रस्य ज्येष्ठस्य च विशेषतः

kārttikī ca tathā māghī vaiśākhasya tṛtīyikā / paurṇamāsī ca caitrasya jyeṣṭhasya ca viśeṣataḥ

हिन्दी अर्थ

है ।२-४। यक्ष गन्धवे, किन्नर, उरग और विद्याधर आदि नित्य हौ वहाँ उन फलों को बड़ी प्रसन्नता से खाया करते हैं ।५। निमंल और मीठे जल वाली कितनी ही अगराघ नदियाँ वहाँ बहती रहती हैं। इधर-उधर कितने ही निर्मेल तथा मीठे जलवाले सरोवर भी दीख पड़ते हैं। वहाँ भगवान् कर्दम प्रजापति का रमणीय आश्रम है, जहाँ देवगण विराजमान रहते हैं। वह वन बड़ा ही मनोहर है। उसका मण्डल-विस्तार सो योजन का हैं ।६-७। ताम्रवर्ण और पतड्भु पर्वत के बीच सौ योजन लम्बा ओर दो योजन चौड़ा एक महापुण्य सरोवर

English

The group of stars moves at the will of Dhruva. 2 The sun, the moon, the fixed and moving stars and the planets are bound to Dhruva through the bonds in the form of groups of winds. It is from Dhruva that their combination, difference, seasonal movement, rising and setting, portentious phenomena, southern and northern transit, the equinoxes and colours begin to function.

अध्याय ५१

श्लोक 9

अष्टकासु च संक्रान्तौ व्यतीपाते तथैव च ।श्राद्धकाला इमे सर्वे दत्तमेष्वक्षयं स्मृतम्

aṣṭakāsu ca saṃkrāntau vyatīpāte tathaiva ca / śrāddhakālā ime sarve dattameṣvakṣayaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

तदणादित्यसंकाशे: पुण्डरीकं: समन्‍्ततः । सहस्नपत्रविकर्चेंम हापदं रलंकृतम् १६

English

Rain, heat, snow, night, twilight, day and the auspicious

अध्याय ५१

श्लोक 10

मधुमासे सिते पक्ष एकादश्यामुपोषितः ।निशि जागरणं कुर्याद् विष्णुपादसमीपतः

madhumāse site pakṣa ekādaśyāmupoṣitaḥ / niśi jāgaraṇaṃ kuryād viṣṇupādasamīpataḥ

हिन्दी अर्थ

सरोवरं महापुण्यं देवदानवसे वितम् । महोरग रध्युषितं नोलजालविभुषितम् तस्पोपरि महारथ्या प्रांशुप्राकारतोरणा । नरनारीगणाकीर्णा स्फीता विभवविस्तरः

English

The sun covers the stars etc. activised by Dhruva and stands by. Hence his rays are illuminated. The sun is the deadly fire (that ends the world).

अध्याय ५१

श्लोक 11

धूपदीपादिनैवेद्यैः स्रङ्मालागुरुचन्दनैः ।अर्चां कुर्वन्ति ये विष्णोः पठेयुः प्राक्तनीं कथाम्

dhūpadīpādinaivedyaiḥ sraṅmālāgurucandanaiḥ / arcāṃ kurvanti ye viṣṇoḥ paṭheyuḥ prāktanīṃ kathām

हिन्दी अर्थ

वलभीकूटनिर्यू है मंणिभक्तिविचित्रिते: । रत्नचित्रापिततले: श्लक्ष्णचित्रोत्तरच्छदे: १४

English

O Brahmanas, in the course of his revolution, the sun brightens the quarters by his brilliance. With the mass of his rays in the company of the wind all round, O excellent Brah¬ manas, the sun takes up the waters of the universe.

अध्याय ५१

श्लोक 12

ऋग्यजुःसाममन्त्रोक्तं सूक्तं जपति यो द्विजः ।सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति

ṛgyajuḥsāmamantroktaṃ sūktaṃ japati yo dvijaḥ / sarvapāpavinirmukto viṣṇulokaṃ sa gacchati

हिन्दी अर्थ

दीप्तानां चित्रवेषाणां सुयप्रतिमतेजसाम् । विद्याधरसहुस्नाणामनेकेषां स राजराट् ११७ विशाखस्याचलेखस्य पतड्भस्पान्तरेण च। सरसस्ताम्रवर्णस्य पूर्वे तीरे परिश्रतम् पञ्चेषुक्षेपणतरिद्धं सुशाखं वर्णशोभितम् । सर्वकालफल तत्र स्फीतं च55श्रवनं महत्

English

The water drunk in by the sun gets transferred to the moon from the solar fire. Through the Nadis (tubular veins) full of wind the activity of sustaining the worlds begins.

अध्याय ५१

श्लोक 13

प्रातः श्राद्धं प्रकुर्वीत द्विजान् सम्पूज्य यत्नतः ।दानं दद्याद् यथाशक्ति गोहिरण्याम्बरादिकम्

prātaḥ śrāddhaṃ prakurvīta dvijān sampūjya yatnataḥ / dānaṃ dadyād yathāśakti gohiraṇyāmbarādikam

हिन्दी अर्थ

है ।5। उसमें तदण सूर्य की तरह पुण्डरीक, सहसख्रपत्र ओर महाप्य चारों ओर खिले हुये हैं। भश्रमरों से आन्दोलित, सुगन्धित शतपन्नों से युक्त खिले हुये रक्त, नील बर्ण के बड़े-बड़े कमलों से उसका जल सुशोभित हो रहा है। जिसमें इधर उधर शवाल भी फंले हैं ।६-१०। देव दानव और महोरग उस जल का सदा उपयोग किया करते हैं। उसी के बीच सौ योजन लम्बा और तीस योजन चोड़ा एक देश्व है, जो मेरु से विभूषित

English

What exudes from the moon, the sun receives at its tips. When the wind blows the clouds let it shower on the earth.

अध्याय ५१

श्लोक 14

पितरस्तस्य तृप्यन्ति यावद् आभूतसम्प्लवम् ।श्राद्धदस्तु व्रजेत् तत्र यत्र देवो जनार्दनः

pitarastasya tṛpyanti yāvad ābhūtasamplavam / śrāddhadastu vrajet tatra yatra devo janārdanaḥ

हिन्दी अर्थ

है।११-१२ वहाँ एक बड़ी सी रध्या ( सड़क ) है, जिसके चारों ओर तोरणों से सजी ऊँची दीवारें हैं । स्‍त्री-पुरुषों से खचाखच भरी वह रथ्या अपनी श्री पर अभिमान करती है। उस देश के मध्य भाग में विद्या- धरों का एक धुसज्जित वगर है। वहाँ अत्युत्तम और अत्युन्नत भद्ठालिकाओं की पंक्तिपाँ शोभा को बढ़ा रही हैं, जिनमें सुन्दर दरवाजे और चन्द्रशालाएं हैं। महलों में मणियों की पच्चीकारी की गई है और अटद्ठालिकाओं को दीवारों पर रत्नों से चित्र बनाये गये हैं। वे अट्टालिकाएंँ बाहर से अत्यन्त स्वच्छ तथा रंग्र-बिरंगी दीख पड़ती हैं ।१३-१४५। वहाँ विद्याधरों के स्वामी पुलोमा नाम से विख्यात हैं जो इन्द्र के समान कान्ति वाले हैं और अपने को वेश-भूषा और मालाओं से सदा सज-ते रहते हैं। उस राज-राज को भड़कीले वस्त्र और भूषण घारण करने वाले सूर्य की तरह तेजस्वी सहस्रों विद्याधर घेरे रहते हैं ॥(६-१७॥ विशाल और पतड्ा-

English

Thus the water is poured and it falls again and again. The same water assumes various shapes. 3

अध्याय ५१

श्लोक 15

त्रयोदश्यां ततो गच्छेद्गुहावासिनि लिङ्गके ।दृष्ट्वा मार्कण्डमीशानं मुच्यते सर्वपातकैः

trayodaśyāṃ tato gacchedguhāvāsini liṅgake / dṛṣṭvā mārkaṇḍamīśānaṃ mucyate sarvapātakaiḥ

हिन्दी अर्थ

चल के बीच ताम्नवर्ण सरोवर के पूर्व तीर पर सम्पूर्ण ऋतुओं में फलने वाला एक विशाल आम्रवन है १्८।

English

For the up-keep of the living beings, Maya has been created. The three worlds including the mobile and immobile beings are pervaded by this Maya.

अध्याय ५१

श्लोक 16

उत्तानपाद उवाच: गुहामध्ये महादेव लिङ्गं परमशोभितम् ।येन प्रतिष्ठितं देव तन्ममाख्यातुम् अर्हसि

uttānapāda uvāca: guhāmadhye mahādeva liṅgaṃ paramaśobhitam / yena pratiṣṭhitaṃ deva tanmamākhyātum arhasi

हिन्दी अर्थ

इस वन पर कामदेव ने मानो अपने बाण चला दिये हैं। इसकी शोभा निखरी सी रहती है, सुन्दर वर्णो से फर्ल: कनकसंकाशमंहास्वादे: सुगन्धिभिः । महाकुम्भप्रमाणश्र तनुशाख:ः समन्‍्ततः

English

Cf. Bh. P. V. 23.4.7 and Bd. 2.22.6.

अध्याय ५१

श्लोक 17

ईश्वर उवाच: त्रिषु लोकेषु विख्यातो मार्कण्डेयो मुनीश्वरः ।दिव्यं वर्षसहस्रं स तपस्तेपे सुदारुणम्

īśvara uvāca: triṣu lokeṣu vikhyāto mārkaṇḍeyo munīśvaraḥ / divyaṃ varṣasahasraṃ sa tapastepe sudāruṇam

हिन्दी अर्थ

सुस्वादविदमनिभः फरलेबिल्व॑मंहोपमैः । शीर्यमाणैविशीर्णश्र प्रक्लिन्नतलमृत्तिकाः

English

Bh. P.V. 23.2 attributes this driving power to Kala (Time).

अध्याय ५१

श्लोक 18

गुहामध्यं प्रविष्टो ऽसौ योगाभ्यासमुपाश्रितः ।लिङ्गं तु स्थापितं तेन मार्कण्डेश्वरसंज्ञितम्

guhāmadhyaṃ praviṣṭo 'sau yogābhyāsamupāśritaḥ / liṅgaṃ tu sthāpitaṃ tena mārkaṇḍeśvarasaṃjñitam

हिन्दी अर्थ

यस्य गन्धेन दिव्येन वास्यते परिमण्डलम् । समग्र योजनशतं काननानि समन्‍्ततः १२६ तत्सिद्धवारणगणरप्सरोभिश्व सेवितम् । रम्यं तत्किशुकव्नं जलाशयविभूषितम् तत्रा5:दिव्यस्य देवस्य दीप्तमायतनं मह॒त् । मासे मासेडअ:बतरति तत्र सु्थः प्रजापतिः ३३१

English

This belief in indestructibility of water is surprisingly modern, though the concept of water-cycle is archaic.

अध्याय ५१

श्लोक 19

तत्र स्नात्वा च यो भक्त्या सोपवासो जितेन्द्रियः ।तत्र जागरणं कुर्वन् दद्याद् दीपं प्रयत्नतः

tatra snātvā ca yo bhaktyā sopavāso jitendriyaḥ / tatra jāgaraṇaṃ kurvan dadyād dīpaṃ prayatnataḥ

हिन्दी अर्थ

सशोभित उस वन के वक्षों की शाखाएँ भी एक-से-एक बढ़कर हैं। जिनमें सोने की तरह पीले, सुगन्धित और घड़े के बराबर बड़े-बड़े रसदार फल लगे हुये हैं ।१६९-२०। उस आम्र फल के सुस्वादु और अमृत्तोपम रस को यक्ष गन्धवे, किप्नर, नाग, विद्याधर आदि बड़े चाव से पिया करते हैं। वहाँ आम्न के रस को पीकर प्रसश्नहृदय महात्मागण सन्‍्तुष्ट होकर सदा आनन्द ध्वनि किया करते हैं जो ध्वनि उन बन में सदा सुनाई

English

J h<; su. n " the lord of the universe; he is the creator of the worlds; he is the thousand-rayed lord; he is the lord of the subjects; he is the sustainer of the world; he is lord Visnu him- self.

अध्याय ५१

श्लोक 20

देवस्य स्नपनं कुर्यान्मृतैः पञ्चभिस् तथा ।यथा शक्त्या समालभ्य पूजां कुर्याद् यथाविधि

devasya snapanaṃ kuryānmṛtaiḥ pañcabhis tathā / yathā śaktyā samālabhya pūjāṃ kuryād yathāvidhi

हिन्दी अर्थ

देती है।२१-२२। विप्रो ! समूल और वधुधार पबंतों के बीच एक बिल्वस्थली है, जो समतल, सुगन्ध से परिपूर्ण शुद्ध और फल के भार से झुके हुये वक्षों से सशोभित है। बह तीस योजन लम्बी और पचास योजन चौड़ी है। खगकुल वहाँ सवंदा कलरबव किया करते हैं। म्ंगे की तरह लाल सुस्वादु और बड़े बड़े बेल गिर गिर कर वहाँ की भूमि को गीली बनाये रखते हैं ।२३-२५। वहाँ पर यक्ष, गन्धवे. किन्नर, सिद्ध, नाग आदि बहुतेरे जीव नित्य बिल्वफल को खाकर ही जीब्न बिताते हैं। वसुधार और रत्नधार पव्॑तों के बीच तीस योजन चौड़ा और सौ योजन लम्बा एक किश॒क्र वन ( पलाश वन ) है। ग्हाँ के वक्ष सदा पृष्पित और सगन्धित रहते हैं और फलों की शोभा से सदा जगमगाते रहते हैं ।२६-२८। फूलों की दिव्य गन्ध से बहाँ का प्रदेश सवासित होता रहता है। उस वन भूमि की कौन बात कहे सौ योजन दूर तक वह गन्ध फली रहती

English

The water of the worlds has exuded from the moon in the sky. The universe is, therefore, supported by the moon. This fact has now been declared.

अध्याय ५१

श्लोक 21

स्वशाखोत्पन्नमन्त्रैश्च जपं कुर्युर् द्विजातयः ।सावित्र्यष्टसहस्रं तु शताष्टकम् अथापि वा

svaśākhotpannamantraiśca japaṃ kuryur dvijātayaḥ / sāvitryaṣṭasahasraṃ tu śatāṣṭakam athāpi vā

हिन्दी अर्थ

है। उस मनोहर किशुक वन की शोभा जलाशय भौर बढ़ा देता है, जहाँ सिद्ध-चारण और अप्सराएं सदा निवास किया करती हैं। वहाँ भगवान् सूर्य देव का एक सुविश्ञाल देदीप्यमान भवन है, जहाँ प्रजापति सूर्य प्रत्येक्ष मास में उतरा करते हैं ।२९-३१। समय का विभाग करने वाले ब्हल किरणधारी सुरक्रष्ठ, सब देवों

English

The hot rays emanate from the sun; the cool rays from the moon. These two powerful hot and cool rays sustain the universe.

अध्याय ५१

श्लोक 22

एतत्कृत्वा नृपश्रेष्ठ जन्मनः फलमाप्नुयात् ।चतुर्दश्यां तु वै स्नात्वा पूजां कृत्वा यथाविधि

etatkṛtvā nṛpaśreṣṭha janmanaḥ phalamāpnuyāt / caturdaśyāṃ tu vai snātvā pūjāṃ kṛtvā yathāvidhi

हिन्दी अर्थ

तत्र कालस्य कर्तारं सहस्रांशुं सुरोत्तमम् । सिद्धसंघा नमस्यन्ति स्वंलोकनमस्कृतम् १३२ इत्येता ह्यन्तरद्रोण्यो दक्षिणे परिकीतिताः यथानृपूर्वमेखिला: सिद्धसंघनिषषेविताः ..

English

The holy Gariga with pure waters has the moon for support. O excellent Brahmanas, the great rivers have the son of the moon as their leader.

अध्याय ५१

श्लोक 23

पात्रं परीक्ष्य दातव्यम् आत्मनः श्रेय इच्छता ।पितरस्तस्य तृप्यन्ति द्वादशाब्दान्यसंशयम्

pātraṃ parīkṣya dātavyam ātmanaḥ śreya icchatā / pitarastasya tṛpyanti dvādaśābdānyasaṃśayam

हिन्दी अर्थ

मध्ये तस्यां शिलास्थल्यां त्रिशद्योजनमण्डलम् । ज्वालासहस्रकलिलं वह्लिस्थानं सुदारणम्

English

Water is present in the bodies of living beings. When the bodies of the mobile and immobile beings burn, the water becomes vapour and rises on all sides. Thereby clouds arise and they arc the receptacles of water. The brilliance of the sun takes up the water from the living beings through the rays.

अध्याय ५१

श्लोक 24

दाता स गच्छते तत्र यत्र भोगाः सनातनाः ।गुहामध्ये प्रविष्टस्तु लोटयेच्चैव शक्तितः

dātā sa gacchate tatra yatra bhogāḥ sanātanāḥ / guhāmadhye praviṣṭastu loṭayeccaiva śaktitaḥ

हिन्दी अर्थ

अनिन्‍्धनस्तत्न सदा ज्वालामाली विभावसु:। ज्वलत्येष सदा देव: शश्त्तत्र हुताशनः अधिदेवकृते योइसावग्नेभागों विधीयते । स तत्र ज्वलते नित्यं लोकसंबर्तकोइनल: ॥४ १ अन्तरे शलवरथोदेवा बाइपि तयोः शुभाः । मातुलुद्भस्थली ततन्न ह्यायाहशयोजना ६४२

English

The rays take the waters from the ocean through the wind. The revolving sun imparts water to the clouds by means of his white rays in the proper seasons.

अध्याय ५१

श्लोक 25

नीले गिरौ हि यत्पुण्यं तत्समस्तं लभन्ति ते ।शूलभेदे तु यः कुर्याच्छ्राद्धं पर्वणि पर्वणि

nīle girau hi yatpuṇyaṃ tatsamastaṃ labhanti te / śūlabhede tu yaḥ kuryācchrāddhaṃ parvaṇi parvaṇi

हिन्दी अर्थ

तत्राइडश्रमं महापुण्यं सिद्धसंघनिषषेवितम् । ब्रहस्पतेः प्रमुदितं सर्बकामगुणय तम् ४४

English

When blown by the wind, the water drips from the clouds. The clouds scatter showers for the benefit of living beings when they are blown by the winds in all directions.

अध्याय ५१

श्लोक 26

विशेषाच्चैत्रमासान्ते तस्य पुण्यफलं शृणु ।केदारे चैव यत्पुण्यं गङ्गासागरसङ्गमे

viśeṣāccaitramāsānte tasya puṇyaphalaṃ śṛṇu / kedāre caiva yatpuṇyaṃ gaṅgāsāgarasaṅgame

हिन्दी अर्थ

नकल तन कि कलल बजा ८++ टन “४ जीडकता भाप ह/-न + 34-43 कक तब कक +ण “7० +०++ण-++ ५-६० - -+-७४०४४+०७-७----० ०-० ---४-१--+ -७-++---.-. ० -०७-क४००+“ कप च्णकापकनन ४ कर +ाप-ड जनम ५ पक ५4 ००»० ० 2५क+फप-०-न-क आना १-३७ ५६ल६ललल०६० ००.०० ०...००६०००००- ५ ..... ३५9 के पूज्य भगवान् सूर्य देव को वहाँ सिद्धगण प्रणाम किया करते हैं। पंचक्ट और कलास शिखरों के बीच की वन भूमि सौ योजन लम्बी ओर तिरसठ योजन चौड़ी है। मामूली जीव वहाँ नहीं जा सकते हैं, सामान्य देह- धारियों के लिये वह दुगंभ और भयद्भूर है। वहाँ की भूमि उज्ज्वल और पाण्डर वर्ण की है। दक्षिण दिशा में स्थित, सिद्ध समूह द्वारा सेवित इतनी ही अन्तर द्रोणियाँ हैं जिनका हमने क्रमशः बणंत कर दिया

English

The clouds shower for six months in order to nourish and develop all living beings. They produce the rumbling sound of thunder arising from the wind and brilliant lightning arising from the fire.

अध्याय ५१

श्लोक 27

सितासिते तु यत्पुण्यमन्यतीर्थे विशेषतः ।अर्बुदे विद्यते पुण्यं पुण्यं चामरपर्वते

sitāsite tu yatpuṇyamanyatīrthe viśeṣataḥ / arbude vidyate puṇyaṃ puṇyaṃ cāmaraparvate

हिन्दी अर्थ

द्विज श्रंष्ठ ! अब पश्चिम दिशा में जो अन्तर द्रोणियाँ हैं और उनका जो विस्तार है, उनका हम भली भाँति वर्णन कर रहे हैं सुनिये ! स॒त॒क्ष और शिखिशैल पर्वतों के मध्य एक शिला-खण्डमय भूमि है जिसकी परिधि सो योजन की है, जो सबंदा गम रहती है। महाभयद्भूर उस भूमि को छते ही लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। सभी जीवों के लिये वह अगम्य तो है ही, समर्थों के लिये भी वह भयावह है ।३६-३०। उस शिलास्थली

English

The root s/mih means 'to exude', 'to sprinkle'. Since the clouds exude water, they are called Alegha. That from which water does not fall off they call Ablira. 1

अध्याय ५१

श्लोक 28

गयादिसर्वतीर्थानां फलमाप्नोति मानवः ।विधिमन्त्रसमायुक्तस् तर्पयेत् पितृदेवताः

gayādisarvatīrthānāṃ phalamāpnoti mānavaḥ / vidhimantrasamāyuktas tarpayet pitṛdevatāḥ

हिन्दी अर्थ

के बीच तीस योजन के घेरे में हजारों लपटों को फेंकनेवाले अग्नि देव का एक भयद्ूर स्थान है। बिना इन्धन के ही वहाँ शिखाशाली विभावसु अग्निदेत सदा जलते रहते हैं। देवता के निमित्त जिस अश्नि को भाग दिया जाता है, वे ही लोक संवर्तक अग्निदेव वहाँ सदा जलते रहते हैं ।३६-४१। देवापि और गय नामक श्रेष्ठ पबतों के बीच दस योजन की एक मातुलूग स्थली हैं। मधुमय व्यञ्जनों से और सुरस तथा सुवर्ण सइश पके हुये फलों से वह वनस्थली सवंत्र सुशोभित है ।४२-४३। वहाँ बृहस्पति का एक महापवित्र आश्रम है, जो सिद्धसमपृह से भरा हुआ, सुखद और सभी कामनाओं को सिद्ध करनेवाला है। उसी प्रकार कुम॒द और

English

Clouds arise in three ways. Their source of origin arc three. The types of clouds are Agneyas, Brahmajas and Paksajas.-

अध्याय ५१

श्लोक 29

कुलानां तारयेद् विंशं दश पूर्वान् दशापरान् ।दक्षिणस्यां ततो मूर्तौ शुचिर्भूत्वा समाहितः

kulānāṃ tārayed viṃśaṃ daśa pūrvān daśāparān / dakṣiṇasyāṃ tato mūrtau śucirbhūtvā samāhitaḥ

हिन्दी अर्थ

२८४ ह वायुपुराणम्

English

Abhra from.y/Umriu is a fanciful derivation. It is usually derived from \Zabhr 'to wander about* + suffix ac (i.e. <x) or from ap+i/bhf +s

अध्याय ५१

श्लोक 30

न्यासं कृत्वा तु पूर्वोक्तं प्रदद्याद् अष्टपुष्पिकाम् ।शास्त्रोक्तैरष्टभिः पुष्पैर्मानसैः शृणु तद्यथा

nyāsaṃ kṛtvā tu pūrvoktaṃ pradadyād aṣṭapuṣpikām / śāstroktairaṣṭabhiḥ puṣpairmānasaiḥ śṛṇu tadyathā

हिन्दी अर्थ

तथेव शैलवरयो: कुमुदाऊुजनयोरपि । अन्तरे केसरद्रोणिरनेकायामयोजना ४५ ह्विबाहुपरिणहैस्तस्त्रिहस्तायतविस्तृतेः । चन्द्रांशुवर्णे्याको शैमंत्तपट्पदनादित: १४६ मधुसपो रज: प्रक्तेमहागन्धमंनोहर: । शबलं तद्॒न॑ भाति कुमुमैः सर्वकालज: ४७ तत्र विष्णो: सुरगुरोदोप्तमायतनं मह॒त् । प्रकाशं त्रिषु लोकेषु स्बंलोकनसस्क्ृतम् ४८ मध्ये तु सरसस्तस्य रम्या तु स्थलपद्मिती । सहस्नपत्रव्याकोशैश्छन्नमात्ररलंकृता ५१

English

Clouds arising from the waters of ocean are Agtiejyas. They function therefrom. Chilliness and winds on a cloudy day are their attributes.

अध्याय ५१

श्लोक 31

वारिजं सौम्यमाग्नेयं वायव्यं पार्थिवं पुनः ।वानस्पत्यं भवेत् षष्ठं प्राजापत्यं तु सप्तमम्

vārijaṃ saumyamāgneyaṃ vāyavyaṃ pārthivaṃ punaḥ / vānaspatyaṃ bhavet ṣaṣṭhaṃ prājāpatyaṃ tu saptamam

हिन्दी अर्थ

मदोत्कटेमंधुकरेभ्र मरेश्व सदोत्कटें:। मृदुगदगदकण्ठानां किनराणां च निस्बन:ः ५३ उपगीतपद्मखण्डाइ्या विस्तीर्णा स्थलपद्मिनी । यक्षगन्धर्वंचरिता सिद्धधारणसेविता ३५४ मध्ये तस्याश्र पद्चिन्या: पश्चपोजनमण्डल: । न्यग्रोधो विपुलस्कन्धों ह्ानेकारोहसण्डित: ३५५ तत्र चन्द्रप्रभ: श्रीमान्पूर्णचन्द्रविभाननः । सहस्नवदनों देवो नोलवासाः सुरारिहा १५६

English

They assume the shapes of buffaloes, boars and elephants in their rut. They roam about and sport very near the

अध्याय ५१

श्लोक 32

अष्टमं शिवपुष्पं स्याद् एषां शृणु विनिर्णयम् ।वारिजं सलिलं ज्ञेयं सौम्यं मधुघृतं पयः

aṣṭamaṃ śivapuṣpaṃ syād eṣāṃ śṛṇu vinirṇayam / vārijaṃ salilaṃ jñeyaṃ saumyaṃ madhughṛtaṃ payaḥ

हिन्दी अर्थ

अज्जनाचल नामक श्रेष्ठ पर्बतों के बीच बहुत योजनों में फैली हुई एक केसर द्रोणी है। वहाँ का वन सभी ऋतुओं में खिलनेवाले कुसुमों से रंगबिरंगा सा शोभित होता है । वे खिले हुये फूल डेढ़ हाथ लम्बे चौड़े, चन्द्रमा की तरह ब्वेत हैं और उन पर मतवाले भौरे गूंजते रहते है। वहाँ सुरगुरु विष्णु का एक देदीप्यमान महान् मन्दिर है, जो ठीनों लोकों में प्रकाशभान और सब के द्वारा वन्दनीय है।४४-४८। कृष्ण और पाण्डुर नामक श्रष्ठ पवेतों के बीच नब्बे योजन लम्बा और तीस योजन चौड़ा एक देश है, जिसमें चिकनी सी एक ही शिला एक छोर से दूसरे तक बिछी है। लता वृक्ष आदि वहाँ कुछ नहीं हैं । चलनेवालों के लिये बहाँ बड़ी सुविधा है; क्योंकि ऊबड़-खाबड़ भूमि वहाँ कहीं भी नहीं है ।४६-५०। उनके बीच एक सरोवर है, जिसमें एक रमणीय स्थल-पद्चिनी है। खिले हुये सहस्तपत्र वाले कमलों से वह सरोवर मालूम पड़ता है मानो अनेक छत्रों

English

The clouds are called Jimutas since they are the source of living beings. They do not have the attributes of thunder. They hang down due to the water-content in them.

अध्याय ५१

श्लोक 33

आग्नेयं धूपदीपाद्यं वायव्यं चन्दनादिकम् ।पार्थिवं कन्दमूलाद्यं वानस्पत्यं फलात्मकम्

āgneyaṃ dhūpadīpādyaṃ vāyavyaṃ candanādikam / pārthivaṃ kandamūlādyaṃ vānaspatyaṃ phalātmakam

हिन्दी अर्थ

से वह अलंकृत है। इस सरंबर में मनोहर गन्धों से युक्त महापद्म, पुण्डरीक और खिले हुये शतपत्र, उत्पल, नीलपत्र एवं मदमत्त श्रमर तथा मदमत्त मधुकर सुशोभित हैं। कोमल गदगद् कण्ठवाले किन्नरों के गीतों से यह पद्मवन सदा निनादित रहता है। यह स्थल-पद्मिनी अतीब विस्तीर्ण है। यक्ष-गन्धर्व यहाँ विचरण करते रहते हैं और सिद्ध-चारण उसकी देख-रेख करते रहते हैं ।११-५४। उस पद्मवन के बीच पाँच योजन की

English

These clouds are huge and silent. They follow the current of the wind submissively. They shower water within a half to one Krosa (from the earth).

अध्याय ५१

श्लोक 34

प्राजापत्यं तु पाठाद्यं शिवपुष्पं तु वासना ।अहिंसा प्रथमं पुष्पं पुष्पमिन्द्रियनिग्रहः

prājāpatyaṃ tu pāṭhādyaṃ śivapuṣpaṃ tu vāsanā / ahiṃsā prathamaṃ puṣpaṃ puṣpamindriyanigrahaḥ

हिन्दी अर्थ

परिधि में अनेक झाखा-प्रशाखाओं से युक्त विशाल स्कन्धवाला एक न्यग्रोध् ( वट ) का वृक्ष है। वहाँ असुर- निहंता श्रीमान् सहख्रमुखधारी नोलाम्बर देव विराजमान हैं। इनकी कान्ति चन्द्रमा की तरह है और इनके तदनन्तसदो नाम सर्वलोकेषु विश्वुतम् । पद्ममालावलस्बाभिर्मालाभिरुपशोभितम् १५६

English

They shower on the tops and ridges of mountains and sport. They pierce the wombs of the flocks of the white cranes. They make them conceive.

अध्याय ५१

श्लोक 35

तृतीयं तु दया पुष्पं क्षमा पुष्पं चतुर्थकम् ।ध्यानपुष्पं तपः पुष्पं ज्ञानपुष्पं तु सप्तमम्

tṛtīyaṃ tu dayā puṣpaṃ kṣamā puṣpaṃ caturthakam / dhyānapuṣpaṃ tapaḥ puṣpaṃ jñānapuṣpaṃ tu saptamam

हिन्दी अर्थ

इषुक्षेपोच्चशिखरं नानाविहगसेवितम् ३६०

English

The types of clouds called Brahmajas are born of the breath of Brahma. They have the attribute of lightning. They are fond of rumbling sounds. They thunder.

अध्याय ५१

श्लोक 36

सत्यं चैवाष्टमं पुष्पमेभिस् तुष्यन्ति देवताः ।भक्त्या तपस्विनः पूज्या ज्ञानिनश्च नराधिप

satyaṃ caivāṣṭamaṃ puṣpamebhis tuṣyanti devatāḥ / bhaktyā tapasvinaḥ pūjyā jñāninaśca narādhipa

हिन्दी अर्थ

तत्राइआश्रमं महापुण्यं देवषिगणसेवितम् । शुक्रस्थ प्रथित॑ तत्न भास्वर पुण्यकर्मण: ६२ शद-कुक्टस्य शैलस्य वृषभस्यान्तरेण च । परूषकस्थली रस्या हानेकाय (यु) तयोजना (६ ३े तां स्थलीयुयजीवन्ति किनरोरगसाधव: । परूषकरसोन्मत्ता सानाढ््यास्तत्र चारणाः

English

Due to their loud report the earth gets a thrill. Like a queen crowned by a king earth attains youth once again. Being the cause of the birth of the living beings, the earth endears itself to the clouds.

अध्याय ५१

श्लोक 37

छत्रमावरणं दद्याद् उपानद्युगलं तथा ।तेन पूजितमात्रेण पूजिताः पुरुषास्त्रयः

chatramāvaraṇaṃ dadyād upānadyugalaṃ tathā / tena pūjitamātreṇa pūjitāḥ puruṣāstrayaḥ

हिन्दी अर्थ

स्थनी मनोहरा सा हि नानावनविभुषिता । नानापुष्पफलोपेता किनरोरगसेविता

English

The birth of living beings is from these clouds called Jimutas. These clouds resort to the second layer of wind called Pravaha.

अध्याय ५१

श्लोक 38

स्वर्गलोके वसेत् तावद् यावद् आभूतसम्प्लवम् ।शूलपाणेस्तु भक्त्या वै जाप्यं कुर्वन्ति ये नराः

svargaloke vaset tāvad yāvad ābhūtasamplavam / śūlapāṇestu bhaktyā vai jāpyaṃ kurvanti ye narāḥ

हिन्दी अर्थ

मुख की कान्ति भी पूर्णचन्द्र की ही तरह है । ये अपराजित महाभाग उम्र पद्ममालामण्डित स्थली के मध्य में यक्ष गन्धव और विद्याधरों से सदा पूजित होते हैं ।५५-४०। उम्र स्थान में साक्षात् नित्य नारायण सिद्धचारणों द्ुरा विविध भाँति के पद्मोपहार से पूजे जाते हैं ।५८। वह स्थान सब लोकों में अनन्त सदन के नाम से विख्यात है और पद्ममालाओं तथा अन्यान्य मालाओं से मंडित है । सहर्नशिखर और कुमुद पर्वतों के बीव सो योजन लम्बा और तीस योजन चौड़ा तथा फेंक्रा गया तीर जितना ऊपर जा सकता है उतना ही ऊंचा पर्वत शिखर है । वहाँ विविध विहंग दा कलरव करते रहते हैं ।५६-६०। वह चारों ओर से मधु टपकानेवाले वक्षों से मण्डित है। उन व॒क्षों के फल हाथी की देह के समान बड़े -बड़े, सुगन्धित और सुस्त्रादु हैं। उस शिखर पर पुण्यकर्ता भगवान् शुक्राचा्य का एक आश्रम है। वह आश्रम पविन्र, देवधियों से सेवित, विख्यात और

English

These clouds shower from a distance of a Yojana, half a Yojana or one-fourth of a Yojana from the earth. They rain in continuous torrents.

अध्याय ५१

श्लोक 39

पञ्चामृतैः पञ्चगव्यैर् यक्षकर्दमकुङ्कुमैः ।समालभेत देवेशं श्रीखण्डागुरुचन्दनैः

pañcāmṛtaiḥ pañcagavyair yakṣakardamakuṅkumaiḥ / samālabheta deveśaṃ śrīkhaṇḍāgurucandanaiḥ

हिन्दी अर्थ

देदीप्पमान है। शडःकुकट और वृषभ पर्वत के बीच एक अनेक योजन विष्तृत परूषकस्थली है, जिसके बेल के सपान बड़े बड़े, सुन्दर, सुगन्धित और सुस्वादु पुरूष फल टहनियों से टपक-टपक कर वहाँ की भूमि को पंकिल बताये रहते हैं। मान के धनी चारणगण परूष के रस को पीकर उन्मत्त बने फिरते हैं और किन्नर, उरग तथा साधुगण उस स्थली में सदा विचरण किया करते हैं ।६१-६५। कर्पिजल और नागशैल के अन्तराल में नाना

English

The wings of the powerful mountains who could go as per their will and pleasure, had grown very large. Indra cut them off for the (welfare of all) living beings.

अध्याय ५१

श्लोक 40

नानाविधैश्च ये पुष्पैरर्चां कुर्वन्ति शूलिनः ।निशि जागरणं कुर्युर् दीपदानं प्रयत्नतः

nānāvidhaiśca ye puṣpairarcāṃ kurvanti śūlinaḥ / niśi jāgaraṇaṃ kuryur dīpadānaṃ prayatnataḥ

हिन्दी अर्थ

बनों से विभूषित एक मनोहर स्थली है, जो दो सौ योजन लम्बी और सौ योजन चौड़ी है। वह विविध भाँति के फल-फूलों वाले नाना प्रकार के वनों से सुशोभित है। जहाँ किन्नर ओर उरग विचरण किया करते दाडिमानां च स्वादूनामक्षोटकवनानि च । अतसोतिलकानां च कद लीनां बनानि च ६६

English

These clouds are called Puskaras. They are huge and they are exhilarated with their waters. For that reason they are called Puskardvartakas (revolving Puskaras).

अध्याय ५१

श्लोक 41

धूपनैवेद्यकं दद्यात् पठेत्पौराणिकीं कथाम् ।तत्र स्थाने स्थिता भक्त्या जपं कुर्वन्ति ये नराः

dhūpanaivedyakaṃ dadyāt paṭhetpaurāṇikīṃ kathām / tatra sthāne sthitā bhaktyā japaṃ kurvanti ye narāḥ

हिन्दी अर्थ

ब्जिता विविधेः सत्त्वेनित्यमस्सिन्रिराशया । सा काननस्थली नाम वारुणा रोमहंणा ७३ महासरांसि च तथा महावुक्षास्तभैव च । महावनानि सर्वाणि कान्तानीमानि स्वशः ७४

English

They assume different forms. They are very terrible.

अध्याय ५१

श्लोक 42

श्रीसूक्तं पौरुषं सूक्तं पावमानं वृषाकपिम् ।वेदोक्तैश्चैव मन्त्रैश्च रौद्रीं वा बहुरूपिणीम्

śrīsūktaṃ pauruṣaṃ sūktaṃ pāvamānaṃ vṛṣākapim / vedoktaiścaiva mantraiśca raudrīṃ vā bahurūpiṇīm

हिन्दी अर्थ

केचित्सन्ति यहाघोराः श्यामाः पर्वेतकुक्षयः । सूर्याशुजाले रस्पृष्टा नित्यं शीता दुरासदा: ७७ इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्ते भुवनविन्यासो नामाश्ठत्रिशोड्ष्याय: ॥(३८।॥

English

The third type of clouds mentioned before shower at the close of the Yugas. They assume many forms and fill the

अध्याय ५१

श्लोक 43

ब्राह्मणान् पूजयेद् भक्त्या पूजयित्वा प्रणम्य च ।नानाविधैर् महाभोगैः शिवलोके महीयते

brāhmaṇān pūjayed bhaktyā pūjayitvā praṇamya ca / nānāvidhair mahābhogaiḥ śivaloke mahīyate

हिन्दी अर्थ

हैं। और जहाँ रमणीय द्वाक्षावत, नागवन, खर्जू रबन, नील, अशोक-वन, स्वादिष्ठ दाड़िमों के वन, अखरोट के वन, अतसी-तिलक-वन, कदलीवन और सुन्दर स्वादवाले वदरीवन हैं। मधुक्न और शीतल जलवाली नदियों से भी वह स्थली शोभित है ।६६-७०। पुष्पषक और महामेघ परववंतों के बोच सो योजन चौड़ी और साठ योजन लम्बी एक भूमि है, जो हथेली की तरह समतल कठोर, पाण्डुर और घन है। वहाँ वृक्ष, लता, गुल्म

English

All the clouds are reputed to have been born of the same Cosmic Egg-shell of Prakfta form from which the self-bom four-faced Brahma was born.

अध्याय ५१

श्लोक 44

अग्निम् इत्यादि जाप्यानि ऋग्वेदी जपते तु यः ।रुद्रान् पुरुषसूक्तं च श्लोकाध्यायं च शुक्रियम्

agnim ityādi jāpyāni ṛgvedī japate tu yaḥ / rudrān puruṣasūktaṃ ca ślokādhyāyaṃ ca śukriyam

हिन्दी अर्थ

तृण आदि का सर्वथा अभाव है ओर एक भी जीव जस्तु वहाँ नहीं हैं वह भूमि अत्यन्त भयद्भुर और कठोर है । इसका नाम काननस्थली है ।७१-७३। वहाँ कितने महासरो4र, महावक्ष और अति कमनीय महावन है ' प्रजापति द्वारा बनाये गये वहां क्षुद्र सरोबरों, वनों और स्थलों की गणना नहीं हो सकती है ।७४-७२। इन छोटे-मोटे सरोवरों आदि की तो बात ही छोड़िये वहाँ के प्रसिद्ध प्रसिद्ध स्थल, द्रोणी और सरोबरों की भी गिनती नहीं है, जो सात आठ, दस, और बारह योजन की लम्बाई चौड़ाई में हैं। उस प्रदेश में स्थान-स्थान पर कितनी ही कृष्ण वर्ण की कंदराएँ और घाटियाँ है, जहाँ कभी भी सूर्य की किरणें नही पहुंचती हैं, जिससे वे सदा ठंढी रहती हैं भोौर जहाँ कोई जा नहीं सकता है। ब्राह्मणो वहाँ कितने ही सरोवर हैं, जो सहस्रों की संख्या में प्॑तों के कुक्षि में वर्तमान हैं । इन सरोवरों का जल सदा खौलता रहता है

English

It is the smoke that makes them all fully developed without any difference. The most excellent among them is Par- janya. And there are four elephants of the quarters.

अध्याय ५१

श्लोक 45

इषेत्वा दिकमन्त्रौघं ज्योतिर्ब्राह्मणमेव च ।गायत्र्यं वै मधु चैव मण्डलब्राह्मणानि च

iṣetvā dikamantraughaṃ jyotirbrāhmaṇameva ca / gāyatryaṃ vai madhu caiva maṇḍalabrāhmaṇāni ca

हिन्दी अर्थ

अथैकोनचत्वा रिशोष्ध्याय: द २८७

English

Elephants, mountains and clouds along with serpents belong to one and the same family, though they are severally manifested, since water is known as the source of (their)

अध्याय ५१

श्लोक 46

एताञ्जप्यांस्तु यो भक्त्या यजुर्वेदी जपेद् यदि ।देवव्रतं वामदेव्यं पुरुषर्षभमेव च

etāñjapyāṃstu yo bhaktyā yajurvedī japed yadi / devavrataṃ vāmadevyaṃ puruṣarṣabhameva ca

हिन्दी अर्थ

अथेकोनचत्वारिशोअध्यायः अतः पर प्रवक्ष्पामि यस्मिन्यस्मिडि्शिलोच्चये । ये संनिविष्टा देवानां विविधानां गृहोत्तमाः

English

During Hemanta (early winter) Parjanya and the elephants of the quarters born of chilliness shower snow (drops) for making the corn flourish.

अध्याय ५१

श्लोक 47

बृहद्रथान्तरं चैव यो जपेद् भक्तितत्परः ।स प्रयाति नरः स्थानं यत्र देवो महेश्वरः

bṛhadrathāntaraṃ caiva yo japed bhaktitatparaḥ / sa prayāti naraḥ sthānaṃ yatra devo maheśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

तत्र योइसो महाशैल: शीतान्‍्तो नेकविस्तरः । नेकधातुशतश्रित्रेनेंकरत्नाकराकरः २

English

The great wind called Parivaha is their support. It is that lordly wind which sustains the Ganga that flows through the sky. ' It is the sacred, heavenly river, flooded over with water, stationed in the heavenly path like the divine Lore (Vidya).

अध्याय ५१

श्लोक 48

पादशौचं तथाभ्यङ्गं कुरुते यो ऽत्र भक्तितः ।गोदाने चैव यत्पुण्यं लभते नात्र संशयः

pādaśaucaṃ tathābhyaṅgaṃ kurute yo 'tra bhaktitaḥ / godāne caiva yatpuṇyaṃ labhate nātra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

नितम्बेः पट्पदोदगीतेः प्रवालेह्रमचित्रकेः । तटेः कुसुमसंकीणें मंत्तत्नमरनादित: ४ विमलस्वादुपानीयेनेंकप्रस्रवर्णर्युतः । निकुछ नै: कुसमोत्कीर्णेरनेकेश्व विभूषितः ६

English

The elephants of the quarters spray all round drops of water from the Ganga by means of their huge trunks. That (spray of water) is called the hoarfrost.

अध्याय ५१

श्लोक 49

ब्राह्मणान् भोजयेत् तत्र मधुना पायसेन च ।एकस्मिन् भोजिते विप्रे कोटिर् भवति भोजिता

brāhmaṇān bhojayet tatra madhunā pāyasena ca / ekasmin bhojite vipre koṭir bhavati bhojitā

हिन्दी अर्थ

« सूतजी बोले--इसके आगे अब हम पवेतों के जिन-जिन शिखरों पर विविध देवों के उत्तमोत्तम गृह बने हुये हैं, उनकी कथा कहते हैं ।! पव॑तों के बीच शीतानत नाम का एक बिस्तृत महागिरि है, जो बहुविध गैरिकादि धातुओं से चित्रित और अनेक प्रकार के रत्नों को उत्पन्न करनेत्राला है। उसके मध्य भाभ में पुष्पों के ढेर लगे हुये हैं और वह सब प्रकार के सत्वगुणों का आलय है। बहुमूल्थ मणियों से जटित और

English

Controlled by Dhruva, the sun causes the rainfall through these two (types) of clouds. The wind encompassed by Dhruva withdraws the rain.

अध्याय ५१

श्लोक 50

सुवर्णं रजतं वस्त्रं दद्याद् भक्त्या द्विजोत्तमे ।तर्पितास्तेन देवाः स्युर् मनुष्याः पितरस् तथा

suvarṇaṃ rajataṃ vastraṃ dadyād bhaktyā dvijottame / tarpitāstena devāḥ syur manuṣyāḥ pitaras tathā

हिन्दी अर्थ

सोने के बाँसों से वह सुशोभित है ।२-३। उस पहाड़ के मध्य में भौरे सवंदा गंजते रहते हैं, किनारे-कितारे फूलो के ढेर लगे हुये हैं जहाँ भौरों की गुंजार होती ही रहती है, वहाँ की भूमि की पच्चीकारी सोने और मूँगेसे की गई है । पहाड़ की चोटियों पर लताओं ने ही मानो बेल-बूटे बना दिये हैं और इधर-उधर बिखरी हुई लाल-पीली धातुएँ चित्र की भाँति दीख पड़ती हैं। वहाँ फूलों की कोई गिनती नहीं है ।४-५। मीठे और स्वच्छ पानी के कितने ही क्षरने झर रहे हैं । फूलों से लदी हुई झाँडियाँ या कूंजें वहाँ की शोभा को और बढ़ा देती हैं। वहाँ कुछ छोटी-बड़ी नदियाँ ऐसी भी हैं, जिनमें फूलों से सजी हुई नावें तैरती रहती हैं ।

English

The wind starts from the planet sun and traverses the entire stellar zone. At the end of the day it enters the sun en¬ compassed by Dhruva.

अध्याय ५१

श्लोक 51

चन्द्रसूर्यग्रहे भक्त्या स्नानं कुर्वन्ति ये नराः ।देवार्चनं ये च कुर्युर् जपं होमं विशेषतः ।दद्याद् दानं यथाशक्ति ब्राह्मणे वेदपारगे

candrasūryagrahe bhaktyā snānaṃ kurvanti ye narāḥ / devārcanaṃ ye ca kuryur japaṃ homaṃ viśeṣataḥ / dadyād dānaṃ yathāśakti brāhmaṇe vedapārage

हिन्दी अर्थ

र्प द वायूपुराणम

English

Now listen to the description of the Sun's Chariot. 1 It has one wheel with five spokes and three naves. The Lord Sun goes ahead on his Chariot that has golden wheel, that is very powerful, that has knotty joints, that has six-fold rim and one felly, which dispells darkness on the way.

अध्याय ५१

श्लोक 52

अश्वं रथं गजं यानं तुलापुरुषमेव च ।शकटं यः प्रदद्याद्वा सप्तधान्यप्रपूरितम्

aśvaṃ rathaṃ gajaṃ yānaṃ tulāpuruṣameva ca / śakaṭaṃ yaḥ pradadyādvā saptadhānyaprapūritam

हिन्दी अर्थ

यक्षगन्धर्वचरितैरनेकः कन्दरोदरेः । शोभितश्र सुखासेव्येश्वित्रेग हनसंकटेः ८ नानासत्त्वगुणाकीणें: सुपानीय: सुखाभयः । नानापुष्पफलोपेते: पादपे: समलंकृतः ३६ तस्मिन्गुहाअ्याकीणें अनेकोदरकन्दरे । क्रीडावन महेन्द्रस्य सर्वकामगुणयुतम् १० तत्र तद्देवराजस्य पारिजातवरन महत् । प्रकाशं त्रिषु लोकेषु गीयते श्रुतिनिश्चयात् ११ तरुणादित्यशंकाशैमं हागन्धेमंनो हरे: । पुष्पर्भाति नगश्ेष्ठः सुदीप्त इव सर्वेशः

English

This Chariot had been made by Brahma for some specific purpose. It is divine and golden. Swift horses have been yoked to it.

अध्याय ५१

श्लोक 53

सयोक्त्रं लाङ्गलं दद्याद्युवानौ तु धुरंधरौ ।गोभूतिलहिरण्यादि पात्रे दातव्यम् अर्चितम्

sayoktraṃ lāṅgalaṃ dadyādyuvānau tu dhuraṃdharau / gobhūtilahiraṇyādi pātre dātavyam arcitam

हिन्दी अर्थ

बेद॒यनालेः कमले: सौवणंव त्केसरे: । सर्वगन्धजलोपेतर्मत्तपट्पदनादित:

English

It is the Vedic metres that have assumed the forms of the horses. It is stationed in the sphere ofSukra (Venus). It has the characteristics similar to those of Varuna's chariot. In this shining Chariot the Sun traverses the sky. These parts of the Chariot of the Sun are fashioned out of the parts of the year in due order.

अध्याय ५१

श्लोक 54

अपात्रे विदुषा किंचिन्न देयं भूतिमिच्छता ।यतो ऽसौ सर्वभूतानि दधाति धरणी किल

apātre viduṣā kiṃcinna deyaṃ bhūtimicchatā / yato 'sau sarvabhūtāni dadhāti dharaṇī kila

हिन्दी अर्थ

ब्याकोशैविकचेश्वापि शतपत्रमंनोहरः । सुपद्भणमंहापत्रे्वाप्पस्तत्र विभूषिताः १५ गुफाओं की भी कमी नहीं है, जिनके चारों रोर किन्नर लोग टहलते रहते हैं। इनके अतिरिक्त और भी बहुत सी गुफाएं हैं, जिनमें यक्ष. गन्धर्व आदि आनन्द से निवास किया करते हैं। सघन और संकटपूर्ण बनों के रहते हुईं भी वे स्थान सुखपूर्वंक निवास करने के योग्य हैं ।६-5। विविध भाँति के पुष्पों और फलों से युक्त वृक्ष वहाँ विराजमान हैं, खाने-पीने की सुविधा पाकर जिन पर अनेकानेक जीव निवास करते हैं। उस पर्वत के

English

The day is the nave of the wheel. The Chariot has one

अध्याय ५१

श्लोक 55

ततो विप्राय सा देया सर्वसस्यौघमालिनी ।अथान्यच्छृणु राजेन्द्र गोदानस्य तु यत्फलम्

tato viprāya sā deyā sarvasasyaughamālinī / athānyacchṛṇu rājendra godānasya tu yatphalam

हिन्दी अर्थ

उदर में कितनी ही कन्दराएं हैं, जिनमें लोग आश्रम बनाये हुये हैं। वहाँ निखिल बिलास साधनों से युक्त देवराज इन्द्र का एक कीड़ावन है और वहीं उनका तीनों लोकों में विख्यात प्रसिद्ध पारिजात वन भी है । श्रुतियाँ भी इसका समर्थन करती हैं ।६-११। तरुण सूर्य की तरह प्रकाशमान और मनोहर गन्धवाले पुष्पों से बह पवंतराज सदा देदीप्पमान रहता है। महेन्द्र के वन से बाहर निकलने वाली वायू उस पारिजात कौ गन्ध

English

The Kasthas constitute its nose and the Ksanas (mo¬ ments) make up the shaft; the Nimesas are the axle-trees and the Lavas make up the poles. The night is the frontal fender; Dharma is its highly nsing banner. Artha and Kama are the two tips of the pole and

अध्याय ५१

श्लोक 56

यावद्वत्सस्य पादौ द्वौ मुखं योन्यां प्रदृश्यते ।तावद्गौः पृथिवी ज्ञेया यावद् गर्भं न मुञ्चति

yāvadvatsasya pādau dvau mukhaṃ yonyāṃ pradṛśyate / tāvadgauḥ pṛthivī jñeyā yāvad garbhaṃ na muñcati

हिन्दी अर्थ

को साँ योजन तक उड़ा ले जाती है ॥१२-१ ३। वहाँ बहुत सी बावलियाँ भी हैं, जिनमें सोने के कमल खिले हुये हैं। उन कमलों के नालदण्ड बैदू्य के और केसर हीरे के हैं जिन पर मदमत्त भ्रमर गुजार करते रहत हैं। उनकी गन्ध से वापीका जल सुवासित रहता है । खिले हुये मनोहर शतपतन्र और महापत्र पंकजों से भी वहाँ की वापिकाएँ विभूषित हैं । सुवर्ण और मणियों से भूषित हजारों चंचल आँखों वाली मछलियाँ पानी के भीतर से उगती और डुबती रहती हैं ।१४-१६। सुवर्ण और रत्नों से परिष्क्ृत अनेक प्रकार के कछये पानी को चीरकर इधर-उधर भाते जाते रहते हैं, जिससे पानी भी चित्रित-सा जान पड़ता है। बुद्धिमान सहस्राक्ष इन्द्र का वह रमणीक बन विविध रंगवाले पक्षियों के कुअन और उनके उन्मत्ते विचरण से सुन्दर दीख पड़ता है ।

English

Verses 54 ff. give a symbolic description of the Chariot of the Sun.

अध्याय ५१

श्लोक 57

येन केनाप्युपायेन ब्राह्मणे तां समर्पयेत् ।पृथ्वी दत्ता भवेत् तेन सशैलवनकानना

yena kenāpyupāyena brāhmaṇe tāṃ samarpayet / pṛthvī dattā bhavet tena saśailavanakānanā

हिन्दी अर्थ

मत्तभ्रमरसंनादरविहड्भानां च कूजिते:। नित्यमानन्दितवरन तस्सात्कीडावन महत् २०

English

The se en Veche metres, viz. Gayatrl, Tristup, Anu-?tup, Jagati, Pankti, Brhatl and U?nik, have assumed the forms of horses and bear the burden. The wheel is fixed to the axle and the axle is fastened to Dhruva. The axle turns along with the wheel; Dhruva turns along with the axle. Urged by Dhruva the axle turns along with the wheel.

अध्याय ५१

श्लोक 58

तारयेन्नियतं दत्ता कुलानाम् एकविंशतिम् ।रौप्यखुरीं कांस्यदोहां सवस्त्रां च पयस्विनीम्

tārayenniyataṃ dattā kulānām ekaviṃśatim / raupyakhurīṃ kāṃsyadohāṃ savastrāṃ ca payasvinīm

हिन्दी अर्थ

शाखामृगेश्च चित्राइरर्नानारत्नतनरुहैः । नानावर्णप्रकारेश्व सत्त्वरन्यं: समाकुलम् शपनासननिय्य है: स्तीर्णे रत्नविभूषिते: । विहारभुमयस्तत्न द्विजा: शक्नवने शुभाः ॥।

English

This is the description of the peculiar construction of the chariot. By means of the parts joined together a shining chariot is fashioned out.

अध्याय ५१

श्लोक 59

ये प्रयच्छन्ति कृतिनो ग्रस्ते सूर्ये निशाकरे ।तेषां संख्यां न जानामि पुण्यस्याब्दशातैर् अपि

ye prayacchanti kṛtino graste sūrye niśākare / teṣāṃ saṃkhyāṃ na jānāmi puṇyasyābdaśātair api

हिन्दी अर्थ

तस्मिन्निद्धवने शुभ्रे देवदानवपतन्नगाः । यक्षराक्षसगुझभ्र गन्वर्वाश्वामितोजस:

English

With that the lord Sun moves quickly in the hea¬ ven. There are two reins of the chariot tied to the tips of the pole and the axle. Propelled by Dhruva the chariot moves in the sky in a circular fashion. Handled by Dhruva the tips of the pole and the axle on the right side of the chariot appear like white reins in a chariot of two wheels.

अध्याय ५१

श्लोक 60

सर्वस्यापि हि दानस्य संख्यास्तीह नराधिप ।चन्द्रसूर्योपरागे च दानसंख्या न विद्यते

sarvasyāpi hi dānasya saṃkhyāstīha narādhipa / candrasūryoparāge ca dānasaṃkhyā na vidyate

हिन्दी अर्थ

तस्य पर्बंतराजस्य पूर्वे पाश्वे महोचितन् । कुमुञ्जं (दं) शेलराजानं नेकनिर्भेरफन्दरम् २८ उन पक्षियों के पंखों में कहीं रत्न गुथे हैं, तो कहीं सुवर्णपृष्प खजित हैं। किन्हों-किन्‍्हीं पक्षियों की चोचों में मणि भी पिरोये हुये हैं। मत्त श्रमरों के गुंजन और पक्षियों के कजन से वह महान् क्रीड़ावन नित्य आनन्दमय रहता है और इसी से वह क्रीड़ावन भी कहलाता है ।१७-२०। इस क्रीड़ावल के पर्वत मणिमुक्ताओं से युक्त हैं। उनके पाइव॑देश सुवर्ण के हैं और शिखरों से मत्रियों के कण झरते रहते हैं। विविध वर्ण के वानरों से

English

The two rays (reins) follow the whirling Dhruva. The tips of the pole and axle of the chariot are wind-waves.

अध्याय ५१

श्लोक 61

यत्र गौर् दृश्यते राजन् सर्वतीर्थानि तत्र हि ।तत्र पर्व विजानीयान्नात्र कार्या विचारणा

yatra gaur dṛśyate rājan sarvatīrthāni tatra hi / tatra parva vijānīyānnātra kāryā vicāraṇā

हिन्दी अर्थ

जिनके लोभ रत्नों से गृुथे हुये हैं-और अनेक प्रकार के जीव-जन्तुओं से बह वन व्याप्त है। पारिजात पुष्प के वक्ष और छोटी-छोटी लतिकाएं वयार के हल्के धक्के से ही पुष्पवृष्टि करने लगती हैं ।११-२३। बिप्रो इन्द्र के उस वन में कितनी ही विहारभूमियाँ हैं जो रत्नों से विभूषित विविध शयन और आसनादि से भरी पड़ीं हैं। वहाँ न गर्मी रहती है न सर्दी क्योंकि वहाँ सूये सदा एक समान रहते हैं। विविध पुष्पों की गम्ध से

English

Just as the rope tied to a peg revolves, in all direc¬ tions, so the two rays (reins) shrink in the zones in the Uttarayana. They increase in the Daksinayana. The two reins handled by Dhruva lead the Sun. When these are dragged by Dhruva, the Sun takes the internal revolutions.

अध्याय ५१

श्लोक 62

पुनः स्मृत्वा तु तत्तीर्थं यः कुर्याद् गमनं नरः ।अथवा म्रियते यो ऽत्र रुद्रस्यानुचरो भवेत्

punaḥ smṛtvā tu tattīrthaṃ yaḥ kuryād gamanaṃ naraḥ / athavā mriyate yo 'tra rudrasyānucaro bhavet

हिन्दी अर्थ

सुवासित उनन्‍्माद-जनक वसन्तकालीन वायु वहाँ सदा बहती है। वह वायु स्पर्श सुख से आनन्द उत्पन्न करनेवाली तथा थकावट और क्लेश को सदा हरनेवाली है।२४ २५। उस सुन्दर इन्द्रबन में देव, दानव, पन्नग, यक्ष, राक्षस, गुह्मक, महाबली गन्धर्व, विद्याधर, सिद्ध, किन्नर और अप्सराएं प्रसब्नचित्त से सदा क्रीड़ा करती रहती हैं ।२६-२७। उस पवतराज के पूर्व पाइव॑ में कुमुझ्ज नाम का एक परवेतराज है, जिसमें अनेक झरने और बज्जके पर्व॑ते चापषि अनेकशिख रोदरे: । उदोर्णा राक्षआावासा नरनारीसमाकुला:

English

The Sun thus traverses the one hundred and eighty circular zones of the two quarters. When the reins are released by Dhruva, it revolves round the external zones. Encircling them the Sun moves fast round the zones.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 51
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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