Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
56
अध्याय 56 / 232

Adhyaya 56

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अध्याय ५६

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे शूलभेदमाहात्म्ये काशीराजमोक्षगमनं नाम पञ्चपञ्चाशत्तमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय ५६ उत्तानपाद उवाच: अन्यच्च श्रोतुमिच्छामि केन गङ्गावतारिता ।रुद्रशीर्षे स्थिता देवी पुण्या कथमिहागता

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe śūlabhedamāhātmye kāśīrājamokṣagamanaṃ nāma pañcapañcāśattamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 56 uttānapāda uvāca: anyacca śrotumicchāmi kena gaṅgāvatāritā / rudraśīrṣe sthitā devī puṇyā kathamihāgatā

हिन्दी अर्थ

दिश्लु सर्वासु यद्यत्र कीत्यंमानं विबोधत (२१ अनेककन्दरदरीगुहानिर्भरसण्डितो । नेककुञ्जवनोपेतो चित्रधातुविभुषितों अनेकधातुकलिलो सर्वधातुविभुषितों । पुष्पमुलफलोपेतो सिद्धचारणसेवितों

English

O Samsapayana, I shall now recount to you the super¬ human power of (Pururavas), the son of Ila. I shall mention how he contacted with the Sun and the noblc-souled Moon.

अध्याय ५६

श्लोक 2

पुण्या देवाशिला नाम तस्या माहात्म्यम् उत्तमम् ।एतदाख्याहि मे सर्वं प्रसन्नो यदि शङ्कर

puṇyā devāśilā nāma tasyā māhātmyam uttamam / etadākhyāhi me sarvaṃ prasanno yadi śaṅkara

हिन्दी अर्थ

चन्द्रकान्तश्व॒ शैलश्र सुयंकान्तश्व सानुमान् । ययोसेध्येन सा याता भव्रीसीभा महानदी ३२५ सहुस्नशश््व नद्योइन्याः प्रसन्नसुरसोदकाः । पर्याप्तोदा: कुरूणां हि स्‍्नानपानावगाहनः

English

I shall mention all these things in order—the increase and decrease of the Moon consisting of the essence of the waters during the bright and the dark halves of the month, the fixation (decision) about the fortnight dedicated to Pitrs, the acqui¬ sition of nectar from the Moon, the Tarpana offerings to Pitis, the vision of the Pitrs who had extracted the Soma juice from the Kavya fire, and how Pururavas, the son of Ila, propitiated Pitrs. I shall mention the Parvans also (all in due order).

अध्याय ५६

श्लोक 3

ईश्वर उवाच: शृणुष्वैकमना भूत्वा यथा गङ्गावतारिता ।देवैः सर्वैर्महाभागा सर्वलोकहिताय वै

īśvara uvāca: śṛṇuṣvaikamanā bhūtvā yathā gaṅgāvatāritā / devaiḥ sarvairmahābhāgā sarvalokahitāya vai

हिन्दी अर्थ

नानावर्णप्रकाराणि पुष्पाणि च सहस्नशः । उपभोगसहस्नाणि भद्राणि च सहान्ति च हैं और आपस में उसी प्रकार अनुरक्त रहते हैं, जंसे चकवा-चकई। वहाँ बालों को पराई स्त्री की चाह नही रहती है । वे महाबली तेरह हजार दस सौ पाँच वर्ष तक जीवित रहते है ।१७-२०। शलराज जादरधि के उत्तर जो उत्तर कुरु है, उसका वर्णन विस्तार से सुनिये । यह उत्तर कुरु सभी दिल्लाओं में प्रसिद्ध हैं। वहाँ बड़े ऊँचे-ऊँचे दो कुल पर्वत हैं, जो अनेक कन्दराओ, दरियों, गृहाओं और झरनों से मण्डित हैं, अनेक कुज और

English

When both the Moon and the Sun come into conjunction with the same constellation, on the same night, in the same orbit, it shall be known as Amavasya (the New Moon).

अध्याय ५६

श्लोक 4

अस्ति विन्ध्यो नगो नाम याम्याशायां महीपते ।गीर्वाणास्तु गताः सर्वे तस्य मूर्ध्नि नरेश्वर

asti vindhyo nago nāma yāmyāśāyāṃ mahīpate / gīrvāṇāstu gatāḥ sarve tasya mūrdhni nareśvara

हिन्दी अर्थ

बनों से युक्त, विचित्र धातुओं से विभूषित वे अनेक श्रकार की विविध धातुओं से रंजित, पृष्प मूल और फलों से युक्त और सिद्ध चरणों से सुशोभित हैं ।२१-२३॥ उन दोनों पब॑तों के सेकड़ों शिखरों से वह द्वीप शोभित हो रहा है । इन दोनों पवेतों के नाम चन्द्रकान्त और सूर्यकान्त है जिनके बीच से महानदी भद्गसीमा बहती है । और भी वहाँ हजारों नदियाँ हैं। जिनके जल को कुरु देशवासी स्तान-पान आदि के कामों में लाते

English

He (Pururavas) used to go to see his maternal and paternal grand-fathers, the Moon and the Sun, on every Amavasya. After making obeisance to them, he used to keep waiting. For the sake of the Pitrs, he used to extract exudation from the de¬ lighted Moon. In every month Pururavas, son of Ila, stayed in the heaven and worshipped the Moon with devotion along with Pitrs.

अध्याय ५६

श्लोक 5

तत्र चाह्वानिता गङ्गा ब्रह्माद्यैरखिलैः सुरैः ।अभ्यर्च्येशं जगन्नाथं देवदेवं जगद्गुरुम्

tatra cāhvānitā gaṅgā brahmādyairakhilaiḥ suraiḥ / abhyarcyeśaṃ jagannāthaṃ devadevaṃ jagadgurum

हिन्दी अर्थ

हैं ।२४-२६। इन नदियों में निमंल मीठा जल पर्याप्त मात्रा से भरा रहता है। वेसे भी हजारों महानदियाँ है, जिनमें दूध, मधु, मदिरा ओर घी बहा करता है। दही के सैकड़ों तालाब हैं सुस्वादु अन्नों के पर्वत की तरह ढेर लगे हुये हैं ॥ अमृत की तरह स्वादवाले सुन्दर फल तो भाँति-भाँति के पड़े है। वहाँ गन्ध, वर्ण और रसों से युक्त ऐसे-ऐसे फल मूल हैं, जिनकी सुगन्‍्ध बीस कोस दूर से जान पड़ने लगती है, भाँति-भाँति के रंग बिरंगे हजारों फूल खिले रहते हैं. जो उपभोग के योग्य और महान् कल्याणकारक हैं ।२७-३०। गन्ध, वर्ण

English

Pitrs and the Moon partake of the Kavya offerings for two lavas. 1 Worshipping Sinivali 1 during the time of its appearance, Pururavas understood the duration of the new moon called Kuhu and worshipped Kuhu too. 2 Biding his time he used to see the Moon in conjunction with the Sun (.)

अध्याय ५६

श्लोक 6

जटामध्यस्थितां गङ्गां मोचयस्वेति भूतले ।भास्वन्ती सा ततो मुक्ता रुद्रेण शिरसा भुवि

jaṭāmadhyasthitāṃ gaṅgāṃ mocayasveti bhūtale / bhāsvantī sā tato muktā rudreṇa śirasā bhuvi

हिन्दी अर्थ

महावक्षसह॒ल्लाणि वरेण्यानि स सवंश: । नानाकाराणि वासांसि सुक्ष्माणि सुसुखानि च

English

Whence will the nectar ooze out from Soma for the satisfaction for a period of a month? It is by (replenishment) for fifteen days (of the bright half) by the flow of nectar. After drinking it in the dark half, it is being milked by the rays with

अध्याय ५६

श्लोक 7

तत्र स्थाने महापुण्या देवैरुत्पादिता स्वयम् ।ततो देवनदी जाता सा हिताय नृणां भुवि

tatra sthāne mahāpuṇyā devairutpāditā svayam / tato devanadī jātā sā hitāya nṛṇāṃ bhuvi

हिन्दी अर्थ

ओर रसों से युक्त तथा सुख स्पशे वहाँ तमाल, अगरु तथा चन्दनों के बन हैं, जहाँ भ्रमर प्रसन्न हो गाते रहते है । प्रफुल्लित वृक्षयुल्म और लताओं से युक्त कितने ही और सुखदायक बन हैं, जहाँ भौंरे गूंजार करते रहते और चिड़ियाँ चहचहाती रहती हैं । ब्राह्मणों वहाँ हजारों सरोवर हैं. जहाँ असंख्य पद्म और उत्पल के. बन हैं ।११-३३। सभी ऋतुओं में सुख देनेवाली रमणीय विहार भूमि में खाने की वस्तुयें, माला, अनुलेपन, शयन, आसनादि उपभोग सामग्रियाँ प्रस्तुत रहती हैं, मनोहर मुख वाले चित्र-विचित्र पक्षियों का कलरब होता रहता है और वे विहारभूमि अनेक भ्रुणों से युक्त हैं ।३४-३५' बहाँ स्वर्ण और मणियों से परिष्कृत एवं सभी प्रकार से सम्पन्न उद्यान, शिलागृह, वक्षगृहू और श्रेष्ठ कदलीगृह हैं। सभी प्रकार के सख देने वाले कितने ही लतागृह हैं। शट्भू की तरह उज्ज्बल कितने ही भूमिगृह भी हैं, जिनमें सोने और मणियों से चित्र बने हैं

English

L<wa=the 60th part of twinkling of the eye.— MW 898.

अध्याय ५६

श्लोक 8

वसन्ति ये तटे तस्याः स्नानं कुर्वन्ति भक्तितः ।पिबन्ति च जलं नित्यं न ते यान्ति यमालयम्

vasanti ye taṭe tasyāḥ snānaṃ kurvanti bhaktitaḥ / pibanti ca jalaṃ nityaṃ na te yānti yamālayam

हिन्दी अर्थ

एवं सोने ओर मणियों को ही खिड़कियाँ हैं । वे भवन भी बड़े-बड़े हैं ।१६-३८। वहाँ बड़े-बड़े हजारों वक्ष, विविध प्रकार के मूल्यवान और सुख पहुंचानेवाले महीन कपड़े हैं। म्ृदद्भ, वेणू, पणव, वीणा आदि बाजे बजते रहते हैं । वहाँ हजारों सकड़ों कल्पवृक्ष हैं, जो इच्छानुसार फल देते हैं ॥१६-४०। सभी जगह उद्यान हैं, सभी जगह नगर हैं, सम्पूर्ण द्वीप आनन्ददायक है, जहाँ सुखी नर-नारी निवास करते हैं। वहाँ वा यु में विविध फूलों की

English

Verses 9-10 etc. state, Amavasya is of two kinds: (i) when Amavasya

अध्याय ५६

श्लोक 9

यत्र सा पतिता कुण्डे शूलभेदे नराधिप ।देवनद्याः प्रतीच्यां तु तत्र प्राची सरस्वती

yatra sā patitā kuṇḍe śūlabhede narādhipa / devanadyāḥ pratīcyāṃ tu tatra prācī sarasvatī

हिन्दी अर्थ

रे२२ वायूपुराणम् चन्द्रकान्ता नरवराः श्यामाडुा: पूर्वकूलजा: । श्यामावदाताः सुखिनः सुयंकान्ता वराः प्रजा:

English

Rtu (Season) which is spoken of as Agni is considered as Samvatsara, since Rtus are born of it. Artavas (smaller division of time such as a fortnight) are born of Rtus (Seasons).

अध्याय ५६

श्लोक 10

याम्यायां शूलभेदस्य तत्र तीर्थमनुत्तमम् ।तत्र देवशिला पुण्या स्वयं देवेन निर्मिता

yāmyāyāṃ śūlabhedasya tatra tīrthamanuttamam / tatra devaśilā puṇyā svayaṃ devena nirmitā

हिन्दी अर्थ

तस्मिन्देशे नराः श्रेष्ठा देवसत्वपराक्रमा: । सदा विहारिणः सर्वे कामवृत्त्या सुब्चंसः

English

Artavas are called half-months. Pitrs are the sons of the year. Rtus are grandfathers. The months and the Rtus are the sons of the year.

अध्याय ५६

श्लोक 11

तत्र स्नात्वा तु यो भक्त्या तर्पयेत् पितृदेवताः ।पितरस्तस्य तृप्यन्ति यावद् आभूतसम्प्लवम्

tatra snātvā tu yo bhaktyā tarpayet pitṛdevatāḥ / pitarastasya tṛpyanti yāvad ābhūtasamplavam

हिन्दी अर्थ

वलयाइ-गदकेयू रहारकुण्डलमूषिताः । स्नग्विणश्रित्रमुकुटाश्रित्राच्छादनवासस: ४५ न ता: प्रसवधर्मिण्यो न वंशप्रक्षयो विधिः । मिथुन जायते वृक्षादुपक्षमसमनीद्शम्

English

Devas are the great-grandfathers. The five years (forming a Yuga) are the sons of Brahma. Saumyas are born of the Moon. Kavyas are the sons ofKavi.

अध्याय ५६

श्लोक 12

तत्र स्नात्वा तु यो भक्त्या ब्राह्मणान् भोजयेन्नृप ।स्वल्पान्नेनापि दत्तेन तस्य चान्तो न विद्यते

tatra snātvā tu yo bhaktyā brāhmaṇān bhojayennṛpa / svalpānnenāpi dattena tasya cānto na vidyate

हिन्दी अर्थ

सामान्यविभवाः सर्वे मसत्वपरिवर्जिताः । न तन्न विद्यते धर्मो नाधर्म: संप्रवतंते ४८ न व्याधिर्न जरा तत्न न दुर्मेधा न च क्लमः । पूर्ण काले विनश्यन्ति जलबुद्बुदबच्च ते ४६ एवमत्यन्तसुखिनः सर्वदुःखबिवर्जिता: । रक्ता धर्म न पश्यन्ति दुःखाद्धमोभिजायते

English

Devas born of Soma, and the imbibers of the Soma juice, are known as Upahutas. The Kavyas are known as Ajyapas. (All) the classes of Pitrs become satisfied thus.

अध्याय ५६

श्लोक 13

उत्तानपाद उवाच: कानि दानानि दत्तानि शस्तानि धरणीतले ।यानि दत्त्वा नरो भक्त्या मुच्यते सर्वपातकैः

uttānapāda uvāca: kāni dānāni dattāni śastāni dharaṇītale / yāni dattvā naro bhaktyā mucyate sarvapātakaiḥ

हिन्दी अर्थ

सुगन्धि रहती है, जिसके स्पर्श से शरीर में सुख और आलह्लाद उत्पन्न हो जाता है। क्लान्ति नाशक उस द्वीप में स्व से भ्रष्ट होकर मानव जनमते हैं, क्योंकि बह द्वीप उत्तम गुणों के कारण भूमि का स्व्रगम कहलाता है ।४१-४२। पूर्वतट में चन्द्रकान्त पर्वत के निकट रहने वाले नरपुगत्र ध्याम वर्ण के और सूययेकान्त पव॑त के निकट रहने वाले इ्याम-अवदात वर्ण के होते हैं। वहाँ के उत्तम निवासी सदा सूखी रहते हैं। उस देश के श्रेष्ठ मनुष्य देवता की तरह पराक्रमी, तेजस्वी और इच्छाधीन विहार करनेवाले हैं वलय, अंगद, केयूर, हार, कुण्डल, माला, चित्रकारी किये हुये मुकुट और रंग-बिरंगी चादर पहनने वाले वहाँ के सदा युवक बने रहने वाले लोग हजारों वर्षों तक जीवित रहते हैं वहाँ की प्रजा देखने में सुन्दर और भली है प्रजा को न प्रसव होता है और न उनको वंशक्षय होता है; क्योंकि वहाँ के वृक्ष ही नर-नारियों के जोड़े को उतनन्न करते हैं

English

Pitrs are classified into three (only): Kavyas, Barhisads and Agnisvattas. Rtus who are householders and performers of sacrifices are definitely Barhisads. Agni¬ svattas are also householders and performers of sacrifices. They are Artavas. Understand that Kavyas are Atfakdpatis (Lords of Astakas). Now understand the five years.

अध्याय ५६

श्लोक 14

देवशिलाया माहात्म्यं स्नानदानादिजं फलम् ।व्रतोपवासनियमैर् यत्प्राप्यं तद्वदस्व मे

devaśilāyā māhātmyaṃ snānadānādijaṃ phalam / vratopavāsaniyamair yatprāpyaṃ tadvadasva me

हिन्दी अर्थ

इसमें बाधा नहीं पड़ती है ।४३-४७। सभी समान व॑ भववाले हैं। किसी को भी सम्पत्ति पर ममता नहीं है । वहाँ धर्म-अध॑म आदि कुछ भी नहीं है। वहाँ न रोग है, न बुढ़ापा है, न कुमति है और न थकाबट । जीवन क्वाल को पूर्णकर वे पानी के बुलबुले की तरह समाप्त है जाते हैं। वे अत्यन्त सुखी हैं. उन्हें कोई भी दुःख नहीं है। वे कभी भी अनुरक्त होकर धर्म नहीं करते हैं। दुःख की अवस्था में ही धर्म किया जाता है

English

Among them Agni is Samvatsara and the Sun is Parival - sara. The Moon is Idvatsara and Vayu is Anuvatsara.

अध्याय ५६

श्लोक 15

ईश्वर उवाच: आसीत्पुरा महावीर्यश्चेदिनाथो महाबलः ।वीरसेन इति ख्यातो मण्डलाधिपतिर्नृप

īśvara uvāca: āsītpurā mahāvīryaścedinātho mahābalaḥ / vīrasena iti khyāto maṇḍalādhipatirnṛpa

हिन्दी अर्थ

उत्तर कुरु के दक्षिण पार्र्व में चन्द्रद्यीप है। यह पाँच हजार योजन विस्तीर्ण और देवलोक से भी बढ़कर है । यहाँ चन्द्रभा का मण्डल स्थिति है जहाँ समुद्र की तरंग मालाएँ सदा लहराती हैं, जिनके तरह-तरह के शब्दों से यह शतयोजनविस्तीणंमुच्छितं तावदेव तु. द

English

Rudra is the Vatsara among them. The five years of the nature of Yugas are known as Lekhas, Usmapds and Divdkirtyas.

अध्याय ५६

श्लोक 16

राष्ट्रे तस्य रिपुर्नास्ति न व्याधिर् न च तस्कराः ।न चाधर्मो ऽभवत् तत्र धर्म एव हि सर्वदा

rāṣṭre tasya ripurnāsti na vyādhir na ca taskarāḥ / na cādharmo 'bhavat tatra dharma eva hi sarvadā

हिन्दी अर्थ

तस्य मध्ये गिरिवरः सिद्धचारणसेवितः । चन्द्रतुल्यप्रभेः कान्तश्चन्द्राकारे: सुलक्षण: १४५४ श्वेतबदूय॑कुमुदेश्चित्रो ॥सो कुमुदप्रभ: । अनेकचित्रकोद्यानो नेकनिर्भरकन्दरः ॥।

English

These imbibe the nectar in heaven every month. As long as he lived, Pururavas gratified them with that.

अध्याय ५६

श्लोक 17

सदा मुदान्वितो राजा सभार्यो बहुपुत्रकः ।एकासीद् दुहिता तस्य सुरूपा गिरिजा यथा

sadā mudānvito rājā sabhāryo bahuputrakaḥ / ekāsīd duhitā tasya surūpā girijā yathā

हिन्दी अर्थ

तस्माच्छलान्महापुण्या चन्द्रांशुविमलोदका। प्रवह॒त्युत्तमनदी चर्द्रावर्ता तरइुगिणी तत्र चन््रमसो नाम्ना शेलः स तु परिश्रुतः । चन्द्रद्वीपं महाद्वीपं प्रकाशं दिवि चेह च 0५८ तन्न चन्द्रप्रतीेकाशाः पूर्णचन्द्रतिभानना: । चन्द्रकान्ताः प्रजा: सर्वा विमलाश्चद्धदंवता: 4५६ अत्यन्तधामिकाः सोम्या: सत्यसंधाः सुतेजसः । प्रजास्तत्र सदाचारा दशवर्ष शतायुषः १६० पश्चिमेन तु द्वीपस्य पश्चिमस्य प्रकोतितम् । चतुर्योजनसाहस्न' समतीत्य महोदधिस् ६१

English

Since the nectar oozes out of the Moon every month, understand that it is the nectar for Pitrs, the drinkers of Soma

अध्याय ५६

श्लोक 18

इष्टा सा पितृमातृभ्यां बन्धुवर्गजनस्य च ।कृतं वैवाहिकं कर्म काले प्राप्ते यथाविधि

iṣṭā sā pitṛmātṛbhyāṃ bandhuvargajanasya ca / kṛtaṃ vaivāhikaṃ karma kāle prāpte yathāvidhi

हिन्दी अर्थ

दशयोजनसाहसन' समन्‍्तात्परिमण्डलम् । द्वीपं भद्राकरं नाम नानापुष्पोपशोंभितम्

English

Being thus drunk by Devas, the Moon remains with only the fifteenth part left on the Amavasya day.

अध्याय ५६

श्लोक 19

अनन्तरं चेदिपतिर्द्वादशाब्दमखे स्थितः ।ततस्तस्यास्तु यो भर्ता स मृत्युवशम् आगतः

anantaraṃ cedipatirdvādaśābdamakhe sthitaḥ / tatastasyāstu yo bhartā sa mṛtyuvaśam āgataḥ

हिन्दी अर्थ

ढ्ीप मुखरित होता रहता है ।५१-५२। इसका घेरा चारों ओर से हजार योजनों का है और लम्बाई ऊँचाई भी सौ-सो योजनों की है। यहाँ भाँति-भाँति के फल-फल लगे हुये हैं और यहाँ अपार वैभव है। उसके बीत कुमुदप्रभ नामक एक पर्वत है। जहाँ सिद्धधारण निवास करते हैं वह पर्वत चन्द्रमा के तुल्य प्रभासंपन्न कमनीय, सुलक्षण और चन्द्रतुल्य इवेत बैंदूर्य मणि तथा कुमुद से चित्रित है। वहाँ अनेक विचित्र-विचिन्न, उद्यान, विविध निर्ल॑र-कन्दराएँ हैं ओर वह पर्वत विविध विशाल शिखर, दरी और कांजों से विभूषित है ।६५३-५५' उस पव॒॑त से चरद्रावर्ता नाम की एक उत्तम नदी प्रवाहित होती है। यह॒अत्पन्त पवित्र है और इसका जल चन्द्रमा की क्रिरण की तरह निमंल है। वह नक्षत्रों के अधिपति चन्द्रमा का श्रेष्ठ स्थान है । वहाँ गृह-नायक चन्द्रमा सदा उतरा करते हैं। वहाँ चन्द्रमा के नाम का एक विख्यात पव॑ त है । वह महाद्वीप

English

Pitrs then drink the nectar for two Kalas on the new moon day, when the Moon develops by the Susumna ray of the Sun.

अध्याय ५६

श्लोक 20

विधवां तां सुतां दृष्ट्वा राजा शोकसमन्वितः ।उवाच वचनं तत्र स्वभार्यां दुःखपीडिताम्

vidhavāṃ tāṃ sutāṃ dṛṣṭvā rājā śokasamanvitaḥ / uvāca vacanaṃ tatra svabhāryāṃ duḥkhapīḍitām

हिन्दी अर्थ

चन्द्रद्वीप स्वगंलोक और मृत्युलोक में प्रकाशित (प्रसिद्ध) है ।१६-५८५। वहाँ की प्रजा चन्द्रमा की भाँति कान्तिमान्, पूर्ण चन्द्र के समान मुखमण्डलधारी, चन्द्रमा के समान विमल, चस्प्रपूजक, अत्यन्त धार्मिक, सौम्य, सत्य प्रतिन्ष तेजस्व्री और सदाचारी रहकर हजार वर्ष जोवित रहती है । पश्चिम दिग्वर्ती उत्त द्वीप के पर्चिम भद्राकर नाम का द्वीप है। यह समुद्र से चार हजार योजन दूर है। यह दस हजार योजनों में फैला हुआ

English

When the Moon is completely exhausted after being drunk, the Sun develops it by his Susumna ray for Pitrs, the drinkers of Soma.

अध्याय ५६

श्लोक 21

प्रिये दुःखम् इदं जातं यावज्जीवं सुदुःसहम् ।नैषा रक्षयितुं शक्या रूपयौवनगर्विता

priye duḥkham idaṃ jātaṃ yāvajjīvaṃ suduḥsaham / naiṣā rakṣayituṃ śakyā rūpayauvanagarvitā

हिन्दी अर्थ

है ।१६-६२। यह तरह-तरह के पुष्पों से शोभित, धन धास्‍स्यों से समृद्ध, अनेक राजाओं द्वारा पालित, सदा ३२४ .. वायुपुराणम्

English

When the digits of the Moon-are exhausted completely, the Sun develops it gradually by one fraction everyday. When the digits dwindle it becomes dark and when they develop it becomes white.

अध्याय ५६

श्लोक 22

दूषयेत कुलं क्वापि कथं रक्ष्या हि बालिका ।नोपायो विद्यते क्वापि भानुमत्याश्च रक्षणे ।परस्परं विवदतोः श्रुत्वा तत्कन्यकाब्रवीत्

dūṣayeta kulaṃ kvāpi kathaṃ rakṣyā hi bālikā / nopāyo vidyate kvāpi bhānumatyāśca rakṣaṇe / parasparaṃ vivadatoḥ śrutvā tatkanyakābravīt

हिन्दी अर्थ

तत्र भद्वासन वायोर्नानारत्नैश्व मण्डितम् । तत्न विग्नहवान्वायुः सदा पर्वंसु पूज्यते... ४६४

English

Thus the body of the Moon is developed by the power of the Sun. On the full moon day the Moon is complete in disc and white in colour. Thus is the decrease and increase of the Moon in the dark and bright halves.

अध्याय ५६

श्लोक 23

भानुमत्युवाच: न लज्जामि तवाग्रे ऽहं जल्पन्ती तात कर्हिचित् ।सत्यं नोत्पद्यते दोषो मदर्थे ते नराधिप

bhānumatyuvāca: na lajjāmi tavāgre 'haṃ jalpantī tāta karhicit / satyaṃ notpadyate doṣo madarthe te narādhipa

हिन्दी अर्थ

बीयबन्तो महाभागा: पत्चवर्षशतायुषः । सत्यसन्धा मुदा युक्ताः प्रजास्ता वायुदेवता: पौराणिकस्तदा सूत ऋषीणां भावितात्मनाम् । एतह्विस्तरतो भुयस्‍्तानुबाच समाहितः १७१

English

The Moon with Pitrs is known as Idvalsara. He is surrounded by fifteen rays shedding the nectar Sudha.

अध्याय ५६

श्लोक 24

अद्यप्रभृत्यहं तात धारयिष्ये न मूर्धजान् ।स्थूलवस्त्रपटार्द्धं तु धारयिष्यामि ते गृहे

adyaprabhṛtyahaṃ tāta dhārayiṣye na mūrdhajān / sthūlavastrapaṭārddhaṃ tu dhārayiṣyāmi te gṛhe

हिन्दी अर्थ

प्रसन्न, निमेल और विज्ञाल पर्वतों से युक्त है । यहाँ वायु देव का नाना रत्नों से मण्डित एक सुन्दर आसन है, जहाँ शरीरधारी वायुदेव सदा पर्चों में पूजे जाते हैं। वहाँ के लोंग तपाये हुये सोने की तरह रंगवाले होते हैं और उसी के भूषण पहनते हैं । वे देवता की तरह शोभित हैं । वे नाता रंग के कषड़े और माला पहनते हैं। वे वीयंद्ाली, सत्यप्रतिज्ञ, आनन्द सम्पन्न और वायूपूजक होकर पाँच सौ वर्षों तक जीते हैं

English

I shall now explain the Parvans and the junctions of Parvans. Just as the sugarcane-stem and the bamboo have knots in their joints, so also the bright and dark halves have Parvans. Their knots and joints differ in respect of the full moon day and the new moon day. Trtiy&( the 3rd Titki) and other tithis (lunar days) are the Parvans of the fortnight.

अध्याय ५६

श्लोक 25

करिष्यामि व्रतान्याशु पुराणविहितानि च ।आत्मानं शोषयिष्यामि तोषयिष्ये जनार्दनम्

kariṣyāmi vratānyāśu purāṇavihitāni ca / ātmānaṃ śoṣayiṣyāmi toṣayiṣye janārdanam

हिन्दी अर्थ

सूतजी बोले--परम तत्त्वज्ञ ऋषियों ने ज सा देखा है वैसा ही हमने देशों का स्वभाव सिद्ध वर्णन कर दिया है। अब और आगे हम आप लोगों को क्या कहें / इस भ्रकार धीमान् यूतपुत्र द्वारा कहे जाने पर फिर कुछ सुनने की इच्छा से ऋषियों ने पूछा ऋषिणरण बोले--हे सत्तम ! यह जो भारतवर्ष है, जहाँ प्रजासृष्टि के व्यापार-क्रम में स्वायम्भुवादि चौदह मनु उत्पन्न हुए हैं. इसे हम जानने की इच्छा करते हैं कहिये। पवित्रात्मा ऋषियों को बात सुनकर पुराण-पण्डित कथावाचक लोमहषंणजी स्थिर चित्त से किर विस्तार के साथ ऋषियों से कहने लगे ।६६-७ १।

English

Since the rites such as of kindling fire are performed during the Parvans, 1 they are auspicious. If there is the overlapp¬ ing of Pratipad in the evening, that time belongs to the full moon.

अध्याय ५६

श्लोक 26

ममैषा वर्तते बुद्धिर् यदि त्वं तात मन्यसे ।भानुमत्या वचः श्रुत्वा राजा संहर्षितो ऽभवत्

mamaiṣā vartate buddhir yadi tvaṃ tāta manyase / bhānumatyā vacaḥ śrutvā rājā saṃharṣito 'bhavat

हिन्दी अर्थ

सतजी बोले-हे द्विजगण ! कुरुषषं कौ स्वाभाविक स्थिति को हमने यथार्थ रूप से कह दिया।

English

According to VP III.11.118-119, the 14th Tithi, 8th Tithi, Ama¬ vasya and Purnima, the Sun's passage from one rdii to another are called Parvans.

अध्याय ५६

श्लोक 27

तीर्थयात्रां समुद्दिश्य कोशं दत्त्वा सुपुष्कलम् ।विसृज्य पुरुषान्वृद्धान् कृत्वा तस्याः सुरक्षणे

tīrthayātrāṃ samuddiśya kośaṃ dattvā supuṣkalam / visṛjya puruṣānvṛddhān kṛtvā tasyāḥ surakṣaṇe

हिन्दी अर्थ

तत: स्वर्गश्व मोक्षश्र मध्यश्रान्तश्न गस्‍्यते । न खल्वन्यत्र सर्त्यानां भूमौ कर्म विधीयते .. भारतस्यास्य वर्बस्य नव भेदाः प्रकोतिता: । समुद्रान्तरिता ज्ञेयास्ते त्वगम्याः परस्परम् ७८ इखटद्ीपः कसेरुश्व ताम्रवर्णो गभस्तिमान् । नागद्वीपस्तथा सौम्यो गन्धवेस्त्वथ वारुणः

English

When the Sun is stationed in Vyatipata' 1 at a deviation of half meridian (?) line at a distance of a Yuga the meridian of the Moon is risen duly by the distance of a Yuga.

अध्याय ५६

श्लोक 28

पुरुषान् सायुधांश् चापि ब्राह्मणान्सपुरोहितान् ।दासीदासान्पदातींश्च चास्याः संरक्षणक्षमान्

puruṣān sāyudhāṃś cāpi brāhmaṇānsapurohitān / dāsīdāsānpadātīṃśca cāsyāḥ saṃrakṣaṇakṣamān

हिन्दी अर्थ

तेषां संव्यवहारो5यं बतंते तु परस्परम् । धर्मार्थकामसंयुक्तो वर्णानां तु स्वकमंसु ८४

English

This is because (the Sun and the Moon) glance each other after the elapse of the full moon (period), and that time their minutes of declination arc the same.

अध्याय ५६

श्लोक 29

ततः पितुर्मतेनैव गङ्गातीरं गता सती ।अवगाह्य तटे द्वे तु गङ्गायाः स नराधिप

tataḥ piturmatenaiva gaṅgātīraṃ gatā satī / avagāhya taṭe dve tu gaṅgāyāḥ sa narādhipa

हिन्दी अर्थ

अब भारत वर्ष के सम्बन्ध में कहते हैं, सुनिये--पूरब से पश्चिम तरफ लम्बायमान हिमालय पहाड़ के दक्षिण पुण्य तीथं भारतवर्ष है । इस देश का जैसा विस्तार है, उसे सुनिये। अब हम आप लो गों को भारतवषं कीं प्रजा का वर्णन करेंगे ।७२-७४। यह मध्यम स्थान विचित्र है, शुभाशुभ फलों का यहाँ उदय होता है। समुद्र के उत्तर और हिमालय के दक्षिण जो देश है, वह भारतवर्ष कहलाता है। यहाँ भारती प्रजा रहती है। प्रजाओं का भरण-पोषण करने के कारण यहाँ के मनु भरत कहे गये हैं। भरत नाम की इस प्रकार निर्रक्ति होने के कारण यह भारतवर्ष कहलाया ।७५-७६। यहीं से स्वर्ग मोक्ष, मध्य तथा अन्त गति प्राप्ति होती है। इस स्थान को छोड़कर मृत्युलोक वासियों के लिये दूसरी जगह कहीं कर्म करने की व्यवस्था नहीं है।इस भारतवर्ष के नौ भेद कहे गये हैं ये नव द्वीप समुद्र से घिरे हुये हैं; अतः परस्पर अगम्य हैं ७७-७८५। इन्द्रद्टी प,

English

Calculation proceeds on the basis of the time and direction of the Sun. That is the time prescribed for the rite to be performed instantly.

अध्याय ५६

श्लोक 30

नित्यं सम्पूज्य सद्विप्रान्गन्धमाल्यादिभूषणैः ।द्वादशाब्दानि सा तीरे गङ्गायाः समवस्थिता

nityaṃ sampūjya sadviprāngandhamālyādibhūṣaṇaiḥ / dvādaśābdāni sā tīre gaṅgāyāḥ samavasthitā

हिन्दी अर्थ

कसेरू, ताम्रवर्णी, गभस्तिमान्, नागद्वीप, सौम्य, गंधव॑ं और वारुण के अतिरिक्त नोगाँ यह भारतवर्ष सागर द्वारा घिरा हुआ है । यह द्वीप दक्षिण से उत्तर हजार योजन का है । ७९-८०। यह कुमारी से लेकर हिमालय तक तियंक् भाव से उत्तर ओर नौ हजार योजन वबिस्तीर्ण है। यह ढीप इस प्रकार बसा हुआ है कि, इसके अन्त में म्लेच्छ, पूर्व में किरात, पश्चिमान्त में यवन रहते हैं ।५१-८२। और मध्य में विभक्त होकर ब्राह्मण,

English

When the Moon is full after a complete period of a pahs a (half-month) but the Punduia is the joint of the night (i.e. when it rises one digit less than the full) it is looked after by Pitrs along with Devas, and hence it is known as Antenati Purnima.

अध्याय ५६

श्लोक 31

त्यक्त्वा गङ्गां तदा राज्ञी गता काष्ठां तु दक्षिणाम् ।प्राप्ता सा सचिवैः सार्द्धं यत्र रेवा महानदी

tyaktvā gaṅgāṃ tadā rājñī gatā kāṣṭhāṃ tu dakṣiṇām / prāptā sā sacivaiḥ sārddhaṃ yatra revā mahānadī

हिन्दी अर्थ

क्षत्रिय, वेद्य तथा शुद्र निवास करते हैं। ये वर्णचतुष्टय यज्ञ, युद्ध एवं व्यापारादि के द्वारा जीविका निर्वाह करते हैं। इन वर्ण चतुष्टयों का अपने-अपने कर्मों में परस्पर व्यवहार धर्म, और काम के अनुरूप होता है। यस्त्वयं नवसो द्वीपस्तियंगायत उच्यते । क्ृत्स्नं जयति यो होन॑ स सम्राडिह कीरत्यंते

English

The Moon shines very brilliantly on the full moon night. Sages call it Raka because the Moon delights then.

अध्याय ५६

श्लोक 32

समाः पञ्च स्थिता तत्र ओङ्कारे ऽमरकण्टके ।उदग्याम्येषु तीर्थेषु तीर्थात्तीर्थं जगाम सा

samāḥ pañca sthitā tatra oṅkāre 'marakaṇṭake / udagyāmyeṣu tīrtheṣu tīrthāttīrthaṃ jagāma sā

हिन्दी अर्थ

अय॑ लोकस्तु वे सम्नाडन्तरीक्षों विराट्स्पृतः स्वराडन्यः स्पृतों लोक: पुनर्वेक्ष्यामि विस्तरमु ॥

English

The night on which the Moon and the Sun stay together in the same constellation is called Amavasya. It is the fifteenth night (after the full moon).

अध्याय ५६

श्लोक 33

स्नात्वा स्नात्वा पूज्य विप्रान् भक्तिपूर्वम् अतन्द्रिता ।वारुणीं सा दिशं गत्वा देवनद्याश्च सङ्गमे

snātvā snātvā pūjya viprān bhaktipūrvam atandritā / vāruṇīṃ sā diśaṃ gatvā devanadyāśca saṅgame

हिन्दी अर्थ

तेषां सहस्नशश्रान्ये प्व॑तास्तु समीपगा: । अभिजाता: सर्वंगुणा वितुलाभ्ित्रसानवः ॥८ ६ मन्दरः पर्व॑तश्रेष्ठो वहारो दर्दुरस्तथा। कोलाहलः ससुरसो मैनाको बेच्य॒तस्तथा .

English

The Moon is clear on the full moon day. The moon and the Sun are full in the afternoon and see each other in the Vyatipata. That is the full moon day.

अध्याय ५६

श्लोक 34

ददर्श चाश्रमं पुण्यं मुनिसङ्घैः समाकुलम् ।दृष्ट्वा मुनिसमूहं सा प्रणिपत्येदम् अब्रवीत्

dadarśa cāśramaṃ puṇyaṃ munisaṅghaiḥ samākulam / dṛṣṭvā munisamūhaṃ sā praṇipatyedam abravīt

हिन्दी अर्थ

पुष्पगियुज्जयन्तो च शैलो रेवतकस्तथा श्रीपबंतश्च कारश्च कूटशैलो गिरिस्तथा १६२

English

In the Amavasya, at the joints of the Parvans, there is the short time of two Lavas —the time taken to utter the two syllables ku-hu. It is remembered to be the time (for the sacred rites). In the Amavasya when the Moon is completely invisible, it comes into contact with the Sun from the midday to the midnight. It suddenly gets released from the Sun in the morning. Ilie Sun comes out in the midday, alter remaining in conjunction for two Kalas.

अध्याय ५६

श्लोक 35

माहात्म्यम् अस्य तीर्थस्य नाम चैवास्य कीदृशम् ।कथयन्तु महाभागाः प्रसादः क्रियतां मम

māhātmyam asya tīrthasya nāma caivāsya kīdṛśam / kathayantu mahābhāgāḥ prasādaḥ kriyatāṃ mama

हिन्दी अर्थ

इरावती वितस्ता च विपाशा देविका कुहू: । गोमती धुतपापा च बाहुदा च दूषढ्वती ३६५ कौशिकी च तृतीया तु निश्चोरा गण्डकी तथा । इक्षुलॉहित इत्येता हिमवत्पादनि:सृता ६६ बेदस्मृतिवेंदवर्ती वृत्रध्नी सिन्धुरेव च वर्णाशा चन्दना चंव सतीरा मह॒ती तथा इसी देश में स्वर्ग और अपवर्ग के लिये संकल्पजन्य पाँच आश्रम ? यथाविधि प्रति पालित होते हैं और इन आश्रमों में मनुष्यों की स्वभावतर: प्रवत्ति है। जो यह नवम द्वीप टेढ़ा और लम्बा कहा गया है, उसे जो सम्पूर्ण जीत लेता है, वही यहाँ सम्राट कहलाता है ।८३-८६। वह इस लोक में सम्राट अन्तरिक्ष में विराट और अन्यलोक में स्व॒राट् कहलाता है जो हो हम इसके आगे की बातें विस्तार पूर्वक कहते हैं। सुन्दर पर्व (गाँठ

English

On the Pratipad day of the bright half, the Moon gets released from the Sun's disc. The time of getting released from the d isc is the app ropriate time for Ahuti of Daria and Vasatkriya. The

अध्याय ५६

श्लोक 36

ऋषय ऊचुः ।चक्रतीर्थं तु विख्यातं चक्रं दत्तं पुरा हरेः ।महेश्वरेण तुष्टेन देवदेवेन शूलिना

ṛṣaya ūcuḥ / cakratīrthaṃ tu vikhyātaṃ cakraṃ dattaṃ purā hareḥ / maheśvareṇa tuṣṭena devadevena śūlinā

हिन्दी अर्थ

का स्तर) वाले महेन्द्र, मलय, सत्य, शुक्तिमान्, कक्ष, विन्व्य और पारियात्र यहाँके सात कुल पर्वत हैं ।7७-८८। इनके समीप में भी अन्यान्य हजारों पव॑त हैं। ये सभी सब गुणों से युक्त, ब॒हत् विचित्र शिक्षर सम्पन्न और रमणीय हैं । परव॑तश्नं षठ मन्दर, वैहार, ददुर. कोलाहल, ससुरस मैनाक, बैद्युत, पातन्धम, पाडर, गन्तुप्रस्थ, कृष्णगिरि, गोधनगिरि, पुष्पगिरि, उज्जयन्त, रवतक, श्रीपवंत, कारु, कूटशैल आदि अनेक पव॑ंतों

English

The text is rather obscure. Surya-Siddhanta XI.1.2 defines Vyatipata as follows:

अध्याय ५६

श्लोक 37

अत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा तर्पयेत् पितृदेवताः ।अनिवर्तिका गतिस् तस्य जायते नात्र संशयः

atra tīrthe tu yaḥ snātvā tarpayet pitṛdevatāḥ / anivartikā gatis tasya jāyate nātra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

के अतिरिक्त छोटे-छोटे भी कितने ही पहाड़ हैं ।5६-६२२। इन पव॑तों के पाददेश में क्रितने ही देश हैं, जहाँ आये और म्लेच्छ निवास करते हैं ।९३। वे सब इन नदियों का पानी पिया करते हैं--गंगा, सिंधु, सरस्वती, शतद्ु, चन्द्रभागा, यमुना, सरयू. इरावती, वितस्ता, विपाशा, देविका, कुहू , गोमती, धुतपाता, बाहुदा, दुषद्वती, कौशिकी, तृतीया, गंडकी, निश्चीरा, इक्ष और लोहित। ये नदियाँ हिमालय के पाददेश से निकली हैं । तमसा पिप्पला श्रोणी करतोया पिशाचिका । नीलोत्पला विपाशा च जम्बुला वालुवाहिनो

English

During the day in the Amavasya Parvan (in the dark half) the Moon remains emaciated. Therefore, on the Amavasya day the Sun is swallowed by the evil planets in the firmament.

अध्याय ५६

श्लोक 38

द्वितीये ऽह्नि ततो गच्छेच्छूलभेदे तपस्विनि ।पूर्वोक्तेन विधानेन स्नानं कुर्याद् यथाविधि

dvitīye 'hni tato gacchecchūlabhede tapasvini / pūrvoktena vidhānena snānaṃ kuryād yathāvidhi

हिन्दी अर्थ

सितेरजा शुक्तिमती मक़॒णा त्रिदिवा क्रमात्। ऋक्षपादात्प्रसुताश्व नद्यो मणिनिभोदकाः.

English

The names of the Tithis have been assigned by the honoured and sensible scholars in accordance with the digits of the Moon.

अध्याय ५६

श्लोक 39

जन्मत्रयकृतैः पापैर् मुच्यते नात्र संशयः ।जलेन तिलमात्रेण प्रदद्याद् अञ्जलित्रयम्

janmatrayakṛtaiḥ pāpair mucyate nātra saṃśayaḥ / jalena tilamātreṇa pradadyād añjalitrayam

हिन्दी अर्थ

गोदावरी भीमरथी कृष्णा बेण्यथ वऊुजुला । तुद॒भद्रा सुप्रयोगा कावेरी च तथा55पगा ॥ कृतमाला ताम्रवर्णी पुष्पजात्युत्पलावती । मलयाभिजातास्ता नद्यः सर्वाः शौतजला: शुभाः

English

The Sun and the Moon sec each other on that day. It comes out and separates itself from the disc of the Sun gradually. Foi the duration of two Lavas, the Moon touches the Sun in the couise of the day and the night. That is the (auspicious) time for Daria and Vasatkriya.

अध्याय ५६

श्लोक 40

तृप्यन्ति पितरस्तस्य द्वादशाब्दान्य् असंशयम् ।यः श्राद्धं कुरुते भक्त्या श्रोत्रियैर् ब्राह्मणैर् नृप

tṛpyanti pitarastasya dvādaśābdāny asaṃśayam / yaḥ śrāddhaṃ kurute bhaktyā śrotriyair brāhmaṇair nṛpa

हिन्दी अर्थ

ऋषीका सुकुमारी च मन्दगा मन्दवाहिनी । कूपा पलानिशी चंब शुक्तिमत्पभवाः स्मृता:ः

English

The Amavasya (which gets mixed with the Pratipad, the first day, of the next fortnight for) the duration of as much time as is required for the cuckoo to utter Ku-hu is called Ku-hu.

अध्याय ५६

श्लोक 41

वार्द्धुष्याद्यास्तु वर्ज्यन्ते पित्ःणां दत्तम् अक्षयम् ।अपरे ऽह्णि ततो गच्छेत् पुण्यां देवशिलां शुभाम्

vārddhuṣyādyāstu varjyante pitḥṇāṃ dattam akṣayam / apare 'hṇi tato gacchet puṇyāṃ devaśilāṃ śubhām

हिन्दी अर्थ

सर्वा: पुण्या: सरस्वत्याः सर्वा गहगाः समुद्रगाः । विश्वस्थ सातर: सर्वा जगत्पापहराः स्मृताः श्रसेता भव्रकारा बोधाः शतपथेश्व रे: । वत्सा: किसष्णा: कुलयश्च कुन्तलाः काशिकोशलाः:

English

(Defective) When the Moonis emaciated (due to loss of digits) yet has the remnant of a (slight digit of the measure of) Sinivali and the Amavasya enters the Sun (gets mixed up with the last part of the calurdaii day), it is called Sinivali.

अध्याय ५६

श्लोक 42

वीक्ष्यते जाह्नवी पुण्या देवैर् उत्पादिता पुरा ।स्नात्वा तत्र जलं दद्यात् तिलमिश्रं नराधिप

vīkṣyate jāhnavī puṇyā devair utpāditā purā / snātvā tatra jalaṃ dadyāt tilamiśraṃ narādhipa

हिन्दी अर्थ

शिप्रा, अवन्ती आदि नदियाँ पारियात्र पहाड़ से निकली हैं ।६४-६८। महानदी शोण, नमंदा, सुमहाद्वुमा, मन्द किनी, दक्षार्णा, चित्रकूटठा, तमसा, पिप्पला, श्रोणी, करतोया, पिशाचिका, नीलोत्पला, विपाशा, जम्बूला, बालुवाहिनी, सितेरणा, दाक्तिमती, मक्रणा और त्रिदिवा क्रम से ऋक्ष परत से उत्पन्न हुई हैं और इनका जल मणि के तुल्य है ।6६-१० १। तापी, पयोष्णी, निर्जेल्ध्या, मद्रा, निषधा, वेन्चा वंतरणी, शितिबाहु. कुमुद्गती,

English

The duration of Parvan in both is equal. Vasatkriya in the Vyatlpata of the Sun and the Moon (is forbidden?). The two types of full moon (i.e. Anumati and Raka) have already been explained.

अध्याय ५६

श्लोक 43

सकृत्पिण्डप्रदानेन मुच्यते ब्रह्महत्यया ।एकादश्याम् उपोषित्वा पक्षयोर् उभयोर् अपि

sakṛtpiṇḍapradānena mucyate brahmahatyayā / ekādaśyām upoṣitvā pakṣayor ubhayor api

हिन्दी अर्थ

तोया. महागोरी, दुर्गा और अन्तशिला विन्ध्य के पाद देश से उत्पन्न हुई हैं ये नदियाँ पुण्य सलिला हैं। गोदावरी, भीमरथी, कृष्णा वेणी, वञुजुला, तुंगभद्रा, सुप्रयोगा और कावेरी नाम की नदियाँ दक्षिण देश की नदियाँ हैं और ये सह्य पंत के पादघुल से बाहुर आयी हैं । कृतमाला, ताम्रपर्णी, पुष्यजाती और उत्पलावती मलया« चल से निकली हैं। इन नदियों का जल शीतल और शुभ कारक है ।१०२-१०४५। त्रिसामा, ऋतुकुल्या, इक्षुला, त्रिदिवा, लांगूलिनी और वंशधरा महेन्द्र पर्वत से निकली हैं। ऋषीका, सुकुमारी, मन्दगा, मन्दवाहिनी, कृपा, पलाशिनी, शूक्तिमान् पहाड़ से उत्पन्न हुई हैं ।!०६-१०७। गंगा, सरस्वती आदि सभी नदियाँ समुद्र में जाकर गिरी हैं । ये सभी नदियाँ पवित्र, संसार के पाप को नष्ट करने वाली और संसार की माता स्वरूप हैं । इन नदियों की हजारों-सैकड़ों उपनदियाँ हैं। इनमें कुछ कुरुपाँचाल, शाल्व, जांगल, शूरसेन, भद्रकार, बोध,

English

The auspicious time on the Pratipad and Purnima is for the duration of two Matras. The auspicious time in Ku-hu and Sinivali is also the same (two matras).

अध्याय ५६

श्लोक 44

क्षपाजागरणं कुर्यात् पठेत्पौराणिकीं कथाम् ।विष्णुपूजां प्रकुर्वीत पुष्पधूपनिवेदनैः

kṣapājāgaraṇaṃ kuryāt paṭhetpaurāṇikīṃ kathām / viṣṇupūjāṃ prakurvīta puṣpadhūpanivedanaiḥ

हिन्दी अर्थ

इेर८... वायुपुराणम्

English

The auspicious time when the Moon is in the spheres of the Sun and fire has the duration of one Kda.

अध्याय ५६

श्लोक 45

प्रभाते भोजयेद् विप्रान् दानं दद्यात् सशक्तितः ।चतुर्थे ऽह्नि ततो गच्छेद् यत्र प्राची सरस्वती

prabhāte bhojayed viprān dānaṃ dadyāt saśaktitaḥ / caturthe 'hni tato gacched yatra prācī sarasvatī

हिन्दी अर्थ

अर्थपाश्च तिलडगाश्च सगधाश्च वुकः सह । मध्यदेशा जनपदा: प्रायशो5सी प्रकातिताः भरद्वाजेन मुनिना तत्प्रियार्थेबतारिताः । अन्तःपुरवनोद्ेशस्तेन जसे सनोरमः

English

Thus, it is the bright half (in which) during the 'joints 5 ofParvans of night the glorious Moon with its full disc gets eclipsed.

अध्याय ५६

श्लोक 46

ब्रह्मदेहाद् विनिष्क्रान्ता पावनार्थं शरीरिणाम् ।तत्र स्नात्वा नरो भक्त्या तर्पयेत् पितृदेवताः

brahmadehād viniṣkrāntā pāvanārthaṃ śarīriṇām / tatra snātvā naro bhaktyā tarpayet pitṛdevatāḥ

हिन्दी अर्थ

बान्लीका वाटधानाश्च आभीराः कालतोयकाः । अपरीताश्च शुद्राश्व पह लवाश्चमंख्नण्डिका: 0११५ गान्धारा यवनाश्चेव सिन्धुसौवी रभद्रका: । शका हदाः कुलिन्दाश्च परिता हारपुरिकाः

English

In fifteen nights the Moon develops fully by putting on fifteen Kalas, adding one everyday. There is no sixteenth Kala in the Moon. On the fifteenth day after the full moon, it becomes emaciated completely.

अध्याय ५६

श्लोक 47

श्राद्धं कृत्वा यथान्यायमनिन्द्यान् भोजयेद् द्विजान् ।पितरस्तस्य तृप्यन्ति द्वादशाब्दान्यसंशयम्

śrāddhaṃ kṛtvā yathānyāyamanindyān bhojayed dvijān / pitarastasya tṛpyanti dvādaśābdānyasaṃśayam

हिन्दी अर्थ

रमदा रद्धकटका केकया दशमानिका: । क्षत्रियोपनिवेशाश्च वेश्यशुद्रकुलानि च काम्बोजा दरदाश्चेव बबंराः प्रियलौकिका: । पीनाश्चेव तुषाराश्च पक्वा बाह्मतोदराः

English

Thus arc these Pitrs.. Devas, the drinkers of Soma and the replenishes of Soma, Artavas. and Rtus (seasons). Hence Devas worship them.

अध्याय ५६

श्लोक 48

सर्वदेवमयं स्थानं सर्वतीर्थमयं तथा ।देवकोटिसमाकीर्णं कोटिलिङ्गोत्तमोत्तमम्

sarvadevamayaṃ sthānaṃ sarvatīrthamayaṃ tathā / devakoṭisamākīrṇaṃ koṭiliṅgottamottamam

हिन्दी अर्थ

आत्रेयाश्च भरद्वाजाः प्रस्थलाश्च कसेरका: लम्पकाः स्तनपाश्चेब पीडिका जुहुडः सह॒.

English

Henceforth I shall describe the Pitrs who partake of the monthly Sraddha. I shall mention their goal, their inherent strength and the procedure of the Sraddha.

अध्याय ५६

श्लोक 49

त्रिरात्रं कुरुते यो ऽत्र शुचिः स्नात्वा जितेन्द्रियः ।पक्षं मासं च षण्मासमब्दमेकं कदाचन

trirātraṃ kurute yo 'tra śuciḥ snātvā jitendriyaḥ / pakṣaṃ māsaṃ ca ṣaṇmāsamabdamekaṃ kadācana

हिन्दी अर्थ

अपगाश्चालिमद्राश्व फिरातानां च जातयः । तोमरा हुंसमार्गाश्च काश्मी रास्तदगणास्तथा चुलिकाश्चाहुकाश्चैव पूर्णदर्वास्तथब च। एते देशा ह्यू,दीच्याश्च प्राच्यान्देशान्निबोधत

English

The departure of the deceased and their return cannot be comprehended even by well-accomplished penance. Then how can it be perceived through the physical eye?

अध्याय ५६

श्लोक 50

न तस्य सम्भवो मर्त्ये तस्य वासो भवेद् दिवि ।नियमस्थो विमुच्येत त्रिजन्मजनितादघात्

na tasya sambhavo martye tasya vāso bhaved divi / niyamastho vimucyeta trijanmajanitādaghāt

हिन्दी अर्थ

अन्भ्रवाका: सुजरका अन्तगगिरिबहिगिराः । तथा प्रवहुगवगेयामालदा मालवतिनः १२२

English

These Pitrs who are Srdddhadevas, are known as Laukika (Worldly) Pitrs. Devas, Saumyas and Yajvans are all Ayonijas (not born of a womb).

अध्याय ५६

श्लोक 51

विना पुंसा तु या नारी द्वादशाब्दं शुचिव्रता ।तिष्ठते साक्षयं कालं रुद्रलोके महीयते

vinā puṃsā tu yā nārī dvādaśābdaṃ śucivratā / tiṣṭhate sākṣayaṃ kālaṃ rudraloke mahīyate

हिन्दी अर्थ

सतपथेदव र, वत्स, किसष्ण, कुल्य, कुन्तल, काशिकोशल, तैलंग और मगध में बहती हैं। मध्यम प्रदेश के देश प्रायः ये ही कहलाते हैं ।१ ०८६-१११। सह्मपबंत के उत्तराद्धं में जहाँ गोदावरी नदी बहती है, वह प्रदेश संपूर्ण पृथ्वी में मनोहर है। यहाँ इन्द्र ने गोवद्धंन नामक स्वगंपुर का निर्माण किया है। भरद्वाज मुनि ने रामचन्द्र की प्रिय कामना से वहाँ ब॒क्ष और औषधियों को उगाया है। वह वन रामचन्द्र के अन्त:पुर के उद्देई्य से बनाया गया है, अतः यह मनोहर बना है ।११२-११४। उत्तर की ओर इतने देश हैं--वाह्लीक, वाटधान आभीर, कालतोयक, अपरीत, शुद्र, पहक्कव, चमंखण्डिक, गान्धार, यवन, सिन्धु, सौवीर, भद्कक, शक, हद, कुलन्दि, परित, हारपूरिक, रमट, रडंकटक, केकय, दशमानिक ये क्षत्रियोपनिवेज्ञ हैं। वश्य-शूद्र कुलों से युक्त

English

All these Pitrs are Devas, for the latter make them flourish. There are human Pitrs while others are proclaimed as Laukika (worldly) Pitrs.

अध्याय ५६

श्लोक 52

मुनीनां वचनं श्रुत्वा मुदा परमया ययौ ।ततो ऽवगाह्य तत्तीर्थमहर्निशमतन्द्रिता

munīnāṃ vacanaṃ śrutvā mudā paramayā yayau / tato 'vagāhya tattīrthamaharniśamatandritā

हिन्दी अर्थ

प्रस्थल, कसेरुक, लम्पाक, स्तनय, पीड़िक, जुहुड, अपग, अलिमद्र किरातजाति, तोमर, हंसमाम, काइ्मीर, तंगण, चुलक, आहुक, और पूर्णदर्व हैं। पूरब दिशा के देशों को सुनिये --११५-१३१। आन्श्रवाक, सुजरक,

English

(The human Pitrs are) father, grand-father, great-grand¬ father. Those who perform Tajnas with Soma are known as Soma-sacrificers.

अध्याय ५६

श्लोक 53

दृष्ट्वा तीर्थप्रभावं तु पुनर्वचनमब्रवीत् ।श्रूयतां वचनं मे ऽद्य ब्राह्मणाः सपुरोहिताः

dṛṣṭvā tīrthaprabhāvaṃ tu punarvacanamabravīt / śrūyatāṃ vacanaṃ me 'dya brāhmaṇāḥ sapurohitāḥ

हिन्दी अर्थ

+ धनुद्चिह्वान्तमंग्रन्थो ग. पुस्तके नास्ति। +- धनुरिचद्वान्तगंग्रत्थो घ. पुस्तके नास्ति । ब्रह्मोत्तरा: प्रविजया भागवा गेयमर्थका: । प्राग्ज्योतिषाश्व मुण्डाश्र विदेहास्ताम्नलिप्तका: ॥

English

Those who are mentioned as Yajvans are Barhisads. En¬ gaged in holy rites, they remain happy and content till they take another body.

अध्याय ५६

श्लोक 54

न त्यजामीदृशं स्थानं यावज्जीवमहर्निशम् ।मत्पितुश्च तथा मातुः कथयध्वम् इदं वचः

na tyajāmīdṛśaṃ sthānaṃ yāvajjīvamaharniśam / matpituśca tathā mātuḥ kathayadhvam idaṃ vacaḥ

हिन्दी अर्थ

अथापरे जनपदा दक्षिणापथवासिनः । पाण्ड््याश्व केरलाश्चेव चोल्याः कुल्यास्तथंव च

English

Those who perform sacrifices and preside over them are known as Agnisvdltas. Those who adhere to their duties in virtue of their stages in life, those who closely follow the traditions, those who do not blunder in the performance of their rites with faith, those who are engaged in the holy rites till death, after being endowed with celibacy, penance, Tajiia, progeny, faith, learning and charitable gifts (are also called Agnisvattas.)

अध्याय ५६

श्लोक 55

त्वत्कन्या शूलभेदस्था नियता व्रतचारिणी ।एवमुक्त्वा स्थिता सा तु तत्र भानुमती नृपः

tvatkanyā śūlabhedasthā niyatā vratacāriṇī / evamuktvā sthitā sā tu tatra bhānumatī nṛpaḥ

हिन्दी अर्थ

सेतुका मुषिक्राश्चेव कुमना वनवासिकाः । महाराष्ट्रा माहिषकाः कलिड्भाश्चेव सवंश!ः. अ (आ) भोरा: सहर्चेषीका आटब्याश्न वराश्व ये । पुलिन्दा विन्ध्यमुलीका वदर्भा दण्डकः सह

English

After reaching heaven they rejoice along with Devas, Pitrs and the subtle-bodied Soma-drinkers and they worship Piemans (?)

अध्याय ५६

श्लोक 56

एकान्तरोपवासस्था शनैर्मासोपवासिता ।देवशिलास्थिता नित्यं दध्यौ सा चक्रपाणिनम्

ekāntaropavāsasthā śanairmāsopavāsitā / devaśilāsthitā nityaṃ dadhyau sā cakrapāṇinam

हिन्दी अर्थ

पौनिका सोनिकाश्चेब अस्मका भोगवर्धना: । नेणिकाः कुन्तला अन्ध्रा उद्धूद्रा नलकालिका:

English

Only those who performed holy rites and were blessed with progeny are praised. Oblations and food-offerings are given to them by their kinsmen and persons born of their families.

अध्याय ५६

श्लोक 57

अहर्निशं दहेद् धूपं चन्दनं च सदीपकम् ।पादशौचं स्वयं कृत्वा स्वयं भोजयते द्विजान् ।द्वादशाब्दानि सा राज्ञी सुव्रता तत्र संस्थिता

aharniśaṃ dahed dhūpaṃ candanaṃ ca sadīpakam / pādaśaucaṃ svayaṃ kṛtvā svayaṃ bhojayate dvijān / dvādaśābdāni sā rājñī suvratā tatra saṃsthitā

हिन्दी अर्थ

दक्षिणात्याश्न वे देशा अपरांस्तान्निबोधत । सूर्पाकाराः कोलवना दुर्गा: कालोतकः सह ६२८ समालवाश्च करूषाश्च रोकलाश्चोत्कलै: सह । उत्तमार्णा दशार्णाश्च भोजाः किष्किन्धक: सह

English

Partaking of the monthly Sraddha, the Somalaukikas be¬ come satisfied. They are human Pitrs and partake of monthly Sraddhas.

अध्याय ५६

श्लोक 58

ईश्वर उवाच: अन्यद् देवशिलायास्तु माहात्म्यं शृणु भूपते ।कथयामि महाबाहो सेतिहासं पुरातनम्

īśvara uvāca: anyad devaśilāyāstu māhātmyaṃ śṛṇu bhūpate / kathayāmi mahābāho setihāsaṃ purātanam

हिन्दी अर्थ

तोसलाः कोसलाश्चंब त्रेयुरा वेदिकास्तथा । तुमुरास्तुम्बुराश्चेव षट्सुरा निषधः सह

English

Others get entangled in their actions and rebirths in wombs. Fallen from their A$rama duties and devoid of Svadha

अध्याय ५६

श्लोक 59

कश्चिद् वनेचरो व्याधः शबरः सह भार्यया ।दुर्भिक्षपीडितस् तत्र आमिषार्थं वनं गतः

kaścid vanecaro vyādhaḥ śabaraḥ saha bhāryayā / durbhikṣapīḍitas tatra āmiṣārthaṃ vanaṃ gataḥ

हिन्दी अर्थ

अनूपास्तुण्डिकेराश्च वीतिहो ज ह्यवन्तयः । एते जनपदाः सर्वे विन्ध्यपृष्ठनिवासिनः मुण्ड, विदेह, ताभ्रलिप्तकक, माला, मगध ओर गोविन्द ।!२२-१२३। इसके बाद दक्षिण दिशा के देश और के निवासी ये हैँं--पाण्डय, केरल, चौल्य, कुल्य, सेतुक, मुषिक, कुमन, वनवासिक, महाराष्ट्र, माहिषक, कलिंग

English

Desirous of water, they roam hither and thither near rivers,lakes, tanks and wells. They covet foodstuffs left by others. They tremble and move about here and there.

अध्याय ५६

श्लोक 60

नापश्यत् पक्षिणस् तत्र न मृगान्न फलानि च ।सरस्ततो ददर्शाथ पद्मिनीखण्डमण्डितम्

nāpaśyat pakṣiṇas tatra na mṛgānna phalāni ca / sarastato dadarśātha padminīkhaṇḍamaṇḍitam

हिन्दी अर्थ

नेणिक, कुन्तल, अन्ध्र, उद्धिद और नलकलिका ।१२४-१२७। इतने तो दक्षिण दिशा के देश हुये, और जो अन्यदेश हैं उन्हें भी सुनिये--सूर्पाकार, कौलवन, दुर्ग, कालीतक, पुलेय, सुराल, रूपस, तापस, सुरसित, परक्षर, और नासिक्य प्रभ्ति एवं इनके अतिरिक्त नमदानदी के तौरबर्ती अन्यान्य देश---भानुकच्छ, समाहेय, सहस, शाइवत, कच्छीय, सुराष्ट्र, आनर्त, आरबुंद, और संपरीत । अब विन्ध्याचलस्थ देशों का नाम सुनिये ।(२८-१३१।

English

They move from one place of torture to another. They are thrown in different hells like Salmall, Vaitarani, Kumbhlpaka, Karambhavaluka, Asipatravana and Silasampe- sana by (as a result of) their own activities.

अध्याय ५६

श्लोक 61

दृष्ट्वा सरोवरं तत्र शबरी वाक्यम् अब्रवीत् ।कुमुदानि गृहाण त्वं दिव्यान्याहारसिद्धये

dṛṣṭvā sarovaraṃ tatra śabarī vākyam abravīt / kumudāni gṛhāṇa tvaṃ divyānyāhārasiddhaye

हिन्दी अर्थ

मालव, करुष, रोकल, उत्कल, उत्तमाण, दशार्ण भोज, किष्कन्धक, तोसल, कोसल, जपुर, बेदिक तुमुर, तुंबुर, षट्सुर, निषध, अनूप, तुंडिकेर, ब्ीतिहोत्र और अवन्ती । इतने ये देश विध्याचल के पृष्ट देश में अवस्थित हैं हैं (!३२-१३४। इसके आगे अब हम पहाड़ी देशों को बताते हैं--निगहर, हंसमाग क्षुपण, तज्भूण, खस, ३३० वायुपुराणम््

English

It is here that they have their miserable hellish abodes devoid of joys of heaven. Offering three Pindas to those who passed to the other world by uttering their names and Gotras, they offer Pindas anticlockwise on the ground strewn over with Kusa grass. Thus they propitiate the Pitrs abiding in their places after death (or in their abodes as Pretas or Ghosts).

अध्याय ५६

श्लोक 62

देवस्य पूजनार्थं तु शूलभेदस्य यत्नतः ।विक्रयो भविता तत्र धर्मशीलो जनो यतः

devasya pūjanārthaṃ tu śūlabhedasya yatnataḥ / vikrayo bhavitā tatra dharmaśīlo jano yataḥ

हिन्दी अर्थ

कुशप्रावरणाश्चेब हुणा दर्वाः सहुृदकाः । त्रिगर्ता मालवाश्चेव किरातास्तामसः सह

English

Those who do not go to the abode of torture are born in any of the five types of living beings according to their (previous) activities. Whatever may be the birth taken by them, whether of animals or of immobile beings, they get their natural food in their respective births as a result of the offerings of food by the kinsmen in the course of Sraddha.

अध्याय ५६

श्लोक 63

भार्याया वचनं श्रुत्वा जग्राह कुमुदानि सः ।उत्तीर्णस्तु तटे यावद्दृष्ट्वा श्रीवृक्षमग्रतः

bhāryāyā vacanaṃ śrutvā jagrāha kumudāni saḥ / uttīrṇastu taṭe yāvaddṛṣṭvā śrīvṛkṣamagrataḥ

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्ते भुवनविन्यासों पश्चचत्वारिशोष्ध्याय: ॥ यच्च किंपुरुषं वर्ष हरिवर्ष तथेव च। आचक्षव नो यथा तत्त्व॑ कीतितं भारत त्वया

English

The offering of food in Sraddha shall be made at the auspicious time to deserving persons. Then alone it reaches the place where the departed kinsman stays.

अध्याय ५६

श्लोक 64

श्रीफलानि गृहीत्वा तु सुपक्वानि विशेषतः ।शूलभेदं स सम्प्राप्तो ददर्श सुबहूञ्जनान्

śrīphalāni gṛhītvā tu supakvāni viśeṣataḥ / śūlabhedaṃ sa samprāpto dadarśa subahūñjanān

हिन्दी अर्थ

कुशप्रावरण, हुण, दवं, सहूदक, त्रिगते, मालब, किरात और तामस हैं। विद्वानों ने भारत वर्ष में कृत, त्रेता, द्वापर और कलि तामक चार युग बताये हैं। इनका पूरा परिचय तथा स्त्रभाव आदि का वर्णन बाद में किया

English

Just as the calf is able to seek and find out its mother- cow even if it is lost among other cows, so also the mantra chanted in the course of Sraddha carries the gifts to the Pitrs.

अध्याय ५६

श्लोक 65

चैत्रमासे सिते पक्षे एकादश्यां नराधिप ।तस्मिन्नहनि नाश्नीयुर्बाला वृद्धास्तथा स्त्रियः

caitramāse site pakṣe ekādaśyāṃ narādhipa / tasminnahani nāśnīyurbālā vṛddhāstathā striyaḥ

हिन्दी अर्थ

सृतजी बोले--ऋषियों ने इस प्रकार उत्तर सुनकर आनन्द से युक्त होकर कुछ और सुनने की इच्छा से लोमहष से पूछा

English

So also the Sraddha offered through the Mantras reaches the manes. So Sanatkumara, who had discovered the movements of the departed souls by his divine vision, could explain how food in Sraddha could reach the manes.

अध्याय ५६

श्लोक 66

मण्डपं ददृशे तत्र कृतं देवशिलोपरि ।वस्त्रैः संवेष्टितं दिव्यं स्रङ्माल्यैरुपशोभितम्

maṇḍapaṃ dadṛśe tatra kṛtaṃ devaśilopari / vastraiḥ saṃveṣṭitaṃ divyaṃ sraṅmālyairupaśobhitam

हिन्दी अर्थ

ऋषिगण बोले- जिस प्रकार अपने भारतवर्ष के बारे में बताया है, उसी प्रकार किपुरुषब्ष और

English

These Pitrs, are known as Bahvikas, Usmapas and Divaklrtyas. The dark half is their day-time and the bright half is their night for sleep.

अध्याय ५६

श्लोक 67

ऋषयश्चागतास्तत्र ये चाश्रमनिवासिनः ।सोपवासाः सनियमाः सर्वे साग्निपरिग्रहाः

ṛṣayaścāgatāstatra ye cāśramanivāsinaḥ / sopavāsāḥ saniyamāḥ sarve sāgniparigrahāḥ

हिन्दी अर्थ

ट्टद नास्ति ग. थ. . पुस्तकेष । पृष्टस्त्विदं यथा विप्रैयंथाप्रश्नं विशेषतः । उबाच मुनिनिदिष्टं पुराणं बिहितं यथा .. ॥३े

English

Thus these Pitrs are Devas and Devas are Pitrs. Rtus and Artavas are declared as Pitrs mutually.

अध्याय ५६

श्लोक 68

देवनद्यास्तटे रम्ये मुनिसङ्घैः समाकुले ।आगच्छद्भिर् नृपश्रेष्ठ मार्गस्तत्र न लभ्यते

devanadyāstaṭe ramye munisaṅghaiḥ samākule / āgacchadbhir nṛpaśreṣṭha mārgastatra na labhyate

हिन्दी अर्थ

अनामया हाशोकाश्च सर्वे ते शुद्धभानसाः । जायन्ते सानवास्तत्न निस्तप्तकनकप्रभाः ६

English

Thus these godly Pitrs and the human ones are de¬ lighted by Sraddha rites offered to them.

अध्याय ५६

श्लोक 69

दृष्ट्वा जनपदं तत्र तां भार्यां शबरो ऽब्रवीत् ।गच्छ पृच्छस्व किमपि किमद्य स्नानकारणम्

dṛṣṭvā janapadaṃ tatra tāṃ bhāryāṃ śabaro 'bravīt / gaccha pṛcchasva kimapi kimadya snānakāraṇam

हिन्दी अर्थ

अतः परं किपुरुषाद्धरिवर्ष: प्रवक्ष्यते । महारजतसंकाशा जायन्ते तत्र मानवाः ८ देवलोकाच्च्युताः सर्वे देवरूपाश्च सर्वशः हरिवर्षे नराः सर्वे पिबन्तीक्षुरस शुभम् १६ एकादश सहल्लाणि वर्षाणां तु मुदा घुताः । हरिवर्ष तु जीवन्ति सर्वे मुदितमानसाः ॥ चर्द्रसुयों सनक्षत्रावप्रकाशाविलाबुते । पद्मप्रभाः पद्मवर्णा: पद्मपत्रनिभेक्षणाः ॥।

English

Thus Piljrs have been explained. The greatness of Pitrs, the imbibers of Soma, is decisively mentioned in the Puranas.

अध्याय ५६

श्लोक 70

पर्वाणि यानि श्रूयन्ते किंस्वित् सूर्येन्दुसम्प्लवः ।अयनं किं भवेदद्य किं वाक्षयतृतीयका

parvāṇi yāni śrūyante kiṃsvit sūryendusamplavaḥ / ayanaṃ kiṃ bhavedadya kiṃ vākṣayatṛtīyakā

हिन्दी अर्थ

हरिवर्ष के सम्बन्ध में भी कहिये । ब्राह्मणों ढवारा इस प्रकार पूछे जाने पर उतके निदिष्ट प्रश्नों का पुराण- सम्मत याथातथ्य उत्तर देने के लिये सूतजी बोले

English

Thus all these have been briefly explained: the contact of Pururavas with the Sun, Pitrs and the Moon, his acquisition of the nectar and the performance of the Tarpana to Pitrs, the duration of the full moon and the new moon and the abode of Pitrs. This is the eternal Sarga (Creation).

अध्याय ५६

श्लोक 71

ततः स्वभर्तुर्वचनाच्छबरी प्रस्थिता तदा ।पप्रच्छ नारीं दृष्ट्वाग्रे दत्त्वाग्रे कमले शुभे

tataḥ svabharturvacanācchabarī prasthitā tadā / papraccha nārīṃ dṛṣṭvāgre dattvāgre kamale śubhe

हिन्दी अर्थ

सूत जी बोलें--ब्राह्मणों ! आप लोग जो सुनता चाहते हैं उसे आतन्दपूर्वक सुनिये। किपुरुषवर्ष में नन्‍्दन कानल के समान एक महान प्लक्षखण्ड है। वहाँ लोगों की आयु दस हजार बर्षों की है। पुरुषों का रंग सोने का-सा होता है और स्त्रियाँ अप्सरा के समान होती हैं ।४-५॥ वहाँ तपाये हुये सोने की तरह रंग- वाले मानव रोग-शोक से रहित और शुद्ध हृदय होते हैं। उस पवित्र किपुरुषवर्ष में मधु बहाने वाला एक प्लक्ष का वक्ष है, वहाँ के निवासी उसके उत्तम रस को पिया करते हैं। अब किपुरुष के बाद हरिवर्ष का वर्णन करते हैं। वहाँ के लोगों का रंग चाँदी के समान होता है। वहाँ वाले सभी देबलोक से परिश्रष्ट हुये हैं; अतः सभी देवस्वरूप हैं । वहाँ के सब लोग ईख का मधुर रस पिया करते हैं ।६-९। हरिवर्ष में लोग प्रसन्न- तापूर्वक आनन्दित हृदय से ग्यारह हजार वर्षों तक जिया करते हैं। वहाँ किसी को भी बुढ़ापा नहीं सताता और

English

The Universal form of all has been mentioned but partially. It is impossible to enumerate (describe) it in full. It should be trusted faithfully by one who wishes prosperity.

अध्याय ५६

श्लोक 72

तिथिरद्यैव का प्रोक्ता किं पर्व कथयस्व मे ।किमयं स्नाति लोको ऽयं किं वा स्नानस्य कारणम्

tithiradyaiva kā proktā kiṃ parva kathayasva me / kimayaṃ snāti loko 'yaṃ kiṃ vā snānasya kāraṇam

हिन्दी अर्थ

न वहाँ के लोग बड़े ही होते हैं ।१०। हमने जो मध्यम इलावुत वर्ष का नाम कहा है, व्हाँ सूर्य की किरणें न तो कभी तीदण होती हैं और न वहाँ कोई बूढ़ा होता है ।१९। इलाइत में चन्द्र-सूयं और नक्षत्रों का प्रकाश नहीं होता है। वहाँ के लोग प्चन-कान्ति, पद्मबर्ण, पद्मपत्र के समान नेत्रों वाले तथा पद्मपत्र के समान नेत्रोंवाले तथा

English

The creation of Svayambhuva Manu has indeed been described by me in detail and in accordance with the sequence.

अध्याय ५६

श्लोक 73

नार्युवाच: अद्य चैकादशी पुण्या सर्वपापक्षयंकरी ।उपोषिता सकृद्येन नाकप्राप्तिं करोति सा

nāryuvāca: adya caikādaśī puṇyā sarvapāpakṣayaṃkarī / upoṣitā sakṛdyena nākaprāptiṃ karoti sā

हिन्दी अर्थ

देवलोकाच्च्युता: सर्वे जायन्ते ह्यजरामराः त्रयोदश सहल्नाणि वर्षाणां ते नरोत्तमाः ३१४ योजनानां सहस्नाणि षर्डावशस्तस्य विस्तरः । चतुरत्नः समन्ताच्च शरावाकारसंस्थितः

English

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अध्याय ५६

श्लोक 74

तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा शबरी शाबराय वै ।कथयामास चाव्यग्रा स्त्रीवाक्यं नृपसत्तम

tasyāstadvacanaṃ śrutvā śabarī śābarāya vai / kathayāmāsa cāvyagrā strīvākyaṃ nṛpasattama

हिन्दी अर्थ

सहस्रमवगाढस्तु तावदेव तु धिष्ठित (१८ प्वेग माल्यवाञऊशलस्तत्प्रमाण: प्रकीतितः । दक्षिणेन तु नीलस्य निषधस्योत्तरेण तु ...

English

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अध्याय ५६

श्लोक 75

अद्य त्वेकादशी पुण्या बालवृद्धैर् उपोषिता ।मदनैकादशी नाम सर्वपापक्षयंकरी

adya tvekādaśī puṇyā bālavṛddhair upoṣitā / madanaikādaśī nāma sarvapāpakṣayaṃkarī

हिन्दी अर्थ

तेषां मध्ये महामेरुः सुप्रमाणः प्रकीतितः । सर्वेषामेव शलानामबगाढो यथा भवेत् आयामा: परिहीयन्ते चतुरत्रा: समस्ततः । अनावत्ताश्चतुष्केण भिद्वन्ते मध्यभागत २२ प्रभिन्नाअुजनसंकाशा जम्बरसव॒ती नदी । मेरोस्तु दक्षिणे पाश्वें निषधस्योत्तरेण तु ३२३ सुदर्शनो नाम महाजम्बुवृक्ष: सनातनः । नित्यपुष्पफलोपेत: सिद्धचारणसेबित:ः ५४

English

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अध्याय ५६

श्लोक 76

नियता श्रूयते तत्र राजपुत्री सुशोभना ।व्रतस्था नियताहारा नाम्ना भानुमती सती

niyatā śrūyate tatra rājaputrī suśobhanā / vratasthā niyatāhārā nāmnā bhānumatī satī

हिन्दी अर्थ

पद्मपत्र की तरह सुगरन्ध धारण करने वाले होते हैं। वहाँ के सभी मनुष्य देवलोक से परिश्रष्ट हुये हैं अतः अतः अजर अमर हैं जो जामुन के फल और को खारर सदा प्रसन्न रहते हैं क्षरणरहित और आत्मसंयमी, मनसस्‍्वी, भोगों के उपभोग करनेवाले और सुन्दर कम फल का भोग करने वाले हैं ।१३२। वे नरोत्तमगगण तेरह हजार वर्षों के आयुप्रमाण से उस इलाबंत-

English

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अध्याय ५६

श्लोक 77

नैतया सदृशी काचित्त्रिषु लोकेषु विश्रुता ।दृश्यते सा वरारोहा ह्यवतीर्णा महीतले

naitayā sadṛśī kācittriṣu lokeṣu viśrutā / dṛśyate sā varārohā hyavatīrṇā mahītale

हिन्दी अर्थ

वर्ष में जीवन धारण क ते हैं, जो मेरु की प्रति दिशा में नौ हजार योजन विस्तृत है उसका विस्तार छब्बीस हजार योजनों का है वह चारों ओर से चौकोर है और शराव की तरह स्थित है ।१४-१६। मेरु के पश्चिम भाग में नौ हजार योजन दूर गन्धमादन पव॑त है जो चौंतीस हजार योजनों का है। उत्तर और दक्षिण की ओर वह नील और निषध पव॑तों तक फंला हुआ है एवं प्ृथ्वीतल से चालीस हजार योजन ऊपर बढा हुआ है । वह हजार योजन पृथ्वी के भीतर धंसा है ओर उतने ही योजनों में अधिष्ठित है ।१७-१८। इसके पूव्व माल्यवान् पव॑त है, जिसका परिमाण कहा जा चुका है। वील के दक्षिण, निषध के उत्तर और पूर्वोक्ति पर्व॑तों के बीच विशालकाय महामेरु स्थित है। वह ऐसा जान पड़ता है, मानों सब पर्वत जसमें डूबे हुये हों। उसका विस्तार-प्रमाण नियुत योजन का हैं ।१६-२०३॥। समुद्र वत्ताकार है और पृथ्वीमंडलस्थ सुमेरु उससे कुछ छोटा

English

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अध्याय ५६

श्लोक 78

भार्याया वचनं श्रुत्वा शबरस्तां जगाद ह ।कमलानि यथालाभं दत्त्वा भुङ्क्ष्व हि सत्वरम्

bhāryāyā vacanaṃ śrutvā śabarastāṃ jagāda ha / kamalāni yathālābhaṃ dattvā bhuṅkṣva hi satvaram

हिन्दी अर्थ

है; इसलिये कि चौकोर का विस्तार जब कि वह वृत्ताकार के रूप में परिणत कियां जता है कुछ कम हो जाता है। तब उसका मध्यभाग भी न्‍्यून पड़ जाता है। मेद्द के दक्षिण और निषध के उत्तर अंजन की तरह जम्बूरसवती नदी है ।२१-२३। वहाँ सुदर्शन नाम का एक पुराना जामुन का ठक्ष है । जिसमें फलफूल सदा

English

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अध्याय ५६

श्लोक 79

ममैषा वर्तते बुद्धिर् न भोक्तव्यं मया ध्रुवम् ।न मयोपार्जितं भद्रे पापबुद्ध्या शुभं क्वचित्

mamaiṣā vartate buddhir na bhoktavyaṃ mayā dhruvam / na mayopārjitaṃ bhadre pāpabuddhyā śubhaṃ kvacit

हिन्दी अर्थ

उत्सेधो वृक्षराजस्य दिव॑ स्पृशति सबशः १२५ अरत्नोनां शतान्यष्टावेकषष्टयधिकानि तु । फलप्रमाणं संख्यातमृषिभिस्तत्त्वदर्शिभि १२६ तत्र जाम्बूनदं नाम कनक॑ देवभूषणम् । इन्द्रगोपकसंकाशं जायते भास्वरं तु तत् १३० सर्वेषां वर्षवक्षाणां शुभ: फलरसस्तु सः। स्कन्न॑ भवति तच्छुक् कनक देवभूषणम्

English

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अध्याय ५६

श्लोक 80

शबर्युवाच: न पूर्वं तु मया भुक्तं कस्मिंश्चैव तु वासरे ।भुक्तशेषं मया भुक्तं यावत्कालं स्मराम्यहम्

śabaryuvāca: na pūrvaṃ tu mayā bhuktaṃ kasmiṃścaiva tu vāsare / bhuktaśeṣaṃ mayā bhuktaṃ yāvatkālaṃ smarāmyaham

हिन्दी अर्थ

रक्ष:पिशाचा यक्षाश्च सर्वे हैमबताः स्घपृतः। हेमक्टे तु गन्धर्वा विज्ञेयाः साप्सरोगणाः

English

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अध्याय ५६

श्लोक 81

भार्याया निश्चयं ज्ञात्वा स्नानं कर्तुं जगाम ह ।अर्धोत्तरीयवस्त्रेण स्नानं कृत्वा तु भक्तितः

bhāryāyā niścayaṃ jñātvā snānaṃ kartuṃ jagāma ha / ardhottarīyavastreṇa snānaṃ kṛtvā tu bhaktitaḥ

हिन्दी अर्थ

सर्वे नागास्तु निबधे शेबवासुकितक्षका: । सहामेरों त्रयस्त्रिशद्श्नसन्ते यज्ञियाः सुराः ॥ नोले तु वड॒यमये सिद्धब्रह्मंयोउसला: । . ॥ह३४ देत्यानां दानवानां च श्वेतपंत उच्चते । शुद्धवान्पवंतः श्रेष्ठ: पितणां प्रतिसंचर:

English

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अध्याय ५६

श्लोक 82

सर्वान् देवान् नमस्कृत्य गतो देवशिलां प्रति ।तस्थौ स शङ्कमानो ऽपि नमस्कृत्य जनार्दनम्

sarvān devān namaskṛtya gato devaśilāṃ prati / tasthau sa śaṅkamāno 'pi namaskṛtya janārdanam

हिन्दी अर्थ

लगे रहने हैं और सिद्ध चरण उसकी सेवा किया करते हैं। उसी के नामानुसार जम्बूद्वीप में एक विशाल वनस्पति है वह महावृक्ष सौ हजार योजन का है। उसका शिखर स्वर्ग को स्पर्श करता है ।२४-२५। तत्त्वदर्शी ऋषिगण कहते हैं कि इस वक्ष के प्रत्येक फल का प्रमाण आठ सौ आठ अरन्ति है। ये फल पृथ्वीतल पर गिर कर महान् शब्द उत्पन्न करते हैं और उनका रस नदी बनकर बह निकलता है।२६-२७। यह नदी मेरु की

English

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अध्याय ५६

श्लोक 83

यस्यास्तु कुमुदे दत्ते तया राज्ञ्यै निवेदितम् ।तद्दृष्ट्वा पद्मयुगलं तां दासीं साब्रवीत् तदा

yasyāstu kumude datte tayā rājñyai niveditam / taddṛṣṭvā padmayugalaṃ tāṃ dāsīṃ sābravīt tadā

हिन्दी अर्थ

प्रदक्षिणा कर फिर उप्ती वक्ष के मूल देश में प्रतेश कर जाती है। वहाँ बाले प्रसन्न होकर जामुन के फल और रस को पिया करते हैं। उस रस को पीने के कारण वे कभी बद्ध नहीं होते हैं यही क्‍यों, रोग, क्रोध और मृत्यु भी उन्हें प्राप्त नहीं होती है ।२८-२६। देवों के भूषणयोग्य जाम्बूनद नाम का सुवर्ण है, जो इन्द्रगोप कीट की तरह चमकीला होता है । उन सभी वक्षों का शुभ फल रस शुक्र रूप में क्षरित होकर देव भूषणोचित सुवर्ण बन जात! है। उनका मूत्र और पुरीष भी विभागक्रम से सभी दिशाओं में बिखर जाता है। ईश्वर की कृपा से भूमि उस मृतिका को ग्रस लेती है ।३०-३२। रक्ष, पिचाश और यक्ष्गण हिमालय पर, गन्धव॑ और अप्सराएँ हेमकट पर एवं शेष वासुकि, रक्षकप्रभूति समस्त नाग निषधाचल पर स्थित हैं तेंतीस याज्ञिक सुरगण महामेरु के ऊपर अ्रमण करते हैं। बेड्यंगय नीलाचल पर सिद्ध ब्रह्मषि और सिद्ध लोग रहते हैं ।३३-३४। देत्य

English

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अध्याय ५६

श्लोक 84

कुत्र पद्मद्वयं लब्धं कथ्यताम् अग्रतो मम ।शीघ्रं तत्रैव गत्वा च पद्मानानय चापरान्

kutra padmadvayaṃ labdhaṃ kathyatām agrato mama / śīghraṃ tatraiva gatvā ca padmānānaya cāparān

हिन्दी अर्थ

और दानवों के लिये ब्वेत पर्वत नियत किया गया है। श्रेष्ठ श्वृज्भवान् पर्वत पितरों का भ्रमणस्थान है।

English

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अध्याय ५६

श्लोक 85

धान्येन वसुना वापि कमलानि समानय ।भानुमत्या वचः श्रुत्वा गता सा शबरं प्रति

dhānyena vasunā vāpi kamalāni samānaya / bhānumatyā vacaḥ śrutvā gatā sā śabaraṃ prati

हिन्दी अर्थ

तेषां विवद्धिबंहुला दृश्यते देवसानुषी । न शक्‍्या परिसंख्यातुं श्रद्धेयाध्नुबुभूषता इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्ते भुवनविन्यासो नाम षट्चत्वारिशोः्ध्यायः

English

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अध्याय ५६

श्लोक 86

श्रीफलानि च पुष्पाणि बहून्यन्यानि देहि मे

śrīphalāni ca puṣpāṇi bahūnyanyāni dehi me

हिन्दी अर्थ

सव्ये हिमबतः पाश्वें केलासो नाम पर्वतः । तस्मिन्रिवसति श्रीमान्कुबेर: सह राक्षस: ॥। अप्सरोगणसंयुक्तो मोदते ह्मलकाधिपः १ कैलासपादात्संभुतं पुण्य शीतजलं शुभस् । सन्‍्द॑ नास्‍्ना कुमुद्वन्तं शरदस्बुदसंनिभम्

English

The creation of Svayambhuva Manu has indeed been described by me in detail and in accordance with the sequence.

अध्याय ५६

श्लोक 87

शबर्य् उवाच: श्रीफलानि सपुष्पाणि दास्यामि च विशेषतः ।न लोभो न स्पृहा मे ऽस्ति गत्वा राज्ञीं निवेदय

śabary uvāca: śrīphalāni sapuṣpāṇi dāsyāmi ca viśeṣataḥ / na lobho na spṛhā me 'sti gatvā rājñīṃ nivedaya

हिन्दी अर्थ

३ ३ २३२३२“ २ ॒ऑ॒. न ऑ ----+++++++++४++भ/ै7/3हैपपएए/-््््-््"ई्ौ//आ््॒“ :त्तत्त्स् विभागक्रम से अवस्थित इन नवों देशों में गतिशील भूतगण नित्य निवास करते हैं । इन भूतों की वृद्धि देव- मानुष के रूप में अधिकतर देखी जाती है। विशेष अनुसंघान करते पर भी उनकी गणना नहीं की जा सकती है

English

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अध्याय ५६

श्लोक 88

तया च सत्वरं गत्वा यथावृत्तं निवेदितम् ।शबर्युक्तं पुरस्तस्याः सविस्तरपरं वचः

tayā ca satvaraṃ gatvā yathāvṛttaṃ niveditam / śabaryuktaṃ purastasyāḥ savistaraparaṃ vacaḥ

हिन्दी अर्थ

सतजी बोले--हिमालय के वाम पादइव में क्लास नामक पर्वत है। वहाँ श्रीम।न् कुबेर राक्षसों के साथ निवास करते हैं। अलकाधिपति वहाँ अप्सराओं के साथ आमोद किया करते हैं ।१। कलास पर्वत के पाद देश से शरत्॒कालीन मेघ के समान पवित्र, सुखद शीतल कुमुदों से युक्त मन्द नामक जल उत्पन्न होता है ।२। उससे दिव्य

English

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अध्याय ५६

श्लोक 89

तस्यास्तु वचनं श्रुत्वा राज्ञी तत्र स्वयं गता ।उवाच शबरीं प्रीत्या देहि पद्मानि मूल्यतः

tasyāstu vacanaṃ śrutvā rājñī tatra svayaṃ gatā / uvāca śabarīṃ prītyā dehi padmāni mūlyataḥ

हिन्दी अर्थ

प्रागुत्तरेण केलासाहिव्यसत्त्वोषध गिरिम् । सुरधातुमयं चित्र सुवर्ण पव॑तं प्रति ४ पुण्या मन्दाकिनों चेव निम्नगाच्छोदिका तथा। महोमण्डलमध्येन प्रविष्टे ते महोदधिम् ८ कैलासाइक्षिणप्राच्यां शिवसत्त्वौर्षाध गुरुप । मनःशिलामयं दिव्यं पिशज्भ परवेतं प्रति ३९

English

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अध्याय ५६

श्लोक 90

शबर्युवाच: न मूल्यं कामये देवि फलपुष्पसमुद्भवम् ।श्रीफलानि च पुष्पाणि यथेष्टं मम गृह्यताम्

śabaryuvāca: na mūlyaṃ kāmaye devi phalapuṣpasamudbhavam / śrīphalāni ca puṣpāṇi yatheṣṭaṃ mama gṛhyatām

हिन्दी अर्थ

तस्मात्पुण्यः प्रभवति लौहित्यः सदनो महान्। देवारण्यं विशोक॑ च तस्य तीरे महावनम् ११

English

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अध्याय ५६

श्लोक 91

अर्चां कुरु यथान्यायं वासुदेवे जगत्पतौ

arcāṃ kuru yathānyāyaṃ vāsudeve jagatpatau

हिन्दी अर्थ

कंलासाहक्षिणे पाश्वें क्रसत्वौषधं गिरिम् । वृत्रकायात्किलोत्पन्नमज्जनं त्रिककुं प्रति ११३ सर्वंधातुमयस्तत्र सुमहान्वेद्युतोी गिरिः । तस्य पादे सरः पुण्य मानस सिद्धसेवितम् और शुभावह मन्दाकिनी नाम की नदी उत्पन्न होती है । उसी के किनारे नन्‍्दन नाम का एक दिव्य महावन है

English

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अध्याय ५६

श्लोक 92

राज्ञ्युवाच: विना मूल्यं न गृह्णामि कमलानि तवाधुना ।धान्यस्य खारिकामेकां ददामि प्रतिगृह्यताम्

rājñyuvāca: vinā mūlyaṃ na gṛhṇāmi kamalāni tavādhunā / dhānyasya khārikāmekāṃ dadāmi pratigṛhyatām

हिन्दी अर्थ

केलाश के पूरंब-उत्तर ओर दिव्य सत्व और औषधियों से युक्त, देवोचित धातुओं से मण्डित और विचित्र सुवर्ण पबत के पास शुद्धरत्न के तुल्य चन्द्रप्रभ नाम का एक पबंत है। उसी के मूलदेश में अच्छोद नाम का सरोवर है ।४-५। जिस सरोवर से आच्छोदा नाम की नदी निकलती है। इस आच्छोद के.तीर पर एक चैत्ररथ नाम का महादिव्य बन है। उस चन्द्रप्रभ पव॑त पर यक्ष सेनापति मणिभद्र अपने अनुचरों के साथ निवास

English

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अध्याय ५६

श्लोक 93

दश विंशत्यथ त्रिंशच् चत्वारिंशद् अथापि वा ।गृहाण वा खारिशतं दुर्भिक्षां बोधिमुत्तर

daśa viṃśatyatha triṃśac catvāriṃśad athāpi vā / gṛhāṇa vā khāriśataṃ durbhikṣāṃ bodhimuttara

हिन्दी अर्थ

करते हैं। वहाँ ऋर प्रकृति गुह्मक भी उसके परिवार की भाँति रहते हैं। पवित्र मन्दाकिनी और अच्छोदा नाम की नदी महीमडल के बीच से बहती हुई महासमुद्र में प्रविष्ट हुई है ।६-०। कैलाश के दक्षिण पश्चिम शिवभक्त जीवों और औषधियों से युक्त, मन:शिलामण्डित एवं विशाल और दिव्य जो पिशज्जपर्बंत है, उसके आसपास सुवर्णश्यज्ध से युक्त रक्तवर्ण का सूयंप्रभ नामक एक महान् पर्वत है। उसी के मूलदेश में लोहित नामक महादिव्य सरोवर है ।६-१०। इसी सरोवर से लोहित नामक एक पुण्यशील महानद प्रवाहित हुआ है । उसी के तट पर विशोक नामक एक महांवत है, जो देवों का लीलावन है । उसी पर्बत पर जितेन्द्रिय मणिवर नामक कोई नामक कोई यक्ष निवास करता है, जो द्ान्त धमिक गुह्मकों से पारिवारिक सद्भाव रखता है ।१ १-१२। कैलास के दक्षिण भाग में कर जीव और ओषधों से युक्त एवं तीन शिखरवाले वृत्रासुर की

English

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अध्याय ५६

श्लोक 94

वसु रत्नं सुवर्णं च अन्यत्ते यदभीप्सितम् ।तत्सर्वं सम्प्रदास्यामि कमलार्थे न संशयः

vasu ratnaṃ suvarṇaṃ ca anyatte yadabhīpsitam / tatsarvaṃ sampradāsyāmi kamalārthe na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

देह से उत्पन्न अंजनाचल के समीप सर्वधातु संपन्न बद्युत नामक एक महान् पवंत है, जिसके मूलदेश में सिद्ध- सेवित और पवित्र मानस नाम का सरोवर है ।१३-१४। इससे लोकपावनी पवित्र सरयथु प्रवाहित होती है,

English

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अध्याय ५६

श्लोक 95

शबर्युवाच: नाहारं चिन्तयाम्यद्य मुक्त्वा देवं वरानने ।देवकार्यं विना भद्रे नान्या बुद्धिः प्रवर्तते

śabaryuvāca: nāhāraṃ cintayāmyadya muktvā devaṃ varānane / devakāryaṃ vinā bhadre nānyā buddhiḥ pravartate

हिन्दी अर्थ

कुबेरानुचरस्तन्न प्रहेतृतनयों वशी । ब्रह्मपातो निवसति राक्षसोउनन्तविक्रम: ॥ तस्यास्तीरे वन दिव्यं विश्वुतं सुरभीति वे। अस्त्युत्तरेण केलासाच्छिवसत्त्वौषधो गिरिः

English

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अध्याय ५६

श्लोक 96

राज्ञ्युवाच: न त्वयान्नं परित्याज्यं सर्वमन्ने प्रतिष्ठितम् ।तस्मात् सर्वप्रयत्नेन ममान्नं प्रतिगृह्यताम्

rājñyuvāca: na tvayānnaṃ parityājyaṃ sarvamanne pratiṣṭhitam / tasmāt sarvaprayatnena mamānnaṃ pratigṛhyatām

हिन्दी अर्थ

तस्य पादे महद्वव्यं शुभं काश्वनबालुकस् । रम्यं बिन्दुसरो नाम यत्र यातो भगीरथः

English

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अध्याय ५६

श्लोक 97

तपस्विनो महाभागा ये चारण्यनिवासिनः ।गृहस्थद्वारि ते सर्वे याचन्ते ऽन्नम् अतन्द्रिताः

tapasvino mahābhāgā ye cāraṇyanivāsinaḥ / gṛhasthadvāri te sarve yācante 'nnam atandritāḥ

हिन्दी अर्थ

गदगानिमित्तं राजपिदवास बहुलाः समाः। दिव॑ यास्यन्ति से पूर्वे गहगातोयपरिष्लुता: ततन्न त्रिपथगा देवी प्रथम तु प्रतिष्ठिता । सोमपादप्रसुता सा सप्तधा प्रतिपच्यते २६

English

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अध्याय ५६

श्लोक 98

शबर्युवाच: निषेधश्च कृतः पूर्वं सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ।सत्येन तपते सूर्यः सत्येन ज्वलते ऽनलः

śabaryuvāca: niṣedhaśca kṛtaḥ pūrvaṃ sarvaṃ satye pratiṣṭhitam / satyena tapate sūryaḥ satyena jvalate 'nalaḥ

हिन्दी अर्थ

जिसके तीर पर बे भ्राज नाम का एक दिव्य वन है। वहाँ एक अत्यन्त पराक्रमी ब्रह्मपात नामक राक्षस निवास करता है। वह कुबेर का अनुचर और प्रहेता का पृत्र है। वह स्वयं इच्द्रियजित्ु और अन्‍्तरिक्षगामी संकड़ों भयानक निशिचरों से घिरा रहता है ।१५-१६। कैलास के परिचिम प्रान्त में मुख्य-मुख्य जीवों और औषधियों से युक्त एक सुवर्णमय अरुण नामक श्रेष्ठ पंत है, जिसके पास सुवर्णमय, विशुभश्र शिलाओं से आउच्छन्न,

English

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अध्याय ५६

श्लोक 99

सत्येन तिष्ठत्य् उदधिर्वायुः सत्येन वाति हि ।सत्येन पच्यते सस्यं गावः क्षीरं स्रवन्ति च

satyena tiṣṭhaty udadhirvāyuḥ satyena vāti hi / satyena pacyate sasyaṃ gāvaḥ kṣīraṃ sravanti ca

हिन्दी अर्थ

मेघतुल्य, शिव-प्रिय श्रीमान् पंत अवस्थित है ।(७-१५। हतसंख्य हेमश्वज्ों से युक्त यह स्वर्ग को छू रहा है। शिव से युक्त यह दुर्गम विशाल पर्वत देवभोग्य और हिममय है । इस पर्वत पर गिरीक्ष धृम्रलोहित निवास करते हैं। उस पर्वत के मूलदेश में शैलोद नामक सरोवर उत्पन्न हुआ ।१६-२०। जिससे दिव्य शैलोदा नाम की एक नदी निकलती है। यह चक्ष् और शीता नामको नदियों के मध्य से लवण-सागर में प्रविष्ट हुई है। उसके तीर पर दिव्य और प्रसिद्ध सुरभि नामक वन है। कलास के उत्तर मड्भलमय प्राणी और औषधियों से युक्त गौर नामके एक पर्वत है । हरितालमय इस पवत के शिखर सुवर्णमय हैं । वह् एक महान् स्वर्गीय मणिमय पर्वत है

English

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अध्याय ५६

श्लोक 100

सत्याधारम् इदं सर्वं जगत् स्थावरजङ्गमम् ।तस्मात् सर्वप्रयत्नेन सत्यं सत्येन पालयेत्

satyādhāram idaṃ sarvaṃ jagat sthāvarajaṅgamam / tasmāt sarvaprayatnena satyaṃ satyena pālayet

हिन्दी अर्थ

उसके पाददेश में एक रमणीय सुवर्ण-बालुकामय विन्दु सरोवर है, जहाँ राजा भागीरथ गये हुये थे। उस राज्षि ने गड्भा के लिये वहाँ बहुत दिनों तक इसलिये निवास किया था कि गज्भाजल से पवित्र होकर उनके पूर्वंज स्वगंगमन करें। गड्जा देवी वहाँ पहले से ही प्रतिष्ठत थीं । यह सोमपाद से उत्पन्न होकर सात भागों

English

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अध्याय ५६

श्लोक 101

देवकार्यं तु मे मुक्त्वा नान्या बुद्धिः प्रवर्तते ।गृहाण राज्ञि पुष्पाणि कुरु पूजां गदाभृतः

devakāryaṃ tu me muktvā nānyā buddhiḥ pravartate / gṛhāṇa rājñi puṣpāṇi kuru pūjāṃ gadābhṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

दिवि चउछायापथो यस्तु अनुनक्षत्रमण्डलम् । दृश्यते भास्व॒रो राज्रो देवी त्रिपथगा तु सा २८ तस्या ये बिन्दवः केचित्कुद्धाया: पतिताः क्षितां । कृतं बिन्दुसरस्तश्न ततो बिन्दुसरः स्मृतमू. ॥

English

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अध्याय ५६

श्लोक 102

श्रूयते द्विजवाक्यैस्तु न दोषो विद्यते क्वचित् ।कुशाः शाकं पयो मत्स्या गन्धाः पुष्पाक्षता दधि ।मांसं शय्यासनं धानाः प्रत्याख्येया न वारि च

śrūyate dvijavākyaistu na doṣo vidyate kvacit / kuśāḥ śākaṃ payo matsyā gandhāḥ puṣpākṣatā dadhi / māṃsaṃ śayyāsanaṃ dhānāḥ pratyākhyeyā na vāri ca

हिन्दी अर्थ

ततो निरुद्धा देवी सा भवेन स्मयता किल । चिन्तयामास मनसा शंकरक्षेपण्ण प्रति

English

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अध्याय ५६

श्लोक 103

राज्ञ्युवाच: आरामोपहृतं पुष्पमारण्यं पुष्पमेव च ।क्रीतं प्रतिग्रहे लब्धं पुष्पमेवं चतुर्विधम्

rājñyuvāca: ārāmopahṛtaṃ puṣpamāraṇyaṃ puṣpameva ca / krītaṃ pratigrahe labdhaṃ puṣpamevaṃ caturvidham

हिन्दी अर्थ

भित्त्वा विशामि पाताल स्रोतसा55गुह्म शंक रम् ज्ञात्वा तस्या अभिन्नायं क्र देव्याश्विकीधितम् तिरोभावयितु बुद्धिरासीदड्गेषु तां नदीम्। तस्या बलेपं त॑ बुद्ध्वा नद्याः क्ुद्धस्तु शंकरः ॥

English

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अध्याय ५६

श्लोक 104

उत्तमं पुष्पमारण्यं गृहीतं स्वयमेव च ।मध्यमं फलमारामे त्वधमं क्रीतमेव च ।प्रतिग्रहेण यल्लब्धं निष्फलं तद्विदुर्बुधाः

uttamaṃ puṣpamāraṇyaṃ gṛhītaṃ svayameva ca / madhyamaṃ phalamārāme tvadhamaṃ krītameva ca / pratigraheṇa yallabdhaṃ niṣphalaṃ tadvidurbudhāḥ

हिन्दी अर्थ

एतस्मिन्नेव काले तु दष्टा राजानमग्रतः । धमनीसंततं क्षीणं क्षुध्राएरि गतेन्द्रियम्

English

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अध्याय ५६

श्लोक 105

पुरोहित उवाच: गृहाण राज्ञि पुष्पाणि कुरु पूजां गदाभृतः ।उपकारः प्रकर्तव्यो व्यपदेशेन कर्हिचित्

purohita uvāca: gṛhāṇa rājñi puṣpāṇi kuru pūjāṃ gadābhṛtaḥ / upakāraḥ prakartavyo vyapadeśena karhicit

हिन्दी अर्थ

अनेन तोषितश्राहूं नद्यर्थ पुवंमेव हि। बुद्ध्वापस्य वरदान तु कोपं नियतवांस्तु सः ब्रह्मणो हि वचः श्रुत्वा प्रतिज्ञाधारणं प्रति । ततो विसर्जेयामास संरुद्धां स्‍्वेन तेजसा ॥

English

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अध्याय ५६

श्लोक 106

ईश्वर उवाच: श्रीफलानि सपद्मानि दत्तानि शबरेण तु ।गृहीत्वा तानि राज्ञी सा पूजां चक्रे सुशोभनाम्

īśvara uvāca: śrīphalāni sapadmāni dattāni śabareṇa tu / gṛhītvā tāni rājñī sā pūjāṃ cakre suśobhanām

हिन्दी अर्थ

में विभक्‍त हुई हैं ॥२४-२६। वहाँ मणिमय यज्ञयूप और सोने की चितियाँ हैं। वहाँ इन्द्र ने सब देवों के साथ मिलकर यज्ञ कर स्वग प्राप्त किया था अन्तरिक्ष में नक्षत्र मण्डल के बीच रात में जो चमकीला छायापथ दीख पड़ता है. वह त्रिपथगा ही है। वही त्रिपयगा जब अन्तरिक्ष और स्वर्ग को प्लवित करती हुई प्रथ्वी पर आयी, तब वह पहले महादेव के ही सिर पर गिरी और महादेव ने उसे योगमाया से वहीं रोक रखा

English

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अध्याय ५६

श्लोक 107

क्षपाजागरणं चक्रे श्रुत्वा पौराणिकीं कथाम् ।शबरस्तु ततो भार्याम् इदं वचनम् अब्रवीत्

kṣapājāgaraṇaṃ cakre śrutvā paurāṇikīṃ kathām / śabarastu tato bhāryām idaṃ vacanam abravīt

हिन्दी अर्थ

क्रोध से तमतमाई गड्भा की कुछ बूंद उछल कर पृथ्वी पर गिरी, उन्हीं से बिन्दुसर बन गया ।३०। गंगा मन में कह रही थीं कि, मैं अपने प्रवाहवेग में शद्भूर को बहाती हुई सब कुछ तोड़ती फोड़ती पाताल चली जाऊँगी । महादेव गड्भा देवी के क्र कम और अभिप्राय को समझ कर वेग से पृथ्वी पर गिरने वाली गंगा को सिरपर रोक रखा । उस नदी के गये को समझ कर महादेव क्रुद्ध हो गये और अपने सिर में छिपा लेना चाहा ।३१०३ ३। इस बीच महादेव ने राजा भगीरथ को सामने खड़ा देखा, जिसकी धमनी क्षीण हो चली थी और भूख से इन्द्रियाँ वकल हो रही थीं । गड्भा के निमित्त राजा ने पहले ही महादेव को प्रसन्न कर लिया था; अत: उनके वरदान का ध्यान कर महदेव ने क्रोध को शान्त कर दिया । इसी बीच ब्रह्मा ने भी महादेव को प्रतिज्ञापालन के लिये स्मरण कराया । तब उन्होंने अपने तेजसे निरुद्ध गड़ा नदी को छोड़ दिया; क्योंकि कठोर तपस्या के

English

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अध्याय ५६

श्लोक 108

दीपार्थं गृह्यतां स्नेहो यथालाभेन सुन्दरि ।कृत्वा दीपं ततस्तौ तु कृत्वा पूजां हरेः शुभाम्

dīpārthaṃ gṛhyatāṃ sneho yathālābhena sundari / kṛtvā dīpaṃ tatastau tu kṛtvā pūjāṃ hareḥ śubhām

हिन्दी अर्थ

द्वारा वे सनन्‍्तुष्ट होकर भगीरथ की भलाई करने के लिये कृतसंकल्प थे ।३४-३६। छूटने पर गंगा सात धाराओं में

English

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अध्याय ५६

श्लोक 109

चक्रतुर्जागरं रात्रौ ध्यायन्तो धरणीधरम् ।ततः प्रभातसमये दृष्ट्वा स्नानोत्सुकं जनम्

cakraturjāgaraṃ rātrau dhyāyanto dharaṇīdharam / tataḥ prabhātasamaye dṛṣṭvā snānotsukaṃ janam

हिन्दी अर्थ

रुषाणांश्च कुणिन्दांश्व अहुगलोकवराय ये। कृत्वा द्विधा सिन्धुमरुं सोताध्गात्पश्चिमोदधिम् अथ चीनमरूंश्चेव तडःगणान्सवंमुलिकान् । सान्प्रांस्तुषारांस्तम्पाकान्पह्॒वान्दरदाज्छकान् ॥।

English

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अध्याय ५६

श्लोक 110

स्नाति वै शूलभेदे तु देवनद्यां तथापरे ।सरस्वत्यां नराः केचिन्मार्कण्डस्य ह्रदे ऽपरे

snāti vai śūlabhede tu devanadyāṃ tathāpare / sarasvatyāṃ narāḥ kecinmārkaṇḍasya hrade 'pare

हिन्दी अर्थ

दरदांश्च सकाश्मीरान्गान्धारान्वरपान्ह्ृदान् । शिवपोरानिद्रहासान्वदातींश्च विसजंयान्

English

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अध्याय ५६

श्लोक 111

चक्रतीर्थं गताश्चक्रुः स्नानं केचिद्विधानतः ।शुचयस्ते जनाः सर्वे स्नात्वा देवाशिलोपरि

cakratīrthaṃ gatāścakruḥ snānaṃ kecidvidhānataḥ / śucayaste janāḥ sarve snātvā devāśilopari

हिन्दी अर्थ

सेन्धवान्रन्ध्रकरकारभश्रमराभोररोहकान् । शुनामसुखांश्रोध्वेमनून्सिद्धचा रणसेवितान् १४६ गन्धर्वान्किन्नरान्यक्षान्रक्षो विद्याधरो रगान् । कलापग्रामकांश्चेव परदान्सीगणान्खसान् किरातांश्व पुलिन्दांश्र कुरूत्सभरतानपि । पश्चालकाशिमात्स्यांश्व मगन्धाड्भरगस्तथव च ४८ ब्रह्मोत्तरांश्र वदगांश्व ताम्रलिप्तांस्तथेव च । एताआजनपदानार्यान्‍्गइूगा भावयते शुभान् ४६

English

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अध्याय ५६

श्लोक 112

श्राद्धं चक्रुः प्रयत्नेन श्रद्धया पूतचेतसा ।तान्दृष्ट्वा शबरो बिल्वैः पिण्डांश्चक्रे प्रयत्नतः

śrāddhaṃ cakruḥ prayatnena śraddhayā pūtacetasā / tāndṛṣṭvā śabaro bilvaiḥ piṇḍāṃścakre prayatnataḥ

हिन्दी अर्थ

बहीं उनमें तीन घाराएँ पूरव की ओर और तीन पश्चिवम की ओर चलीं । इस प्रकार गज्जा का स्रोत सात भागों में विभकत हुआ नलिनी, ह्ादिनी और पावनी नामक तीन धाराएँ पूरब की तरफ भयीं एवं सीता, चक्षु और सिन्धु नामक तीन धाराएँ पश्चिम को सातवीं धारा भागीरथ के पीछे दक्षिण तरफ चली ३७-३६। इसलिये उस घारा का नाम भागीरथी हुआ और वह लवण-सागर में प्रविष्ट हुई ये सातों धाराएँ हिमवर्ष

English

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अध्याय ५६

श्लोक 113

भानुमत्या तथा भर्तुः पिण्डनिर्वपणं कृतम् ।अनिन्द्या भोजिता विप्रा दम्भवार्द्धुष्यवर्जिताः

bhānumatyā tathā bhartuḥ piṇḍanirvapaṇaṃ kṛtam / anindyā bhojitā viprā dambhavārddhuṣyavarjitāḥ

हिन्दी अर्थ

को प्लचित करती हैं ।४०-४१। ये सभी वहाँ जाती हैं, जहाँ भेघ बरसता रहता है, जेसे सिरिन्ध्र, कुन्तल, चीन, बर्बर, यवस, द्रुह, रुषाण, कुणिन्द और श्रेष्ठ अढृगलोक सिन्धु मरु को दो टुकड़ों में विभकक्‍त कर सीता नदी पद्चिम समुद्र में गिरी है ।४२-४३। चीन मरु, तझ्भगुण, सर्वंमुलिक, सान्ध्र तुषार, तम्पाक, पहुव, दरद, और शक नामक जनपद को प्लावित करके चल्षु समुद्र में गिरी है।४४। दरद, काश्मीर, गांधार, बरप, हद, शिवपौर, इन्द्रहास, वदाति, विसजंय, सैन्धव, रन्प्रकरक, भ्रमर, आभीर, रोहक, शुनामुख, उद्धव मनु, सिद्धचारणसेवित देश, गान्धवेकिन्नरयक्ष-राक्षस-विद्याधर-उरग आदि के निवास देश, कलापग्राम, पारद, सीगण, खस, किरात, पुलिन्द, कुछ, भारत, पांचाल, काशि, मत्स्य, मगध अंग, ब्रह्मोत्त र, बंग और ताम्र- लिप्त आदि ब॒भ आय॑ देशों को प्लावित करती है ।४५-४६॥ फिर वह विन्ध्य पर्वत से ठकरा कर दक्षिण सागर

English

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अध्याय ५६

श्लोक 114

हविष्यान्नैस्तथा दध्ना शर्करामधुसर्पिषा ।पायसेन तु गव्येन कृतान्नेन विशेषतः

haviṣyānnaistathā dadhnā śarkarāmadhusarpiṣā / pāyasena tu gavyena kṛtānnena viśeṣataḥ

हिन्दी अर्थ

प्लावयन्त्युपभोगांश्व निषादानां च जातयः । धीवरानृषिकांश्चेच तथा नीलमुखानपि ५१ केरलानुष्ट्कर्णाश्व किरातानपि चेव हि। कालोदरास्विवर्णाश्च कुमारान्स्वर्णमूषितान् ५२

English

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अध्याय ५६

श्लोक 115

भोजयित्वा तथा राज्ञी ददौ दानं यथाविधि ।पादुकोपानहौ छत्रं शय्यां गोवृषमेव च

bhojayitvā tathā rājñī dadau dānaṃ yathāvidhi / pādukopānahau chatraṃ śayyāṃ govṛṣameva ca

हिन्दी अर्थ

मध्येनोद्यानमकरान्कुथप्रावरणान्ययों । इन्द्रद्वीपसमुद्रे तु प्रविष्टा लवणोदधिम् ५५ ततश्च नलिनी चागात्प्राचीोमाशां जबेन तु। तोमरान्प्लावयन्तीह हंसमार्गन्सहूहुकान् पूर्बान्दिशांश्च सेवन्ती भित्वा सा बहुधा गिरीन् । कर्णप्रावरणांश्चेब प्राप्प चाश्वसुखानपि (५७ सिकतापबंतसरून्गत्वा विद्याधरान्ययों नेमिमण्डलकोष्ठे तु प्रविष्टा सा महोद्धिम् ५८

English

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अध्याय ५६

श्लोक 116

विविधानि च दानानि हेमरत्नधनानि च ।चक्रतीर्थे महाराज कपिलां यः प्रयच्छति ।पृथ्वी तेन भवेद् दत्ता सशैलवनकानना

vividhāni ca dānāni hemaratnadhanāni ca / cakratīrthe mahārāja kapilāṃ yaḥ prayacchati / pṛthvī tena bhaved dattā saśailavanakānanā

हिन्दी अर्थ

वस्वोकसायास्तीरे तु वने सुरभिविश्ुते । हरिशद्धा तु वसति विद्वान्कोबेरको वशो ३६० यज्ञोपेत: स सुमहानमितौजा: सुविक्रमः । तत्रा55गस्त्येः परिवृतों बिद्ृद्भिन्नेह्या राक्षस: ॥

English

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अध्याय ५६

श्लोक 117

उत्तानपाद उवाच: यानि यानि च दत्तानि शस्तानि जगतीपतेः ।तानि सर्वाणि देवेश कथयस्व प्रसादतः

uttānapāda uvāca: yāni yāni ca dattāni śastāni jagatīpateḥ / tāni sarvāṇi deveśa kathayasva prasādataḥ

हिन्दी अर्थ

में प्रवेश करती है । वहाँ से वह॒ पवित्र आह्लादिनी धारा पूरब की ओर बहती है ।५०। कितने ही देश और निषधों, धीवरों, ऋषिकों, नीलमुखों, केरलों, उष्ट्रकणों. किरातों, कालोदरों, विवर्णो और स्वणंभूषित कुमारों को प्लावित करती हुई वह समुद्रमण्डल में पूव की ओर विलीन हो गई है। पावेती धारा भी पूरब दिशा को ही बही है ५१-५१ यह भअपथों को, इख्ध्युम्त सरोवर को, खरापथ को, इन्द्रशडःकुपथ को ओर कुथश्रावरण प्रभति स्थानों को प्लावित करती हुई इस्द्रढ्दीप समुद्र के निकट लवण-सागर में प्रविष्ट हुई है। नलिनी भी पूरब की ओर वेग से बहती है। यह भी तोमर, हंसमागं, हुहुक और अन्याय पूर्वीय देशों को प्लाबित करती हुई, अनेकानेक पर्वतों को फोड़ती हुई, कर्णप्रावरण, अश्वमुख, सिकतापबंत मद प्रभ्नति स्थानों में गमन करती हुई विद्याधर के देश में उपस्थित हुई है। यह नेमिमण्डल कोष्ठ के पास महासाभर में प्रविष्ट हुई

English

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अध्याय ५६

श्लोक 118

ईश्वर उवाच: तिलप्रदः प्रजामिष्टां दीपदश्चक्षुरुत्तमम् ।भूमिदः स्वर्गमाप्नोति दीर्घम् आयुर् हिरण्यदः

īśvara uvāca: tilapradaḥ prajāmiṣṭāṃ dīpadaścakṣuruttamam / bhūmidaḥ svargamāpnoti dīrgham āyur hiraṇyadaḥ

हिन्दी अर्थ

है ।१४-५८। इन नदियों की सैकड़ों हजारों उपनदियाँ है । वे इनसे ही निकल कर फिर इनमें ही इस प्रकोर- मिलती हैं, जिस प्रकार मेघ समुद्र से जल लेकर बरसाता है और वह जल फिर समुद्र में ही मिल जाता है। वस्वोकसा के तीर पर प्रसिद्ध सुरभि वन में हरिश्वद्ध के ऊपर विद्वान वशी कौबेरक रहते हैं

English

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अध्याय ५६

श्लोक 119

गृहदो रोगरहितो रूप्यदो रूपवान् भवेत् ।वासोदश्चन्द्रसालोक्यम् अर्कसायुज्यम् अश्वदः

gṛhado rogarahito rūpyado rūpavān bhavet / vāsodaścandrasālokyam arkasāyujyam aśvadaḥ

हिन्दी अर्थ

बहाँ जितेन्द्रिय यज्ञोपेत, अमितोजा, सुमहान और सुविक्रम नामक कुबेर के चार अनुचर निवास करते हैं । ये अगस्त्य वंशीय विद्वान ब्रह्मराक्षगों द्वारा सेवित और कुबेर के ही समान है ।६?। पर्वतवासियों की एवमेव तु विज्ञेया ऋद्धिः पर्वतवासिनाम् । परस्परेण द्विगुणा धर्तः कामतोडथंतः..

English

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अध्याय ५६

श्लोक 120

वृषदस्तु श्रियं पुष्टां गोदाता च त्रिविष्टपम् ।यानशय्याप्रदो भार्याम् ऐश्वर्यम् अभयप्रदः

vṛṣadastu śriyaṃ puṣṭāṃ godātā ca triviṣṭapam / yānaśayyāprado bhāryām aiśvaryam abhayapradaḥ

हिन्दी अर्थ

अवगाहा हाभयतः समुद्रौ पर्वपश्चिमौं। सरो विष्णुपदं नाम निषधे पदवंतोत्तमे

English

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अध्याय ५६

श्लोक 121

धान्यदः शाश्वतं सौख्यं ब्रह्मदो ब्रह्म शाश्वतम् ।वार्यन्नपृथिवीवासस्तिलकाञ्चनसर्पिषाम्

dhānyadaḥ śāśvataṃ saukhyaṃ brahmado brahma śāśvatam / vāryannapṛthivīvāsastilakāñcanasarpiṣām

हिन्दी अर्थ

पुण्डरीका पयोदा च तस्मान्नद्यो विनिगंते । श्वेतात्प्रभवते पुण्यं सरस्तृत्तरसानसम्् ६७ ज्योत्स्ना च म्रगकान्ता च तस्मादह संबभूवतुः मधुमत्सरः पुण्यं च पद्ममीनद्विजाकुलम् कल्पवृक्षसमाकीर्ण मधुवत्सवबंत: सुखम् । रुद्रकानवसिति ख्यातं निर्मितं तज़ूबेन तु १६६९

English

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अध्याय ५६

श्लोक 122

सर्वेषामेव दानानां ब्रह्मदानं विशिष्यते ।येन येन हि भावेन यद्यद्दानं प्रयच्छति

sarveṣāmeva dānānāṃ brahmadānaṃ viśiṣyate / yena yena hi bhāvena yadyaddānaṃ prayacchati

हिन्दी अर्थ

तेम्यः शान्तो च माध्वी च है नद्यो संबभुवतु: । यानि किपुरुषाद्यानि तेषु देवो न वर्षति (७१ उद्धिज्जान्युदकान्यत्र प्रवहन्ति सरिहरा: । ऋषभो दुन्दुभिश्चव धूम्रश्चेव सहागिरिः ७२

English

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अध्याय ५६

श्लोक 123

तेन तेन स भावेन प्राप्नोति प्रतिपूजितम् ।दृष्ट्वा दानानि सर्वाणि राज्ञी दत्तानि यानि च

tena tena sa bhāvena prāpnoti pratipūjitam / dṛṣṭvā dānāni sarvāṇi rājñī dattāni yāni ca

हिन्दी अर्थ

3... . ल्‍ के के ृ€उछआख छउछऊ छछ अन्‍्या----०व.....................-ननकनतनीनानया-3---++++कभनकतययाणण-न।--त-+ककनीनननतदकऊिनतख38कना-नकनन-ख- लिन के. 7...-जन-+----++5 समृद्धि इसी प्रकार प्रसिद्ध है। वे धर्म, अ्थं और काम के सम्बन्ध में परस्पर द्वियुणित समृद्धि सम्पन्न हैं

English

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अध्याय ५६

श्लोक 124

उवाच शबरो भार्यां यत्तच्छृणु नरेश्वर ।पुराणं पठितं भद्रे ब्राह्मणैर्वेदपारगैः

uvāca śabaro bhāryāṃ yattacchṛṇu nareśvara / purāṇaṃ paṭhitaṃ bhadre brāhmaṇairvedapāragaiḥ

हिन्दी अर्थ

हेमकट के पीछे सायन नामक एक सरोवर है, जिससे मनस्विनी ज्योतिष्मती उत्पन्न हुई है। यह भागे पीछे दोनों ही भागों से पू्व-पश्चिम समुद्रों में प्रवेश करती है । पव॑तोत्तम निषध पर विष्ण पद नामक सरोवर है

English

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अध्याय ५६

श्लोक 125

श्रुतं च तन्मया सर्वं दानधर्मफलं शुभम् ।पूर्वजन्मार्जितं पापं स्नानदानव्रतादिभिः

śrutaṃ ca tanmayā sarvaṃ dānadharmaphalaṃ śubham / pūrvajanmārjitaṃ pāpaṃ snānadānavratādibhiḥ

हिन्दी अर्थ

इससे गान्धर्वी और नत्वली नामक नदियाँ निकली हैं । मेरु के पीछे चन्द्प्रभ नामक एक महान हद है। वहाँ पावनी जम्बू नदी बहती है, जिसमें शुभावह सुबर्ण होता है। नीलाचल पर शुश्र पुण्डरीकयुक्त पर्योद नाम का सरोवर है। उसीसे पुण्डरीका और पयोदा नामकी नद्वियाँनिकली हैं। दवेत पर्वत से उत्तर मानस नामक - पुण्य सरोवर उत्पन्न हुआ है ।६५-६७। ज्योत्स्मा और गमृगकान्ता नामक नदियाँ उससे निकली हैं। शिव ढ्वारा निर्मित रुद्रकान्‍्त नामक वहाँ एक और सरोवर है, जो मधुरस से परिपूर्ण, पद्म-मीन-पक्षियों से युक्त, कल्पव॒क्षों से व्याप्त, सुखसम्पन्न और पवित्र है।ओऔर भी पद्ममीन-पक्षियों से यूक्त यहाँ कितने ही हृद हैं। वे सब जय कहलाते हैं ओर मालूम पड़ते हैं ज॑से बारह समुद्र हों ।६८५-७०। उनसे शान्ती और साध्वी नामक दो नदियाँ निकली हैं । किपूरुषादि देझ्षों में वृष्टि नहीं होती है।७१। वहाँ की श्रेष्ठ नदियाँ उद्धिज्ज

English

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अध्याय ५६

श्लोक 126

शरीरं दुस्त्यजं मुक्त्वा लभते गतिमुत्तमाम् ।संसारसागराद्भीतः सत्यं भद्रे वदामि ते

śarīraṃ dustyajaṃ muktvā labhate gatimuttamām / saṃsārasāgarādbhītaḥ satyaṃ bhadre vadāmi te

हिन्दी अर्थ

जलराशि को बहाया करती हैं। ये भाग्यशालिनी नदियाँ पूरव की तरफ लम्बी होकर लवण-सागर में गिरी हैं। ऋषभ, दुन्दुभि, महागिरि धूम्र, चन्द्रकंक तथा प्राणादि छिलोच्चयों के उत्तर बहती हुई ये नदियाँ उत्तरी सीमा तक जाकर महासमुद्र में गिरी हैं ।७२-०७३। सोमक, वराह और नारद नामक महीधर परिचम

English

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अध्याय ५६

श्लोक 127

अनेकानि च पापानि कृतानि बहुशो मया ।घातिता जन्तवो भद्रे निर्दग्धाः पर्वताः सदा

anekāni ca pāpāni kṛtāni bahuśo mayā / ghātitā jantavo bhadre nirdagdhāḥ parvatāḥ sadā

हिन्दी अर्थ

तत्र संबर्तको नाम सो5ग्निः पिबति तज्जलम् । नाम्ना ससुद्रपः श्रीमानोवें: स वडवासुख: भारतस्य तु वर्षस्य भेदास्ते नव कीतिताः । इहोदितस्य दृश्यन्ते तथान्येडन्यत्र नोदिते उत्तरोत्तरमेतेषां वर्ष मुद्दिश्य ते गुण: । आरोग्यायुष्प्रमाणाभ्यां धमंतः कामतोथ्थेत:

English

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अध्याय ५६

श्लोक 128

तेन पापेन दग्धो ऽहं दारिद्र्यं न निवर्तते ।तीर्थावगाहनं पूर्वं पापेन न कृतं मया

tena pāpena dagdho 'haṃ dāridryaṃ na nivartate / tīrthāvagāhanaṃ pūrvaṃ pāpena na kṛtaṃ mayā

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्ते भुवनविन्यासो नाम सप्तचत्वारिशोज्ध्याय: ॥४७)।

English

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अध्याय ५६

श्लोक 129

तेनाहं दुःखितो भद्रे दारिद्र्यम् अनिवर्तिकम् ।मातुर्गृहं प्रयाहि त्वं त्यज स्नेहं ममोपरि ।नगशृङ्गं समारुह्य मोक्तुम् इच्छाम्यहं तनुम्

tenāhaṃ duḥkhito bhadre dāridryam anivartikam / māturgṛhaṃ prayāhi tvaṃ tyaja snehaṃ mamopari / nagaśṛṅgaṃ samāruhya moktum icchāmyahaṃ tanum

हिन्दी अर्थ

की ओर लम्बायमान होते हुए लवणसागर में मिल गये हैं ।७४। बक, बलाहक, ओर मैनाक पत्रत दक्षिण दिशा में लम्बायमान होकर दक्षिण सागर में मिल गये हैं, दक्षिण दिंशा में चन्द्र और मैनाक पव॑त के बीच संवतंक नामक एक अग्नि है, जो समुद्रजल को पिया करता है। इस अग्नि का नामान्तर समुद्रप, वड़वामुख और श्रीमान है है ।७ -दृ। ये बारह पंत इस भय से कि कहीं इन्द्र उनके पक्ष न काट डाले लवणोदषि में प्रविष्ट हैं 4-इवैंत चन्द्र में यह जो काला शशांक देखा जाता है ।७७। वहू नवधा भिन्न भारतवषे का ही प्रतिबिम्ब है । इस देह में ही उदित चन्द्र के मध्य यह देखा जाता है, दूसरी जगह नहीं ।७८। उत्तरोत्तर क्रम से इन देशवासियों के प्राणी आरोग्य, आयु, घर्मं, अर्थ और काम आदि गुणों में उत्तरोत्तर पूर्व-पूत्र देशस्थ लोगों की अपेक्षा अधिक समृद्ध हैं। नाना जातियों के प्राणिसमृह उल्लिखित देशों में निवास क'ते हैं। इसी

English

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अध्याय ५६

श्लोक 130

शबर्युवाच: मात्रा पित्रा न मे कार्यं नापि स्वजनबान्धवैः ।या गतिस्तव जीवेश सा ममापि भविष्यति

śabaryuvāca: mātrā pitrā na me kāryaṃ nāpi svajanabāndhavaiḥ / yā gatistava jīveśa sā mamāpi bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

प्रकार यह प्रृथ्वी सम्पूर्ण विश्व को अपने वक्ष:स्थल पर लोकस्थिति के लिये धारण करती है

English

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अध्याय ५६

श्लोक 131

न स्त्रीणामीदृशो धर्मो विना भर्त्रा स्वजीवितम् ।श्रूयन्ते बहवो दोषा धर्मशास्त्रेष्वनेकधा

na strīṇāmīdṛśo dharmo vinā bhartrā svajīvitam / śrūyante bahavo doṣā dharmaśāstreṣvanekadhā

हिन्दी अर्थ

इदमध नास्ति घ. पुस्तके । ३४२ वायुपुराणम््

English

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अध्याय ५६

श्लोक 132

पारणं कुरु भोजेन्द्र व्रतं येन न नश्यति ।यत्ते ऽभिवाञ्छितं किंचिद् विष्णवे कर्तुम् अर्हसि

pāraṇaṃ kuru bhojendra vrataṃ yena na naśyati / yatte 'bhivāñchitaṃ kiṃcid viṣṇave kartum arhasi

हिन्दी अर्थ

प्रसन्नस्वादुसलिलास्तत्र नद्यः सहस्नरशः । वाप्यस्तस्य तु ह्वीपस्य प्रवृत्ता विमलोदकाः ऐ

English

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अध्याय ५६

श्लोक 133

भार्याया वचनं श्रुत्वा मुमुदे शबरस्ततः ।गृहीत्वा श्रीफलं शीघ्रं होमं कृत्वा यथाविधि

bhāryāyā vacanaṃ śrutvā mumude śabarastataḥ / gṛhītvā śrīphalaṃ śīghraṃ homaṃ kṛtvā yathāvidhi

हिन्दी अर्थ

तस्य शेलस्य च्छिद्रेषु विस्तीर्णेष्वायतेषु च। अनेकेषु समृद्धानि नानाकाराणि स्वेशः ५ नरनारीसमाठ्यानि मुदितानि महान्ति च । तेषां तलप्रवेशानि सहर्नाणि शतानि च पुराणि संनिविष्टानि पर्व॑तान्तगंतानि च। सुसंबद्धानि चान्योन्यमेकद्वाराणितान्यथ ७

English

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अध्याय ५६

श्लोक 134

सर्वदेवान्नमस्कृत्य भुक्तो ऽपि च तया सह ।चैत्र्यां तु विषुवं ज्ञात्वा तस्थौ तत्र दिनत्रयम्

sarvadevānnamaskṛtya bhukto 'pi ca tayā saha / caitryāṃ tu viṣuvaṃ jñātvā tasthau tatra dinatrayam

हिन्दी अर्थ

शाखामृगसधर्माणः फलमुलाशिनस्तथा । गोधर्माणो ह्यनिदिष्टा: शौचाचारविवर्जिताः ६

English

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 56
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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