Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
83
अध्याय 83 / 232

Adhyaya 83

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अध्याय ८३

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे दधिस्कन्दादिपञ्चतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम द्व्यशीतितमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय ८३ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेन्महाराज तीर्थं परमशोभनम् ।ब्रह्महत्याहरं प्रोक्तं रेवातटसमाश्रयम् ।हनूमताभिधं ह्यत्र विद्यते लिङ्गमुत्तमम्

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe dadhiskandādipañcatīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma dvyaśītitamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 83 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchenmahārāja tīrthaṃ paramaśobhanam / brahmahatyāharaṃ proktaṃ revātaṭasamāśrayam / hanūmatābhidhaṃ hyatra vidyate liṅgamuttamam

हिन्दी अर्थ

लक्ष्मी: कीतिधृतिमेंधा लज्जा क्षान्तिवेपु: स्वधा तुष्टिः पुष्कि: क्रिया चेव बाचां वेधी सरस्वती ॥ त्वत्त: प्रसुता देवेश संध्या राधिस्तथेत्र च ४ ३ सुर्वायुतानामयुतप्रभाव नमोस्तु ते चन्द्रसहल्नगोचर । द

English

The sages to whom this ( Sraddha Kalpa ) was narrated became very much delighted. Extremely eager to hear further, they asked him thereafter.

अध्याय ८३

श्लोक 2

युधिष्ठिर उवाच: हनूमन्तेश्वरं नाम कथं जातं वदस्व मे ।ब्रह्महत्याहरं तीर्थं रेवादक्षिणसंस्थितम्

yudhiṣṭhira uvāca: hanūmanteśvaraṃ nāma kathaṃ jātaṃ vadasva me / brahmahatyāharaṃ tīrthaṃ revādakṣiṇasaṃsthitam

हिन्दी अर्थ

नमोइस्तु ते पर्वंतरूपधारिणे नमो5स्तु ते सबंगुणाकराय ४४

English

Please narrate (to us) in proper sequence the condition of the races of the kings of unmeasured spledour as well as valour. We implore you.

अध्याय ८३

श्लोक 3

श्रीमार्कण्डेय उवाच: साधु साधु महाबाहो सोमवंशविभूषण ।गुह्याद्गुह्यतरं तीर्थं नाख्यातं कस्यचिन्मया

śrīmārkaṇḍeya uvāca: sādhu sādhu mahābāho somavaṃśavibhūṣaṇa / guhyādguhyataraṃ tīrthaṃ nākhyātaṃ kasyacinmayā

हिन्दी अर्थ

नमोष्स्तु ते भस्मविभुताभूषिताड़ु नमो5स्तु ते कामशरोरनाशन । नमोस्तु ते देव हिरण्यवाससे नमोस्तु ते देव हिरण्यबाहवे १४६

English

Thus entreated, Suta Lomakarfana an expert in the narration of tales and proficient in the art of speech, (observed) the desire of the sages to hear the story and spoke these words:

अध्याय ८३

श्लोक 4

तव स्नेहात्प्रवक्ष्यामि पीडितो वार्द्धकेन तु ।पूर्वं जातं महद्युद्धं रामरावणयोरपि

tava snehātpravakṣyāmi pīḍito vārddhakena tu / pūrvaṃ jātaṃ mahadyuddhaṃ rāmarāvaṇayorapi

हिन्दी अर्थ

आप ही तीनों लोकों को धारण करते और सृष्टि भी करते हैं ।३५-३७। अपने पूर्व मुख से तुम इन्द्र रूप में प्रकाशित होते हो, प्रभो ! दक्षिण मुख से सभी लोकों का विनाश करते हो अर्थात् यम रूप में विद्यमान हो, पश्चिममुख से वरुण का कार्य करते हो एवं उत्तर मुख से चन्द्रमा का धर्म तुममें व्यवस्थित है

English

Even as I recount, listen, and understand the state and position of the dynasties of the kings of unmeasured splendour, in the proper order and their prowess.

अध्याय ८३

श्लोक 5

पुलस्त्यो ब्रह्मणः पुत्रो विश्रवास्तस्य वै सुतः ।रावणस्तेन संजातो दशास्यो ब्रह्मराक्षसः

pulastyo brahmaṇaḥ putro viśravāstasya vai sutaḥ / rāvaṇastena saṃjāto daśāsyo brahmarākṣasaḥ

हिन्दी अर्थ

देव ! इस प्रकार तुम अनेक रूपों द्वारा इस समस्त जगत् के उत्वादक रूप में शोभित होते हो, तुम्हारा कभी नाश नहीं होता । देवेश ! बारह आदित्य, आठों वसु, ग्यारहों रुद़्, उनचासों मरुत्, दोनों अश्विनीकुमार एवं इनके अतिरिक्त जो साध्य, विद्याधर, नाग, चारण, तप्स्वी, बालखिल्य प्रभृति महात्मा तपोनिष्ठ हैँ, वे सभी तुमसे उत्पन्न हुए हैं। अन्य जितने जगत् में तपोनिष्ठ ब्रतधारी हैं, वे सब भी तुमसे उत्पन्न हुए हैं । उमा, सीता, सिनीवाली, कुह, गायत्री, लक्ष्मी, कीति, धृति, मेधा लज्जा, शान्ति, वषु, सवा, तुष्टि, पुष्टि क्रिया, वाग्देवी सरस्वती, संध्या, राज्ि-ये सभी तुमसे उत्पन्न हुई हैं।४०-४३। दस सहल॒ सूर्य से भी अधिक प्रभावशाली तुम्हें हमारा नमस्कार है। है सहस्रों चन्द्रमा के समान कःन्तिशालिन् ! तुम्हें हम नमस्कार करते हैं। पर्वत के समान विशाल स्वरूप धारण करने वाले, सबंगुणों के आकर स्वरूप तम्हें हम

English

This chapter corresponds to Bd. 3.59; only verse numbers from that chapter are quoted in notes.

अध्याय ८३

श्लोक 6

त्रैलोक्यविजयी भूतः प्रसादाच्छूलिनः स च ।गीर्वाणा विजिताः सर्वे रामस्य गृहिणी हृता

trailokyavijayī bhūtaḥ prasādācchūlinaḥ sa ca / gīrvāṇā vijitāḥ sarve rāmasya gṛhiṇī hṛtā

हिन्दी अर्थ

नमस्कार करते हैं। है पट्टिश के धारण करने वाले, चर्म एवं विभूति से विभूषित तुम्हें हमारा नमस्कार

English

Varuna's wife was the daughter of the ocean and was called "Sunodevi". She had two sons Kali and Vaidya and a daughter Surasundarl.

अध्याय ८३

श्लोक 7

वारितः कुम्भकर्णेन सीतां मोचय मोचय ।विभीषणेन वै पापो मन्दोदर्या पुनःपुनः

vāritaḥ kumbhakarṇena sītāṃ mocaya mocaya / vibhīṣaṇena vai pāpo mandodaryā punaḥpunaḥ

हिन्दी अर्थ

नमोस्तु ते देव हिरण्यरूप नमो5स्तु ते देव हिरण्यनाभ । नमोस्तु ते नेत्रसहस्मचित्र नमो5स्तु ते देव हिरण्यरेतः (१४७ “ नमोस्तु ते देंब हिरण्यवर्ण नमोस्तु ते देव हिरण्यगर्भ ।

English

Kali had two very powerful sons (namely): Jaya and Vijaya. Vaidya too had two sons of great strength, viz. Ghrni and Muni.

अध्याय ८३

श्लोक 8

त्वं जितः कार्तवीर्येण रैणुकेयेन सो ऽपि च ।स रामो रामभद्रेण तस्य संख्ये कथं जयः

tvaṃ jitaḥ kārtavīryeṇa raiṇukeyena so 'pi ca / sa rāmo rāmabhadreṇa tasya saṃkhye kathaṃ jayaḥ

हिन्दी अर्थ

नमोस्तु ते देव हिरण्यचीर नमोःस्तु ते देव हिरण्यदायिने ध४८

English

When the subjects became desirous of eating, they ate each other. Devouring each other, they perished.

अध्याय ८३

श्लोक 9

रावण उवाच: वानरैश्च नरैरृक्षैर्वराहैश्च निरायुधैः ।देवासुरसमूहैश्च न जितो ऽहं कदाचन

rāvaṇa uvāca: vānaraiśca narairṛkṣairvarāhaiśca nirāyudhaiḥ / devāsurasamūhaiśca na jito 'haṃ kadācana

हिन्दी अर्थ

नमोस्तु ते देव हिरण्यमालिने नमोउस्तु ने देव हिरण्यवाहिने । नमोस्तु ते देव हिरण्यवत्मंने नमोस्तु ते भेरवनादनादिने .

English

Kali begot ofSura (a son). That son of his is remembered as Mada. Himsa, the daughter of Tvastr, was the eldest wife of Kali. She was known as Nikfti (too).

अध्याय ८३

श्लोक 10

श्रीमार्कण्डेय उवाच: सुग्रीवहनुमद्भ्यां च कुमुदेनाङ्गदेन च ।एतैरन्यैः सहायैश्च रामचन्द्रेण वै जितः

śrīmārkaṇḍeya uvāca: sugrīvahanumadbhyāṃ ca kumudenāṅgadena ca / etairanyaiḥ sahāyaiśca rāmacandreṇa vai jitaḥ

हिन्दी अर्थ

नमो5स्तु ते भेरवबेगवेग नमोस्तु ते शंकर नीलकण्ठ ।

English

She bore four other man-eating sons to Kali, viz. Naka, the famous Vighna, Sadrama and Vidhama.

अध्याय ८३

श्लोक 11

रामचन्द्रेण पौलस्त्यो हतः संख्ये महाबलः ।वनं भग्नं हताः शूराः प्रभञ्जनसुतेन च

rāmacandreṇa paulastyo hataḥ saṃkhye mahābalaḥ / vanaṃ bhagnaṃ hatāḥ śūrāḥ prabhañjanasutena ca

हिन्दी अर्थ

एवं संस्तृयमानस्तु व्यक्तो भूत्वा महासतिः। भाति देवों महायोगी सुर्यकोटिसमप्रभ: १५१ अभिभाष्यस्तदा हृष्टो महादेवों महेश्वरः । वक्‍त्रकोटिसहुल्न ण ग्रसमान इवास्बरस् ॥५२ , एकग्रीवस्त्वेकजटों नानाभूषणभूषितः । नाचारत्नावचित्राड्रों नानामाल्यानुलेपन: 9 ््फफरफर छरछ ॒ ॒॒रऑरऑढररऑझउ्जछ नननन्‍ानााासससससससॉअकीरॉसस ॉनॉ5पपाघपपप+++++ है । तुम रुद्र हो, पिनाकपाणि हो, सायक तथा चक्र धारण करने वाले हो, तुम्हें हमारा नमस्कार है। हे भस्म से विभूषित अंगों वाले ! कामदेव के शरीर को नष्ट करने वाले ! तुम्हें हम नमस्कार करते हैं। देव ! तुम स्वणिम वस्त्र धारण करने बाले हो, हिरण्यंबाहु हों है हिरण्यरूप, तुम्हें हमारा बारम्बार नमस्कार है,

English

Among them Vighna was devoid of head; Naka had no body; Sadrama was single-handed; and Vidhama had a single foot.

अध्याय ८३

श्लोक 12

रावणस्य सुतो जन्ये हतश्चाक्षकुमारकः ।आयामो रक्षसां भीमः सम्पिष्टो वानरेण तु

rāvaṇasya suto janye hataścākṣakumārakaḥ / āyāmo rakṣasāṃ bhīmaḥ sampiṣṭo vānareṇa tu

हिन्दी अर्थ

हे हिरण्यनाभ ! तम्हें हम नमस्कार करते हैं। है सहस्रों नेत्रों से विचित्र आकृति वाले, हिरण्यरेता देव ! तुम्हें हमारा नमस्कार है, नमस्कार है ।४४-४७। है देव ! तुम हिरण्य के समान वर्णवाले हो, हिरण्यगर्भ हो । है देव ! तुम हिरण्य का चीर धारंण करने वाले हो, हिरण्प दान करने वाले हो, तुम्हें हम नमस्कार करते हैं । हें हिरण्य की माला धारण करने बालें देव तुम्हें हमारा नमस्कार है, देव ! तुम हिरण्यवाही हो, तुम्हें हम

English

Sadrama's wife was remembered as Putana. She had Tamasic qualities. Revat! was the wife of Vidhama. Their sons were in thousands.

अध्याय ८३

श्लोक 13

एवं रामायणे वृत्ते सीतामोक्षे कृते सति ।अयोध्यां तु गते रामे हनुमान्स महाकपिः

evaṃ rāmāyaṇe vṛtte sītāmokṣe kṛte sati / ayodhyāṃ tu gate rāme hanumānsa mahākapiḥ

हिन्दी अर्थ

नमस्कार करते हैं। है देव ! तुम हिरण्यवर्श्मा हो, अतिभीषण नाद करने बाले तुम्हें हमारा नमस्कार है, नमस्कार है। है भीषणवेगशाली ! शंकर ! नीलकण्ठ ! तुम्हें हमारा नमस्कार है। है दिव्य सह बाहु धारण करने वाले ! नृत्य एवं वाद्य को पसन्द करने वाले ! तुम्हें हमारा बारम्बार तमस्कार है ।४५-४०। इस प्रकार है स्तुति किये जाने पर महाबुद्धिमान्, कोटि सूर्य के समान कान्ति वाले, महायोगी भगवान् प्रकट हुए उस समय प्रसन्‍्नचित्त महेश्वर महादेव प्राथियों की ओर मुख कर कुछ बोलते हुए शतकोटि मुर्खों द्वारा आकाश को निगलते हुए से शोभित हो रहे थे । उस समय भंगवान् पिनाकपाणि अति शोभायुत हो रहे थे। उनके एकमात्र कण्ठ था जटा एक थी, शरीर विविध आभूषणों से विभूषित था, विविध रत्नों से अज्ों की.शोभा

English

Sakuni was the wife of Naka and AyomukhI was the wife of Vighna. Raksasas of huge heads roaming about at dawn and dusk (were born of them).

अध्याय ८३

श्लोक 14

कैलासाख्यं गतः शैलं प्रणामाय महेशितुः ।तिष्ठ तिष्ठेत्यसौ प्रोक्तो नन्दिना वानरोत्तमः

kailāsākhyaṃ gataḥ śailaṃ praṇāmāya maheśituḥ / tiṣṭha tiṣṭhetyasau prokto nandinā vānarottamaḥ

हिन्दी अर्थ

४२४ द वायुपुराणम्

English

The sons of Revat! and Putana are remembered by the name of Nairrtas. All these Raksasas were evil demons known as Grahas. They particularly harassed children (by haunting them). With the permission of Brahma, lord Skanda became their overlord.

अध्याय ८३

श्लोक 15

ब्रह्महत्यायुतस्त्वं हि राक्षसानां वधेन हि ।भैरवस्य सभा नूनं न द्रष्टव्या त्वया कपे

brahmahatyāyutastvaṃ hi rākṣasānāṃ vadhena hi / bhairavasya sabhā nūnaṃ na draṣṭavyā tvayā kape

हिन्दी अर्थ

व्यालयज्ञोपवीती च सुराणामभयंकरः । दुष्दुभिस्वननिर्धोषषर्जन्यनिनदोपमः ॥॥ अय॑ मे दक्षिणों बाहुब्ंह्मा लोकपितामहः । बामो बाहुश्व मे विष्णुनित्यं युद्धेषु तिष्ठति ॥

English

Brhaspati's sister was a noble lady (named) Yogasiddha. Observing celibacy and being detached, she roamed over the whole universe.

अध्याय ८३

श्लोक 16

हनुमान् उवाच: नन्दिनाथ हरं पृच्छ पातकस्योपशान्तिदम् ।पापो ऽहं प्लवगो यस्मात् संजातः कारणान्तरात्

hanumān uvāca: nandinātha haraṃ pṛccha pātakasyopaśāntidam / pāpo 'haṃ plavago yasmāt saṃjātaḥ kāraṇāntarāt

हिन्दी अर्थ

यदि प्रीति: समुत्पन्ना यदि देयो बरश्न नो । भक्तिभंवतु नो नित्य॑ त्वयि देव सुरेश्वर १६०

English

She became the wife of the eighth of the Vasus, vizi Prabhasa. Visvakarma, the creator of arts and crafts was born as her son.

अध्याय ८३

श्लोक 17

नन्द्युवाच: रुद्रदेहोद्भवा किं ते न श्रुता भूतले स्थिता ।श्रवणाज्जन्मजनितं द्विगुणं कीर्तनाद् व्रजेत्

nandyuvāca: rudradehodbhavā kiṃ te na śrutā bhūtale sthitā / śravaṇājjanmajanitaṃ dviguṇaṃ kīrtanād vrajet

हिन्दी अर्थ

चित्र विजित्र हो रही थी, शरीर पर विविध प्रकार के पुष्प चन्दन सुशोभित हो रहे थे । वृषभ पर समासीन थे, हाथ में शुल धारण किये थे, दण्ड एवं कृष्णमृग का चमं धारण किये कपाल लिये हुए थे। उस समय उनकी आकृति अतिघोर थी, सप का यज्ञोपवीत धारण किया था; परु ऐसा स्वरूप होते हुए भी वे भोषण तथा गम्भीर थे । उस समय शद्भूर ने भीषण अट्वहास किया जिससे आकाझ्षमण्डल व्याप्त हो गया ।१५१-५५। महात्मा शंकर के उसः भीषण नाद से हम लोग भयभीत हो गये । तदनन्‍्तर महायोगी शंकर ने कहा, देवताओं में श्रेष्ठ ! मैं तुम दोनों पर प्रसश्त हूं । भय को छोड़कर मेरी महामाया को देखों, पूवंकाल में तुम दोनों सनातन पुरुष मेरे शरीर से ही उत्पन्न हुए हो। यह लोकपितामह ब्रह्मा मेरे दाहिने हाथ हैं,

English

(He was known as) Tvastr. He created many forms. He was the grandson of Dharma. He was liberal-minded. He was the creator of thousands of arts and crafts. He was the Architect of Devas.

अध्याय ८३

श्लोक 18

त्रिंशज्जन्मार्जितं पापं नश्येद् रेवावगाहनात् ।तस्मात् त्वं नर्मदातीरं गत्वा चर तपो महत्

triṃśajjanmārjitaṃ pāpaṃ naśyed revāvagāhanāt / tasmāt tvaṃ narmadātīraṃ gatvā cara tapo mahat

हिन्दी अर्थ

और यह नित्य युद्ध में स्थित रहने वाले विष्ण मेरे बाएँ हाथ हैं। मैं तुम दोनों पर अति प्रसन्न हूँ और मनोअभिलाषित वरदान दे रहा हैँ । शिव की ऐसी बातें सुनकर निष्पाप महात्मा ब्रह्मा, विष्णु अति प्रसन्‍्त मन से शिव के चरणों पर बारम्बार प्रणत हुए और बोले देव ! यदि सचमृच हम पर आपकी प्रीति उत्पन्न हुई है और वरदान देने के लिए प्रस्तुत हैं तो सुरेश्वर ! आपमें हमारी भक्ति सबंदा बनी रहे ।१५६-६०।॥

English

He made aerial chariots for all the Devas. Human beings

अध्याय ८३

श्लोक 19

गन्धर्वाहसुतो ऽप्येवं नन्दिनोक्तं निशम्य च ।प्रयातो नर्मदातीरम् और्व्यादक्षिणसङ्गमम्

gandharvāhasuto 'pyevaṃ nandinoktaṃ niśamya ca / prayāto narmadātīram aurvyādakṣiṇasaṅgamam

हिन्दी अर्थ

भगवान् बोले--महाभाग्यशाली ! जेसा तुम दोनों कह रहे हो, वैसा ही हो, विविध प्रकार की प्रजाओं की सृष्टि करते जाओ । भगवान् शंकर इतना कहकर वहीं अन्तहित हो गये । मैंने उन योगी क्षकर के प्रभाव का यह वर्णन तुम लोगों को सुना दिया उन्हीं भगवान् ने इस समस्त चराचर जगत् की एतद्विरूपमज्ञातमव्यक्तं शिवसंज्ञितम्। अचिन्त्यं तददृश्यं च पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः

English

Tvastr's wife was the famous daughter of Prahlada and was the sister of Virocana and the mother of Trisiras

अध्याय ८३

श्लोक 20

दध्यौ सुदक्षिणे देवं विरूपाक्षं त्रिशूलिनम् ।जटामुकुटसंयुक्तं व्यालयज्ञोपवीतिनम्

dadhyau sudakṣiṇe devaṃ virūpākṣaṃ triśūlinam / jaṭāmukuṭasaṃyuktaṃ vyālayajñopavītinam

हिन्दी अर्थ

तस्मै देवाधिपत्याय नमस्कार प्रयुझज्वहे । येन सुक्ष्ममचिन्त्यं च पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः .

English

Maya, the son of the intelligent preceptor of Devas in craftsmanship of all kinds, is remembered as Visvakarma also

अध्याय ८३

श्लोक 21

भस्मोपचितसर्वाङ्गं डमरुस्वरनादितम् ।उमार्द्धाङ्गहरं शान्तं गोनाथासनसंस्थितम्

bhasmopacitasarvāṅgaṃ ḍamarusvaranāditam / umārddhāṅgaharaṃ śāntaṃ gonāthāsanasaṃsthitam

हिन्दी अर्थ

महादेव नमस्तेःस्तु महेश्वर नमोःस्तु ते । सुरासुरवरश्रेष्ठ मनोहंस नमोषस्तु ते ॥........ ७४६५ एतच्छ त्वा गताः सर्वे सुराः स्व स्व॑ निवेशनम् । नभस्कारं प्रयुअजाना: शंकराय महात्मने

English

His younger sister, the daughter of Tva lt r (originally) famous by the name of Surenu, became the wife of the Sun and was well known as Samjna.

अध्याय ८३

श्लोक 22

वत्सरान् सुबहून् यावद् उपासांचक्र ईश्वरम् ।तावत्तुष्टो महादेव आजगाम सहोमया

vatsarān subahūn yāvad upāsāṃcakra īśvaram / tāvattuṣṭo mahādeva ājagāma sahomayā

हिन्दी अर्थ

इमं स्तवं पठेद्चस्तु ईश्वरस्य महात्मनः । कामांश्व लभते सर्वान्पापेभ्यस्तु विमुच्यते

English

Assuming the form of a mare, the noble lady went to the land of Kurus. The blessed lady bore two sons to the Sun who had assumed the form of a horse. She gave birth to them through nostrils. They were the twin gods, the Asvins Nasatya and Dasra. Both of them were the sons of Martanda (the Sun-god). ' v

अध्याय ८३

श्लोक 23

उवाच मधुरां वाणीं मेघगम्भीरनिस्वनाम् ।साधु साध्वित्य् उवाचेशः कष्टं वत्स त्वया कृतम्

uvāca madhurāṃ vāṇīṃ meghagambhīranisvanām / sādhu sādhvity uvāceśaḥ kaṣṭaṃ vatsa tvayā kṛtam

हिन्दी अर्थ

एतत्सवं सदा तेन विष्णुना प्रभविष्णना । महादेवबप्रसादेन उकत॑ ब्रह्म सनातनम् १ इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्ते लिड्भरोड्रवस्तवों नाम पञ्चपञ्चाशोड्ध्याय:

English

Why is (the Sun) called Martanda by learned men? Why did she, in the form of a mare, give birth to them through the nostrils? We wish to know this. Please explain this to us who ask you.

अध्याय ८३

श्लोक 24

न च पूर्वं त्वया पापं कृतं रावणसंक्षये ।स्वामिकार्यरतस्त्वं हि सिद्धो ऽसि मम दर्शनात्

na ca pūrvaṃ tvayā pāpaṃ kṛtaṃ rāvaṇasaṃkṣaye / svāmikāryaratastvaṃ hi siddho 'si mama darśanāt

हिन्दी अर्थ

सृष्टि की है, हम लोग तो हेतुमात्र हैं। ये भगवान् स्वरूप रहित हैं, अज्ञात हैं, बव्यक्त हैं, लोक में उनकी 'शिव नाम से प्रसिद्धि है, वे अचिन्त्य हें, अदृश्य हैं, ज्ञान चक्ष पण्डितजन ही उन्हें देख सकते हैं। उन देवाधि- पति को हम नमस्कार करते हैं जिनके द्वारा ज्ञान चक्षु पण्डितजन सूक्ष्म एवं अचिन्त्य पदार्थों का दर्शन करते हैं। है महादेव ! तुम्हें हमारा नमस्कार है। महेश्वर ! हम तुम्हें तमस्कार करते हैं, सभी सुरासुरों में श्रेष्ठ !

English

Fora long time, the egg did not break (did not get hatched). It was broken open by Tvastr. On seeing it, Kas'yapa became sad as he feared that the foetus was killed.

अध्याय ८३

श्लोक 25

हनुमांश्च हरं दृष्ट्वा उमार्द्धाङ्गहरं स्थिरम् ।साष्टाङ्गं प्रणतो ऽवोचज्जय शम्भो नमो ऽस्तु ते ।जयान्धकविनाशाय जय गङ्गाशिरोधर

hanumāṃśca haraṃ dṛṣṭvā umārddhāṅgaharaṃ sthiram / sāṣṭāṅgaṃ praṇato 'vocajjaya śambho namo 'stu te / jayāndhakavināśāya jaya gaṅgāśirodhara

हिन्दी अर्थ

मनोहंस ! तुम्हें हमारा नमस्कार स्वीकार हो ।६१-६५ ! खूत बोले--इस प्रकार की बातें सुनकर सभी देव्गण महात्मा शंकर को नमस्कार करते हुए अपने-अपने वास-स्थान को चले गये ! जो मनुष्य महात्मा हंकर के इस उपयुक्त स्तोत्र का पांठ करता है, बह सभी मनोरथों को प्राप्त करता है तथा सभी पापों से विमुक्त होता है। इस प्रकार महामहिमामय सनातन ब्रह्म भगवान् विष्णु ने महादेव की कृपा से इन उपर्युक्त बातों की चर्चा की। और वह सब महेद्वर की पराक्रम

English

When the egg was broken into two parts, he looked into it and said to Tvastr, "This is certainly not an (ordinary)egg". (Then to the child he said) "O Sinless one, be Martanda".

अध्याय ८३

श्लोक 26

एवं स्तुतो महादेवो वरदो वाक्यम् अब्रवीत् ।वरं प्रार्थय मे वत्स प्राणसम्भवसम्भव

evaṃ stuto mahādevo varado vākyam abravīt / varaṃ prārthaya me vatsa prāṇasambhavasambhava

हिन्दी अर्थ

प्रकट करने वाली बातें मैंने तुम लोगों को सुनाई ।६६-६८॥।

English

The father affectionately said—"Indeed this (child) in the egg is not dead". On hearing his words, the relevancy of the name has been understood.

अध्याय ८३

श्लोक 27

श्रीहनुमान् उवाच: ब्रह्मरक्षोवधाज्जाता मम हत्या महेश्वर ।न पापो ऽहं भवेदेव युष्मत्सम्भाषणे क्षणात्

śrīhanumān uvāca: brahmarakṣovadhājjātā mama hatyā maheśvara / na pāpo 'haṃ bhavedeva yuṣmatsambhāṣaṇe kṣaṇāt

हिन्दी अर्थ

घनुष्चित्वान्तगंतग्रस्थो घ. पुस्तके नास्ति। यदा तु चन्द्रसुयों तो नक्षत्रेण समागतो । अमावास्थां मिवसत एकराज्रेकमण्डले

English

Since he was addressed by the father, "Be born of the dead (broken) egg", when the egg was broken, Vivasvan is cal-

अध्याय ८३

श्लोक 28

ईश्वर उवाच: नर्मदातीर्थमाहात्म्याद्धर्मयोगप्रभावतः ।मन्मूर्तिदर्शनात् पुत्र निष्पापो ऽसि न संशयः

īśvara uvāca: narmadātīrthamāhātmyāddharmayogaprabhāvataḥ / manmūrtidarśanāt putra niṣpāpo 'si na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

शांशपायन ने कहा--सूतजी ! प्रत्येक मास की अमावास्या तिथि को इडा" का पुत्र पुरूरवा किस

English

Henceforth I shall mention the progeny of Martanda Vivasvan. Formerly three children were born of his wife Samjna

अध्याय ८३

श्लोक 29

अन्यं च ते प्रयच्छामि वरं वानरपुंगव ।उपकाराय लोकानां नामानि तव मारुते

anyaṃ ca te prayacchāmi varaṃ vānarapuṃgava / upakārāya lokānāṃ nāmāni tava mārute

हिन्दी अर्थ

प्रकार स्वर्ग को जाता था और किस प्रकार पितरों.का तपंण करता था ? सूत ने कहा--शांशपायन ! उस महात्मा इलापुन्र राजा पुरूरवा का प्रभाव आपको बतला रहा हूँ, चन्द्रमा का सूर्य के साथ संयोग, जल के सारभूत चन्द्रमा की शुक्ल और कृष्ण पक्ष में हास और वद्धि, पितरों के पक्ष का निर्णय, चन्द्रमा से अमृत की प्राप्ति, पितरों का तपेंण, कब्यों को बहुत करने वाले अग्नि और आत्तसोम पितरों का दर्शन इलापुतन्र पुरूरवा ने पितरों का तपंण किस प्रकार किया, इसका विवरण

English

(Later) the younger Manu Savarni and Sanaiscara

अध्याय ८३

श्लोक 30

हनूमानं जनिसुतो वायुपुत्रो महाबलः ।रामेष्टः फाल्गुनो गोत्रः पिङ्गाक्षो ऽमितविक्रमः

hanūmānaṃ janisuto vāyuputro mahābalaḥ / rāmeṣṭaḥ phālguno gotraḥ piṅgākṣo 'mitavikramaḥ

हिन्दी अर्थ

तथा पर्वबों का वर्णन---इन सब विषयों को “क्रमानुसार बतला रहा हें ।२-५॥। जिस समय चन्द्रमा तथा सूर्य एक ही रात्रि तथा एक ही मण्डल में समान नक्षत्र पर होते हैं, उसे अमावास्या कहते हैं, प्रत्येक अमावास्या

English

Vivasvan of great fame, was born of KaSyapa and a daughter of Daksa. The noble lady, the daughter of Tva?tr be¬ came the wife of Vivasvan. Originally she was well known by the name Surenu and later came to be known as Samjna.

अध्याय ८३

श्लोक 31

उदधिक्रमणश्रेष्ठो दशग्रीवस्य दर्पहा ।लक्ष्मणप्राणदाता च सीताशोकनिवर्तनः

udadhikramaṇaśreṣṭho daśagrīvasya darpahā / lakṣmaṇaprāṇadātā ca sītāśokanivartanaḥ

हिन्दी अर्थ

१. पुरूरवा इला का पुत्र था, संस्कृत में ड और ल में भेद नहीं माना जाता । स् गच्छति तदा द्रष्टूं बिवाकरनिशाकरो । अमावस्थाममावास्थां मातामहपितामही ॥

English

The wife of lord Martanda of excessive splendour was a woman of great beauty in the prime of youth. She was dis¬ satisfied with the dazzling form of her husband.

अध्याय ८३

श्लोक 32

इत्युक्त्वान्तर्दधे देव उमया सह शङ्करः ।हनूमानीश्वरं तत्र स्थापयामास भक्तितः

ityuktvāntardadhe deva umayā saha śaṅkaraḥ / hanūmānīśvaraṃ tatra sthāpayāmāsa bhaktitaḥ

हिन्दी अर्थ

अभिवाद्य तदा तत्र कालपेक्ष: प्रतशक्षति( ते) ३७

English

The dazzlingly brilliant person of Martanda, the son of Aditi, coming into contact with her body was not very pleas¬ ing to her.

अध्याय ८३

श्लोक 33

आत्मयोगबलेनैव ब्रह्मचर्यप्रभावतः ।ईश्वरस्य प्रसादेन लिङ्गं कामप्रदं हि तत् ।अच्छेद्यमप्रतर्क्यं च विनाशोत्पत्तिवर्जितम्

ātmayogabalenaiva brahmacaryaprabhāvataḥ / īśvarasya prasādena liṅgaṃ kāmapradaṃ hi tat / acchedyamapratarkyaṃ ca vināśotpattivarjitam

हिन्दी अर्थ

कुहुमात्रां कलां चेव ज्ञात्वोपास्ले कुहुं पुनः । स तदय भानुमत्येककालावेक्षो प्रपश्यति १० सोम्या बहिषदः काव्या अग्निष्यालास्तथव च द १३

English

Being unaware, Kasyapa said out of affection, "Indeed this (child) in the egg is not dead". Hence he is called Mar¬ tanda.

अध्याय ८३

श्लोक 34

श्रीमार्कण्डेय उवाच: हनूमन्तेश्वरे पुत्र प्रत्यक्षप्रत्ययं शृणु ।यद्वृत्तं द्वापरस्यादौ त्रेतान्ते पाण्डुनन्दन

śrīmārkaṇḍeya uvāca: hanūmanteśvare putra pratyakṣapratyayaṃ śṛṇu / yadvṛttaṃ dvāparasyādau tretānte pāṇḍunandana

हिन्दी अर्थ

को पुरूरवा अपने: नाक तथा पितामह सूर्य तथा चन्द्रमा को देखने जाता था, और उन्हें प्रणाम कर समय की प्रतीक्षा करता हुआ स्थित रहता था.। प्रसन्न. हुए. चन्द्रमा से पितरों के लिए अमृत का परिखवण होता था ।६-७॥ह। इला का पूत्र विद्वान्-पुरूरवा इस प्रकार प्रयत्नपूर्वक प्रत्येक मास की- अमावास्पा को स्वगेलोक में उपस्थित रहकर पितरों समेत चन्द्रमा की. उपासना करता था दो लव" कुहु मात्र पर्यन्त ही वे दोनों

English

The brilliance of Vivasvan increased day by day where¬ by he, the son of Kasyapa, scorched the three worlds.

अध्याय ८३

श्लोक 35

सुपर्वा नाम भूपालो बभूव वसुधातले ।तस्य राज्ञः सदा सौख्यं नरा दीर्घायुषः सदा

suparvā nāma bhūpālo babhūva vasudhātale / tasya rājñaḥ sadā saukhyaṃ narā dīrghāyuṣaḥ sadā

हिन्दी अर्थ

( पितर और सोम ) रहते हैं अर्थात् कव्य. ग्रहण करते हैं, अतः सिनीवाली के प्रमाण-काल के भीतर ही सिनीवाली का प्रेमी उपासक पुरूरवा चतुदंशी युक्त अमावास्या तथा प्रतिपदा युक्त अमावास्था--इन दोनों को भली भाँति. उपासना योग्य समझकर अमावास्या और कुहु की उपासना करता था, उस समय वह भानुमती (सूयंयुक्त अम्रबास्था) के एक काल की प्रतीक्षा करता हुआ वहाँ निवास करता था ।८-१०। पितरों की एक मास कौ तृप्ति के लिए चन्द्रमा से सुधामृत का प्रद्नवण होता है । क्ृष्णपक्ष में पन्द्रह सुधामृत को प्रत्र॒वण करने वाली सूर्य की किरणों द्वारा चन्द्रमा से दुहे मये सुधामृत का पान होता है। नृपतिवर पुरूरवा इस शीघ्र स्रवित चन्द्रमा के अमृत द्वारा पितरों की विधि से निर्वापण कर पितरों को तृप्त करती था, सौम्य बहिषद, काव्य और अग्निष्वात्त, ये पितर हैं ।११-१३॥ ऋतु जो अग्नि कहा गया है, वही संवत्सर माना गया है

English

Ravi (the Sun-god) begot of Samjna three children, two sons of great prowess and the daughter Kalindi (Yamuna).

अध्याय ८३

श्लोक 36

स पुत्रधनसंयुक्तश्चौरोपद्रववर्जितः ।शतबाहुर्बभूवास्य पुत्रो भीमपराक्रमः

sa putradhanasaṃyuktaścauropadravavarjitaḥ / śatabāhurbabhūvāsya putro bhīmaparākramaḥ

हिन्दी अर्थ

उसी से ऋतुगणों की उत्पत्ति हुई, उन ऋतुगणों से आतंबों की उत्पत्ति हुई। वे आतंव अरधमास नाम से प्रसिद्ध वर्ष के पुत्र पिता कहे जाते हैं। ऋतुगण पितामह हैं, वे भी मास नाम से प्रसिद्ध तथा वर्ष के पुत्रगण

English

Manu was the eldest son of Vivasvan. He was a Praja- pati and known as Sraddhadeva. Yama and Yami were born as twins.

अध्याय ८३

श्लोक 37

आसक्तो ऽसौ सदा कालं पापधर्मैर् नरेश्वर ।अटाट्यत धरां सर्वां पर्वतांश्च वनानि च

āsakto 'sau sadā kālaṃ pāpadharmair nareśvara / aṭāṭyata dharāṃ sarvāṃ parvatāṃśca vanāni ca

हिन्दी अर्थ

१. दो काछ्ठा, अर्थात् ३६ निमेष का अल्प समय । प्रपितामहास्तु वे देवाः पत्चावदा ब्रह्मणः सुता: । सौम्यास्तु सौम्यजा ज्ञेयाः काव्या ज्ञेयाः कवे सुता: ॥। उपहूता: स्मृता देवाः सोमजाः सोमपास्तथा । आज्यपास्तु स्पृताः काव्यास्तृष्यन्ति पितुजातयः

English

On seeing the whetted brilliance of Vivasvan and una¬ ble to endure it, Samjna created her own shadow of the same complexion as hers.

अध्याय ८३

श्लोक 38

वधार्थं मृगयूथानाम् आगतो विन्ध्यपर्वतम् ।तरुजातिसमाकीर्णे हस्तियूथसमाचिते

vadhārthaṃ mṛgayūthānām āgato vindhyaparvatam / tarujātisamākīrṇe hastiyūthasamācite

हिन्दी अर्थ

काव्या बहिषदश्च॑व अग्निष्वात्ताश्न ते त्रिधा गृहस्था ये च यज्वान ऋतुबंहिषदो श्रुवम्

English

That woman of earthly form, bom of her shadow came to her humbly with palms joined in reverence and spoke to Samjna:

अध्याय ८३

श्लोक 39

सिंहचित्रकशोभाढ्ये मृगवाराहसंकुले ।क्रीडित्वा स वने राजा नर्मदामानतः क्वचित्

siṃhacitrakaśobhāḍhye mṛgavārāhasaṃkule / krīḍitvā sa vane rājā narmadāmānataḥ kvacit

हिन्दी अर्थ

गहस्थाभ्रापि यज्वानो अ( हाय )ग्निष्वात्तास्तथा55तंवाः । अष्टकापतय: काव्याः पत्च्चाब्दास्तान्नचिबोधत १ एवां संवत्सरो ह्यग्निः सुयंस्तु परिवत्सर:। सोम इद्वत्सरः प्रोक्तो वायुश्चेबानुवत्सरः रुद्रस्तु बत्सरस्तेषां प्चाब्दा ये युगात्मका: । लेखाश्चेवोष्मपाश्चव दिवाकीरत्याश्व ते स्पूताः

English

The Vedic word is Marlaptfa 'born of an (apparently) dead egg'. Martanda is a later Puranic form, though the derivation is the same.

अध्याय ८३

श्लोक 40

हनूमन्तवने प्राप्तः शतक्रोशप्रमाणके ।चिञ्चिणीवनशोभाढ्ये कदम्बतरुसंकुले

hanūmantavane prāptaḥ śatakrośapramāṇake / ciñciṇīvanaśobhāḍhye kadambatarusaṃkule

हिन्दी अर्थ

इत्येब॑ पीयमानस्तु देवतेश्वय निशाकर:। समागच्छदमावास्यां भागे पच्च॒दशे स्थिति: २६ सुषुम्नाप्यायितं चेव अमावास्यां यथाक्रमस् । पिबन्ति द्विकलं काल पितरस्ते सुधामृतम्ू..

English

You must remain m my house without any hesitation These two sons of mine and this daughter of splendid complex¬ ion (should be looked after).

अध्याय ८३

श्लोक 41

नित्यं पालाशजम्बीरैः करंजखदिरैस्तथा ।पाटलैर् बदरैर्युक्तैः शमीतिन्दुकशोभितम्

nityaṃ pālāśajambīraiḥ karaṃjakhadiraistathā / pāṭalair badarairyuktaiḥ śamītindukaśobhitam

हिन्दी अर्थ

कहे जाते हैं। ब्रह्मा के पुत्र पंचाब्द नाम से प्रसिद्ध जो देवगण हैं, वे प्रपितामह नाम से प्रसिद्ध हैं। सौम्य नामक पितरमण सौम्य से उत्पन्न जानने चाहिए, काव्य नामक पितर कवि (भुगु) के पुत्र हैं ।(१४-१६। सोम्त से उत्पन्न होने वाले सोमपायी पितरगण उपहुत नाम से स्मरण किये जाते हैं, आज्य (घत) पानः करने वाले पितरगण काब्य कहे जाते हैं--और इस प्रकार ये पितरवर्ग तृष्ति लाभ करते हैं। काव्य, बहिषद और अग्निष्वात्त--पितरों के ये तीन भेद हैं । यज्ञकर्ता गृहस्थ ऋतु और वहिषद (पितरों की श्रेणी है) होते हैं. एवं वे ही गृहस्थ अग्निष्वात्त तथा आतंब पितर भी होते हैं। अष्टकापति, काव्य, पज्चाब्द नामक पितर कहे जाते हैं ।१७-१६। इनके संवत्सर का नाम अग्नि है, सूर्य परिवत्सर है, चन्द्रमा इद्वत्सर है, वायु अनुवत्सर है, भौर रुद्र बत्सर है, जो युगात्मक पाच वर्ष कहे गये हैं, वे लेखा ऊष्मपा और दिवाकीत्यं नाम से

English

This (arrangement) should not be mentioned to the lord, my husband".

अध्याय ८३

श्लोक 42

मृगयूथैः समाछन्नशिखण्डिस्वरनादितम् ।पारावतकसङ्घानां समन्तात्स्वरशोभितम्

mṛgayūthaiḥ samāchannaśikhaṇḍisvaranāditam / pārāvatakasaṅghānāṃ samantātsvaraśobhitam

हिन्दी अर्थ

स्मरण किये जाते हैं। ये प्रत्येक मास में अमावास्या तिथि को आकाश में सुधा का पान करते हैं । राजां पुरूुरवा जब तक जीवित था इसी प्रकार सुधा द्वारा उन पितरों को तृप्त करता था ।२०-२२। प्रत्येक मास में चन्द्रमा से यतः प्रस्रवित होता था अतः सोमपायी पितरों के लिये वह सूधा अम्नृत था, इस प्रकार क्षरित वह अम्रृत सौम्य, सुधा और मधु नाम से प्रसिद्ध है। कृष्णपक्ष में क्रशः चन्द्रमा की पर्रह कलाओं को,

English

"O noble lady, until the hair is caught hold of, I will never speak your secret idea. O noble lady, go back to your own house".

अध्याय ८३

श्लोक 43

शरत्काले ऽरमद् राजा बहुले चाश्विनस्य सः ।वनमध्यं गतो ऽद्राक्षीद्भ्रमन्तं पिङ्गलद्विजम्

śaratkāle 'ramad rājā bahule cāśvinasya saḥ / vanamadhyaṃ gato 'drākṣīdbhramantaṃ piṅgaladvijam

हिन्दी अर्थ

जो जलमयी हैं, छन्‍्द से उत्परन होने वाले तेतीस देवगण पान करते हैं, और इस प्रकार सुधामृत को एक मास पान करने के उपरान्त चले जाते हैं ।२३-२५। देवताओं द्वारा इस प्रकार पान किया गया चद्धमा अमावास्या को परद्वह॒वें भाग में स्थित रह कर गमन करता है। सुषुम्ता द्वारा बद्धि को प्राप्त हुए चन्द्रमा पौर्णमासे व्यतीपाते यदीक्षेते परस्परम् । यस्सिन्काले स सोमान्ते स व्यतीपात एवं तु ॥इ८ काल॑ सुर्यस्य निर्देश दृष्टा संख्या तु सपंति । स वे पथं? क्रियाफालः कालात्सशों घिधीयते.

English

After consoling Samjna, she said, "So be it". She- the woman in a pitiable condition, went nearTvastras though greatly ashamed.

अध्याय ८३

श्लोक 44

पुस्तिकाकरसंस्थं च पप्रच्छ चपलं द्विजम्

pustikākarasaṃsthaṃ ca papraccha capalaṃ dvijam

हिन्दी अर्थ

पूर्णन्दो: पूर्णपक्षे तु राजिसंधिषु पृणिमा । » यस्सात्तामनृपश्यन्ति पितरो देवते: सह ॥।

English

On seeing her come back, the father became angry and spoke to Samjna: "Go back to your husband. Do not hate Diva- kara (the Sun-god)."

अध्याय ८३

श्लोक 45

शतबाहुरुवाच: एकाकी त्वं वने कस्माद् भ्रमसे पुस्तिकाकरः ।इतस्ततो ऽपि सम्पश्यन् कथयस्व द्विजोत्तम

śatabāhuruvāca: ekākī tvaṃ vane kasmād bhramase pustikākaraḥ / itastato 'pi sampaśyan kathayasva dvijottama

हिन्दी अर्थ

अत्यर्थ ञ्राजते यस्मात्पोर्णमास्यां निशाकरः। रञ्जनाच्चेव चन्द्रस्य राकेति कबयो धिदुः ॥४ १ अमा वसेतामृक्षे तु यदा चन्द्रदिवाकरों । एकां पच्चदशों रातिममावास्या ततः स्घृता १४२ ततो5परस्य तैव्यंक्तः पौर्णमास्यां निशाकर: । यदीक्षते व्यतीपाते दिवा पूर्णों परस्परम् ॥ द चन्द्राकाविपराह तु पूर्णात्मानो तु पूणिमा क्‍ ः १४३ यदि कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा की प्रवृत्ति होती है तो वह समय पूर्णमासी का है। चन्द्रमा और सूर्य परस्पर यग मात्र के व्यवधान पर अवस्थित रह विषुव रेखा के ऊपर समसूत्र में जब उदित होते हैं तो परस्पर दर्शन होता है। इसी का नाम व्यतीपांत है । पूर्णणासी को भी इस प्रकार परस्पर दशेन होता है । सूये को ही आधार मानकर समय के विषय में विशेष संख्याओं की कल्पना की जाती है। सूयथ ही

English

Though urged thus by her father and compelled (to go) again and again, she lived in her father's house for a thousand years.

अध्याय ८३

श्लोक 46

ब्राह्मण उवाच: कान्यकुब्जात्समायातः प्रेषितो राजकन्यया ।अस्थिक्षेपाय वै राजन्हनूमन्तेश्वरे जले

brāhmaṇa uvāca: kānyakubjātsamāyātaḥ preṣito rājakanyayā / asthikṣepāya vai rājanhanūmanteśvare jale

हिन्दी अर्थ

समय का मार्गप्रदर्शक है और समय के ही अधीन सत्क्रियाओं का विधान माना गया है ।३५-३६। जिस रात्रि के संधिभाग में पृूणिमा तिथि हो, पूर्ण चन्द्रमा का प्रकाश हो, उसे अनुमती' पूर्णिमा कहा ग्रया है क्योंकि पितरगण देवताओं के साथ उसे देखते हैं। पूणिमा तिथि को चन्द्रमा अत्यन्त सुप्रकाशित होता है अतः चन्द्रमा के रंजन के कारण ही उसे कवि लोग राका कहते हैं। जिस पन्द्रहवीं रात्रि को एक ही.

English

"Go to your husband's house". When insisted upon again and again thus,that uncensured (praise-worthy) lady con¬ cealed her real form and assumed the form of a mare. She went to the northern Kurus and began to graze grass.

अध्याय ८३

श्लोक 47

राजोवाच: अस्थिक्षेपो जले कस्माद्धनूमन्तेश्वरे द्विज ।क्रियते केन कार्येण साश्चर्यं कथ्यतां मम

rājovāca: asthikṣepo jale kasmāddhanūmanteśvare dvija / kriyate kena kāryeṇa sāścaryaṃ kathyatāṃ mama

हिन्दी अर्थ

नक्षत्र में चन्द्रमा तथा सूय॑ं एक साथ विराजमान रहते हैं उसे अमावस्या कहते हैं ।/०-४२॥ जिस दिन के तीसरे पहर में चन्द्रना और सूये पूर्णरूप में ब्यतीपात की भाँति परस्पर एक दूसरे को देखते हैं, उसे पूणिमा कहते हैं। ऊपर कही गई जिस अमावास्या तिथि को चन्द्रमा और सुय॑ एक ही स्थान में समागत )» यस्मादित्यारम्य ततः स्मृतेत्यन्तग्रस्थस्य क्रमव्यत्यासः । ख. घ. ड. पुस्तकेषु वते।

English

Considering that she (the shadow of Saihjna) was the real Samjna, the Sun begot of the shadow, the second Samjna, two sons of the splendour of Aditya (the Sun).

अध्याय ८३

श्लोक 48

सुपर्वणः सुतो यानं त्यक्त्वा भूमौ प्रणम्य च ।कृताञ्जलिपुटो भूत्वा ब्राह्मणाय नरेश्वर ।समस्तं कथयामास वृत्तान्तं स्वं पुरातनम्

suparvaṇaḥ suto yānaṃ tyaktvā bhūmau praṇamya ca / kṛtāñjalipuṭo bhūtvā brāhmaṇāya nareśvara / samastaṃ kathayāmāsa vṛttāntaṃ svaṃ purātanam

हिन्दी अर्थ

१. जिस पूर्णिमा में एक कला स्यून चन्द्रमा सूर्यास्त से कुछ पहिले उदय होता है, वह अनुंमती कहलाती है । यह पूरणिमा चतुदंशी युक्त होने के कारण देवताओं और पितरों--दोनों को अनुमत हैं, अतः अनुमती नाम से प्रसिद्ध है। सूर्यास्त के उपरान्त अथवा सूर्यास्त के साथ ही जिस तिथि को पूर्णचन्ध उदित होता हैं वह राका कहलाती है । चन्द्रमा की रंजनकारिका होने के कारण यह राका है--देवी पुराण से । द

English

The sons were Srutasrava, the knower of Dharma, and Srutakarman. Both of those lordly ones were equal to Manu the eldest-born.

अध्याय ८३

श्लोक 49

ब्राह्मण उवाच: शिखण्डी नाम राजास्ति कन्यकुब्जे प्रतापवान् ।अपुत्रो ऽसौ महीपालः कन्या जाता मनोरथैः

brāhmaṇa uvāca: śikhaṇḍī nāma rājāsti kanyakubje pratāpavān / aputro 'sau mahīpālaḥ kanyā jātā manorathaiḥ

हिन्दी अर्थ

ततः पीतक्षये सोमे सुर्यो इसावेक रश्सिना । आप्याययत्सुषुम्नेन पित्॒णां सोमपायिनामू. . ॥रद (सायाह्ने ह्ानुमत्याइसौ द्वौ लवो काल उच्यते। लवौ द्वावेव राकाया: कालो ज्ेयोपपराह्लिकः

English

Srutasravas will become Savarni Manu. The planet Sanaiscara (Saturn) is to be known as Srutakarman.

अध्याय ८३

श्लोक 50

जातिस्मरा सुचार्वङ्गी नर्मदायाः प्रभावतः ।पित्रा च सैकदा कन्या विवाहाय प्रजल्पिता

jātismarā sucārvaṅgī narmadāyāḥ prabhāvataḥ / pitrā ca saikadā kanyā vivāhāya prajalpitā

हिन्दी अर्थ

+ प्रतिपत्कृष्णपक्षस्य कालेघ्तीतेडपराह्हिक: ।) सायाह्व प्रतिपच्चेव स कालः पौणिमासिक:ः

English

It is known that Savarni became Manu. The earthly form of Samjna was affectionate only towards her (own) sons and not towards the earlier born ones. Manu bore.it patiently, but. Yama did not brook it.

अध्याय ८३

श्लोक 51

अनित्ये पुत्रि संसारे कन्यादानं ददाम्य् अहम् ।श्वःकृत्यम् अद्य कुर्वीत पूर्वाह्णे चापराह्णिकम् ।न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतं चास्य न चाकृतम्

anitye putri saṃsāre kanyādānaṃ dadāmy aham / śvaḥkṛtyam adya kurvīta pūrvāhṇe cāparāhṇikam / na hi pratīkṣate mṛtyuḥ kṛtaṃ cāsya na cākṛtam

हिन्दी अर्थ

के सुधामृत को क्रमशः पिंतरगण अमावास्या को दो कला मात्र समय तक पान करते हैं। और इस प्रकार वाले पितरों की तृप्ति करता हैं ।२६-२८। कलाओं से निःशेष हो जाने पर सूर्य चन्द्रमा को पुनः पूर्ण करता है। सुषुम्ता द्वारा पूर्ण चन्द्रमा कीं कलाओं के एक-एक भाग को क्रमशः देवगण पान करते हैं। वे कलायें क्षीण होकर कृष्ण और पूर्ण होने पर शुक्ल कहाती हैं, और इस प्रकार क्रमशः चन्द्रमा क्षीण और पूर्ण होता है। इस प्रकार सूर्य के पराक्रम से चन्द्रमा का दरीर पूर्ण होता है, और पूर्णमासी तिथि को उसका सम्पूर्ण

English

On being insulted many times (by the step-

अध्याय ८३

श्लोक 52

कन्योवाच: इच्छेयं यत्र कले हि तत्र देया त्वया पितुः ।पुत्रीवाक्यादसौ राजा विस्मितो वाक्यम् अब्रवीत्

kanyovāca: iccheyaṃ yatra kale hi tatra deyā tvayā pituḥ / putrīvākyādasau rājā vismito vākyam abravīt

हिन्दी अर्थ

मण्डल श्वेत दिखाई पड़ता है। शुक्ल और कृष्ण पक्ष में चन्द्रमा की ह्ास और वृद्धि इसी प्रकार होती रहती है। पितृमान् चन्द्रमा इस प्रकार क्रमशः इद्वत्सर स्मरण किया गया है, और वह सुधामृत को प्रश्नवित करने वाली पन्द्रह किरणों से घिरा हुआ है ।२९-३१। अब इसके उपरास्त पर्वो' की संधियों का वर्णन कर रहा हूँ । जिस प्रकार ईख और बाँसों के पोर गाँठों वाले होते हैं, उसी प्रकार आधे मास पर होने वाली शुक्ल

English

"Since you are threatening the renowned wife of your father, this leg of yours will undoubtedly fall off."

अध्याय ८३

श्लोक 53

शिखण्ड्य् उवाच: कथ्यतां मे महाभागे साश्चर्यं भाषितं त्वया ।पितुर्वाक्येन सा बालोत्तमा ह्यागतान्तिकम्

śikhaṇḍy uvāca: kathyatāṃ me mahābhāge sāścaryaṃ bhāṣitaṃ tvayā / piturvākyena sā bālottamā hyāgatāntikam

हिन्दी अर्थ

पक्षीय और क्रृष्ण पक्षीय तिथियों को भी काल का पर्व कहा गया है। पृणिमा और अमावस्या के भेद से उनकी ग्रन्थि और संधियाँ कही गई हैं। तृतीया आदि तिथियाँ आधे मास की पव तिथियां हैं, अग्न्याधान आदि सत्क्रियाएँ इसीलिए इन पर्वों की संधियों में की जाती हैं ।३२९-३४। सायंकाल के समय अनुमति का दो लव काल तथा राका का तीसरे पहर का दो लव काल सत्क्रियाओं के योग्य माना गया है। इसी प्रकार कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा लिथि' को भी अपराह्न काल में सत्क्रियाओं के योग्य माना गया है। सा्यकाल के समय

English

With his mind deeply afflicted due to that curse, Yama of virtuous soul reported everythin g to his father, along with Manu (i.e. accompanied by him.)

अध्याय ८३

श्लोक 54

कथयामास यद्वृत्तं हनूमन्तेश्वरे नृप ।कलापिनी ह्यहं तात युता भर्त्रावसं तदा

kathayāmāsa yadvṛttaṃ hanūmanteśvare nṛpa / kalāpinī hyahaṃ tāta yutā bhartrāvasaṃ tadā

हिन्दी अर्थ

धनुर्चिद्वास्तगंत ग्रन्थ: क. पुस्तकेषु । +इृदम्ध॑ नास्ति ख. घ. पुस्तकेषु ।

English

"I am much distressed due to the fear of the curse (tak¬ ing effect). I have been defeated (?) by the (statement) words of Saiiijfia. (This mistake is) due to my childishness or delusion. Sir, please protect me.

अध्याय ८३

श्लोक 55

रेवौर्व्यासङ्गमन्तिस्था रेवाया दक्षिणे तटे ।हनूमन्तवने पुण्ये चिक्रीडाहं यदृच्छया

revaurvyāsaṅgamantisthā revāyā dakṣiṇe taṭe / hanūmantavane puṇye cikrīḍāhaṃ yadṛcchayā

हिन्दी अर्थ

ही हो लवावमावास्यां यः कालः पर्वबंसंधिषु । इच्नक्षरं कुहुमात्नं तु एवं कालस्तु स स्मृतः ॥ दो कालो संगमश्चेव मध्याह्न निष्पतेद्रविः क्‍

English

O lord of the worlds, foremost one among those who

अध्याय ८३

श्लोक 56

भर्तृयुक्ता च संसुप्ता रजन्यां सरले नगे ।आगता लुब्धकास्तत्र क्षुधार्ता वनमुत्तमम्

bhartṛyuktā ca saṃsuptā rajanyāṃ sarale nage / āgatā lubdhakāstatra kṣudhārtā vanamuttamam

हिन्दी अर्थ

स तदा ह्याहुतेः कालो दर्शस्य च वषट्क्विया । एतद्तुमुखं ज्ेयसमावास्यास्थ पर्यणः

English

Thus implored, lord Vivasvan spoke to Yama: "O son, undoubtedly there will be a great reason behind this (incident).

अध्याय ८३

श्लोक 57

भर्तृयोगयुता पापैर्दृष्टाहं वधचिन्तकैः ।पाशबन्धं समादाय बद्धाहं स्वामिना सह

bhartṛyogayutā pāpairdṛṣṭāhaṃ vadhacintakaiḥ / pāśabandhaṃ samādāya baddhāhaṃ svāminā saha

हिन्दी अर्थ

दिया पर्वण्यमावास्यां क्षीणेन्दौ बहुले तु वे । तस्माहिवा ह्यमांवास्यां गृह्मतेइसो दिवाकरः ॥ द्विलवेन ह्यहोरात्रं भास्करं स्पृशते शशी । स तदा ह्याहुतेः कालो दर्शस्य च वषट्क्रिया

English

That was why anger took possession of you who are the knower of virtue and the speaker of the truth. The words of your mother too cannot be falsified.

अध्याय ८३

श्लोक 58

ग्रीवां ते मोटयामासुः पिच्छाछोटनकं कृतम् ।हुताशनमुखे तैस्तु सह कान्तेन लुब्धकैः

grīvāṃ te moṭayāmāsuḥ picchāchoṭanakaṃ kṛtam / hutāśanamukhe taistu saha kāntena lubdhakaiḥ

हिन्दी अर्थ

होकर एक दूसरे को देखते हैं उसे दश कहा जाता है ।४३-४४। अमावास्या तिथि के दो लव तथा पे संधियों के दो लव काल--केवल कु हु इन दो अक्षरों के उच्चारण में जितना काल लगता है - सल्क्रियाओं के योग्य माना जाता है । मध्यांह्न में सूबे के साथ संगत होकर अमावस्या को जब कि चन्द्रमा नहीं दिखाई पड़ता, दिन के आधे भाग से रात्रि के आधे भाग तक चन्द्रमा सुबं के साथ अवस्थित रहता है। तदनन्तर सूर्य से मुक्त

English

In this way, your mother's words will be true and effec¬ tive. By removal of the curse, you will also be saved."

अध्याय ८३

श्लोक 59

परिभर्ज्यावयोर् मांसं भक्षयित्वा यथेष्टतः ।सुप्ताः स्वस्थेन्द्रिया रात्रौ सा गता शर्वरी क्षयम्

paribharjyāvayor māṃsaṃ bhakṣayitvā yatheṣṭataḥ / suptāḥ svasthendriyā rātrau sā gatā śarvarī kṣayam

हिन्दी अर्थ

होता है। प्रात:काल के समय दों कला काल तक चन्द्रमा के साथ रहकर मध्याक्न के समय सूय॑ चन्द्रमण्डल से बाहर निकलता है ।४१५-४६। और इस प्रकार शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से सूये मण्डल से चन्द्रमा मुक्त हो. जाता है, छोड़े जाते हुये उन दोनों सूयें और चन्द्र मण्डलों के संगम का त्याग काल आहुति और वषट् क्रिया (यज्ञ भोर त्पण) का उत्तम काल है। इस पर्व का--अमावास्याकाल का--ही नाम ऋतुमुख जानना चाहिए । अमा- वस्या के दिन चन्द्रमा की कला का अधिकाधिकरूपेण क्षय हो जाता है। इसलिये उस दिन सूर्य ही ग्रहण किया जाता है यही कारण है कि अमावस्या के दिन ही सूर्य राहु और केतु के द्वारा ग्रस लिया जाता है ।४७-४९। उन मान्य कलाओं के आधार पर ही बुद्धिमान विद्वानों ने तिथियों का नामकरण किया है। उस तिथि (अमावस्या) को सूर्य और चन्द्रमा परस्पर एक दूसरे को देखते हैं। उसी दिन से चन्द्रमा सूर्य-मण्डल से क्रमशः निकल कर

English

Aditya then spoke to Samjna, "When the sons are all equal, why is more affection shown by you towards one?"

अध्याय ८३

श्लोक 60

प्रभाते मांसशेषं च जम्बुकैर् गृध्रघातिभिः ।मच्छरीरोद्भवं चास्थि स्नायुमांसेन चावृतम्

prabhāte māṃsaśeṣaṃ ca jambukair gṛdhraghātibhiḥ / maccharīrodbhavaṃ cāsthi snāyumāṃsena cāvṛtam

हिन्दी अर्थ

पृथक होता है। चन्द्रमा दो लव काल मात्र सूर्य मण्डल का स्पर्श करता है, वह उतना काल अमावस्या के निमित्त होने वाले यज्ञ एवं वषट् क्रिया के उपयुक्त है। कोकिल की 'कुह” यह आवाज जितने समय में सम्पन्न होती है, उतने

English

Avoiding (the necessity of disclosing the secret) she did not say anything to Vivasvan. But by means of his Yogic power and concentration, the Sun found out the truth.

अध्याय ८३

श्लोक 61

गृहीतं घातिनैकेन चाकाशात्पतितं तदा ।तं मांसभक्षणं दृष्ट्वा परे पक्षिण आगताः

gṛhītaṃ ghātinaikena cākāśātpatitaṃ tadā / taṃ māṃsabhakṣaṇaṃ dṛṣṭvā pare pakṣiṇa āgatāḥ

हिन्दी अर्थ

४४२ तवायुपुराणम् कुहेति कोकिलेनोक्तो यः काल: परिचिद्धतः । तत्कालसंज्ञिता यस्मादमावास्या कुहः स्मृता...

English

The infuriated Sun-god was about to curse her bringing about her destruction. She then confessed factually everything to Vivasvan.

अध्याय ८३

श्लोक 62

दृष्ट्वा पक्षिसमूहं तु अस्थिखण्डं व्यसर्जयत् ।विहगानां समस्तानां धावतां चैव पश्यताम्

dṛṣṭvā pakṣisamūhaṃ tu asthikhaṇḍaṃ vyasarjayat / vihagānāṃ samastānāṃ dhāvatāṃ caiva paśyatām

हिन्दी अर्थ

सिनीवालीप्रमाणेन क्षीणशेषों निशाकरः । अमावास्यां विशत्यक सिनीवाली ततः स्मुता..

English

On hearing it, Vivasvan was enraged and hastened to Tvastr. Tvastr honoured with due formalities the Sun-god who wanted to burn down everything. He pacified him slowly saying: "Your present form which is excessively dazzling, is not attractive.

अध्याय ८३

श्लोक 63

पतितं नर्मदातोये हनूमन्तेश्वरे नृप ।मदीयमस्थिखण्डं च पतितं नर्मदाजले

patitaṃ narmadātoye hanūmanteśvare nṛpa / madīyamasthikhaṇḍaṃ ca patitaṃ narmadājale

हिन्दी अर्थ

(+अनुमत्या: सराकायाः सिनीवाली कुहस्तथा । एतासां ह्ििलवः काल: कुहमात्रा कुहस्तथा ॥ इत्येष पर्वंसंधीनां कालो वे हिलवः स्प्रतः)

English

It is because she could not endure it that Saihjna is wandering in the forests and meadows. You will see your wife of auspicious conduct today itself.

अध्याय ८३

श्लोक 64

तस्य तीर्थस्य पुण्येन जाताहं पुत्रिका तव ।भूपकन्या त्वहं जाता पूर्णचन्द्रनिभानना

tasya tīrthasya puṇyena jātāhaṃ putrikā tava / bhūpakanyā tvahaṃ jātā pūrṇacandranibhānanā

हिन्दी अर्थ

पर्वणः पर्वकालस्तु तुल्यों वे तु वषट्क्रिया । चन्द्रसुयंव्यतीपाते उमे ते पूर्णिसे स्मृते

English

O lord of rays, by using your Yogic power, you will see your praiseworty wife superbly endowed with youthful charm. Everything will be favourable if my condition is accepted.

अध्याय ८३

श्लोक 65

जातिस्मरा नरेन्द्रस्य संजाता भवतः कुले ।तस्माद् विवाहं नेच्छामि मम भर्ता नृपोत्तम

jātismarā narendrasya saṃjātā bhavataḥ kule / tasmād vivāhaṃ necchāmi mama bhartā nṛpottama

हिन्दी अर्थ

प्रतिपत्पअद॒श्योश्र पर्वकालो द्विमात्रकः:। काल: कुहसिनीवाल्यो: समुद्रो दिलवः स्मृतः अकॉ ग्निसण्डले सोमे पर्बंकाल: कलाशभ्रयः । एवं स शुक्लपक्षो वे रजन्या: पर्वंसंधिषु ४५८

English

O suppressor of enemies! At the outset, I shall change your personal form into an excellent one". The form of Vivasvan, then, was sideways, upwards and below (i.c. the rays were diffused everywhere). Hence Divaspati (the Sun-god) was ashamed of that form. So the deity of great penance praised the wheel of Tvastr. Tvastr was then permitted to change the form. With the concurrence of the Sun-god (Martanda Vivasvan), Tvastr mounted him on the wheel and whetted his brilliance. Then the brilliance had pleasant refulgence due to reduction in dazzle.

अध्याय ८३

श्लोक 66

विषमे वर्तते ऽद्यापि शकुन्तमृगजातिषु ।तस्यास्थिशेषं राजेन्द्र तस्मिंस्तीर्थे भविष्यति

viṣame vartate 'dyāpi śakuntamṛgajātiṣu / tasyāsthiśeṣaṃ rājendra tasmiṃstīrthe bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

इत्येते पितरो देवा: सोमपा: सोमवर्धनताः । आतंवा ऋतवो यस्मात्ते देवा भावयन्ति च ६ १

English

The refulgence became very pleasing to behold. What was inauspicious before shone splendidly. Then (the Sun) made use of Yogic power and saw his wife in the form of a mare.

अध्याय ८३

श्लोक 67

तत्क्षेपणार्थं वै तात प्रेषयाद्य द्विजोत्तमम् ।एतत्ते सर्वमाख्यातं कारणं नृपसत्तम

tatkṣepaṇārthaṃ vai tāta preṣayādya dvijottamam / etatte sarvamākhyātaṃ kāraṇaṃ nṛpasattama

हिन्दी अर्थ

ही काल वाली अमावस्या कुह् नाम से स्मरण की जाती है ।५०-५३। जिस अमावास्या तिथि को क्षीण चन्द्रमा सिनीवाली) के प्रमाण से सूर्य के मण्डल में प्रवेश करता है उसे सिनीवाली नाम से स्मरण करते हैं । अनुमती, राका, ' सिनीवाली और कुह--इन सबों के दो लव काल केवल कुह मात्र प्रशस्त माने गये हैं. इस प्रकार पर्व की संधियों का यह दो लव काल प्रशस्त माने गये हैं, सब पर्व तिथियों का पूवेकाल समान रूप से प्रशस्त है और वषट् क्रिया के लिये प्रशस्त है । चन्द्र और सूर्य का व्यतीपात योग पर संयोग और पृणिमा दोनों तुल्यफलदायी माने जाते हैं ।५४-५६। प्रसिपदा और पूर्णिमा का पर्वकाल द्विमात्रिक होता है, कुह और सिनीवाली का परवकाल द्विलवात्मक होता है। चन्द्रमा के सूयं और अग्निमण्डल से युक्त रहने पर जो पर्बकाल होता है वह कलाश्नम मात्र होता है। इस प्रकार रात्रि की पव॑सन्धियों में सम्पूर्ण मण्डल वाला श्रीमान् चन्द्रमा

English

She had been invisible to all living beings due to her brilliance and observance of rites. In the form of a horse, Mar¬ tanda approached her and declared his love.

अध्याय ८३

श्लोक 68

मद्भर्ता विषमे स्थाने शकुन्तमृगजातिषु ।यदि प्रेषयसे तात कंचित्त्वं नर्मदातटे

madbhartā viṣame sthāne śakuntamṛgajātiṣu / yadi preṣayase tāta kaṃcittvaṃ narmadātaṭe

हिन्दी अर्थ

उपरक्त होता है (ग्रहण लगता है) जिस कारण से सोम पूणिमा के दिन पञ्चदश कलाओं के साथ बढ़ते हैं (पूर्ण होते हैं) इसी लिये उसको पूणिमा कहा जाता है। दिनों के अनुसार पाँच और दर कलाओं से ही वे बढ़ते हैं इसलिये सोम में पन्द्रह कलायें ही होती हैं सोलह कलायें नहीं होतीं । इसलिये पञ्चदशी (कला या पूर्णिमा) में ही चन्द्रमा का महाक्षय (ग्रहण) होता है ।१७-६०। ये ऊपर कहे गये सोमपायी और सोमवधेक पितरगण और

English

In the physical activity of sexual intercourse, she suspec¬ ted him to be someone other than her lord. She therefore dis¬ charged the semen virile of Vivasvan through her nostrils.

अध्याय ८३

श्लोक 69

तस्याहं कथयिष्यामि स्थानैश्चिह्नैश्च लक्षितम् ।शिखण्डिनाप्यहं तत्र ह्याहूतो ह्यवनीपते

tasyāhaṃ kathayiṣyāmi sthānaiścihnaiśca lakṣitam / śikhaṇḍināpyahaṃ tatra hyāhūto hyavanīpate

हिन्दी अर्थ

गण हैं। वे ऋतु और आतंवदेव परस्पर एक दूसरे की सहायता एवं पुष्टि भी करते हैं ।६१। इसके अनन्तर “धनुद्चिद्वान्तगंतग्रन्थ: क. पुस्तके नास्ति । १. चतुदंशी युक्त अमावास्या। २. इन दोनों का परिचय पूुर्क में आ चुका है ।

English

From that semen were born the twin gods Asvins, the excellent physicians, Nasatya and Dasra. They are remembered as Asvins.

अध्याय ८३

श्लोक 70

दास्यामि विंशतिग्रामान्गच्छ त्वं नर्मदातटे ।प्रेषणं मे प्रतिज्ञातमलक्ष्म्या पीडितेन तु

dāsyāmi viṃśatigrāmāngaccha tvaṃ narmadātaṭe / preṣaṇaṃ me pratijñātamalakṣmyā pīḍitena tu

हिन्दी अर्थ

श्राउ्ददेवान्पित् नेतान्पितरो लौकिका: स्मृता:। देवा: सोस्याश्र यज्वानः सर्वे चेव ह्ययोनिजा:

English

They are the sons of Martanda, the eighth Prajapati. Bhaskara (the Sun-god) showed his beautiful form to her.

अध्याय ८३

श्लोक 71

कन्योवाच: गच्छ त्वं नर्मदां पुण्यां सर्वपापक्षयंकरीम् ।आग्नेय्यां सोमनाथस्य हनूमन्तेश्वरः परः

kanyovāca: gaccha tvaṃ narmadāṃ puṇyāṃ sarvapāpakṣayaṃkarīm / āgneyyāṃ somanāthasya hanūmanteśvaraḥ paraḥ

हिन्दी अर्थ

देवास्ते पितर: सर्वे देवास्तान्भावयन्त्युत मनुष्या: पितरश्चेव तेम्यो३न्ये लौकिका: स्मृता:ः ये यज्वानः स्मृतास्तेषां ते वे बहिषदः स्मृता: । कर्मस्वेतेषु युक्तास्ते तृप्यन्त्यादेहसंभवात्

English

On seeing him the wife was satisfied and fascinated. Yama was much afflicted in the mind due to that curse.

अध्याय ८३

श्लोक 72

अर्धक्रोशेन रेवाया विस्तीर्णो वटपादपः ।करंजः कटहश् चैव सन्निधाने वटस्य च

ardhakrośena revāyā vistīrṇo vaṭapādapaḥ / karaṃjaḥ kaṭahaś caiva sannidhāne vaṭasya ca

हिन्दी अर्थ

अग्निष्वात्ता: स्मृतास्तेषां होमिनो याज्ययाजिनः । +तेषां ते धर्मसाधर्म्यात्स्मृता सा योज्यकद्विजः ॥ ये वाषप्पाश्र मधर्मेण प्रख्यानेषु व्यवस्थिताः द

English

He pleased (all) by means of his Dharma. Then ne became known as Dharmaraja. By means of his auspicious acti¬ vity, he became extremely refulgent and attained the lordship of Pitrs and guardianship of the quarters. Savarni Manu of great fame shall become the Manu in the Savarnika Manvan- tara. Even today the holy lord performs penance on the beautiful ridge of the Meru mountain.

अध्याय ८३

श्लोक 73

न्यग्रोधमूलसांनिध्ये सूक्ष्मान्यस्थीनि द्रक्ष्यसि ।समूह्य तानि संगृह्य गच्छ रेवां द्विजोत्तम

nyagrodhamūlasāṃnidhye sūkṣmānyasthīni drakṣyasi / samūhya tāni saṃgṛhya gaccha revāṃ dvijottama

हिन्दी अर्थ

अन्ते व नेव सीदन्ति श्रद्धायुक्तेन कमंणा। ब्रह्म॑ंचयेंण तपसा यज्ञेन प्रजया च वे श्रद्धया विद्यया चेव प्रदानेन च सप्तधा। कर्मस्वेतेषु ये युक्ता भवन्त्यादेहपातनात् .

English

Their brother SanaiScara attained the status of a planet. With'the (chopped off) brilliance (of the Sun) Tvastr made Visnu's discus. 1 It was unobstructed (irresistible) in battles to check Danavas.

अध्याय ८३

श्लोक 74

आश्विनस्यासिते पक्षे त्रिपुरारिस्तु वै तिथौ ।स्नाप्य त्रिशूलिनं भक्त्या रात्रौ त्वं कुरु जागरम्

āśvinasyāsite pakṣe tripurāristu vai tithau / snāpya triśūlinaṃ bhaktyā rātrau tvaṃ kuru jāgaram

हिन्दी अर्थ

देवेस्ते: पितुभिः सार्थ सूक्ष्मकं: सोमपायक: । स्वर्गता दिवि सोदन्‍्ते पितृमन्तसुपासते ॥७ १

English

Their younger sister Yamuna of great fame, became the excellent river Yamuna, the purifier of all the worlds. 2

अध्याय ८३

श्लोक 75

क्षिपेः प्रभाते तानि त्वं नाभिमात्रजलस्थितः ।इत्युच्चार्य द्विजश्रेष्ठ विमुक्तिस् तस्य जायताम्

kṣipeḥ prabhāte tāni tvaṃ nābhimātrajalasthitaḥ / ityuccārya dvijaśreṣṭha vimuktis tasya jāyatām

हिन्दी अर्थ

भासश्राद्ध के भोग करने वाले पितरों का वर्णन कर रहा हूँ। उनकी गति, उनका पराक्रम और उनको श्राद्वीय वस्तुओं की प्राप्ति कैसे होती है इसका भी वर्णन कर रहा हूँ सावधान हो सुनिये मृत व्यक्तियों के आवागमन का हाल कोई योग दृष्टि सम्पन्न महातपस्वी भी नहीं जान सकते, तो फिर मेरे समान चरम चक्ष् वाले साधारण व्यक्ति केसे जान सकते हैं ।६२-६३२। उन भ्राद्धदेव पितरों को लौकिक पितर कहां जाता है। सब अयोनिज और सौम्यदेव, एवं यज्ञ करने वाले पितर देव तुल्य हैं ऐसे पितरों की देवगण, मनुष्य और पितर भी पुष्टि करते हैं अर्थात् सम्मान करते हैं। पिता, पितामह उसी प्रकार प्रपितामह और जो सोम से यज्ञ करने वाले हैं वे सोमवन्‍्त कहे जाते हैं ।६४-६६। जो यज्ञ करने वाले होते हैं वे मनुष्य भर कर बहिंषद् पितर होते हैं। जो यज्ञ आदि सत्कर्मों के अनुष्ठान में रहते हैं वे पुनर्जन्म ग्रहण करने के समय तक तृप्त रहते हैं।

English

I shall now narrate the details of Vaivasvata Manu who was the eldest among them. He had great splendour and his creation is current (and he presides over the present Manvan- tara).

अध्याय ८३

श्लोक 76

क्षिप्त्वास्थीनि पुनः स्नानं कर्तव्यं त्वघनाशनम् ।एवं कृते तु राजेन्द्र गतिस्तस्य भविष्यति

kṣiptvāsthīni punaḥ snānaṃ kartavyaṃ tvaghanāśanam / evaṃ kṛte tu rājendra gatistasya bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

उनमें से जो होमपरायण यज्ञाधिकारियों से यज्ञ करने वाले हैं वे अग्निष्वात्त कहे गये हैं। जो अपने आश्रम- धर्मानुसार विहित अनुष्ठानों में निरत रहते हैं वे घ्मंसाम्य के कारण योग्य ब्राह्मणों द्वारा अग्निष्वात्त ही कहे जाते हैं जो श्रद्धायुक्तकर्मों को करते हैं और ब्रह्मचय, तप, यज्ञ, प्रजोत्पत्ति, श्रद्धा, विद्या और दान-इन सात श्रेष्ठकर्मों में जीवन भर निरत रहते हैं वे मृत्यु के बाद भी कष्ट नहीं प्राप्त करते प्रत्युत सोमपान करने वाले

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 77

कथितं कन्यया यच्च तत्सर्वं पुस्तिकाकृतम् ।आगतो ऽहं नृपश्रेष्ठ तीर्थे ऽत्र दुरितापहे

kathitaṃ kanyayā yacca tatsarvaṃ pustikākṛtam / āgato 'haṃ nṛpaśreṣṭha tīrthe 'tra duritāpahe

हिन्दी अर्थ

वाले, सुक्ष्मशरीर देवों ओर पितरों के साथ स्वर्ग में जाकर आनन्द प्राप्त करते हैं और पितरों को सन्तुष्ठ + इदमर्ध नास्ति क. पुस्तके।

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 78

सो ऽभिज्ञानं ततो दृष्ट्वा नीत्वास्थीनि नरेश्वर ।पूर्वोक्तेन विधानेन प्राक्षिपं नार्मदा मसिपुष्पवृष्टिः ऽशु साधु साध्विति पाण्डव ।विमानं च ततो दिव्यम् आगतं बर्हिणस् तदा

so 'bhijñānaṃ tato dṛṣṭvā nītvāsthīni nareśvara / pūrvoktena vidhānena prākṣipaṃ nārmadā masipuṣpavṛṣṭiḥ 'śu sādhu sādhviti pāṇḍava / vimānaṃ ca tato divyam āgataṃ barhiṇas tadā

हिन्दी अर्थ

प्रजावतां प्रशंसेब स्मृता सिद्धा क्रियावताम् । तेषां निवापदत्तान्न॑ तत्कुलीन॑श्च बास्थवे: ...

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 79

दिव्यरूपधरो भूत्वा गतो नाके कलापवान् ।एवं तु प्रत्ययं दृष्ट्वा हनूमन्तेश्वरे नृप

divyarūpadharo bhūtvā gato nāke kalāpavān / evaṃ tu pratyayaṃ dṛṣṭvā hanūmanteśvare nṛpa

हिन्दी अर्थ

मास श्राउ्भुजस्तृप्ति लभन्‍्ते सोमलौकिका: । एते मनुष्या: क्तिरों मासि भ्राद्ठभूजस्तु ते... ७३ तेभ्यो5परे तु ये चान्‍्ये संकीर्णा: कर्मयोनिषु । अ्रष्टाश्चा5:थ्रमधर्मेम्य: स्वधास्वाहाविवर्जिता: भिन्नवेहा दुरात्मान: प्रेतभूता यमक्षये । स्वकर्माण्येव शोचन्ति यातनास्थानमागताः ७४ दीर्घायुषा5तिशुष्काश्च विवर्णाश्व विवासस: । क्षुत्पिपासापरीताश्य बविद्रवन्ति ततस्ततः ७६ सरित्सरस्तडागानि वापीश्चेव जलेप्सवः । परात्नानि च लिप्सन्ते काल्यमानास्ततस्ततः ७७ स्थानेषु पाच्यमानाश्च यातायातेषु तेषु वे । शाल्मलो बैतरण्यां च कुम्भीपाकेषु तेषु च॑ ७८

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 80

चकारानशनं विप्रः शतबाहुश्च भूपतिः ।शोषयामासतुस् तौ स्वमीश्वराराधने रतौ

cakārānaśanaṃ vipraḥ śatabāhuśca bhūpatiḥ / śoṣayāmāsatus tau svamīśvarārādhane ratau

हिन्दी अर्थ

करम्भवालुकायां च असिपत्रवने तथा । शिलासंपेषणे चेव पात्यमाना: स्वकर्म भिः (७६ तत्र स्थानानि तेषां वे दुःखानामप्यनाकवत् । तेषां लोकान्तरस्थानां विविधर्नामगोत्रतः ८०

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 81

ध्यायन्तौ तस्थतुर्देवं शतबाहुद्विजोत्तमौ ।मासार्धेन मृतो राजा शतबाहुर् महामनाः

dhyāyantau tasthaturdevaṃ śatabāhudvijottamau / māsārdhena mṛto rājā śatabāhur mahāmanāḥ

हिन्दी अर्थ

करते हैं ।३७-७१। कि यावान् और प्रज्ञावान् जन ही सिद्ध और प्रशंसनीय हैं। पितरों के निमित्त दिये हुये दान से, उनके कुलों में उत्पन्न एवं बन्धुओं द्वारा दिये गये श्राद्धान्न से सोम लोक में रहने वाले श्राद्धभोजी पितर एक महौने तक तुप्त रहते हैं ऐसे ही पितरों को मासश्राइभुक् पितर कहते हैं। ऊपर कहे गये पितर मनुष्यों के पितर कहे जाते हैं जो कि मास मास में श्राद्ध भोग करते हैं । उनसे अतिरिक्त जो हैं वे अपने संकी्णं कर्मों के अनुसार भिन्न-भिन्न योनियों में प्रमण करते रहते हैं । वे आश्रम-धमंपभ्रष्ट स्वधा स्वाहा (पितृकर्म, देवकम) विमुख हुरात्मा शरीर नष्ट होने पर यमपुरी में प्रेत बतकर भिन्न-भिन्न प्रकार की यातनायें सहते हुये, क्ृतकर्मों पर पश्चात्ताप करते हैं ।9७२-७५। दीर्घ आयु वाले वे अतिकृशकाय, वस्त्र रहित, क्षुधा और पिपासा से व्याकुल हो इधर-उधर भटकते फिरते हैं। नदी, तालाब, बापी आदि जलाशयों के जल की इच्छा से वहाँ-वहाँ जाते हैं

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 82

किङ्कणीजालशोभाढ्यं विमानं तत्र चागतम् ।साधु साधु नृपश्रेष्ठ विमानारोहणं कुरु

kiṅkaṇījālaśobhāḍhyaṃ vimānaṃ tatra cāgatam / sādhu sādhu nṛpaśreṣṭha vimānārohaṇaṃ kuru

हिन्दी अर्थ

और दूसरों के दिये हुये अन्न की प्राप्ति की इच्छा रखते हंये इधर-उधर घूमते रहते हैं। वे भीषण नरकपुरी के यातनास्थानों में--अर्थात् शाल्मली, वैतरणी, कुम्भीपाक, करम्भबालुका असिपत्रवन, शिला संपेषण, आदि घोर नरकों में स्वकर्मानुसार गिराये जाते हैं ॥।७६-७९। ऐसे प्रेतात्माओं के परिवार वालों को चाहिए कि वे उन प्रेतात्माओं के नाम गोत्रादि का उच्चारण कर अपसब्य हो पृथ्वी पर कुशा के ऊपर उनके निमित्त तीन

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 83

शतबाहुर् उवाच: नायामि स्वर्गमार्गाग्रं विप्रो यावन्न संस्थितः ।उपदेशप्रदो मह्यं गुरुरूपी द्विजोत्तमः

śatabāhur uvāca: nāyāmi svargamārgāgraṃ vipro yāvanna saṃsthitaḥ / upadeśaprado mahyaṃ gururūpī dvijottamaḥ

हिन्दी अर्थ

पिण्ड दें । ऐसा करने से उन प्रेतस्थानों में यातना पाने वाले पितरों को परम शान्ति मिलती है ।८०-८१। जो' अपने कर्मों के अनुसार इन यातना स्थानों को जाकर इस पृथ्वी पर पशु, स्थावर आदि पाँच प्रकार की योवनियों काले न्यायागत॑ पात्र विधिना प्रतिपादितम्। प्राप्नोत्यन्न॑ यथादत्तं बन्धु्यत्रावतिष्ठते ८ ढ॑ यथा गोषु प्रनष्टासु वत्सो बिन्दन्ति मातरम्। तथा श्राद्ध तदिष्टानां सन्त्रः प्रापपले पितन॒

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 84

अप्सरस ऊचुः ।लोभावृतो ह्ययं विप्रो लोभात् पापस्य संग्रहः ।हनूमन्तेश्वरे राजन्ये मृताः सत्त्वमास्थिताः

apsarasa ūcuḥ / lobhāvṛto hyayaṃ vipro lobhāt pāpasya saṃgrahaḥ / hanūmanteśvare rājanye mṛtāḥ sattvamāsthitāḥ

हिन्दी अर्थ

बह्नीकाश्रोष्मपाश्वेव दिवाकीर्त्याश्व ते स्मृताः । कृष्णपक्षस्त्वहस्तेषां शुक्ल: स्वप्नाय शबंरी

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 85

ते यान्ति शांकरे लोके सर्वपापक्षयंकरे ।नैव पापक्षयश्चास्य ब्राह्मणस्य नरेश्वर

te yānti śāṃkare loke sarvapāpakṣayaṃkare / naiva pāpakṣayaścāsya brāhmaṇasya nareśvara

हिन्दी अर्थ

इत्येते पितरो देवा देवाश्न पितरश्च ये। ऋतातंवा अनेके तु अन्योन्यपितरः स्मृता: ८८ एते तु पितरो देवा मानुषाः पितरश्र ये। प्रीतेषु तेषु प्रीयन्ते भ्द्धायुक्तेन कर्मणः- इत्येवं पितर: प्रोक्ता: पितणां सोमपायिनाम् । एतत्पितृमतत्वं हि पुराणे निश्चयों मतः

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 86

गृहं च गृहिणी चित्ते ब्राह्मणस्य प्रवर्तते ।शतबाहुस्ततो विप्रम् उवाच विनयान्वितः

gṛhaṃ ca gṛhiṇī citte brāhmaṇasya pravartate / śatabāhustato vipram uvāca vinayānvitaḥ

हिन्दी अर्थ

पूणिमावास्ययो: काल: पित्णां स्थानमेव च्। समाप्तात्कीतितस्तुम्यमेष सर्गः सनातनः ६२

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 87

त्यज मूलमनर्थस्य लोभमेनं द्विजोत्तम ।इत्युक्त्वा स्वर्ययौ राजा स्वर्गकन्यासमावृतः

tyaja mūlamanarthasya lobhamenaṃ dvijottama / ityuktvā svaryayau rājā svargakanyāsamāvṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

में अथवा भूतों एवं नाना रूपात्मक जीव श्रेणी या तियंग्योनियों में उत्पन्न हो गये हैं, उनके लिये श्राद्ध में दिया हुआ अन्न उन योनियों के उपयुक्त आहार बनकर उनको मिलता है ।८५२-८३। श्रेष्ठकाल में विधभिप्वक सत्पात्र को श्राद्ध निमित्त दिया हुआ पदार्थ किसी भी योनि में गये हुये पितर को प्राप्त होता है। जिस प्रकार गौओं में छिपी हुई अपनी माँ को (गौ का) बछड़ा प्राप्त कर लेता है उसी प्रकार श्राद्ध में मन्त्र द्वारा जिस पितर के उद्देश्य से अन्न दिया जाता है वह उसको अवश्य प्राप्त होता है ।5४-८५। इस प्रकार सर्वाज्भपूर्ण श्राद्ध ओर मन्त्र द्वारा श्राद्ध में दिये गये पदार्थों की प्राप्ति के विषय में प्रेतों के आवागमन विद्या को जानने वाले (प्रेत- . विद्याभिज्ञ) सनत्कुमार ने अपने दिव्यचक्षुओं से देखकर बतलाया है। ये पितर बह्नलीक, उष्मपा और दिवा- कीर्त्य नाम से भी कहे जाते हैं । कृष्ण पक्ष उन पितरों का दिन और शुक्ल पक्ष विश्वाम (शयन) करने के लिये

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 88

दिनैः कैश्चिद्गतो विप्रः स्वर्गं वैतालिकैर्वृतः ।बर्ही च काशीराजस्य पुत्रस् तीर्थप्रभावतः

dinaiḥ kaiścidgato vipraḥ svargaṃ vaitālikairvṛtaḥ / barhī ca kāśīrājasya putras tīrthaprabhāvataḥ

हिन्दी अर्थ

रात्रि है। ये इतने पितृ देवता और देव पितर, ऋत और आतंब सब एक दूसरे के पितर (जनक) हैं । ये जितने पितर देवता हैं और जो मानुष पितर हैं, उनके श्रद्धायुक्त कर्म से और उनकी प्रसन्नता से सभी देव पितर भी प्रसन्न रहते हैं। ८६-८६॥ इस प्रकार सोमपायी पितरों के भी पितर पुराणों में कहे गये हैं । इन पितरों का महत्त्व पुराणों में निश्चित रूप से कहा गया है । इस प्रकार से सूर्य, चद्धमा, पितर और पुरूरवा का समागम,

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 89

आत्मानं कन्यया दत्तं पूर्वजन्म व्यचिन्तयन् ।सा च तं प्रौढमालोक्य पितुराज्ञामवाप्य च ।स्वयंवरे स्वभर्तारं लेभे साध्वी नृपात्मजम्

ātmānaṃ kanyayā dattaṃ pūrvajanma vyacintayan / sā ca taṃ prauḍhamālokya piturājñāmavāpya ca / svayaṃvare svabhartāraṃ lebhe sādhvī nṛpātmajam

हिन्दी अर्थ

सुधा, अमृत की प्राप्ति, पितरों की तृप्ठि, पूर्णिमा अमावास्था का पुण्यकाल, पितरों का स्थान आदि का वर्णन संक्षेप में तुमसे कहा है, यही सनातन सर्ग है ।९०-९२। यद्यपि इन सबका विस्तार अधिक है फिर भी मैंने इनके एक देश का वर्जन किया है, इसकी अलग-अलग गणना नहीं की जा सकती । ऐश्वयं चाहने वाले मनुष्यों स्वायंभुवस्य हीत्येष सर्ग:ः क्रान्तो मया5त्र वे । विस्तरेणा5पनृपुर्व्या च भुयः कि वर्णयाम्यहम् (६४ इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्ते पितृवर्णनं नाम षटपश्चाशो5्ध्याय:

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 90

श्रीमार्कण्डेय उवाच: एतद्वृत्तान्तम् अभवत् तस्मिंस्तीर्थे नृपोत्तम ।एतस्मात् कारणान्मेध्यं तीर्थम् एतत् सदा नृप

śrīmārkaṇḍeya uvāca: etadvṛttāntam abhavat tasmiṃstīrthe nṛpottama / etasmāt kāraṇānmedhyaṃ tīrtham etat sadā nṛpa

हिन्दी अर्थ

संख्ययेह प्रसंड्याय विस्तराच्चेब स्वंशः । युगं च युगभेद॑ च युगधर्म तथव च ३३ युगसंध्यंशक चेव युगसंधानमेव च्। षदट्प्रकारयुगारुयानां प्रवक्ष्यामीह तत्त्वतः ड़

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 91

अष्टम्यां वा चतुर्दश्यां सर्वकालं नरेश्वर ।विशेषाच्चाश्विने मासि कृष्णपक्षे चतुर्दशीम्

aṣṭamyāṃ vā caturdaśyāṃ sarvakālaṃ nareśvara / viśeṣāccāśvine māsi kṛṣṇapakṣe caturdaśīm

हिन्दी अर्थ

को इस प्रकार श्रद्धा करनी चाहिए । यहाँ पर मैंने विस्तार पूर्वक यथार्थरूप से स्वाम्भुव मनु के सृष्टि तत्त्व का वर्णन किया है। अब आप लोग और क्या सुनना चाहते हैं क्षियों ने कहा--सूत जी ! पूर्वकाल में स्वायम्भुव मन्वन्तर में जो चार युग थे उन सबों के स्वभाव एवं तत्त्व को विस्तारधवंक सुनने के हम इच्छुक हैं

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 92

स्नापयेद् ईश्वरं भक्त्या क्षौद्रक्षीरेण सर्पिषा ।दध्ना च खण्डयुक्तेन कुशतोयेन वै पुनः

snāpayed īśvaraṃ bhaktyā kṣaudrakṣīreṇa sarpiṣā / dadhnā ca khaṇḍayuktena kuśatoyena vai punaḥ

हिन्दी अर्थ

सूत ने कह्ा--ऋषिबव॒न्द ! पृथ्वी आदि के वर्णन प्रसज्ञ में मैंने जिन चारों युगों का वर्णन षहिले किया था उनको विस्तारपूर्वक बलता रहा हूँ, सुनिये २। प्रत्येक युगों का मान संख्याओं से परिगणित कर युग, यूगभेद, युगधर्म, युगसंधि, युगांश, तथा युगसंधान--इन छः प्रकार के युगों को तत्त्वतः बतला रहा हूं

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 93

श्रीखण्डेन सुगन्धेन गुण्ठयेच् च महेश्वरम् ।ततः सुगन्धपुष्पैश्च बिल्वपत्रैश्च पूजयेत्

śrīkhaṇḍena sugandhena guṇṭhayec ca maheśvaram / tataḥ sugandhapuṣpaiśca bilvapatraiśca pūjayet

हिन्दी अर्थ

लोकिकेन प्रमाणेन विबुद्धोब्दस्तु मानुषः । तेनाब्देन प्रसंख्याय वक्ष्यामीह चतुयुगगंम् निरमेषकालः काष्ठा चर कलाश्रापि मुहूर्तका: । निमेषकालतुल्य हि विद्याल्लध्वक्षरं च यत्

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 94

मुचकुन्देन कदेन जातीकाशकुशोद्भवैः ।उन्मत्तमुनिपुष्पौघैः पुष्पैस्तत्कालसम्भवैः

mucakundena kadena jātīkāśakuśodbhavaiḥ / unmattamunipuṣpaughaiḥ puṣpaistatkālasambhavaiḥ

हिन्दी अर्थ

काष्ठा निमेषा दश पत्च घेब त्रिशच्च काष्ठा गणयेत्कलास्ताः ।

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 95

अर्चयेत् परया भक्त्या हनूमन्तेश्वरं शिवम् ।घृतेन दापयेद् दीपं तैलेन तदभावतः

arcayet parayā bhaktyā hanūmanteśvaraṃ śivam / ghṛtena dāpayed dīpaṃ tailena tadabhāvataḥ

हिन्दी अर्थ

त्रिशत्कलाश्चव भवेन्मुहूर्तास्तास्त्रिशता राध्यहुणी समेते द ७ अहोरात्रे विभजते सूर्यो मानुषदेविके । तत्राहः कमचेष्टायां रात्रि: स्वप्नाय कल्प्यते पिश्ये राह्यहणी मासः प्रविभागस्तयो: पुनः । क्रष्णपक्षस्त्वहस्तेषां शुक्ल: स्वप्नाय शरवरो ३६ त्रिशच्च मानुषा मासाः पित्रयो मासश्र स स्पृत:। शतानि त्रीणि मासानां षष्टया चाप्याधिकानि वे ॥॥

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 96

श्राद्धं च कारयेत् तत्र ब्राह्मणैर् वेदपारगैः ।सर्वलक्षणसम्पूर्णैः कुलीनैर् गृहपालकैः

śrāddhaṃ ca kārayet tatra brāhmaṇair vedapāragaiḥ / sarvalakṣaṇasampūrṇaiḥ kulīnair gṛhapālakaiḥ

हिन्दी अर्थ

चत्वारश्राधिका मासाः पित्रे चंबेह कीतिता: ११ लौकिकेनंव मानेन अब्दो यो मानुषः स्मृतः । एतहिव्यमहो रात्र शास्त्रेडस्मिन्िश्नयों मतः १२ दिव्ये राज्यहणी वर्ष प्रविभागस्तयो: पुनः । अहस्तत्रोदगयन रात्रि: स्पाहक्षिणायनम् १३

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 97

तर्पयेद् ब्राह्मणान् भक्त्या वसनान्नहिरण्यतः ।नरकस्था दिवं यान्तु प्रोच्येति प्रणमेद् द्विजान्

tarpayed brāhmaṇān bhaktyā vasanānnahiraṇyataḥ / narakasthā divaṃ yāntu procyeti praṇamed dvijān

हिन्दी अर्थ

ये ते राह्यहणी दिव्ये प्रसंछ्घाते तथोः पुनः । त्रिशच्च तानि वर्षाणि दिव्यों ह्यंष विधि: स्मृत: मानव वर्ष लौकिक प्रमाण से माना गया है, उसी मानव वर्ष के प्रमाण से इन चारों थुगों का प्रमाण बतला रहा हूँ । निमेषकाल, काष्ठा, कला और मुह॒तें--ये लौकिके काल के मापक हैं। एक लघु अक्षर के उच्चारण में जितना समय अपेक्षित है उसे निमेषकाल के बराबर जानना चाहिए । पन्द्रह निमेष की एक काष्ठा होती है, तीस काष्ठा की एक कला होती है, तीस कला का एक मुह॒तें होता है, और तीस मुहतं का एक

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 98

पतितान् वर्जयेद् विप्रान् वृषली यस्य गेहिनी ।स्ववृषं चापरित्यज्य वृषैर् अन्यैर् वृषायते

patitān varjayed viprān vṛṣalī yasya gehinī / svavṛṣaṃ cāparityajya vṛṣair anyair vṛṣāyate

हिन्दी अर्थ

दिन रात होता ।५-७। मनुष्य और दंव दोनों के दिन रात का विभाजन सूर्य करता है, उसमें से दिन तो कर्म विधान के लिये और रात्रि शयन के लिये बनायी गई है। पितरों का एक दिन-रात एक मास का होता है उसमें से कृष्ण पक्ष तो उनका दिन और शुक्ल शबन के लिये रात्रि रूप है -इस प्रकार मानव का तीस मास पितरों का एक मास कहा गया है और तीन सौ आठ मानव मास का पितरों का एक वर्ष होता है

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 99

वृषलीं तां विदुर्देवा न शूद्री वृषली भवेत् ।ब्रह्महत्या सुरापानं गुरुदारनिषेवणम्

vṛṣalīṃ tāṃ vidurdevā na śūdrī vṛṣalī bhavet / brahmahatyā surāpānaṃ gurudāraniṣevaṇam

हिन्दी अर्थ

मानव वर्ष के मान के अनुसार उसके सौ वर्ष का पितरों का तीन वर्ष और चार मास कहा गया है। लौकिक मान से मानव के एक वर्ष का देवताओं का एक दिन इस शास्त्र में निश्चित माना गया है। इस दिव्य (देवताओं के) वर्ष का विभाग इस प्रकार है, उसमें उत्तरायण तो दिन है और दक्षिणायन रात्रि। ये जो दिव्य दिन रात कहे गये हैं, उसके तोस दिन रात का एक दिव्य मास होता है अर्थात् मानव के तीस वर्षों का एक दिव्य मास कहा जाता है। और इस प्रकार सौ मानव वर्ष के तीन मास दस दिन देवताओं के

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 100

सुवर्णहरणन्यासमित्रद्रोहोद्भवं तथा ।नश्यते पातकं सर्वम् इत्येवं शङ्करो ऽब्रवीत्

suvarṇaharaṇanyāsamitradrohodbhavaṃ tathā / naśyate pātakaṃ sarvam ityevaṃ śaṅkaro 'bravīt

हिन्दी अर्थ

त्रीणि वर्षशतान्येव षष्टिव (वें) थघाणि यानि च्। दिव्य: संवत्सरो ह्यंष मानुषेण प्रकोतितः:

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 101

श्रीमार्कण्डेय उवाच: वाक्प्रलापेन भो वत्स बहुनोक्तेन किं मया ।सर्वपातकसंयुक्तो दद्याद् दानं द्विजन्मने

śrīmārkaṇḍeya uvāca: vākpralāpena bho vatsa bahunoktena kiṃ mayā / sarvapātakasaṃyukto dadyād dānaṃ dvijanmane

हिन्दी अर्थ

जानना चाहिए। यह देवताओं के एक वर्ष का प्रमाण स्मरण किया गया है।३३-१५। मानव के तीन सौ साठ वर्षों का एक दिव्य वर्ष कहा गया है । मानव के तीन सहस्न और तीस वर्षों का एक सप्त्षिवत्सर कहा गया है और नव सहस्र नब्बे बषं का एक क्रोंच संवत्सर स्मरण किया गया है। मानव के छत्तीस सहस्न वर्षों का है ।१६-१६। तोन नियुत साठ सहस्न मानव वर्षों का एक सहस्न दिव्य वर्ष संख्याविद् लोग जानते हैं । इस प्रकार ऋषियों ने दिव्य संख्या द्वारा विव्य प्रमाण से युग की अवधि की कल्पना की है। भारतवषं में कवियों ने युगों की संर्या चार बतलाई है, इन चारों युगों में सर्वप्रथम कृतयुग तदनन्तर त्रेता, ढ्वापर और कलियुग की कल्पना हुई ।३०-२२। उनमें क्ृतयुग को चार सहस्न वर्षों का कहा गया है, और उसकी संध्या तथा संध्या

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 102

गोदानं च प्रकर्तव्यम् अस्मिंस्तीर्थे विशेषतः ।गोदानं हि यतः पार्थ सर्वदानाधिकं स्मृतम्

godānaṃ ca prakartavyam asmiṃstīrthe viśeṣataḥ / godānaṃ hi yataḥ pārtha sarvadānādhikaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

का प्रमाण चार सो वर्षों का है। अन्य तीनों युगों के प्रमाण, संध्या तथा संध्यांश में क्रशः एक-एक सहस्र

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 103

सर्वदेवमया गावः सर्वे देवास् तदात्मकाः ।शृङ्गाग्रेषु महीपाल शक्रो वसति नित्यशः

sarvadevamayā gāvaḥ sarve devās tadātmakāḥ / śṛṅgāgreṣu mahīpāla śakro vasati nityaśaḥ

हिन्दी अर्थ

इदमर्ध नास्ति क, ख. घ. पुस्तकेषु । १. आनन्दाश्रम की प्रति में इस इलोक के मध्य में 'षष्टिब्चैव सहल्लाणि वर्षाणां मनुषाणि तु! इतना पाठ अधिक दिया गया है, जो अथुक्त है। क्‍योंकि इस प्रकार साठ सहख्न मानव वर्ष का अथ होता है जो अशुरद्ध है । गणित करने पर छत्तीस सहस्न मानव बर्ष का एक छत दिव्य वर्ष होता है ।

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 104

उरः स्कन्दः शिरो ब्रह्मा ललाटे वृषभध्वजः ।चन्द्रार्कौ लोचने देवौ जिह्वायां च सरस्वती

uraḥ skandaḥ śiro brahmā lalāṭe vṛṣabhadhvajaḥ / candrārkau locane devau jihvāyāṃ ca sarasvatī

हिन्दी अर्थ

इतरासु च संध्यासु संध्यांशेषु च वे त्रिचु । एकापायेन वर्तन्ते सहल्लाणि शतानि च

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 105

मरुद्गणाः सदा साध्या यस्या दन्ता नरेश्वर ।हुङ्कारे चतुरो वेदान् विद्यात्साङ्गपदक्रमान्

marudgaṇāḥ sadā sādhyā yasyā dantā nareśvara / huṅkāre caturo vedān vidyātsāṅgapadakramān

हिन्दी अर्थ

श्रेता त्रीणि सहल्लाणि संख्येब परिकीत्यंते । तस्यास्तु त्रिशती संध्या संध्यांशभ्र तथाविध:. दापरं है सहन तु युगमाहुम नीषिणः । तस्यापि द्विशती संध्या संध्यांशः संध्यया समः

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 106

ऋषयो रोमकूपेषु ह्यसंख्यातास् तपस्विनः ।दण्डहस्तो महाकायः कृष्णो महिषवाहनः

ṛṣayo romakūpeṣu hyasaṃkhyātās tapasvinaḥ / daṇḍahasto mahākāyaḥ kṛṣṇo mahiṣavāhanaḥ

हिन्दी अर्थ

एवा द्वादशसाहल्ी युगारुवा परिकीतिता । कछूत॑ ज्रेता द्वापरश्न कलिश्चेब चतुष्टयम् २८

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 107

यमः पृष्ठस्थितो नित्यं शुभाशुभपरीक्षकः ।चत्वारः सागराः पुण्याः क्षीरधाराः स्तनेषु च

yamaḥ pṛṣṭhasthito nityaṃ śubhāśubhaparīkṣakaḥ / catvāraḥ sāgarāḥ puṇyāḥ kṣīradhārāḥ staneṣu ca

हिन्दी अर्थ

सहस्नाणां शतान्यत्र चतुदंश तु संड्धया । चत्वारिशत्सह्लाणि कलिकालयुगस्य तु (३० + एवं संध्यांशकालस्यथ कालेष्चिह बिशेषतः । एवं चतुर्युगः कालो विना संध्यांशकः स्पृतः ॥३ १

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 108

विष्णुपादोद्भवा गङ्गा दर्शनात्पापनाशनी ।प्रस्रावे संस्थिता यस्मात् तस्माद् वन्द्या सदा बुधैः

viṣṇupādodbhavā gaṅgā darśanātpāpanāśanī / prasrāve saṃsthitā yasmāt tasmād vandyā sadā budhaiḥ

हिन्दी अर्थ

सहल्न सथा एक-एक सौ वर्षों की न्‍्यूनता रहती है। इस प्रकार त्रेता युग का प्रमाण तीन सहस्न वर्षों का कहा . गया है और उसकी संध्या तथा संध्यांश का प्रमाण तीन सौ वर्षों का है। पंडित जन द्वापरयुथ का प्रमाण दो सहस्त वर्षों का बवलाते हैं उसकी संध्या तथा संध्यांश की संख्या भी दो-दो सौ वर्ष की मानी गई है । इसी प्रकार विद्वानों ने कलियुग का प्रमाण एक सहद्न वर्ष का और उसको भी संध्या तथा सध्यांश एक-एक सौ

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 109

लक्ष्मीश्च गोमये नित्यं पवित्रा सर्वमङ्गला ।गोमयालेपनं तस्मात् कर्तव्यं पाण्डुनन्दन

lakṣmīśca gomaye nityaṃ pavitrā sarvamaṅgalā / gomayālepanaṃ tasmāt kartavyaṃ pāṇḍunandana

हिन्दी अर्थ

वर्षों का माना है ।२३-२७। यह बारह सहस्त वर्षों की संख्या सतयुग जेता द्वापर तथा कलियुग इन चारों युगों की कही गई है, यह दिव्य बर्षों का प्रमाण है। इस संसार में संवत्सरों की कल्पना मानव वर्ष के प्रमाण से हुई है, अत: उसी के द्वारा कुतयुग का प्रमाण बतला रहा हूं, वह कृतयुग चौदह लाख चालीस सहस्र मानव वर्ष का कहा गया है, कलियुग" का प्रमाण चालौस हजार वर्ष है। चारों युगों का प्रमाण इसी प्रकार संध्या और संध्यांश से विहीन छत्तीस नियुत वर्ष अर्थात् छत्तीस लाख्ष वर्ष स्मरण किया गया है तथा ततालीस जियुत अर्थात् तेतालीस लाख तथा बीस सहस्न मानव वर्षों का संध्या और संध्यांशों समेत चारों युगों का प्रमाण कहा गया

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 110

गन्धर्वाप्सरसो नागाः खुराग्रेषु व्यवस्थिताः ।पृथिव्यां सागरान्तायां यानि तीर्थानि भारत ।तानि सर्वाणि जानीयाद् गौर्गव्यं तेन पावनम्

gandharvāpsaraso nāgāḥ khurāgreṣu vyavasthitāḥ / pṛthivyāṃ sāgarāntāyāṃ yāni tīrthāni bhārata / tāni sarvāṇi jānīyād gaurgavyaṃ tena pāvanam

हिन्दी अर्थ

है ।३२८-३२। इसी प्रकार सतयुग, त्रेता, दापर और कलियुम-इन चारों युगों का इकहत्तर गुना काल एक

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 111

युधिष्ठिर उवाच: सर्वदेवमयी धेनुर्गीर्वाणाद्यैरलंकृता ।एतत्कथय मे तात कस्माद् गोषु समाश्रिताः

yudhiṣṭhira uvāca: sarvadevamayī dhenurgīrvāṇādyairalaṃkṛtā / etatkathaya me tāta kasmād goṣu samāśritāḥ

हिन्दी अर्थ

+इदमर्ध तास्ति के पुस्तके । + अस्मिन्नधेस्थान इदमर्ध संख्यातस्त्वेककाल्नस्तु काले श्विह विशेषत इति ख ग. घ. ड. पुस्तकेषु । १. कई मूल पुस्तकों में इस स्थल का पाठ भिन्न-भिन्न है, किसी में आधा इलोक है ही नहीं, अतः अनुवाद की गति भंग हो जाती है आननन्‍्दाश्रम की प्रति में जोड़ा गया अर्धश्लोक संगति विहीन है।

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 112

श्रीमार्कण्डेय उवाच: सर्वदेवमयो विष्णुर् गावो विष्णुशरीरजाः ।देवास्तदुभयात् तस्मात् कल्पिता विविधा जनैः

śrīmārkaṇḍeya uvāca: sarvadevamayo viṣṇur gāvo viṣṇuśarīrajāḥ / devāstadubhayāt tasmāt kalpitā vividhā janaiḥ

हिन्दी अर्थ

एवं चतुर्यगारुया तु साधिका हां कसप्ततिः + कृतत्रेतादियुक्ता सा मनोरन्तरभुच्यते...

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 113

श्वेता वा कपिला वापि क्षीरिणी पाण्डुनन्दन ।सवत्सा च सुशीला च सितवस्त्रावगुण्ठिता

śvetā vā kapilā vāpi kṣīriṇī pāṇḍunandana / savatsā ca suśīlā ca sitavastrāvaguṇṭhitā

हिन्दी अर्थ

मन्वन्तरस्प संख्या तु वर्षाग्रेण निबोधत । त्रिशत्कोट्यस्तु वर्षाणां मानुषेण प्रकीतिता:.... 0३४ सप्तषष्टिस्तथा5स्यानि नियुतान्यधिकानि तु. विशतिश्य 'सहुल्लाणि कालो5यं संधिकं बिना मन्वन्तरस्य संख्येषों सेंस्याविस्धि हिजेः स्मृता । मस्वन्तरस्थ के।लो5यं शुगेः साध॑ प्रकीतितेंः :

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 114

कांस्यदोहनिका देया स्वर्णशृङ्गी सुभूषिता ।हनूमन्तेश्वरस्याग्रे भक्त्या विप्राय दापयेत्

kāṃsyadohanikā deyā svarṇaśṛṅgī subhūṣitā / hanūmanteśvarasyāgre bhaktyā viprāya dāpayet

हिन्दी अर्थ

चतुःसहख्रयुक्‍तं बे प्रथम -तत्कृतं युगम् । त्रेतावरशिष्ट वक्ष्यामि द्वाप्र कलिसेव च......

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 115

नियमस्थेन सा देया स्वर्गमानन्त्यम् इच्छता ।असमर्थाय ये दद्युर् विष्णुलोके प्रयान्ति ते

niyamasthena sā deyā svargamānantyam icchatā / asamarthāya ye dadyur viṣṇuloke prayānti te

हिन्दी अर्थ

ऋषिवंशप्रसड्धभ न व्याकुलत्वात्ववच. .. आइद तत्र त्रेतायुगस्था55दौ संनुः सप्तर्ष पश्च ते । भौत॑ स्मातें च धर्म च ब्रह्मणा च प्रचोदितम् ३६ दाराग्निहोत्रसंयोगमृप्य जु:सामसंज्ञितम् । इत्यादिलक्षणं श्रोतं धर्म सप्तर्षयो5छुबन् + + ॥ परंम्परागतं धर्म स्मार्ते चाइपचचारलक्षणस् । वर्णाश्नमाचारयुतं प्रभ्नुः स्वायंभुवो5उन्नवीत् ४३ सत्येन ब्रह्मचयेंण श्रुतेन तपसा च॒ वे। तेषां सुतप्ततपसामार्षयेण क्रमेण तु द ॥३४ २

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 116

असौ लोके च्युतो राजन्भूतले द्विजमन्दिरे ।कुशलो जायते पुत्रो गुणविद्याधनर्द्धिमान्

asau loke cyuto rājanbhūtale dvijamandire / kuśalo jāyate putro guṇavidyādhanarddhimān

हिन्दी अर्थ

अभिव्यक्तास्तु ते मन्त्रास्तारकाञ्ेनिदर्शनेंः । आदिकल्पे तु देवानां प्रादुर्भूतास्तु ते स्वयम् प४४

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 117

सर्वपापहरं तीर्थं हनूमन्तेश्वरं नृप ।शृण्वन्विमुच्यते पापाद् वर्णसंकरसंभवात्

sarvapāpaharaṃ tīrthaṃ hanūmanteśvaraṃ nṛpa / śṛṇvanvimucyate pāpād varṇasaṃkarasaṃbhavāt

हिन्दी अर्थ

नननमभकान----+प्राना।-पामाम्म गपह्य०न्माा नाक गाइननय पी वि मन्वन्तर का कहा गया है। मन्वन्तर के वर्षों की संख्या. का प्रमाण इस प्रकार है, सुनिये । तीस करोड़ सड़सठ लाख बीस सहस्त मानव वर्ष को एक मन्वन्तर का समय कहा गया. हैं. काल की संख्या को जानने व्ाले द्विजगण संधिकाल को छोड़कर मन्वन्तर की यही संख्या स्मरण करते हैं। युगों के साथ मन्वन्तर के समय का वर्णन इस प्रकार कर चुका ।३३-३६। जैसा कि पहले कह चुका हूँ इन चारों युगों में. कृतयुग का प्रमाण चार सहस्र

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

अध्याय ८३

श्लोक 118

दूरस्थश्चिन्तयन् पश्यन् मुच्यते नात्र संशयः

dūrasthaścintayan paśyan mucyate nātra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

दिव्य वर्षों का है इसके अतिरिक्त त्रेता, .द्वापर तथा कलियुंग को बतला रहा हूँ इसके पहिले ऋषियों के वंश- वर्णन के प्रसंग में व्यग्रतावश मैं इन युगों के प्रमाणों का निरूषण कर चुका हूँ ।३७-३८। एके प्रसंग में आये हुए सयुक्त अर्थ का वर्णन दो प्रकार से अलग-अलग नहीं किया जा सकता, . और क्रमशः इनके वर्णन को तो मैं तुम्हें सुना भी चुका हूँ । उस त्रेता युग के आदिम काल में ब्रह्मा द्वारा निर्दिष्ट किये गये श्रौत एवं स्मात धर्मों

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 83
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.