अध्याय ८५
श्लोक 1
॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे कपितीर्थरामेश्वरलक्ष्मणेश्वरकुम्भेश्वरमाहात्म्यवर्णनं नाम चतुरशीतितमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय ८५ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र नर्मदायाः पुरातनम् ।ब्रह्महत्याहरं तीर्थं वाराणस्या समं हि तत्
|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe kapitīrtharāmeśvaralakṣmaṇeśvarakumbheśvaramāhātmyavarṇanaṃ nāma caturaśītitamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 85 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchettu rājendra narmadāyāḥ purātanam / brahmahatyāharaṃ tīrthaṃ vārāṇasyā samaṃ hi tat
हिन्दी अर्थ
की प्राप्ति करता है और तपस्या द्वारा वराग्य की प्राप्ति होती है कर्मों के संन्याप से ब्राह्मण्य (ब्रह्म की प्रांप्ति) वराग्य से लय और ज्ञान से कैवलल््य पद की भ्राप्ति होती है--ये पाँच ग्रातियाँ स्मरण की जाती हैं इस प्रकार पूर्व काल में स्वायम्भुव मन्वन्तर में ऋषियों और देवताओं के बीच में यज्ञ की प्रथा प्रचलित होने के अवसर पर बहुत बड़ा विवाद हुआ था। तदनस्तर उस अद्वमेघ महायज्ञ में समुपस्थित ऋषिगण उक्त प्रकार के हिसात्मक यज्ञ के अदुभुत घर्मं पथ को देखकर राजा वसु की कही गई बातों को अनादर करके जहाँ-जहाँ से आये थे, वापस चले मये ।११६-१२०। इस प्रकार ऋषियों के वापस चले जाने के बाद देवताओं ने यज्ञ का
English
(Listen to and) understand the details of Manu's sons. Pjrsadhra tortured the cow of his preceptor and ate it. Due to the curse of the noble-souled Cyavana, he attained the status of a Sudra.