Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
85
अध्याय 85 / 232

Adhyaya 85

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अध्याय ८५

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे कपितीर्थरामेश्वरलक्ष्मणेश्वरकुम्भेश्वरमाहात्म्यवर्णनं नाम चतुरशीतितमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय ८५ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र नर्मदायाः पुरातनम् ।ब्रह्महत्याहरं तीर्थं वाराणस्या समं हि तत्

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe kapitīrtharāmeśvaralakṣmaṇeśvarakumbheśvaramāhātmyavarṇanaṃ nāma caturaśītitamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 85 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchettu rājendra narmadāyāḥ purātanam / brahmahatyāharaṃ tīrthaṃ vārāṇasyā samaṃ hi tat

हिन्दी अर्थ

की प्राप्ति करता है और तपस्या द्वारा वराग्य की प्राप्ति होती है कर्मों के संन्याप से ब्राह्मण्य (ब्रह्म की प्रांप्ति) वराग्य से लय और ज्ञान से कैवलल्‍्य पद की भ्राप्ति होती है--ये पाँच ग्रातियाँ स्मरण की जाती हैं इस प्रकार पूर्व काल में स्वायम्भुव मन्वन्तर में ऋषियों और देवताओं के बीच में यज्ञ की प्रथा प्रचलित होने के अवसर पर बहुत बड़ा विवाद हुआ था। तदनस्तर उस अद्वमेघ महायज्ञ में समुपस्थित ऋषिगण उक्त प्रकार के हिसात्मक यज्ञ के अदुभुत घर्मं पथ को देखकर राजा वसु की कही गई बातों को अनादर करके जहाँ-जहाँ से आये थे, वापस चले मये ।११६-१२०। इस प्रकार ऋषियों के वापस चले जाने के बाद देवताओं ने यज्ञ का

English

(Listen to and) understand the details of Manu's sons. Pjrsadhra tortured the cow of his preceptor and ate it. Due to the curse of the noble-souled Cyavana, he attained the status of a Sudra.

अध्याय ८५

श्लोक 2

युधिष्ठिर उवाच: आश्चर्यं कथ्यतां ब्रह्मन्यद्वृत्तं नर्मदातटे ।वाराणस्या समं कस्माद् एतत् कथय मे प्रभो

yudhiṣṭhira uvāca: āścaryaṃ kathyatāṃ brahmanyadvṛttaṃ narmadātaṭe / vārāṇasyā samaṃ kasmād etat kathaya me prabho

हिन्दी अर्थ

काय समाप्त किया । ऐसा सुना जाता है कि प्राचीन काल में प्रियन्नत, उत्तानपाद, ध्रुव, मेधातिथि, बसु, सुमेधा, विरजा, शंखपाद, रज, प्राचीनर्वाह, प्जन्य, एवं ह॒विर्धान प्रभूति अनेकानेक तपः सिद्ध ब्राह्मण महात्मा एवं क्षत्रिय राजागण, जो महातेजस्वी एवं कीतिश,ली हो गये हैं, अपने तप के बल से सिद्धि प्राप्त कर स्वरगंगामी हुये ।१२१-१२३। इन्हीं सब कारणों से सभी स्थलों पर यज्ञ की अपेक्षा तपस्या विशेष फलदायिनी है।

English

Bhalandana had a very powerful son named Pramsu. Pramsu had a son who became well known as Prajani.

अध्याय ८५

श्लोक 3

निमग्नो दुःखसंसारे हृतराज्यो द्विजोत्तम ।युष्मद्वाणीजलस्नातो निर्दुःखः सह बान्धवैः

nimagno duḥkhasaṃsāre hṛtarājyo dvijottama / yuṣmadvāṇījalasnāto nirduḥkhaḥ saha bāndhavaiḥ

हिन्दी अर्थ

प्राचीन काल मे ब्रह्माजी ने इस निखिल विश्व की सृष्टि तप के भरोसे की है यज्ञ कभी भी तप की अपेक्षा श्रेष्ठ नहीं हो सकता, इस समस्त चराकर जगत् का मूल तप ही है। स्वायम्भव मन्वन्तर में इस प्रकार यज्ञ की प्रथा - प्रचलित हुई थी, तभी से लेकर प्रत्येक युगों में यह यज्ञ होता चला आ रहा है श्रीवायुमहापुरण में यज्ञप्रवत्तव नाम सत्तावनवाँ अध्याय समाप्त ॥५७॥।

English

Prajani had a valorous son named Khanitra. His son was the glorious Ksupa of great fame.

अध्याय ८५

श्लोक 4

श्रीमार्कण्डेय उवाच: साधु साधु महाबाहो सोमवंशविभूषण ।पृष्टो ऽस्मि दुर्लभं तीर्थं गुह्याद्गुह्यतरं परम्

śrīmārkaṇḍeya uvāca: sādhu sādhu mahābāho somavaṃśavibhūṣaṇa / pṛṣṭo 'smi durlabhaṃ tīrthaṃ guhyādguhyataraṃ param

हिन्दी अर्थ

धनुदिच द्वान्तगंत ग्रन्थो ऊ. पुस्तके नास्ति +नुद्िचिह्वास्तर्गतग्रस्थो घ. पुस्तके नास्ति ।

English

Ksupa's son was Virhsa who had no one equal to him. Vimsa's son was Vivimsa, the righteous performer of religi¬ ous rites.

अध्याय ८५

श्लोक 5

आदौ पितामहस् तावत् समस्तजगतः प्रभुः ।मनसा तस्य संजाता दशैव ऋषिपुंगवाः

ādau pitāmahas tāvat samastajagataḥ prabhuḥ / manasā tasya saṃjātā daśaiva ṛṣipuṃgavāḥ

हिन्दी अर्थ

४२० वायुपुराणमभ् "5! संमेदश्चेव वर्णानां कार्याणां च विनिर्णय:। याच्जा वधः पणो दण्डो मदो दसश्भो5क्षमाइबलम् ॥.. एषां रजस्तमोयुक्ता प्रवृत्तिद्व परे स्मृता क्‍ द - कोड . आ कते न धर्मोइस्ति जेतायां संप्रपद्यते । द्वापरे व्याकुली सृत्वा प्रणश्यंति कलोौ युगे 404 वर्णानां विपरिध्वंसः संकोत्यंते तथा55श्रम: । हधमुत्पद्यते चेव युगे तस्मिअ्श्रुत्ौ स्मृतौ दे

English

Vivimsa's son was the virtuous-souled and valorous Kha- ninetra. In the beginning of Tretavuga, his son Karandhama was born.

अध्याय ८५

श्लोक 6

मरीचिमत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् ।प्रचेतसं वसिष्ठं च भृगुं नारदमेव च

marīcimatryaṅgirasau pulastyaṃ pulahaṃ kratum / pracetasaṃ vasiṣṭhaṃ ca bhṛguṃ nāradameva ca

हिन्दी अर्थ

सूतजी बोले---अब इसके उपरान्त मैं द्वापर युग के स्वभाव का बर्णन करता हूँ । त्ेता थुग के क्षीण होने के बाद द्वापर युग का समय आता है इस-द्वापर युग के आदिम काल में मनुष्यों को त्रेता युग में जो सिद्धियाँ प्राप्त रहती हैं, वे युग की समाप्ति के साथ, समाप्त हो जाती. है ।१:२। तदुप्रान्‍्त: द्वापर में. उन्हीं प्रजाओं के मन में लोभ, अधैयं, वणिक वत्ति, युड्ध-वत्ति, युद्ध, तत्त्तों का. भनिइ्चय, ब्रह्मादि वर्णों में .पारस्वरिक मतभेद,

English

Karandhama's son was the vigorous Aviksit. By means of his good qualities, Aviksit surpassed his father.

अध्याय ८५

श्लोक 7

जज्ञे प्राचेतसं दक्षं महातेजाः प्रजापतिः ।दक्षस्यापि तथा जाताः पञ्चाशद्दुहिताः किल

jajñe prācetasaṃ dakṣaṃ mahātejāḥ prajāpatiḥ / dakṣasyāpi tathā jātāḥ pañcāśadduhitāḥ kila

हिन्दी अर्थ

कार्याक. ये का अनिर्णय, याचना, वध,.-पण (नौकरी या. पैसे पंदा करने के. अन्य उपाय), दण्ड, मद्र, दम्भ, अक्षमा, निबंलता--इस सभी अवगुणों, की. रजोमय .एवं , तपोमय प्रवृत्तियाँ पाई जाने लगती हैं-- ऐसा कहा गया है ।३-४॥ आदिमयुग कृत में धर्म नहीं था त्रेता युग में उसकी प्रवृत्ति होती है; द्वापर में वह व्याकुलित होकर कलियुग में विनष्ट हो जाता है ॥५। उसमें वर्णों एवं आश्रसों का विध्वंस हो जाता है, तथा श्रुतियों एवं स्मृतियों के दुविधा के भाव उत्पन्न हो जाते हैं। श्रुतियों तथा स्मृतियों के द्वेघीभाव के कारण किसी विषय का निश्चय नहों होता एवं अनिदचय परिणाम यह होता है कि श्वम तत्त्वों का स्वंधा विलोप हो जाता है। और

English

The term ' Murcchana ' means the changing of key or modulation of voice (and sounds) in the Science of Music. For more explanation see Footnote No 3,

अध्याय ८५

श्लोक 8

ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश ।तथैव स महाभागः सप्तविंशतिमिन्दवे

dadau sa daśa dharmāya kaśyapāya trayodaśa / tathaiva sa mahābhāgaḥ saptaviṃśatimindave

हिन्दी अर्थ

परस्परविभिन्नेस्तंद ध्टीनां विश्रेमेण व । अंय॑ धर्मो हाय॑ नेति निश्चयों नभिगम्यतें' “- ““ कारणानां च वेकल्यात्कारणस्थाध्यनिश्चयात् । मंतिभेदे चे तेषां वे दृष्टीनां विभ्रमों भंबेत् ६ ततो दृष्टिविभिन्नैस्ते: कृतं शास्त्रकुल त्विदम् । 'एको वेदश्र्वतुष्पादस्त्रेतास्विह विधीयते '. ४१०

English

A. reads: Nabhaga was the son of Arista. Bhalandana was a scholar.

अध्याय ८५

श्लोक 9

रोहिणी नाम या तासामभीष्टा साभवद्विधोः ।शेषासु करुणां कृत्वा शप्तो दक्षेण चन्द्रमाः

rohiṇī nāma yā tāsāmabhīṣṭā sābhavadvidhoḥ / śeṣāsu karuṇāṃ kṛtvā śapto dakṣeṇa candramāḥ

हिन्दी अर्थ

ऋषिपुत्रे: पुनर्वेदा भिचन्ते दृष्टिविश्रमैः- सन्त्रब्राह्मणविन्यासे: स्व॒स्वर्णादिपयंथें: ... / ब्राह्मणं कल्पसुऋणि मन्त्रप्रबचनानि च्। अन्‍्ये'तु प्रहितास्ती्ें: केचित्तान्प्रत्यवेस्थिताः --

English

(His son) named Marutta was a virtuous-souled king equal to an emperor. He was taken to heaven by (sage) Sam- varta along with his friends and kinsmen.

अध्याय ८५

श्लोक 10

क्षयरोग्यभवच्चन्द्रो दक्षस्यायं प्रजापतेः ।स च शापप्रभावेण निस्तेजाः शर्वरीपतिः

kṣayarogyabhavaccandro dakṣasyāyaṃ prajāpateḥ / sa ca śāpaprabhāveṇa nistejāḥ śarvarīpatiḥ

हिन्दी अर्थ

उनमें भिन्न-भिन्न मनुष्यों के भिन्न-भिन्न मत हो जाते हैं ।६-७। दृष्टि विभ्रम के कारण परस्पर भिन्न-भिन्न मत रखने वाले उन मनुष्यों के बीच में “यह धर्म है, यह अधर्म है”, इस बात का निश्चय नहीं हो पाता । कारणों की बिकलता (अपूर्णता) एवं अनिदिचत बुद्धि के कारण भिन्न-भिन्न मति रखने वाले उन मनुष्यों में दृष्टि विधभ्रम का हो जाना स्वॉभाविक' हो जाता है। उर्न विशभ्रान्त दृष्टि वाले मैनुंष्यों से शॉस्त्र बेचारे व्यॉकुल हो जाते

English

In this connection a great dispute arose between Sam- vavta and Byhaspati. On seeing the magnificence of the Yajfia, Byahspati became angry with him.

अध्याय ८५

श्लोक 11

गतः पितामहं सोमो वेपमानो ऽमृतांशुमान् ।पद्मयोने नमस्तुभ्यं वेदगर्भ नमो ऽस्तु ते ।शरणं त्वां प्रसन्नो ऽस्मि पाहि मां कमलासन

gataḥ pitāmahaṃ somo vepamāno 'mṛtāṃśumān / padmayone namastubhyaṃ vedagarbha namo 'stu te / śaraṇaṃ tvāṃ prasanno 'smi pāhi māṃ kamalāsana

हिन्दी अर्थ

है, एक वेद कौ त्रेतायुग में चार चरण करके चार विभाग किये गये हैं ।८-१०। द्वापरादि युगों में मनुष्यों की पायु के कारण वेदव्यासों ने' वेद को चार भागों में विभक्त किया। उसके बाद भी दृष्टि विश्रम के कारण ऋषि पुत्रों द्वारा उन॑ वेदों का विभाग हुआ, जिसमें 'स्वरं और वर्ण के विपयंय से मन्त्र और ब्राह्मण--दो भाग हुये । भ्रान्त दृष्टि वाले उन वेदाभ्यासी ऋषियों ने कहीं-कहीं सांमान्य ढंग से और कहौं-कहीं बुद्धि की विक्वृति के कारण ऋक्, यजु और साम॑ की संहिताओं का विपयेय कद दिया। पंरिणाम स्वरूप, ब्र/ह्मण, कल्पसूत्र,

English

When the Yajfla was brought to a successful conclusion by Samvarta, he (Brhaspati) became more furious. He was in¬ tent on the destruction of the worlds but he was propitiated by the deities (gods).

अध्याय ८५

श्लोक 12

ब्रह्मोवाच: निस्तेजाः शर्वरीनाथ कलाहीनश्च दृश्यसे ।उद्विग्नमानसस्तात संजातः केन हेतुना

brahmovāca: nistejāḥ śarvarīnātha kalāhīnaśca dṛśyase / udvignamānasastāta saṃjātaḥ kena hetunā

हिन्दी अर्थ

मंत्र, प्रवेचन आदि सभी 'विपय॑स्त हो गये। उनमें से कुछ तो ब्राह्मणों से दूर कर दिये बये और कुछ उन पर आस्थांशील बने रहें ।११-१४। द्वापर युगों में आश्रम धर्म का विपर्येय हो जाता हैं, द्विंजादिगण अपने अपने आश्रमंधर्मों से एवं आचारों से च्युत हो जाते हैं, प्राचीन काल में केवल एंक्र आध्वयेत्र था, जिसका बाद में चलकर दी विभाग हो जाता है। सामान्य अर्थों के स्थान परे विपरीत अंथ समझने के कारण यह शास्त्र

English

Emperor Marutta obtained Narisyanta (as son). Nari-?yanta's successor was the king Dama, wielding the staff of jus¬ tice and punishment.

अध्याय ८५

श्लोक 13

सोम उवाच: दक्षशापेन मे ब्रह्मन्निस्तेजस्त्वं जगत्पते ।निर्हारश्चास्य शापस्य कथ्यतां मे पितामह

soma uvāca: dakṣaśāpena me brahmannistejastvaṃ jagatpate / nirhāraścāsya śāpasya kathyatāṃ me pitāmaha

हिन्दी अर्थ

ही एकदम से अस्त व्यस्त हो जाता है, इस ' प्रकार आध्वयेव के विभिन्‍न प्रस्तावों के कारण उसका मूलरूप विकृंत हो 'जाता है। इसौ प्रकार अथर्ववेद, ऋग्वेद और सामवेद में भी जतक्य॑ विकल्पों के कारण भिन्न- १ हद यजुबद का अध्वर्य सम्बन्धो कम - कं की ड ; वन, आ रा न की

English

The valorous king Ra$travardhana was his son. His son was Sudhytin and Sudhrtin's son was Nara.

अध्याय ८५

श्लोक 14

ब्रह्मोवाच: सर्वत्र सुलभा रेवा त्रिषु स्थानेषु दुर्लभा ।ओङ्कारे ऽथ भृगुक्षेत्रे तथा चैवौर्वसंगमे

brahmovāca: sarvatra sulabhā revā triṣu sthāneṣu durlabhā / oṅkāre 'tha bhṛgukṣetre tathā caivaurvasaṃgame

हिन्दी अर्थ

४६२ क्‍ वायुपुराणम्

English

Kevala was his son and Bandhuman was the son of Ke- vala. The virtuous-souled king Vegavan was Bandhuman's son.

अध्याय ८५

श्लोक 15

तत्र गच्छ क्षपानाथ यत्र रेवान्तरं तटम् ।त्वरितो ऽसौ गतस्तत्र यत्र रेवौर्विसंगमः

tatra gaccha kṣapānātha yatra revāntaraṃ taṭam / tvarito 'sau gatastatra yatra revaurvisaṃgamaḥ

हिन्दी अर्थ

वाइमन:क्ंजद:खेनिवेंदों जायते पुनः । निवेदाज्जायते तेषां दुःखमोक्षबिचारणा २० मनसा कमंणा वाचा कृच्छाद्वार्ता प्रसिध्यति । द्वापरे सबंभृतानां कायक्लेशपुरस्कृता २५ लोभो5धृतिवंनिग्युद्ध तत््वानासविनिश्चयः । वेदशास्त्रप्रणयनं धर्माणां संकरस्तथा १२६ द्वापरेषु प्रवर्तन्ते रागो लोभो बधस्तथा। वर्णाश्रसपरिध्वंसा: कामद्ेषो तथब व. 0२७ पूर्ण वर्षसहस्न है परमायुस्तथा नृणाम् । निःशेषे द्वापरे तस्मिस्तस्य संध्या तु पादतः २८

English

Budha was Vegavan's son and Tynabindu was the son of Budha. He became king at the beginning of the third Treta- yuga.

अध्याय ८५

श्लोक 16

काष्ठावस्थः स्थितः सोमो दध्यौ त्रिपुरवैरिणम् ।यावद् वर्षशतं पूर्णं तावत् तुष्टो महेश्वरः

kāṣṭhāvasthaḥ sthitaḥ somo dadhyau tripuravairiṇam / yāvad varṣaśataṃ pūrṇaṃ tāvat tuṣṭo maheśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

भिन्न दृष्टि वाले ऋषियों द्वारा द्वापर युग में अस्तव्यस्तता आ जाती है। उन विकल्पों का परिणाम यह होता है कि. द्वापर युग में उन के अगणित भेद अभेद हो जाते हैं और कलियुग आते भाते वे पुनः एकदम से बिलुप्त हो जाते हैं ।१५-१८। द्वापर युग में इस प्रकार प्रजावर्ग के कर्मो में निषयंय हो जाता है, जिससे अनावृष्टि, मरण, विविध प्रकार की व्याधियाँ, अनेक उपद्रव, मानसिक, वाचिक एवं कर्म सम्बन्धी दोषों से उत्पन्न होने

English

His daughter was Dravi(ja (Idaviqla in Bd. P.) who be¬ came the mother of Visravas. He had a son also named Visala. He was an extremely virtuous king.

अध्याय ८५

श्लोक 17

प्रत्यक्षः सोमराजस्य वृषासन उमापतिः ।साष्टाङ्गं प्रणिपत्योच्चैर्जय शम्भो नमो ऽस्तु ते

pratyakṣaḥ somarājasya vṛṣāsana umāpatiḥ / sāṣṭāṅgaṃ praṇipatyoccairjaya śambho namo 'stu te

हिन्दी अर्थ

वाले कष्टों के कारण प्रजा के मन में पश्चात्ताप होता है, जिसके कारण उनके मन में उन दुश्खों से मुक्ति पाने का विवेक उत्पन्न होता है । दुःख मोक्ष के उपाय चिन्तन से सांसारिक विषयों से वेराग्य हो जाता है, और वेराग्य के कारण अपने दोषों पर दृष्टि जाती है, इस प्रकार दोष - दर्शन से ज्ञान की उत्पत्ति द्वापर युग में होती है।१९-२२। इस प्रकार पूर्व स्वायम्भुव मन्वन्तर के द्वापर युग में उन मानी प्रजावर्गों के पूर्वज शास्त्रों के परिपन्‍्थी (विरोधी) उत्पन्न हुए। आयुर्वेद, वेदों के सभी अंग, ज्योतिष, अथंशास्त्र, हेतुशास्त्र, (म्याय शास्त्र) स्मृति शास्त्र एवं अन्यान्य सभी प्रकार के शास्त्रों में मतभेदों के कारण विकल्प हो जाते हैं, सभी मनुष्यों में मतभेद हो जाते हैं ।२३-२४। द्वापर में कायिक, मानसिक, वाचिक व्यवहारों से अतिकष्ट के साथ जीविका. निर्वाह होता है और सभी जीवों में शारीरिक कष्टों की अधिकता पाई जाती हैं। लोभ,

English

The city of Visala (Vaisali) 1 was built by king Visala. Visala's son was the king Hemacandra of great strength.

अध्याय ८५

श्लोक 18

जय शङ्कर पापहराय नमो जय ईश्वर ते जगदीश नमः ।जय वासुकिभूषणधार नमो जय शूलकपालधराय नमः

jaya śaṅkara pāpaharāya namo jaya īśvara te jagadīśa namaḥ / jaya vāsukibhūṣaṇadhāra namo jaya śūlakapāladharāya namaḥ

हिन्दी अर्थ

अधयं, वाणिज्य बुद्धि, युद्धतत्वों का अनिश्चय, वेदों एवं शास्त्रों का मनमानी प्रणयन एवं सम्पादन, घाभिक व्यवहारों में परस्पर विपयेय--ये सभी कार्य द्वापर में अबोध रूप से प्रचलित हो जाते हैं, जिससे राग लोभ, मारण, वर्णाश्रम का विध्वंस, काम और दढ्वेष की अधिकता हो जाती है मनुष्य की अधिक आयु दो सहन वर्ष की होती है। इस प्रकार द्वापर के समाप्त हो जाने पर उसकी अवधि के चतुर्थ अंश में उसकी

English

After Hemacandra (his son) Sucandra became very famous. Sucandra's son was the well known king Dhumrasva.

अध्याय ८५

श्लोक 19

जय अन्धकदेहविनाश नमो जय दानववृन्दवधाय नमः ।जय निष्कलरूप सकलाय नमो जय काल कामदहाय नमः

jaya andhakadehavināśa namo jaya dānavavṛndavadhāya namaḥ / jaya niṣkalarūpa sakalāya namo jaya kāla kāmadahāya namaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रतिष्ठते गुणेहीनों धर्मोउसौ द्वापरस्प तु । तथैव संध्यापादेन अंशस्तस्थावतिष्ठते. २६ (हिसाइसुयाउनृतं साया वधश्चेव तपस्विनाम् । एते स्वभावास्तिष्यस्थ साधपन्ति च वे प्रजा:

English

Dhumrasva's son Synjaya became a great scholar. Syn- jaya's son was the glorious and valorous Sahadeva.

अध्याय ८५

श्लोक 20

जय मेचककण्ठधराय नमो जय सूक्ष्मनिरञ्जनशब्द नमः ।जय आदिरनादिरनन्त नमो जय शङ्कर किंकरमीश भज

jaya mecakakaṇṭhadharāya namo jaya sūkṣmanirañjanaśabda namaḥ / jaya ādiranādirananta namo jaya śaṅkara kiṃkaramīśa bhaja

हिन्दी अर्थ

एव धर्म: कृत: कृत्स्नो धर्मेश्न परिहीयते । मनसा कमंणा स्वुत्या वार्ता सिध्यति वा नवा ३२ कलौ प्रमारकों रोगः सतत क्षुद्धूयानि वे । अनावुष्टिभयं घोरं देशानां च विपयेय:

English

Krsasva was Sahadeva's son. He was extremely righte¬ ous. The valorous Somadatta of great brilliance was Krsasva's son.

अध्याय ८५

श्लोक 21

एवं स्तुतो महादेवः सोमराजेन पाण्डव ।तुष्टस्तस्य नृपश्रेष्ठ शिवया शङ्करो ऽब्रवीत्

evaṃ stuto mahādevaḥ somarājena pāṇḍava / tuṣṭastasya nṛpaśreṣṭha śivayā śaṅkaro 'bravīt

हिन्दी अर्थ

न प्रमाणं स्मृतेरस्ति तिष्ये लोके युगे युगे । गर्भस्थों ज्रियते कश्चिद्यौवनस्थस्तथा5१२: ॥। अधाभिकास्त्वनाचारा मोहकोपाल्पतेजसः । अनृतबुवाश्र सतत तिष्ये जायन्ति वे प्रजा:

English

Janamejaya was the son of the saintly king Somadatta. Janamejaya's son named Pramati was very famous.

अध्याय ८५

श्लोक 22

ईश्वर उवाच: वरं प्रार्थय मे भद्र यत्ते मनसि वर्तते ।साधु साधु महासत्त्व तुष्टो ऽहं तपसा तव

īśvara uvāca: varaṃ prārthaya me bhadra yatte manasi vartate / sādhu sādhu mahāsattva tuṣṭo 'haṃ tapasā tava

हिन्दी अर्थ

दुरिष्टदरधोतैश्न दुराचारेदुरागमैः । विप्राणां कर्मदोषैस्तेः प्रजानां जायते भयम्

English

By the grace of Tynabindu, all the kings ruling over Visala were long-lived, noble-souled, valorous and very righteous.

अध्याय ८५

श्लोक 23

सोम उवाच: दक्षशापेन दग्धो ऽहं क्षीणसत्त्वो महेश्वर ।शापस्योपशमं देव कुरु शर्म मम प्रभो

soma uvāca: dakṣaśāpena dagdho 'haṃ kṣīṇasattvo maheśvara / śāpasyopaśamaṃ deva kuru śarma mama prabho

हिन्दी अर्थ

सस्ध्या प्रवृत्त होती है ।२५-१८। उस सन्ध्या के समय में द्वापर यूग का स्वभात्र अपने गुणों से कुछ विहीन हो कर स्थित रहता है, सन्ध्या के समाप्त हो जाने पर सन्ध्या की पाद परिमित अवधि के लिए सन्ध्यांश की प्रवृत्ति होती है। इस प्रकार द्वापर यूग के स्वभाव का वर्णन कर चुका अब कलियुग के स्वभाव का वर्णन सुनो । द्वापर युग के सन्ध्यांझ की निवृत्ति हो जाने के उपरान्त कलियूग की प्रवृत्ति होती है । हिंसा असया, असत्य भाषण, माया, तपस्वियों का संहार, ये कलियूग के स्वभाव हैं, उस युग की प्रजाएँ कालधम के अनुसार इनका पालन करती हैं। इन उपयुक्त कलि धर्मों के कारण वेदानुमत धर्मे ु सम्पुर्ण रूप से विनष्ट हो जाता है। मनसा, कर्मणा एवं स्तुति द्वारा अथक भ्रयत्न करने पर भी लोगों की जीविका निष्पन्न होने में सन्‍्देह बना रहता है ।२६-३२। उस कलियुग में महामारी रोग, निरन्तर क्षुध्रा की व्याधियाँ,

English

Saryati begot twins, a son and a daughter Th* tnn u

अध्याय ८५

श्लोक 24

ईश्वर उवाच: तव भक्तिगृहीतो ऽहमुमया सह तोषितः ।निष्पापः सोमनाथस्त्वं संजातस्तीर्थसेवनात्

īśvara uvāca: tava bhaktigṛhīto 'hamumayā saha toṣitaḥ / niṣpāpaḥ somanāthastvaṃ saṃjātastīrthasevanāt

हिन्दी अर्थ

दुर्भिक्ष आदि, घोर अनावृष्टि का भय तथा देशों में उथल-उथल सर्वदा! मची रहती है, उन स्मृतियों का लोक में कोई प्रमाण नहीं रह जाता, जिनका प्रत्येक युगों में मान था, कोई गर्भ में ही मर जाता है तो कोई जवानी में । इसी प्रकार वद्धावस्था, कुमारावस्था में भी कलियुग में प्रजाएँ मृत्युलाभ करती हैं ।३३०३४। कलियुग में सभो लोग घर्मविहीन, अनाचारी, अज्ञानी क्रीधी, अल्प बुद्धिवाले एवं निरन्तर असत्यभाषी उत्पन्न होते

English

Anarta's successor was the heroic (kin j n

अध्याय ८५

श्लोक 25

इत्यूचे देवदेवेशः क्षणं ध्यात्वेन्दुना ततः ।स्थापितं परमं लिङ्गं कामदं प्राणिनां भुवि ।सर्वदुःखहरं तत् तु ब्रह्महत्याविनाशनम्

ityūce devadeveśaḥ kṣaṇaṃ dhyātvendunā tataḥ / sthāpitaṃ paramaṃ liṅgaṃ kāmadaṃ prāṇināṃ bhuvi / sarvaduḥkhaharaṃ tat tu brahmahatyāvināśanam

हिन्दी अर्थ

हैं। उस कलियुग में ब्राह्मण जाति की कुशिक्षा, दुष्ट उपायों से यज्ञाराधन करने, असत् उपायों से जीविका उत्पन्त करने, दुराचारी एवं दुव्यंसनी होने के कारण प्रजावर्ग को भय उत्पन्न होता है। उस कलियुग में सभी जीवों में हिसा, माया, ईर्ष्या, क्रोष, असूया, अक्षमाशीलता, असत्य भाषण, राग एवं लोभ प्रभूति दोषों का प्रादुर्भाव टो जाता है। उस कलियग के प्राप्त होने पर प्रत्येक जीवों में अतिशय क्षोभ उत्पन्न हो जाता है उस समय राजानः शूद्रभूयिष्ठा: पाषण्डानां प्रवर्तका: + अर णहत्याः प्रजास्तत्र प्रज्ञा एवं प्रवतंते. ४० आयुर्सेधा बल रूप॑ कुल चैब प्रहीयते । शुद्राश्र-ब्राह्मणाचारा: शुद्राचाराध् ब्राह्मणा:...-

English

O son of Suta, O holy lord, how is it that even after the lapse of a long period of many Yugas, Revati did not become old? How did her hair not turn grey?

अध्याय ८५

श्लोक 26

युधिष्ठिर उवाच: सोमनाथप्रभावं मे संक्षेपात्कथय प्रभो ।दुःखार्णवनिमग्नानां त्राता प्राप्तो द्विजोत्तम

yudhiṣṭhira uvāca: somanāthaprabhāvaṃ me saṃkṣepātkathaya prabho / duḥkhārṇavanimagnānāṃ trātā prāpto dvijottama

हिन्दी अर्थ

तदा सुक्ष्मो महोदरकों दुलंभो दानमुलवान् । चतुराश्रमशंथिल्याद्ध्म: प्रविचलिष्यति ,... यह तदा ह्याल्पफला देवी भवेद्भूमिमहीयसी । शुद्रास्तपश्चरिष्यन्ति युगान्ते प्रत्यतत्थिति....॥४ ६" तदा होकांहिको धर्मों द्वापरे यश्च मासिक: । न्लेतायां वंत्सरस्थश्च एकाह्वादतिरिच्यते...

English

After going to the mountain Meru how did Saryati's son have progeny of his own? How did they survive till now on the earth? We wish to hear precisely.-

अध्याय ८५

श्लोक 27

श्रीमार्कण्डेय उवाच: शृणु तीर्थप्रभावं ते संक्षेपात्कथयाम्य् अहम् ।यद्वृत्तमुत्तरे कूले रेवाया उरिसंगमे

śrīmārkaṇḍeya uvāca: śṛṇu tīrthaprabhāvaṃ te saṃkṣepātkathayāmy aham / yadvṛttamuttare kūle revāyā urisaṃgame

हिन्दी अर्थ

द्विजातिवर्ग न तो वेदों का अध्यन करते हैं और न ठीक से यज्ञों का-अनुष्ठान ही करते हैं तथा क्षत्रिय वैश्यों समेत सभी मनुष्य नष्ट होने लगते. हैं ।३५-३८। इस कलिकाल. में शुद्र एवं अन्त्यज वर्णों के - साथ ब्राह्मणों का : 'शयन; आसन एवं भोजनादि में सम्बन्ध स्थापित हो जाता है । राजा लोग अधिकतर थशूद्र जाति के होते हैं, : ओर पाखएड को बढ़ानेवाले होते हैं, प्रजावर्ग में गर्भ .हत्या-आदि घोर पाप होते रहते है । प्री लोगों की बायु बुद्धि, बल, रूप, एवं कुल का विनाकब्न हो जाता है, शुद्र लोग ब्राह्मणों की भाँति एवं ब्राह्मण लोग शूद्रों की. भाँति. आंचार-व्यवहार करने लगते हैं। इसी प्रकार चोर लोग राजाओं की . भाँति प्रजाव्गं पर शासन एवं दण्डादि को व्यवस्था करते हैं और राजा लोग चोरों की तरह चोरी से प्रजा. के धनादि- का अपहरण करते हैं। उस. कलिकाल. में नौकर लोग स्वामि-भक्ति से रहित हो जाते हैं ।३९-४२। स्त्रियाँ अतिशय दुःशील, -

English

How many are the groups of gods? How are the Gan- dharvas? How was that music on hearing which Raivata consi¬ dered a long period as only a Muhurta?

अध्याय ८५

श्लोक 28

शम्बरो नाम राजाभूत्तस्य पुत्रस्त्रिलोचनः ।त्रिलोचनसुतः कण्वः स पापर्द्धिपरो ऽभवत्

śambaro nāma rājābhūttasya putrastrilocanaḥ / trilocanasutaḥ kaṇvaḥ sa pāparddhiparo 'bhavat

हिन्दी अर्थ

ब्रतादि में निष्ठा व रखनेवाली, मदिरा एवं मांस को पसन्द करनेवाली, केवल मायाविनी होने लगती है, हिंल जीवों का उस, कलियुग में प्राबाल्य एवं गौओं का हास होने लगता है। उस कलियुग में साधु प्रकृति के लोधो का. एक भ्रकार से सवंथा अभाव ही समझना चाहिए । इस प्रकार उस कल्लिकाल में सूक्ष्म किन्तु महान् फल देनेवाला, अतिशय दुलंभ दानमूलक धर्म चारों आश्रमों के शियिल होने के कारण विचलित हो

English

Accidentally Einstein is anticipated by the imaginative Purana-

अध्याय ८५

श्लोक 29

वने नित्यं भ्रमन्सो ऽथ मृगयूथं ददर्श ह ।मृगयूथं हतं तत् तु त्रिलोचनसुतेन च

vane nityaṃ bhramanso 'tha mṛgayūthaṃ dadarśa ha / mṛgayūthaṃ hataṃ tat tu trilocanasutena ca

हिन्दी अर्थ

जायगा ।४३:४५। उस समय अति प्रभावशालिनी प्रृथ्वी अल्प फलदायिनी, . शुद्र लोग तपस्या. में निरत हो जायंगे, किन्तु उस युग का एक दित का धरम द्वापर के एक सास एवं जेता के एक वर्ष. के घमं के समान फलदायी होगा । उस युगान्तकाल में राजा लोग केवल अपनी रक्षा: में तत्पर रहकर प्रजाबर्ग के- अरक्षक-

English

To a person who goes to the world of god Brahma, there is neither hunger nor thirst. He has neither old age nor fear of death. No ailment affects him.

अध्याय ८५

श्लोक 30

मृगरूपी द्विजो मध्ये चरते निर्जने वने ।स हतस्तेन सङ्गेन कण्वेन मुनिसत्तम

mṛgarūpī dvijo madhye carate nirjane vane / sa hatastena saṅgena kaṇvena munisattama

हिन्दी अर्थ

अक्षत्रियाश्व राजानों विशः शुद्रोपजीविनः । शुद्रभिवादिनः सर्वे युगानते हिजसत्तमाः ४६ यतयश्च भविष्यन्ति बहुवोस्मिन्कलौ युगे। चित्रवर्षी तदा देवो यदा स्यात्तु युगक्षयः

English

O excellent sages, as to the question put to me on Gandharva (science of music), I shall explain it precisely, O good sages of holy rites.

अध्याय ८५

श्लोक 31

ब्रह्महत्यान्वितः कण्वो निस्तेजा व्यचरन्महीम् ।व्यचरंश्चैव सम्प्राप्तो नर्मदाम् उरिसंगमे

brahmahatyānvitaḥ kaṇvo nistejā vyacaranmahīm / vyacaraṃścaiva samprāpto narmadām urisaṃgame

हिन्दी अर्थ

सर्वे बागिजकाश्चापि भविष्यन्त्यधमे युगे । (शुूद्राश्च यतिनश्चेव गृढवासास्तपस्विनः ॥ बहुयाचनको लोको भविष्यति परस्परम् । क्रव्यादनः क़्रवाक्यो5नार्जवो नानसुयकः

English

The Svara Manila 1 (the whole group pertaining to musical notes) is comprised by seven Svaras (notes), three Gramas- (basic scales), twentyone Murcchanas? (the modes of

अध्याय ८५

श्लोक 32

किंशुकाशोकबहले जम्बीरपनसाकुले ।कदम्बपाटलाकीर्णे बिल्वनारङ्गशोभिते

kiṃśukāśokabahale jambīrapanasākule / kadambapāṭalākīrṇe bilvanāraṅgaśobhite

हिन्दी अर्थ

न कृते प्रतिकर्ता च क्षीणो लोको भविष्यति । अशडुू चेब पतिते तद्यगान्तस्य लक्षणम्

English

It suggests the ascent and descent of seven notes, known as Svara- sap taka. Sec v. 37.

अध्याय ८५

श्लोक 33

चिञ्चिणीचम्पकोपेते ह्यगस्तितरुछादिते ।प्रभूतभूतसंयुक्तं वनं सर्वत्र शोभितम्

ciñciṇīcampakopete hyagastitaruchādite / prabhūtabhūtasaṃyuktaṃ vanaṃ sarvatra śobhitam

हिन्दी अर्थ

अल्पोदका चाल्पफला भविष्यति वसुंधरा । गोप्तारश्चाप्यगोप्तारः प्रभविष्यन्त्यशासना: एवं कर ग्रहण करनेवाले होंगे। वे राजागण क्षत्रिय जाति के न होकर अन्य नीच जातियों में होंगे । उस कलिकाल में वेश्यगण शुद्रों के समान जीविका अजित करनेवाले तथा सभी ब्राह्मण लोग शुद्रों के नमस्कार करने वाले होंगे ।४६०४६९। उस कलियुग में बहुतेरे संन्यासी का वेश धारण कर जीविका चलानेवाले होंगे, उस समय जब कि युग समाप्ति सन्तिकट होगी, दंव विचिन्न वृष्टि करेगा, अर्थात् कहीं पर बहुत अधिक. कहीं पर कुछ

English

Grama: Grama means the group of seven notes. The three Gramas mentioned in Puranas are (1) §adja-grama, (ii) Madhyama-grama and (iii) Gandhara-grama. These three were the basic scales—the Sdsca\c, the Ma-s cale and the Ga-scale. These had the notes Sd, Ma and Ga as the starting points. TIius the order of notes in these scales will be as follows:

अध्याय ८५

श्लोक 34

चित्रकैर् मृगमार्जारैर् हिंस्रैः शम्बरशूकरैः ।शशैर्गवयसंयुक्तैः शिखण्डिखरमण्डितम्

citrakair mṛgamārjārair hiṃsraiḥ śambaraśūkaraiḥ / śaśairgavayasaṃyuktaiḥ śikhaṇḍikharamaṇḍitam

हिन्दी अर्थ

भी नहीं, कहीं पर अकाल में वृष्टि और कहीं पर वर्षाकाल में भी अनावृष्टि होगी। उस अधम कलियुग के सभी मलुष्य प्रायः वाणिज्य व्यवसाय करनेवाले होंगे । शूद्र लोग संन्‍्यासियों का बाता धारण कर कौपीन धारण कर तपस्य निरत होंगे और सभी लोग दूसरे की स्त्री में चित्त लगाकर अपने धर्म पथ से भ्रष्ट होंगे । व्यवसायी लोग प्रायः कपटपूर्ण तौल द्वारा वस्तुओं का विक्रय कर क्रेताओं को बंचित करेंगे १०-५१ व्यर्थ

English

Murcchand:

अध्याय ८५

श्लोक 35

प्रविष्टस्तु वने कण्वस्तृषार्तः श्रमपीडितः ।स्नातो रेवाजले पुण्ये सङ्गमे पापनाशने

praviṣṭastu vane kaṇvastṛṣārtaḥ śramapīḍitaḥ / snāto revājale puṇye saṅgame pāpanāśane

हिन्दी अर्थ

के बाहरी पाषाण्डों में अभिरुचि रखनेवाले प्रायः सभी प्राणी अतिशय दुःशील एवं अनःचारी होंगें। उस युगान्त के समय पुरुषों की कमी और स्त्रियों की अधिकता होगी । लोगों में एक दूसरे से याचता करने की प्रवृत्ति बहुत बढ़ जायगी। लोग कच्चा मांस खाने लगेंगे, कटुभाषी होंगे, अतिशय कुटिल व्यवहार करनेवाले तथा प्रनिन्दक होंगे। उपकार करनेवालों का प्रत्युपकार कोई भी नहीं करेगा । सभी शरीर से अति क्षीण होंगे और घोर पतित व्यवहारों में भी उन्हें आशंका नहीं होगी--यही युगान्त का लक्षण समझिए ।५२-५४। सारी पृथ्वी मनुष्यों से रहित होकर प्रायः सूनी हो जायगी । देशों और नगरों में मण्डलों की स्थापना होगी । सारी वसुन्धरा अल्प जल से युक्त तथा अल्प फलवाली हो

English

Tala or Tana:

अध्याय ८५

श्लोक 36

अर्चितः परया भक्त्या सोमनाथो युधिष्ठिर ।पपौ सुविमलं तोयं सर्वपापक्षयंकरम्

arcitaḥ parayā bhaktyā somanātho yudhiṣṭhira / papau suvimalaṃ toyaṃ sarvapāpakṣayaṃkaram

हिन्दी अर्थ

जायगी । पृथ्वी रक्षक कहानेवाले राजागण उस समय रक्षा करने में असमर्थ हो जायंगे राज्य में शासन व्यवस्था

English

The Murcchanas of the Mas calc ( Maclhyama-gramika ) are known as Saublr! (Sauvlra in Bd. P.) of the Madhyama- grama, Harinasya, Kalopabalopeta (also known as Kalopanata) the fourth Suddha-madhyama, Sarngi, Pavanl and Dpstaka in the serial order. Murcchanas of Madhyama-grama are ex¬ plained. Now understand (the Murcchanas of) the Sascale (Safia-grama ).

अध्याय ८५

श्लोक 37

फलानि च विचित्राणि चखाद सह किंकरैः ।सुप्तः पादपच्छायायां श्रान्तो मृगवधेन च

phalāni ca vicitrāṇi cakhāda saha kiṃkaraiḥ / suptaḥ pādapacchāyāyāṃ śrānto mṛgavadhena ca

हिन्दी अर्थ

तास्त्ययं इ्लोकः क. घ॒ ड पुस्तकेषु । ४९६ . वायुपुराणम्

English

The text omitted the names Abhirudgata, Matsarikrta and Asvakranta.

अध्याय ८५

श्लोक 38

तावत्तीर्थवरं विप्रः स्नानार्थं सङ्गमं गतः ।मार्गगो ब्राह्मणो हर्षोद्युक्तस्तद्गतमानसः

tāvattīrthavaraṃ vipraḥ snānārthaṃ saṅgamaṃ gataḥ / mārgago brāhmaṇo harṣodyuktastadgatamānasaḥ

हिन्दी अर्थ

हर्तारः पररत्नानां पेरदारप्रधबंका: । कामात्मानो दुरात्मानों हाधर्मात्साहसप्रियाः ७. प्रनष्टचेतना पुंसो मुक्तकेशास्तु चुलिका: । ऊनषोडशवर्षाश्च ( + प्रजायन्ते युगक्षये ४८ शुक्लदन्ता जिताक्षाश्च् मुण्डा:ः काषायवासस: । शूद्रा धर्म चरिष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ५६

English

Strangely enough neither our text nor Bd. P. gives the Murcchanas of the Ga-scale.

अध्याय ८५

श्लोक 39

अबला तमुवाचेदं तिष्ठ तिष्ठ द्विजोत्तम ।त्रस्तो निरीक्षते यावद्दिशः सर्वा नरेश्वर

abalā tamuvācedaṃ tiṣṭha tiṣṭha dvijottama / trasto nirīkṣate yāvaddiśaḥ sarvā nareśvara

हिन्दी अर्थ

जानकमंण्युपरते लोके निष्करियतां गते । कीटमूषिकसर्पाश्च ) धर्षयिष्यन्ति मानवान् १६१ सुभिक्ष क्षेममारोग्यं सामथ्यं दु्लंभ भवेत् । फौशिका: प्रतिवत्स्यन्ति देशान्क्षुद्भययपीडितानू उत्सीदन्ति तथा यज्ञा: केवला धर्मपीडिता: । काषायिणश्च निग्नेन्धास्तथा कापालिनश्च हु

English

The Murcchana Karopanita-vitala was sung by Maruts in Svara-Mandala. That is Kalofianitd. Hence its presiding deity is Maruta. 7

अध्याय ८५

श्लोक 40

तावद्वृक्षसमारूढां स्त्रियं रक्ताम्बरावृताम् ।रक्तमाल्यां तदा बालां रक्तचन्दनचर्चिताम् ।रक्ताभरणशोभाढ्यां पाशहस्तां ददर्श ह

tāvadvṛkṣasamārūḍhāṃ striyaṃ raktāmbarāvṛtām / raktamālyāṃ tadā bālāṃ raktacandanacarcitām / raktābharaṇaśobhāḍhyāṃ pāśahastāṃ dadarśa ha

हिन्दी अर्थ

उत्पच्चन्त तथा ते व संप्राप्ते तु कलो युगे । नाधोयन्‍्ते तदा वेदाः शूद्रा धर्मार्थंकोविदाः

English

The Murcchana Suddha-madhyama originated in the Manu (ru?) desa.

अध्याय ८५

श्लोक 41

स्त्र्युवाच: संदेशं श्रूयतां विप्र यदि गच्छसि सङ्गमे ।मद्भर्ता तिष्ठते तत्र शीघ्रमेव विसर्जय

stryuvāca: saṃdeśaṃ śrūyatāṃ vipra yadi gacchasi saṅgame / madbhartā tiṣṭhate tatra śīghrameva visarjaya

हिन्दी अर्थ

का सर्वथा अन्त हो जायगा। वे दुष्ट नृपतिगण दूसरे लोगों के रत्नों के छीननेबाले तथा दूसरों की स्त्रियों के साथ बलात्कार करने वाले होंगे। अधम में साहस दिखानेवाले वे दुरात्मा नृपति अति कामुक तथा विद्या- बुद्धि से सवंथा शून्य होगे। उस युगान्त के समय के पुरुष अपने केशों को बिखराये हुए चूल धारण करनेवाले होंगे, सोलह बर्ष से भी अल्प अवस्था में वे सन्तानोत्पत्ति करेंगे ।५५-४८। युगान्त के आने पर श्वेत दातों- वाले, अपने को जितेन्द्रिय प्रकट करनेवाले शुद्र लोग, मुण्डित शिर हो काषाय वस्त्र धारण कर धर्मकाये करेंगे। उस समय अन्न की चोरी करनेवाले तथा वस्त्र की चोरी करने वाले चोर होंगे, चोरों के घर में भी चोरी करने वाले तथा डाकुओं को भी लूटनेबाले लोग उत्पर्त होंगे । इस प्रकार बुद्धि एवं सत्कर्म के स्वंथा निबृत्त हो जाने पर सभी लोग अकमंण्य हों जायंगे, उस समय कीट पलंग, मूस और सर्पादि जीव भी मनुष्यों

English

Since it moves along with the deer for the guidance of

अध्याय ८५

श्लोक 42

एकाकिनी च ते भार्या तिष्ठते वनमध्यगा ।इत्याकर्ण्य गतो विप्रः सङ्गमं सुरदुर्लभे

ekākinī ca te bhāryā tiṣṭhate vanamadhyagā / ityākarṇya gato vipraḥ saṅgamaṃ suradurlabhe

हिन्दी अर्थ

को पीड़ित करेंगे ।५६-६१५१। सुभिक्ष, कल्याण, आरोग्य एबं सामथ्यें, ये सभी चीजें लोगों को दुलेभ हो जायेगी, ऐसे समय में जब कि सारा देश क्षुधा के कारण सन्तप्त एवं भयभीत रहेगा, उल्लू के समृह वहाँ निवास करंगे। इन दुःखों से पीड़ित कलियुग के मनुष्यों की अधिक से अधिक आयु सौ वर्ष को होगी, सभी वेद शास्त्र कहीं परु तो दिखाई पड़ेंगे, कहीं पर नहीं। धर्म कार्य के स्बंधा बिलोप हो जाने के कारण बन्ञों

English

As the Murcchana is associated with hermitages and also with the various (human) voices of citizens, it is called Rajani due to its association with rajas (dust/atmosphere).

अध्याय ८५

श्लोक 43

वृक्षच्छायान्वितः कण्वो ब्राह्मणेनावलोकितः ।उवाच तं प्रति तदा वचनं ब्राह्मणोत्तमः

vṛkṣacchāyānvitaḥ kaṇvo brāhmaṇenāvalokitaḥ / uvāca taṃ prati tadā vacanaṃ brāhmaṇottamaḥ

हिन्दी अर्थ

की परम्परा नष्ट हो जायगी । उस समय गेरुआ वस्त्र धारणकर, बिना पढ़े-लिखे, कापालिक, धर्म की व्यवस्था देंगे, कोई वेदों का विक्रय करेगा तो कोई तीथ्थों का ।६२९-६५। इसी प्रकार अन्यान्य वर्णाश्रम धर्म के विरोधी पाषाण्डी उस कलियुग के आने पर उत्पन्न होंगे, उस समय ब्राह्मण लोग वेदशास्त्रों का अध्ययन छोड़ देंगे। “ धनश्चित्वान्तगंतग्रन्थो घ पुस्तके नास्ति ।

English

The Tala (beating time) is known as having Satjlja as its deity. Hence Uttara-t&la is known first as well extended.

अध्याय ८५

श्लोक 44

ब्राह्मण उवाच: वनान्तरे मया दृष्टा बाला कमललोचना ।रक्ताम्बरधरा तन्वी रक्तचन्दनचर्चिता

brāhmaṇa uvāca: vanāntare mayā dṛṣṭā bālā kamalalocanā / raktāmbaradharā tanvī raktacandanacarcitā

हिन्दी अर्थ

घजन्ते ताश्वमेधेन राजानः शुद्रयोनयः । स्त्रीवर्ध योवर्ध कृत्वा हत्वा चैव परस्परम् ॥।

English

Since it is after Apana (?), Uttarayana having Dha (Dhaivata) as the starting point, is the Murcchana the deities of which are Pitrs (manes), the deities (worshipped in) Sraddhas.

अध्याय ८५

श्लोक 45

रक्तमाल्या सुशोभाढ्या पाशहस्ता मृगेक्षणा ।वृक्षारूढावदद्वाक्यं मद्भर्ता प्रेष्यतामिति

raktamālyā suśobhāḍhyā pāśahastā mṛgekṣaṇā / vṛkṣārūḍhāvadadvākyaṃ madbhartā preṣyatāmiti

हिन्दी अर्थ

दृश्यन्ते नाभिदृश्यन्ते बेदाः कलियुगेडखिला: । उत्सीदन्ते तदा यज्ञाः केवला धर्मपीडिताः ७० तदा त्वल्पेन कालेन सिद्धि यास्यन्ति मानवाः । धन्या धर्म चरिष्यन्ति युगान्ते द्विजसत्तमाः ७४७१ श्रुतिस्मृत्युदितं धर्म ये चरन्त्यनसूथकाः । त्रेतायां बाधिको धर्मों द्वापरे मासिकः स्मृतः ॥ शुद्र लोग धर्म के पण्डित माने जायेंगे । शूद्र कुल में उत्पन्न होनेवाले राजा जोम अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान नहीं करेंगे। उस कलियुग में प्रजावर्ग स्त्री हत्या, गोहत्या, परस्पर मारपीट एवं एक दूसरे का बंध करके किसी प्रकार जीवनयापन करता है। इन सब घोर पापों से होनेवाले दुःखों की अधिकता से लोग अल्पायु होते हैं देश का विनाश हो जाता है, अनेक प्रकार की व्याधियाँ, रुणणता, अज्ञान, ग्लानि, कृत्रिम सुख की

English

The great sages worship the Fire-god with the Suddha- Sadja (pure Sa-) note; it should be known as $uddha-Sa<jljika.

अध्याय ८५

श्लोक 46

कण्व उवाच: कस्मिन्स्थाने तु विप्रेन्द्र विद्यते मृगलोचना ।कस्य सा केन कार्येण सर्वमेतद्वदाशु मे

kaṇva uvāca: kasminsthāne tu viprendra vidyate mṛgalocanā / kasya sā kena kāryeṇa sarvametadvadāśu me

हिन्दी अर्थ

अभिलाषा और तामसिक मनोवृत्ति,इन सब की कलियुग में प्रधानता कही गई है ६६-६८ श्रजावग्ग में गर्भहत्या का घोर पाप अन्धाधुन्ध होता है, इन्हीं सब घोर पापों के कारण उस युग में आयु, बल, एवं . रूप, इन सब का विनाश हो जाता है। उस समय बनेक दुःखों से पीड़ित लोगों की अधिक आयु सौ वर्ष की होती है। उस घोर कलिकाल में सभी वेद शास्त्र कहीं तो दिखाई पड़ेंगे और कहीं नहीं। घोर

English

It starts from the Pahcama note causing delight to the good people.

अध्याय ८५

श्लोक 47

ब्राह्मण उवाच: सङ्गमाद् अर्धक्रोशे सा उद्यानान्ते हि विद्यते ।वचनाद् ब्रह्मणस्यैषा न ज्ञाता पार्थिवेन तु

brāhmaṇa uvāca: saṅgamād ardhakrośe sā udyānānte hi vidyate / vacanād brahmaṇasyaiṣā na jñātā pārthivena tu

हिन्दी अर्थ

अधर्म के कारण यज्ञादि सत्कर्मों का विलोप हो जाता है। किन्तु उस युग में थोड़े समय में ही सिद्धि प्राप्त करते हैं, उस युगान्त में धर्मांचण करनेवाने उत्तम द्विजगण धश्य हैं, जो श्रुतियों एवं स्मृत्तियों से अनुमोदित कर्म का बिना किसी प्रकार की निन्‍दा किये अनुष्ठान करते हैं। भेता युग में एक वर्ष में प्राप्त होनेवाला जो धर्मफल है वह द्वापर युग में एक मास में प्राप्त किया जाता है, किन्तु उसी धर्मफल को अपनी शक्ति के अनुरूप कलियूग में अनुष्ठान करने पर मनुष्य केवल एक दिन में प्राप्त करता है। यह कलियुग की अवस्था है। अब सम्ध्यांश का वर्णन मुझसे सुनिये ।६९-७२। प्रत्येक युगों में सिद्धियाँ पृव युग की अपेक्षा पिछले यूग में अपने तीन चरणों से हीन हो जाती हैं, अर्थात् केवल एक चरण मात्र विद्यमान रहती हैं इसी प्रकार युम के स्वभाव से उसकी सिद्धियाँ सन्ध्या में एकपाद रहती हैं और सन्ध्यांश में सन्ध्या के स्वभाव

English

(Defective) That Murcchana which serpents of poiso¬ nous eyes do not approach and the serpent-deities become as it

अध्याय ८५

श्लोक 48

तदा स कण्वभूपालः स्वकं दूतं समादिशत् ।कण्व उवाच: गच्छ त्वं पृच्छतां तां क्वागता क्वच गमिष्यसि ।प्रेषितस्त्वरितो दूतो गतो नारीसमीपतः

tadā sa kaṇvabhūpālaḥ svakaṃ dūtaṃ samādiśat / kaṇva uvāca: gaccha tvaṃ pṛcchatāṃ tāṃ kvāgatā kvaca gamiṣyasi / preṣitastvarito dūto gato nārīsamīpataḥ

हिन्दी अर्थ

एवं संध्यांशके काले संप्राप्ते तु युगान्तिके तेषां शास्ता हासाधूनां भुगूणां निधनोत्यितः

English

The Murcchana with which Kinnaras (sing) in imitation of birds, is the excellent ( Ultama) MQrcchand. Its deity is the Lord of Birds (Garutfa).

अध्याय ८५

श्लोक 49

वृक्षस्थां ददृशो बालामुवाच नृपसत्तम ।मन्नाथः पृच्छति त्वां तु कासि त्वं क्व गमिष्यसि

vṛkṣasthāṃ dadṛśo bālāmuvāca nṛpasattama / mannāthaḥ pṛcchati tvāṃ tu kāsi tvaṃ kva gamiṣyasi

हिन्दी अर्थ

समाः स॒ विशति पूर्णाः पयंटन्वे वसुंधराम् । आचकर्ष स वे सेनां सवाजिरथकुरजराम् ७७ नात्यर्थ धामिका ये च तान्सर्बान्हन्ति स्वंश: । वर्णव्यत्यासजातांश्र ये च तानृपजीबिनः (८० उदीच्यान्मध्यदेशांश्व पावंतीयांस्तथव च । प्राच्यास्प्रतीच्यांश्व तथा विन्ध्यप्रष्ठापरान्तिकान॒

English

By the sound of Gandhara Raga, the earth (or cow?) is held in support. Hence it is called Visuddha-Gandharl (of pure Go). And Gandharva is its presiding deity.

अध्याय ८५

श्लोक 50

कन्योवाच: गुरुरात्मवतां शास्ता राजा शास्ता दुरात्मनाम् ।इह प्रच्छन् न पापानां शास्ता वैवस्वतो यमः

kanyovāca: gururātmavatāṃ śāstā rājā śāstā durātmanām / iha pracchan na pāpānāṃ śāstā vaivasvato yamaḥ

हिन्दी अर्थ

तुषारान्वबेरांश्वीनाञजशुलिकान्दरदान्खसान । लम्पाकानथ केतांश्च किरातानां च जातयः.

English

The Murcchana Uttara-Gandharl is so called as it was created after Gandhara. Its (presiding) deities are Vasus.

अध्याय ८५

श्लोक 51

ब्रह्महत्या च संजाता मृगरूपधरद्विजात् ।मया युक्तो ऽपि ते राजा मुक्तस्तीर्थप्रभावतः

brahmahatyā ca saṃjātā mṛgarūpadharadvijāt / mayā yukto 'pi te rājā muktastīrthaprabhāvataḥ

हिन्दी अर्थ

माधवस्य तु सोंडशेन देवस्य हि विजज्िवान् । पूर्वजन्मविधिज्ञेश्र प्रसितिर्नाम वीयबानू... गोत्रेण वे चल्रमसः पूर्वे कलियगे प्रभुः । द्वात्रिशेड््युदिते वर्षे प्रकानते विशात समाः

English

The Satfja Murcchana first approached god Brahma (Pitamaha). Hence its greatness. Its deity is the Fire-god.

अध्याय ८५

श्लोक 52

अर्धक्रोशान्तरान् मध्ये ब्रह्महत्या न संविशेत् ।सोमनाथप्रभावो ऽयं वाराणस्याः समः स्मृतः

ardhakrośāntarān madhye brahmahatyā na saṃviśet / somanāthaprabhāvo 'yaṃ vārāṇasyāḥ samaḥ smṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

से एक पाद शेष रहती हैं। इस नियम के अनुसार स्वायम्भव मम्वन्तर के आदि कलियुग के सन्ध्यांश के समुपस्थित होने पर उन असत्पुरुषों को दण्ड देने वाला भूगु वंशियों की मृत्यु के उपरान्त उसी वंश में उत्पन्न हुआ, चन्द्रमा के गोत्र का प्रमति नामक राजा भगवान् विष्णु के अंश से उत्पन्न होता है, वह स्मस्त पृथ्वी मण्डल पर संकड़ों सहस्न शस्त्रास्त्रधारी ब्राह्मणों को साथ लेकर एक विशाल वाहिनी की

English

The Murcchana called Mandasastha is divine and extensive. The names of its equalities cannot be described. Its deity is Paflcama (the note Pa).

अध्याय ८५

श्लोक 53

गच्छ त्वं प्रेष्यतां राजा शीघ्रम् अत्र न संशयः ।गतो भृत्यस्ततः शीघ्रं वेपमानः सुविह्वलः

gaccha tvaṃ preṣyatāṃ rājā śīghram atra na saṃśayaḥ / gato bhṛtyastataḥ śīghraṃ vepamānaḥ suvihvalaḥ

हिन्दी अर्थ

सहायता से पूरे बीस वर्ष तक भ्रमणकर सहम्रों म्लेच्छों का संहार करता है ।७३-७८५। सभी स्थलों पर जाने वाले उस अमित तेतस्वी ने उन शूद्र कुल में उत्पन्न होने वाले राजाओं को मारकर सभो प्रकार के फैले हुए पाषण्डों का निराकरण कर जो लोग धर्म में अधिक विध्वास करने वाले नहीं थे उन सब को एक दम से विनष्ट करता है । इसके अतिरिक्त वर्णसंकर एवं उनके सहायकों का भी समूल विनाश कर देता है ।७६-८०। उदीच्य, मध्यदेशीय, पावंतीय, प्राच्य, प्रतीच्य तथा विन्ध्यगिरि के पृष्ठ पर बसने वाले,

English

All the seven Notes ( Svaras) and the Murcchanas are recounted completely. Murcchanas with Sadharana Svaras 1 Ce.g. Antara Gandhara, Kakall Nisada) are many. Only six of them are known.

अध्याय ८५

श्लोक 54

समस्तं कथयामास यद्वृत्तं हि पुरातनम् ।तस्य वाक्यादसौ राजा पतितो धरणीतले

samastaṃ kathayāmāsa yadvṛttaṃ hi purātanam / tasya vākyādasau rājā patito dharaṇītale

हिन्दी अर्थ

चीन, शूलिक, दरद, खस, लम्बक, केत और किरात प्रभृति स्लेच्छ जातियों को, वह सभी भूतों से न पर।जित होने वाला, म्लेच्छों का धोर शत्र प्रमिति अपनी अपनी सेना को साथ ले विनष्ट करता है

English

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अध्याय ८५

श्लोक 55

भृत्य उवाच: कस्मात् त्वं शोचसे नाथ पूर्वोपात्तं शुभाशुभम् ।इत्याकर्ण्य वचस्तस्य राजा वचनम् अब्रवीत्

bhṛtya uvāca: kasmāt tvaṃ śocase nātha pūrvopāttaṃ śubhāśubham / ityākarṇya vacastasya rājā vacanam abravīt

हिन्दी अर्थ

चन्द्रमा के गोत्र में उत्पन्न, विष्ण का अंशीभूत, पूव॑जन्म की विधियों को जानने वाला, प्रमिति नामक परम पराक्रमी वह अमित तेजस्वी प्रभ अपनी बत्तीस वर्ष की अवस्था में बीस बषं तक अनवरत पथ्वी प्रदक्षिणा परस्परनिमित्तेन कोपेनाइकस्मिकेन तु ८७ स साधयित्वा वृबलास्थायशस्तानधामिकान् । गड्भायमुनयोमंध्ये निष्ठां प्राप्तः सहानुगः ..

English

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अध्याय ८५

श्लोक 56

प्राणत्यागं करिष्यामि सोमनाथसमीपतः ।शीघ्रमानीयतां वह्निरिन्धनानि बहूनि च

prāṇatyāgaṃ kariṣyāmi somanāthasamīpataḥ / śīghramānīyatāṃ vahnirindhanāni bahūni ca

हिन्दी अर्थ

ततो व्यतोते तस्मिस्तु अमात्ये सत्यसेनिके । उत्साद्य पारथ्थिवान्सवन्स्लिच्छांश्चेब सहल्नशः ८६ तत्र संध्यांशके काले संप्राप्ते तु युगान्तिके । स्थितास्वल्पावशिष्टासु प्रजास्विह क्वचित्ववचित् ॥

English

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अध्याय ८५

श्लोक 57

आनीतं तत्क्षणात्सर्वं भृत्यैस् तद्वशवर्तिभिः ।स्नानं कृत्वा शुभे तोये सङ्गमे पापनाशने

ānītaṃ tatkṣaṇātsarvaṃ bhṛtyais tadvaśavartibhiḥ / snānaṃ kṛtvā śubhe toye saṅgame pāpanāśane

हिन्दी अर्थ

अप्रग्रहास्ततस्ता वे लोकचेष्टास्तु वुन्दशः । उर्पाहिसन्ति चान्योनय॑ प्रपद्यचन्ते परस्परम् ६ ९ अराजके युगववशात्संशये समुपस्थिते । प्रजास्ताः व॑ ततः सर्वा: परस्परभयादिता: ९२ व्याकुलाश्र परिभ्रान्तास्त्यवत्वा दारान्गुह्रणि च्। स्वान्प्राणान्समवेक्षन्तों निष्कारुण्या: सुदु:ःखिता:॥॥€३ नष्टे श्रौते स्मृते धर्में परस्परहृतास्तदा । निर्मर्यादा निराक़न्दा निस्‍्नेहा निरपत्रपाः ' ६४ नष्टे वर्ष प्रतिहता हस्वकाः पन्चाविशका: । हित्वा दारांभ्र पुत्रांश्व विषादव्याकुलेन्द्रिया: ९५ अनावृष्टिहताश्चव वार्तामुत्सुज्य दुःखिता: । प्रत्यन्तांस्तान्निषेवन्ते हित्वा जनरदानस्वकानू

English

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अध्याय ८५

श्लोक 58

अर्चितः परया भक्त्या सोमनाथो महीभृता ।त्रिःप्रदक्षिणतः कृत्वा ज्वलन्तं जातवेदसम्

arcitaḥ parayā bhaktyā somanātho mahībhṛtā / triḥpradakṣiṇataḥ kṛtvā jvalantaṃ jātavedasam

हिन्दी अर्थ

सरितः सागरान्पान्तेवन्ते पर्वतांस्तदा । मधुमासेमू लफलबंतेंयन्ति सुदुःखिताः .

English

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अध्याय ८५

श्लोक 59

प्रविष्टः कण्वराजासौ हृदि ध्यात्वा जनार्दनम् ।पीताम्बरधरं देवं जटामुकुटधारिणम्

praviṣṭaḥ kaṇvarājāsau hṛdi dhyātvā janārdanam / pītāmbaradharaṃ devaṃ jaṭāmukuṭadhāriṇam

हिन्दी अर्थ

कर सभी जीव जन्तुओं एबं मनुष्यों का विनाश करता है और इस प्रकार अपने प्रचण्ड कम द्वारा समस्त प्रृथ्वी मण्डल को पराक्रम शून्य कर निर्मित्त वश एवं आकस्मिक क्रोध से उन अधामिक शूद्रों को दण्ड दे गज्ञा और यमुना के मध्य भाग में अपने अनुगामियों समेत शरीर त्याग करता है ।६५-८८। तदुपरास्त उस सन्ध्यांश काल में सहस्रों शूद्रवंशीय राजाओं एवं सभी म्लेच्छों को ध्वस्त कर सैनिकों एवं मंत्रियों के समेत प्रमिति के स्वगंस्थ हो जाने पर यत्र तत्र स्थान स्थान पर थोड़ी संख्या में प्रजाएँ शेष बच रहती हैं। किसी शासक के अभाव में बिना नियन्त्रण के उन सभी लोगों की चेष्टाएँ एक दूसरे के मारने लूटने खसोटने की ओर हो जाती हैं। इस प्रकार उस युगान्त में अराजकता के समय जब कि जीवन का संशय उपस्थित हो जाता है, सभी गैंग एक दूसरे के भय से विह्नल एवं परिभ्रान्त होकर घर द्वार स्त्री बच्चों को छोड़कर अपने अपने प्राणों

English

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अध्याय ८५

श्लोक 60

श्रिया युक्तं सुपर्णस्थं शङ्खचक्रगदाधरम् ।सुरारिसूदनं दध्यौ सुगतिर् मे भवत्विति

śriyā yuktaṃ suparṇasthaṃ śaṅkhacakragadādharam / surārisūdanaṃ dadhyau sugatir me bhavatviti

हिन्दी अर्थ

का ध्यान करते हये इधर उधर भटकते हुए करुणा से रहित होकर अति दुश्ख का अनुभव करते हैं ।८६-६ ३। उस समय श्रौत स्मात॑ धर्मों के विनष्ट हो जाने पर मर्यादा, दया, लज्जा एवं स्नेह रहित सारे लोग एक दूसरे से युद्ध करते हुये मृत्यु प्राप्त करते हैं। उस समय के लोग लघ॒काय के तथा पचीस वर्ष की छोटी उम्न वाले होते हैं, वे अपने पुत्र स्त्री प्रभूति परिवार के लोगों को छोड़कर विषाद ९ससे व्याकुलेन्द्रिय रहते हैं ।

English

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अध्याय ८५

श्लोक 61

पपात पुष्पवृष्टिस्तु साधु साधु नृपात्मज ।आश्चर्यमतुलं दृष्ट्वा निरीक्ष्य च परस्परम्

papāta puṣpavṛṣṭistu sādhu sādhu nṛpātmaja / āścaryamatulaṃ dṛṣṭvā nirīkṣya ca parasparam

हिन्दी अर्थ

हैं। घोर अनावृष्टि से पीड़ित होकर वे जीविका की आशा छोड़ देते हैं और अपने अपने जनपदों को छोड़कर समीपस्थ देशों में निवास करते हैं। उस समय वे प्राणी नदियों, सागरों; जलप्राय स्थलों एवं पर्वतों पर अति दुःखित जीवन बिताते हुए मधु, मांश मुल तथा फलों से जीविका निर्वाहित करते हैं ए७० बॉयुंपुराणंयू..

English

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अध्याय ८५

श्लोक 62

मृतं तैः पावके भृत्यैर्हृदि ध्यात्वा गदाधरम् ।विमानस्थास् ततः सर्वे संजाताः पाण्डुनन्दन

mṛtaṃ taiḥ pāvake bhṛtyairhṛdi dhyātvā gadādharam / vimānasthās tataḥ sarve saṃjātāḥ pāṇḍunandana

हिन्दी अर्थ

चौरवस्त्राजिनधरा निष्पत्ना निष्परिग्रहा: वर्णाश्रमपरिभ्रष्ठाः संकरं घोरमास्थिताः.... दे: एता काष्ठामनृप्राप्ता अल्पशेषाः प्रजास्तथा । जराव्याधिक्षुधाविष्टा दुःखाप्निवेंदमागमन् ३९६ विचारणं तु निर्वेदात्साम्यावस्था विचारणात् । साम्यावस्थासु संबोधः संबोधाद्मंशीलता

English

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अध्याय ८५

श्लोक 63

निष्पापास्ते दिवं याताः सोमनाथप्रभावतः ।ब्राह्मणे सङ्गमे तत्र ध्यायमाने वृषध्वजम्

niṣpāpāste divaṃ yātāḥ somanāthaprabhāvataḥ / brāhmaṇe saṅgame tatra dhyāyamāne vṛṣadhvajam

हिन्दी अर्थ

प्रवत्ते तु पुनर्स्तास्मस्ततः कृतयुगे तु वे। उत्पन्ना: कलिशिष्टास्तु कार्तंयुग्यः प्रजास्तदा तेषां सप्तर्षयो धर्म कथयन्तीतरेषु घ्। वर्णाश्रमाचारयुक्तः भोतः स्मार्तों द्विधा तु सः

English

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अध्याय ८५

श्लोक 64

श्रीमार्कण्डेय उवाच: सोमनाथप्रभावो ऽयं शृणुष्वैकमना विधिम् ।अष्टम्यां वा चतुर्दश्यां सर्वकालं रवेर्दिने

śrīmārkaṇḍeya uvāca: somanāthaprabhāvo 'yaṃ śṛṇuṣvaikamanā vidhim / aṣṭamyāṃ vā caturdaśyāṃ sarvakālaṃ raverdine

हिन्दी अर्थ

ततस्तेषु क्रियावत्सु वर्तन्‍्ते वे प्रजा: छृते । भौतः स्मार्तः छृतानां तु धर्म: सप्तषिदर्शितः 0१०७ तासु धर्मष्यवस्थार्थ तिष्ठन्तीहाध्युगक्षयात् । मन्वन्तराधिकारेघु तिष्ठन्ति मुनयस्तु दे १०८

English

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अध्याय ८५

श्लोक 65

विशेषाच्छुक्लपक्षे चेत्सूर्यवारेण सप्तमी ।उपोष्य यो नरो भक्त्या रात्रौ कुर्वीत जागरम्

viśeṣācchuklapakṣe cetsūryavāreṇa saptamī / upoṣya yo naro bhaktyā rātrau kurvīta jāgaram

हिन्दी अर्थ

चीर चर्म को धारण कर स्त्री पत्रादि से विरहित, निमर्याद वर्णाअम धर्म से च्युत घोर संकरवर्ण में उत्पन्न होने वाले वे प्राणीं जो कि बहुत थोड़ी संख्या में शेष रह जाते हैं, इस कष्ट की अन्तिम सीमा को पंहुँचकर जरा व्यांधि एवं क्षुधा की पीड़ा से अतिशंय सन्तप्त होकर दुःख के कारण जीवन से विरक्त हो जाते हैं। इस प्रकार जीवन से विरक्त होने पर उन्हें विवेक उत्पन्न होता है, विवेक से सभी जीवों पंर समानता का व्यवहार करते हैं, इस साम्यावस्था में उन्हें संबोध (वास्तविक ज्ञान) की प्राप्ति होती हैं और संबोध से उनकी प्रवृत्तियाँ धर्म की ओर उन्मुख होती हैं। ओर इस प्रकार कलियुग की उन अल्प धर्मशील प्रजाओं के शेष प्रजाओं के चित्त में संमोह उत्पन्न करके / भवितव्यता वश संतयुग की प्रवृत्ति होती है, सतयुग के प्रवृत्त हो जाने पर कलियुग की शेष अल्पसंख्यक उन प्रजाओं

English

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अध्याय ८५

श्लोक 66

पञ्चामृतेन गव्येन स्नापयेत् परमेश्वरम् ।श्रीखण्डेन ततो गुण्ठ्य पुष्पधूपादिकं ददेत्

pañcāmṛtena gavyena snāpayet parameśvaram / śrīkhaṇḍena tato guṇṭhya puṣpadhūpādikaṃ dadet

हिन्दी अर्थ

से ही सतयुग की प्रजाओं की उत्पत्ति होती हैं। उस समय ब्राह्मण क्षत्रिय बैइय शुद्र---इन चारों वर्णों की उत्पत्ति के बीज स्वरूप जो स्मरण किये गये हैं, वे लोग तथा वे सिद्धशजण जो अतिहर्ष के साथ सदा विचरण किया करते हैं, तथा वे सातों ऋषिगण --उन अवशेष कलियुगीन प्रजाओं के साथ निविशेष भाव से संम्मिलित होकर परस्पर व्यवहार करते हैं उन में वे सप्तषि गण अन्य सभी लोगों को वर्णाश्षम।चार युक्त इन

English

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अध्याय ८५

श्लोक 67

घृतेन बोधयेद् दीपं नृत्यं गीतं च कारयेत् ।सोमवारे तथाष्टम्यां प्रभाते पूजयेद् द्विजान्

ghṛtena bodhayed dīpaṃ nṛtyaṃ gītaṃ ca kārayet / somavāre tathāṣṭamyāṃ prabhāte pūjayed dvijān

हिन्दी अर्थ

दी प्रकार के श्रौत एवं स्मात॑ धर्मों का उपदेश करतें हैं ।१०२-१०७। जिससे सतयुग की वे प्रथाये उनके उंपदेशॉनुसार श्लोत-स्मातं धर्मों का पालन करती हैं। इस प्रकार सतयुग में उत्पन्न होने वाले लोगों का श्रौत स्मार्त धर्म उन्ही सप्तर्षियों द्वारा प्रदर््षित होता है। प्रत्येक मन्वन्तरों में सप्तषिगण युगक्षय पयेन्त सखमायुब॑ल रूप धर्मायों काम एवं च। युगेष्बेतानि हीयन्ते न्नीणि पादक़मेण तु

English

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अध्याय ८५

श्लोक 68

जितक्रोधानात्मवतः परनिन्दाविवर्जितान् ।सर्वाङ्गरुचिराञ्छस्तान् स्वदारपरिपालकान्

jitakrodhānātmavataḥ paranindāvivarjitān / sarvāṅgarucirāñchastān svadāraparipālakān

हिन्दी अर्थ

ससंध्यांशेषु होयन्ते युगानां धर्म सिद्धयः। इत्येष प्रतिसंधिर्व: फीतितस्तु सया ह्विजाः

English

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अध्याय ८५

श्लोक 69

गायत्रीपाठमात्रांश्च विकर्मविरतान् सदा ।पुनर्भूवृषलीशूद्री चरेयुर् यस्य मन्दिरे

gāyatrīpāṭhamātrāṃśca vikarmaviratān sadā / punarbhūvṛṣalīśūdrī careyur yasya mandire

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मणस्तदहः प्रोक्‍्तं रात्रिश्व तावती स्घृता । अन्नाउप्जंबं जडीभावो भृतानामायुगक्षयात्. एतदेव तु सर्वेषां युगानां लक्षणं स्मृतम् । एषां चतुयुंगानां (णां) तु गणना हा कसप्ततिः ॥।

English

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अध्याय ८५

श्लोक 70

दूरतो ऽसौ द्विजस्त्याज्य आत्मनः श्रेय इच्छता ।हीनाङ्गान् अतिरिक्ताङ्गान् येषां पूर्वापरं न हि

dūrato 'sau dvijastyājya ātmanaḥ śreya icchatā / hīnāṅgān atiriktāṅgān yeṣāṃ pūrvāparaṃ na hi

हिन्दी अर्थ

सर्गे सगें यथा भेदा उत्पद्चन्ते तथेव तु । पश्चविशत्परिसिता न न्यूना नाधिकास्तथा ११७

English

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अध्याय ८५

श्लोक 71

व्रते श्राद्धे तथा दाने दूरतस्तान् विवर्जयेत् ।आयसी तरुणी तुल्या द्विजाः स्वाध्यायवर्जिताः

vrate śrāddhe tathā dāne dūratastān vivarjayet / āyasī taruṇī tulyā dvijāḥ svādhyāyavarjitāḥ

हिन्दी अर्थ

घमं की व्यवस्था के लिये उन प्रजाओं में विद्यमान रहते हैं। जिस प्रकार ग्रीष्म ऋतु में भस्म हुए तृण समूहों के मूल भाग से वर्षाऋतु में पुनः नवाडकुर उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार उन अल्पशेष कलियुगी धार्मिक प्रजाओं से सतयुग की प्रजाओं की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार मत्वस्तर के अवसान पर्थन्त एक युग के समाप्त हो जाने पर दूसरे युग की प्रजाओं का उन्हीं आधद्य युगीन प्रजाओं से उत्पत्ति एवं विस्तार होता है ।( ०८-११०। सुख आयु, बल, रूप, धर्म, अर्थ, काम--ये सभी प्रत्येक यगों में अपने अपने स्वभाव के अनुरूप एक एक चरण न्यून होते जाते हैं। और युगों की भर्मसिद्धियाँ अपने संध्या एवं सन्ध्यांश में तो प्रायः विलुप्त हो जाती हैं। है ऋषिगण ! यह यूगों की प्रतिसन्धि मैं आप लोगों को बतला चका इसी के द्वारा सभी यूगों के स्वभावादि का तात्त्विक ज्ञान होता है। इन चारों युगों के एक सहख वार

English

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अध्याय ८५

श्लोक 72

आत्मानं सह याज्येन पातयन्ति न संशयः ।शाल्मलीनावतुल्याः स्युः षट्कर्मनिरता द्विजाः

ātmānaṃ saha yājyena pātayanti na saṃśayaḥ / śālmalīnāvatulyāḥ syuḥ ṣaṭkarmaniratā dvijāḥ

हिन्दी अर्थ

व्यतीत हो जाने पर ब्रह्मा का एक दिन और उतने ही बार व्यतीत होने पर एक रात्रि होती है ।१११-११३३। यग परयेसत उसमें सरलता एवं जड़ता सभी जौवों में विद्यमान पाई जाती हैं । यही' सभी युगों का लक्षण कहा गया है। इन्हों चारों यूगों की आवृत्ति जब इकदृत्तर बार समाप्त हो जाती है तब मन्वन्तर कहा जाता है। एक चतुर्यग में जिस प्रकार की घटनाएँ जिस क्रम से घटित होती हैं, उसी

English

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अध्याय ८५

श्लोक 73

दातारं च तथात्मानं तारयन्ति तरन्ति च ।श्राद्धं सोमेश्वरे पार्थ यः कुर्याद्गतमत्सरः

dātāraṃ ca tathātmānaṃ tārayanti taranti ca / śrāddhaṃ someśvare pārtha yaḥ kuryādgatamatsaraḥ

हिन्दी अर्थ

प्रकार की घटनाएँ उसी क्रम से दूसरे चतुर्युग में घटित होती हैं । परन्तु एक सृष्टि की अपेक्षा दुसरौ सृष्टि इृदम्ध नास्ति डः. पुस्तके ।

English

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अध्याय ८५

श्लोक 74

प्रेतास्तस्य हि सुप्रीता यावद् आभूतसम्प्लवम् ।अन्नं वस्त्रं हिरण्यं च यो दद्याद् अग्रजन्मने

pretāstasya hi suprītā yāvad ābhūtasamplavam / annaṃ vastraṃ hiraṇyaṃ ca yo dadyād agrajanmane

हिन्दी अर्थ

तथा कल्पयुगः सार्व भवन्ति समलक्षणा:। मन्वन्तराणां सर्वेधामेतदेव तु लकक्षणम.....

English

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अध्याय ८५

श्लोक 75

स याति शाङ्करे लोक इति मे सत्यभाषितम् ।हयं यो यच्छते तत्र सम्पूर्णं तरुणं सितम्

sa yāti śāṅkare loka iti me satyabhāṣitam / hayaṃ yo yacchate tatra sampūrṇaṃ taruṇaṃ sitam

हिन्दी अर्थ

तथा न संतिष्ठति जीवलोकः क्षयोदयाभ्यां परिवतंमानः ११६ इत्येतल्लक्षणं प्रोक्‍्त युगानां वे समासतः । अतीतानतीतानां वे सर्वमन्‍्वन्तरेष्विह । अनागतेषु तद्बच्च तकें: कार्यो विजानता। मन्वस्तरेषु सर्वेषु अतीतानागतेष्विह

English

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अध्याय ८५

श्लोक 76

रक्तं वा पीतवर्णं वा सर्वलक्षणसंयुतम् ।कुङ्कुमेन विलिप्ताङ्गावग्रजन्महयावपि

raktaṃ vā pītavarṇaṃ vā sarvalakṣaṇasaṃyutam / kuṅkumena viliptāṅgāvagrajanmahayāvapi

हिन्दी अर्थ

मन्वन्तरेण चेकेन सर्वाण्येबान्तराणि वे व्याख्यातानि विजानीध्वं कल्पे कल्पेन चेव हि.

English

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अध्याय ८५

श्लोक 77

स्रग्दामभूषितौ कार्यौ सितवस्त्रावगुण्ठितौ ।अङ्घ्रिः प्रदीयतां स्कन्धे मदीये हयमारुह

sragdāmabhūṣitau kāryau sitavastrāvaguṇṭhitau / aṅghriḥ pradīyatāṃ skandhe madīye hayamāruha

हिन्दी अर्थ

अस्याभिमानिनः सर्वे नासरूपभंवन्त्युत । देवा हाष्टविधा ये च इह मन्वन्तरेश्वरा: . इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्ते चतुर्युगाख्यान॑ नामाष्टपज्चाशोअध्यायः ।१५५॥ द

English

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अध्याय ८५

श्लोक 78

आरूढे ब्राह्मणे ब्रूयाद् भास्करः प्रीयतामिति ।स याति शांकरं लोकं सर्वपापविवर्जितः

ārūḍhe brāhmaṇe brūyād bhāskaraḥ prīyatāmiti / sa yāti śāṃkaraṃ lokaṃ sarvapāpavivarjitaḥ

हिन्दी अर्थ

में जो भेद पाये जाते हैं, वे संख्या में पच्चीस होते हैं, न इससे न्‍्यूबन अधिक और कल्प तथा युग ये भी समान लक्षण वाले होते हैं इसी प्रकार सभी मन्वन्तरों का भी यही लक्षण जानना चाहिए

English

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अध्याय ८५

श्लोक 79

उपरागे तु सोमस्य तीर्थं गत्वा जितेन्द्रियः ।सत्यलोकाच् च्युतश्चापि राजा भवति धार्मिकः

uparāge tu somasya tīrthaṃ gatvā jitendriyaḥ / satyalokāc cyutaścāpi rājā bhavati dhārmikaḥ

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार स्वभाववश सभी युगों का परिवत्तन भी चिर प्रवृत्त सनातन जानना चाहिए, विनाश एवं उत्पत्ति--इन दो विशेष अवस्थाओं में परिवर्तित जीवसमृह सबंदा एक अवस्था में अवस्थित नहीं रह सकता । बीते हुए एवं भविष्य में आने वाले सभी मन्वन्तरों में यूगों के लक्षणों का मैं संक्षेप में वर्णत कर चुका । बीते हुये भन्‍्वन्तरों की घटनाओं द्वारा बुद्धिमान् मनुष्य भविष्य में आने वाले सभी मन्वन्तरों की घटनाओं का भी वर्णन हो चुका समझना चाहिए। इसी प्रकार एक कल्प के वर्णन से अन्य कल्पों की घटनाओं का भी अतुमान कर लेना चाहिए ।११९-२२२। इनके अभिमानी जो मन्वन्तरों के स्वामी भाठ प्रकार के देव, ऋषि तथा मनु गण हैं, वे सभी नाम तथा रूप से समान प्रयोजन सिद्ध करने वाले होते हैं। इसी प्रकार प्रत्येक्त युगों में वर्णाभ्रमों का विभाग होता है। भगवान् विधाता सवंदा युगों के स्वभाव के अनुसार तत्तद्युग

English

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अध्याय ८५

श्लोक 80

तस्य वासः सदा राजन्न नश्यति कदाचन ।दीर्घायुर्जायते पुत्रो भार्या च वशवर्तिनी

tasya vāsaḥ sadā rājanna naśyati kadācana / dīrghāyurjāyate putro bhāryā ca vaśavartinī

हिन्दी अर्थ

की कार्यसिद्धि के लिए वर्णाश्रम के आचार व्यवहार से थृक्त सृष्टि का विधान सम्पादित करते हैं। य॒गों के पारस्परिक सम्बन्ध आदि का वर्णन मैं कर चुका अब सृष्टि का वृत्तान्त सुनिये। मैं विस्तार पूवेक्र क्रमशः सभी युगों की स्थिति का विवरण बतला रहा हूं ।!२३-१२६।

English

All the seven Notes ( Svaras) and the Murcchanas are recounted completely. Murcchanas with Sadharana Svaras 1 Ce.g. Antara Gandhara, Kakall Nisada) are many. Only six of them are known.

अध्याय ८५

श्लोक 81

जीवेद्वर्षशतं साग्रं सर्वदुःखविवर्जितः ।सोपवासो जितक्रोधो धेनुं दद्याद्द्विजन्मने

jīvedvarṣaśataṃ sāgraṃ sarvaduḥkhavivarjitaḥ / sopavāso jitakrodho dhenuṃ dadyāddvijanmane

हिन्दी अर्थ

श्रीबायुमहापुराण का नीलकण्ठ-स्तुति नामक अट्टावनवाँ अध्याय समाप्त ॥५5५॥। गगांधशााकामनक भा भ 93!

English

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अध्याय ८५

श्लोक 82

सवत्सां क्षीरसंयुक्तां श्वेतवस्त्रावलोकिताम् ।शबलां पीतवर्णां च धूम्रां वा नीलकर्बुराम्

savatsāṃ kṣīrasaṃyuktāṃ śvetavastrāvalokitām / śabalāṃ pītavarṇāṃ ca dhūmrāṃ vā nīlakarburām

हिन्दी अर्थ

मनुष्याणां पशूुनां च पक्षिणां स्थावरें: सह । तेषामायुः परिक्रान्तं युगधर्मेषु सबंशः

English

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अध्याय ८५

श्लोक 83

कपिलां वा सवत्सां च घण्टाभरणभूषिताम् ।रूप्यखुरां कांस्यदोहां स्वर्णशृङ्गीं नरेश्वर

kapilāṃ vā savatsāṃ ca ghaṇṭābharaṇabhūṣitām / rūpyakhurāṃ kāṃsyadohāṃ svarṇaśṛṅgīṃ nareśvara

हिन्दी अर्थ

देवासुरप्रमाणात्तु सप्तसप्ताइगुलं हसत् । अडगुलानां शत पूर्णमष्टपश्चाशदुत्तरम् ३५ ' हैवासुरप्रमाणं तबुच्छायं कलिजे: स्मृतम् । चत्वारश्रवाप्यशीतिश्र कलिजरडगुल: स्मृतम् ६ स्वेनाइूगुलप्रमाणन ऊर्ध्वमापादमस्तकम् । इत्येष मानुषोत्सेधो हसतोह युगान्तिके ७ सूतजी बोले--प्रत्येक युगों में प्रो प्रजाएँ उत्पन्न होती हैं, उनका विवरण सुनिये । असुर संपे, गो, पक्षी, पिश्ञाच, यक्ष, राक्षसादि प्रजावर्ग जिस युग में जन्म लेकर जितने दिनों तक जीवन धारण करते हैं, उसे बतला रहा हूँ । पिशाच, असुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और सर्प “इन सब प्राणधारियों का यदि कोई बध न करे तो ये पूरे युग भर जीवित रहते हैं ।२। मनुष्य, पशु, पक्षी और स्थावर॑ जीव गण अपने युग

English

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अध्याय ८५

श्लोक 84

श्वेतया वर्धते वंशो रक्ता सौभाग्यवर्धिनी ।शबला पीतवर्णा च दुःखघ्न्यौ संप्रकीर्तिते

śvetayā vardhate vaṃśo raktā saubhāgyavardhinī / śabalā pītavarṇā ca duḥkhaghnyau saṃprakīrtite

हिन्दी अर्थ

धर्म के अनुसार सभी युगो में पूर्ण आयु तक जीवित रहते हैं ।३॥ केवल कलियुग में मनुष्यों की आयु में अस्थिरता (अनिश्चितता) देखी जाती है। इस कलियुग में मनुष्य की अधिक से अधिक आयु केवल सौ वर्ष की कही गई है ।४-५। और असुरों की ऊँचाई प्रमाण से मानव की ऊँचाई सांत-सांत अंगुल न्यून होती है। कलियुग में उत्पन्न होने वाले मनुष्यों के एक सौ बद्गावन भंगुल की ऊँचाई देवताओं और असुरों की होती

English

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अध्याय ८५

श्लोक 85

कपिला नाशयेत् पापं सप्तजन्मसमुद्भवम् ।सत्यलोकमवाप्नोति गोप्रदायी नरेश्वर

kapilā nāśayet pāpaṃ saptajanmasamudbhavam / satyalokamavāpnoti gopradāyī nareśvara

हिन्दी अर्थ

है । कलियूग में उत्पन्न मनुष्य के चरण से लेकर मस्तक तक की ऊँचाई अपने चौरासी अँगुल की होती है । सर्वेषु युगकालेषु अतीतानागतेष्विह । स्वेनाइ-गुलप्रमाणेन अष्टतालः स्थृतों नरः ८

English

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अध्याय ८५

श्लोक 86

पक्षान्ते ऽथ व्यतीपाते वै धृतौ रविसंक्रमे ।दिनक्षये गजच्छायां ग्रहणे भास्करस्य च

pakṣānte 'tha vyatīpāte vai dhṛtau ravisaṃkrame / dinakṣaye gajacchāyāṃ grahaṇe bhāskarasya ca

हिन्दी अर्थ

गवाश्वह॒स्तिनां चने सहिषस्थावरात्मनाम । क्रमेणैतेन योगेन ह्वासबृद्धी युगे युगे ११० घट्सप्तत्यडःगुलोत्सेध: पशुनां ककुदस्तु वे । अडगुलाष्टश्त पूर्णमुत्सेषः करिणां स्मुतः:.. ४११ अडगुलानां सहस्न' चत्वारिशाइगुल बिना । पत्चाशतं हयानां च उत्सेधः शाखिनां स्पृतः

English

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अध्याय ८५

श्लोक 87

ये व्रजन्ति महात्मानः सङ्गमे सुरदुर्लभे ।मृदावगुण्ठयित्वा तु चात्मानं सङ्गमे विशेत्

ye vrajanti mahātmānaḥ saṅgame suradurlabhe / mṛdāvaguṇṭhayitvā tu cātmānaṃ saṅgame viśet

हिन्दी अर्थ

मानुषस्य शरीरस्य संनिवेशस्तु यादृशः । तल्लक्षणस्तु देवानां पक्षिणां वृश्यते तत््वदशंनात्ू ४१३ बुद्धयाइतिशययुक्‍त च देवानां कायमुच्यते । देवानतिशयं चेव मानुष कायमुच्यते गावो हाजा महिष्यो5श्वा हस्तिनः पक्षिणो नगा:। उपयुक्ता: क्षिपास्वेते यज्ञियास्विह सर्वश!

English

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अध्याय ८५

श्लोक 88

हृदयान्तर्जले जाप्या प्राणायामो ऽथवा नृप ।गायत्री वैष्णवी चैव सौरी शैवी यदृच्छया ।ते ऽपि पापैः प्रमुच्यन्त इत्येवं शङ्करो ऽब्रवीत्

hṛdayāntarjale jāpyā prāṇāyāmo 'thavā nṛpa / gāyatrī vaiṣṇavī caiva saurī śaivī yadṛcchayā / te 'pi pāpaiḥ pramucyanta ityevaṃ śaṅkaro 'bravīt

हिन्दी अर्थ

देवस्थानेषु जायन्ते तद्॒पा एवं ते पुनः । यथाशयोपभोगास्तु देवानां शुभमूरतयः १७

English

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अध्याय ८५

श्लोक 89

जगतीं सोमनाथस्य यस्तु कुर्यात् प्रदक्षिणाम् ।प्रदक्षिणीकृता तेन सप्तद्वीपा वसुंधरा

jagatīṃ somanāthasya yastu kuryāt pradakṣiṇām / pradakṣiṇīkṛtā tena saptadvīpā vasuṃdharā

हिन्दी अर्थ

मनुष्यों की ऊँचाई का यह मान युगान्‍्त में और भी न्यून हो जाता है व्यतीत एवं भविष्यत्कालीन सभी यगों में मानव अपने अंगुलों से आठ ताल! ऊँचाई का बतलाया जाता है ।६-५। जो व्यक्ति चरण से लेकर मस्तक तक अपने अंगुल मान से नव ताल ऊँचा हो, और जिसके बाहु घुटने पयंन्त लम्बे एवं सघन हों, वह क्रमशः निम्नलिखित परिमाणगत ह्ासवृद्धि होती है। गौओं की ऊंचाई पाद से लेकर ककुद् (डिल) पयेन्‍्त छिहत्तर अंगुल की होती है हाथियों की ऊँचाई पूरी एक सौ अ'्ठ अंगुल की कही गई है ।६-११। अश्वों को ऊँचाई पचास अंगुल की तथा वृक्षों की ऊँचाई नव सौ साठ अँगुल की स्मरण कौ जाती है। मनुष्यों के शरीद का गठन एवं अवयव संस्थात जिस प्रकार का होता है उसी प्रकार का गठन देवताओं के शरीर का भी

English

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अध्याय ८५

श्लोक 90

ब्रह्महत्या सुरापानं गुरुदारनिषेवणम् ।भ्रूणहा स्वर्णहर्ता च मुच्यन्ते नात्र संशयः

brahmahatyā surāpānaṃ gurudāraniṣevaṇam / bhrūṇahā svarṇahartā ca mucyante nātra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

समाधि द्वारा देखा जाता है इसके अतिरिक्त देवताओं का शरीर अतिशय बुद्धि एवं चेतना से संयुक्त बतलाया जाता है. मनुष्यों का शरीर देवताओं की अपेक्षा अल्प-चेतना युक्त एवं लघुशक्ति सम्पन्न कहा गया है।

English

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अध्याय ८५

श्लोक 91

तीर्थाख्यानमिदं पुण्यं यः शृणोति जितेन्द्रियः ।व्याधितो मुच्यते रोगी चारोगी सुखमाप्नुयात्

tīrthākhyānamidaṃ puṇyaṃ yaḥ śṛṇoti jitendriyaḥ / vyādhito mucyate rogī cārogī sukhamāpnuyāt

हिन्दी अर्थ

जीवों के बारे में सुनिये ।१२-१५॥ इस संसार में उत्पन्न होने वाले गो, बकरे-भेंसे, अश्व, हस्ती. पक्षी एवं बक्षादि जीवगण यज्ञादि क्रियाओं के साधनभूत हैं और इनका सामान्य नाम यज्ञिय (यज्ञादि कार्यों के उपकरण) है । देवताओं को अतिप्रिय लगने वाले अतिकमनीय स्वरूप सम्पन्न ये जीव तद्रप होकर उनके (देवताओं) निवास स्थानों में पुनः उत्पन्न होते हैं और इनका पुनः देवताओं द्वारा उपभोग होता है।

English

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अध्याय ८५

श्लोक 92

यत्ते संदह्यते चेतः शृणु तन्मे युधिष्ठिर ।नैकापि नृप लोके ऽस्मिन् भ्रूणहत्या सुदुस्त्यजा

yatte saṃdahyate cetaḥ śṛṇu tanme yudhiṣṭhira / naikāpi nṛpa loke 'smin bhrūṇahatyā sudustyajā

हिन्दी अर्थ

१. देशी भाषा में उसे बित्ता कहते हैं ।

English

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अध्याय ८५

श्लोक 93

किमु षड्विंशतिं पार्थ प्राप याः क्षणदाकरः ।सो ऽपि तीर्थमिदं प्राप्य तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम्

kimu ṣaḍviṃśatiṃ pārtha prāpa yāḥ kṣaṇadākaraḥ / so 'pi tīrthamidaṃ prāpya tapastaptvā suduścaram

हिन्दी अर्थ

एकोनषश्टितमी5घ्याय: ४७ अतः शिष्टान्प्रवक्यामि सतः साधुंस्तथेव च् । सदिति ब्रह्मण: शब्दस्तद्वन्तो ये भवनत्युत ॥

English

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अध्याय ८५

श्लोक 94

विमुक्तः सर्वपापेभ्यः शीतरश्मिरभूत्सुखी ।श्रूयते नृप पौराणी गाथा गीता महर्षिभिः

vimuktaḥ sarvapāpebhyaḥ śītaraśmirabhūtsukhī / śrūyate nṛpa paurāṇī gāthā gītā maharṣibhiḥ

हिन्दी अर्थ

सायुज्यं ब्रह्मणोष्त्यन्तं तेन सन्‍्तः प्रचक्षते १६ दशात्मके ये विषये कारण चाष्टलक्षणे न क्ुध्यन्ति न हृष्पन्ति जितात्मानस्तु ते स्मृताः.

English

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अध्याय ८५

श्लोक 95

लिङ्गं प्रतिष्ठितं ह्येकं दशभ्रूणहनं भवेत् ।अतो लिङ्गत्रयं सोमः स्थापयामास भारत

liṅgaṃ pratiṣṭhitaṃ hyekaṃ daśabhrūṇahanaṃ bhavet / ato liṅgatrayaṃ somaḥ sthāpayāmāsa bhārata

हिन्दी अर्थ

सामान्येषु च धर्मेषु तथा वेशेषिकेषु च । ब्रह्मक्षत्रविशों युक्ता यस्मात्तस्मादिजातयः वर्णाश्रमेषु युक्तस्य स्वर्गगोमुखचारिण: । श्रौतस्मातेस्य धर्मस्थ ज्ञानाद्धमं: स उच्यते

English

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अध्याय ८५

श्लोक 96

रेवौरिसंगमे ह्याद्यं द्वितीयं भृगुकच्छके ।ततः सिद्धिं परां प्राप्य प्रभासे तु तृतीयकम्

revaurisaṃgame hyādyaṃ dvitīyaṃ bhṛgukacchake / tataḥ siddhiṃ parāṃ prāpya prabhāse tu tṛtīyakam

हिन्दी अर्थ

एवसाश्रमधर्माणां साधनात्साधवः स्मृताः । गहस्थो ब्रह्मचारी व वानप्रस्थो5थ भिक्षुकः

English

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अध्याय ८५

श्लोक 97

इति ते कथितं सर्वं तीर्थमाहात्म्यमुत्तमम् ।धर्म्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं संशुद्धिकृन्नृणाम्

iti te kathitaṃ sarvaṃ tīrthamāhātmyamuttamam / dharmyaṃ yaśasyamāyuṣyaṃ svargyaṃ saṃśuddhikṛnnṛṇām

हिन्दी अर्थ

न च देवा न पितरो मुनयों न च मानवाः । अयं धर्मो ह्ययं नेति ब्रुवते भिन्नदर्शनाः २६ स्थावर एवं जंगम जीवो के उपर्युक्त प्रमाणों के अनुरूप तथा उन्हीं के स्वरूप के अनुसार मनोहारि स्वरूप धारण कर ये जीवगण सुख का तात्त्विक अनुभव करते हैं ।१६-१८। अब इसके उपरान्त मैं सम्तों, साधुओं एवं शिष्ट पुरुषों के बारे में बतला रहा हू । 'सत्” यह ब्रह्मवाची शब्द है, जो लोग ब्रह्मवान (ब्रह्मतिष्ठ) होते हैं तथा ब्रह्म का अत्यन्त सायज्य प्राप्त करते हैं, वे सन्‍त कहलाते हैं। जो लोग दस प्रकार के विषयों एवं

English

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अध्याय ८५

श्लोक 98

पुत्रार्थी लभते पुत्रान्निष्कामः स्वर्गमाप्नुयात् ।मुच्यते सर्वपापेभ्यस् तीर्थं कृत्वा परं नृप

putrārthī labhate putrānniṣkāmaḥ svargamāpnuyāt / mucyate sarvapāpebhyas tīrthaṃ kṛtvā paraṃ nṛpa

हिन्दी अर्थ

आठ प्रकार के कारणों में फंसकर कभी क्द्ध और ह््षित नहीं होते वे जितात्मा कहे जाते हैं। यतः सामान्य और विशेष इन दोनों प्रकार के धर्मों से अनुमोदित आचरण करते हैं, अतः ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य लोग द्विजाति कहलाते हैं। वर्णाश्रमाचार योग यूक्त स्वगं, तीर्थ एवं मंत्रात्मक भ्रुत्ति स्मृति से अनुमीदित घममे का ज्ञान वास्तविक धर्म का ज्ञान वास्तविक धर्म कहलाता है !१६-२२। गुरु का हित करने वाला

English

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अध्याय ८५

श्लोक 99

एतत्ते सर्वमाख्यातं सोमनाथस्य यत्फलम् ।श्रुत्वा पुत्रमवाप्नोति स्नात्वा चाष्टौ न संशयः

etatte sarvamākhyātaṃ somanāthasya yatphalam / śrutvā putramavāpnoti snātvā cāṣṭau na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मचर्य त्रत परायण विद्यार्थी विद्या की साधना में तन्‍्मंय रहने के कारण साधु कहा जाता है सत्कियाओं के साधन में लीन रहने से गृहस्थाश्रम में रहने वाला व्यक्ति साधु कहाता है। घोर जज्भल में तपस्या की साधना में निरत रहने वाला वेखानस साधु कहा जाता है । योंगाम्यास में परायण यत्ति योग की साधना में लीन रहने के कारण साधु कहा जाता है। इसी प्रकार आश्रम धर्म के पालन करने वाले अपने अपने धर्मों के पथ पर अडिग रहने के कारण साधु कहे जाते हैं, वे चाहे ग॒हस्थ हों, चाहे ब्रह्मचयं ब्रत में विद्याभ्यास करने वाले विद्यार्थी हों चाहे वानप्रस्थाशत्रम में दीक्षित होकर भिक्षाटन पर निर्भर हों । तो न देवता, न पितर, ने मुनिगण ओर न मनुष्य--इनमें से कोई भी-भिस्न-मतों के कारण “यह धर्म है, यह अधम है” ऐसा कहने में समर्थ नहीं हो सकते ।२३-२६। इस जगत् में धर्म तथा अधर्म ये दो शब्द जो कहे गये हैं, वे क्रियात्मक

English

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 85
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
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