Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
87
अध्याय 87 / 232

Adhyaya 87

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पूर्ण अध्याय पाठ5 श्लोक

अध्याय ८७

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे पिङ्गलेश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम षडशीतितमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय ८७ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेन्महीपाल तीर्थं परमशोभनम् ।स्थापितं मुनिसङ्घैर् यद्ब्रह्मवंशसमुद्भवैः

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe piṅgaleśvaratīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma ṣaḍaśītitamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 87 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchenmahīpāla tīrthaṃ paramaśobhanam / sthāpitaṃ munisaṅghair yadbrahmavaṃśasamudbhavaiḥ

हिन्दी अर्थ

स्वामिना5रक्ष्यमाणानामुत्सृष्टानां च सत्सु च। परस्वानामनादानमलोभ इह कीत्यंते दशात्मके यो विषये कारण चाष्टलक्षणे । न क्ुध्येत्तु प्रतिहतः स जितात्मा विभाष्यते ४८

English

On being thus addressed, the infuriated Vaisarhpayana spoke to Yajnavalkya: "Return so me whatever you have learnt from me 55.

अध्याय ८७

श्लोक 2

ऋणमोचनमित्याख्यं रेवातटसमाश्रितम् ।षण्मासं मनुजो भक्त्या तर्पयन् पितृदेवताः

ṛṇamocanamityākhyaṃ revātaṭasamāśritam / ṣaṇmāsaṃ manujo bhaktyā tarpayan pitṛdevatāḥ

हिन्दी अर्थ

कारण्यात्सवंभूते भ्यः सुविभागस्तु बन्धुषु

English

On being commanded thus, that sage Yajnavalkya, the most excellent among the knowers of Brahman, vomited the embodied forms of Yajur-Mantras smeared with blood and gave them back to his preceptor.

अध्याय ८७

श्लोक 3

देवैः पितृमनुष्यैश्च ऋणमात्मकृतं च यत् ।मुच्यते तत्क्षणान् मर्त्यः स्नातो वै नर्मदाजले

devaiḥ pitṛmanuṣyaiśca ṛṇamātmakṛtaṃ ca yat / mucyate tatkṣaṇān martyaḥ snāto vai narmadājale

हिन्दी अर्थ

श्रुतिस्मृतिभ्यां विहितो धर्मों वर्णाश्रभात्मकः । शिष्टाचाराविरुद्धश्व धमः सत्साधुसद्भतः ५१ संस्थासः कर्मणो न्यासः कृतानासकृतेः सह । कुशलाकुशलानां च प्रह्म्ं त्याग उच्चते..

English

O Brahmanas, then he meditated and worshipped the Sun-god. What was vomited rose up in the sky and stood near the Solar Brahman.

अध्याय ८७

श्लोक 4

प्रत्यक्षं दुरितं तत्र दृश्यते फलरूपतः ।तत्र तीर्थे तु यो राजन्नेकचित्तो जितेन्द्रियः

pratyakṣaṃ duritaṃ tatra dṛśyate phalarūpataḥ / tatra tīrthe tu yo rājannekacitto jitendriyaḥ

हिन्दी अर्थ

जो दूसरों हरा गाली फटकार पाने पर अथवा मार पीट खा जाने पर भी अपकर्त्ता को गाली फटकार नहीं देता अथवा उसे नहीं मारता तथा मनसा, वाचा, कर्मणा उन सब अपंकारों को सहन कर लेता है, उसके इस व्यवहार का नाम क्षमा कहा गया है। स्वामी द्वारान रखाई जाने वाली एवं छोड़ी गई या. पड़ी हुईं परकीय वस्तु को ग्रहण न करना निर्लोभता के लक्षण कहे गये हैं। मैथुन (स्त्री पुरुष संयोग)

English

The delighted Sun handed over the Yajur-Mantras which had gone up to the solar disc. The Sun-god gave them to the intelligent Brahmarati (in Bd. P.) Yajnavalkya who had assumed the form of a horse.

अध्याय ८७

श्लोक 5

स्नात्वा दानं च वै दद्याद् अर्चयेद् गिरिजापतिम् ।ऋणत्रयविनिर्मुक्तो नाके दीप्यति देववत्

snātvā dānaṃ ca vai dadyād arcayed girijāpatim / ṛṇatrayavinirmukto nāke dīpyati devavat

हिन्दी अर्थ

का व्यवहार न करना, मन से भी उसकी चिन्तना एवं कल्पना ने करना तथा भोग विलास विषयक अन्य वस्तुओं से सच्ची निवृत्ति प्राप्त कर लेना ब्रह्मचयं कहा गया है । और उसका पूर्ण रूपेण पालन करना दम है ।४४-४६। अपने लिए अथवा पराये के लिए जिसकी इन्द्रियाँ मिथ्या विषयों में अभिनिविष्ट नहीं होती उसके इस व्यवहार का नाम शम है। जो व्यक्ति दसों प्रकार के ऐन्द्रियक विषयों एवं आठ प्रकार के लक्षणों में फसकर या प्रतिहत होकर भी क्रोध नहीं प्रकट करता वह॒जितास्मा कहा जाता है। जो जो अपने को अति प्रिय लगने वाली वस्तु-हो, तथा जिसकी प्राप्ति ध्याय मार्ग से हुई हो, उसे गुणवानों को समर्वित करना दान का लक्षण है ।४७-४६। दान तीन प्रकार के होते हैं, कनिष्ठ, ज्येष्ठ और मध्यम । उनमें निःश्रेयस् (मोक्ष) की प्राप्ति के लिये किया गया दान ज्येष्ठ और स्वार्थ सिद्धि के लिए किया गया दान कनिष्ठ कहलाता

English

Thenceforth, the Brahmanas who began the study of the Yajus handed over to Yajnavalkya in the form of a horse ( Vajin ) became known as Vajins.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 87
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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