Vishnu Purana· Viṣṇu Purāṇa
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अध्याय 114 / 126

Book 5 - Adhyaya 34

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अध्याय ११४

श्लोक 1

[[इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमे ऽंशे त्रयस्त्रिंशो ऽध्यायः ]] चक्रे कर्म महच् छौरिर् बिभ्राणो मानुषीं तनुम् जिगाय शक्रं शर्वं च सर्वान् देवांश् च लीलया

[[iti śrīviṣṇupurāṇe pañcame 'ṃśe trayastriṃśo 'dhyāyaḥ ]] cakre karma mahac chaurir bibhrāṇo mānuṣīṃ tanum jigāya śakraṃ śarvaṃ ca sarvān devāṃś ca līlayā

हिन्दी अर्थ

हे मैत्रेय! भगवान् वासुदेवने यदुवंशमें जन्म लेकर जो-जो लीलाएँ की थीं, वह सब मैंने विस्तारपूर्वक तुम्हें

English

which he jliumiliatcd the prowess o( the celestials ; I am desirous to hear them.

अध्याय ११४

श्लोक 2

यच् चान्यद् अकरोत् कर्म दिव्यचेष्टाविधानकृत् तत् कथ्यतां महाभाग परं कौतूहलं हि मे

yac cānyad akarot karma divyaceṣṭāvidhānakṛt tat kathyatāṃ mahābhāga paraṃ kautūhalaṃ hi me

हिन्दी अर्थ

जो पुरुष भगवान् कृष्णके इस चरित्रको

English

PARASara said : — Hear with respectful attention, Brahman, as described by me of the burning of VarSijaslii by Krishna in the course of his relievingthe burden of tlie

अध्याय ११४

श्लोक 3

गदतो मम विप्रर्षे श्रूयताम् इदम् आदरात् नरावतारे कृष्णेन दग्धा वाराणसी यथा

gadato mama viprarṣe śrūyatām idam ādarāt narāvatāre kṛṣṇena dagdhā vārāṇasī yathā

हिन्दी अर्थ

वसुदेव-देवकीका विवाह, भारपीडिता पृथिवीका देवताओंके सहित क्षीरसमुद्रपर जाना और चकार यानि कर्माणि भगवान्पुरुषोत्तम: । देवकस्य सुतां पूर्व बसुदेवो महामुने। उपयेमे महाभागां देवकीं देवतोपमाम्॥ अब, है ब्रह्मर्षे! यदुकुलमें जो भगवान् विष्णुका अंशावतार हुआ था, उसे मैं मुने! भगवान् पुरुषोत्तमने अपने अंशांशसे पृथिवीपर अवतीर्ण होकर जो-जो कर्म किये थे, उन सबका आप मुझसे वर्णन कीजिये श्रीपराशरजी बोले--हे मैत्रेय! तुमने मुझसे जो पूछा है वह संसारमें परम मंगलकारी भगवान् विष्णुके अंशावतारका चरित्र सुनो महामुने! पूर्वकालमें देवककी महाभाग्यशालिनी पुत्री देवीस्वरूपा देवकीके साथ वसुदेवजीने विवाह

English

There was a king of Pundra, who was known as Vasu-

अध्याय ११४

श्लोक 4

पौण्ड्रको वासुदेवस् तु वासुदेवो ऽभवद् भुवि अवतीर्णस् त्वम् इत्य् उक्तो जनैर् अज्ञानमोहितैः

pauṇḍrako vāsudevas tu vāsudevo 'bhavad bhuvi avatīrṇas tvam ity ukto janair ajñānamohitaiḥ

हिन्दी अर्थ

वसुदेव और देवकीके वैवाहिक कंस सारथि बनकर उन दोनोंका माड्नलिक रथ हाँकने उसी समय मेघके समान गम्भीर घोष करती हुई आकाशवाणी कंसको ऊँचे स्वरसे सम्बोधन ““अरे मूढ़! पतिके साथ रथपर बैठी हुई जिस देवकीको तू लिये जा रहा है इसका आठवाँ गर्भ तेरे प्राण हर लेगा'' श्रीपराशरजी बोले--यह सुनते ही महाबली कंस म्यानसे खड़ग निकालकर देवकीको मारनेके लिये उद्यत हुआ। तब वसुदेवजी यों कहने लगे-- न हन्तव्या महाभाग देवकी भवतानघ। तथेत्याह ततः कंसो वसुदेवं द्विजोत्तम। न घातयामास च तां देवकीं सत्यगौरवात्॥ १९ एतस्मिन्नेव काले तु भूरिभारावपीडिता।

English

deva and flattered by the ignorant people as the descended

अध्याय ११४

श्लोक 5

स मेने वासुदेवो ऽहम् अवतीर्णो महीतले नष्टस्मृतिस् ततः सर्वं विष्णुचिह्नम् अचीकरत्

sa mene vāsudevo 'ham avatīrṇo mahītale naṣṭasmṛtis tataḥ sarvaṃ viṣṇucihnam acīkarat

हिन्दी अर्थ

गौरवसे कंसने वसुदेवजीसे “बहुत अच्छा' कह देवकीका भारसे पीडित होकर पृथिवी गौका रूप धारणकर सुमेरुपर्वतपर देवताओंके दलमें गयी खेदपूर्वक करुणस्वरसे बोलती हुई अपना सारा पृथिवी बोली--जिस प्रकार अग्नि सुवर्णका तथा सूर्य गो (किरण)-समूहका परमगुरु है, उसी काल हैं। है देवश्रेष्ञण! आप सब लोगोंका समूह भी उन्हींका अंशस्वरूप है॥ १५-१६॥ आदित्य, मरुदगण, ही रूप हैं॥१७-१८॥ यक्ष, राक्षस, हैत्य, पिशाच, विष्णुके ही रूप हैं

English

deity until he thought himself to be the Vásudeva who had

अध्याय ११४

श्लोक 6

दूतं च प्रेषयाम् आस कृष्णाय सुमहात्मने त्यक्त्वा चक्रादिकं चिह्नं मदीयं नाम चात्मनः

dūtaṃ ca preṣayām āsa kṛṣṇāya sumahātmane tyaktvā cakrādikaṃ cihnaṃ madīyaṃ nāma cātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

ग्रह, नक्षत्र तथा तारागणोंसे तथापि उन अनेक रूपधारी विष्णुके ये रूप समुद्रकी तरंगोंके समान रात-दिन एक-दूसरेके बाध्य-बाधक इस समय कालनेमि आदि हैत्यगण मर्त्यलोकपर अधिकार जमाकर अहर्निश जनताको क्लेशित कर विष्णुने मारा था, इस समय वही उग्रसेनके पुत्र महान् असुर कंसके रूपमें उत्पन्न हुआ है पुत्र अति भयंकर बाणासुर तथा और भी जो गये हैं उनकी मैं गणना नहीं कर सकती॥ २४-२५॥ इतिहासपुराणे च तथा व्याकरणं प्रभो। हे दिव्यमूर्तिधारी देवगण! इस समय मेरे ऊपर

English

come down upon earth. Forgetting his real character he

अध्याय ११४

श्लोक 7

वासुदेवात्मकं मूढ मुक्त्वा गर्वं विशेषतः आत्मनो जीवितार्थाय ततो मे प्रणतिं व्रज

vāsudevātmakaṃ mūḍha muktvā garvaṃ viśeṣataḥ ātmano jīvitārthāya tato me praṇatiṃ vraja

हिन्दी अर्थ

हे अमरेश्वरो! मैं आपलोगोंको यह बतलाये देती हूँ कि अब मैं उनके अत्यन्त भारसे पीडित होकर अपनेको धारण करनेमें सर्वथा असमर्थ अत: है महाभागगण! आपलोग मेरे भार उतारनेका अब कोई ऐसा उपाय कीजिये जिससे में अत्यन्त व्याकुल होकर रसातलको न चली जाऊँ पृथिवीके इन वाक्योंको सुनकर उसके भार उतारनेके विषयमें समस्त देवताओंकी प्रेरणासे भगवान् ब्रह्माजी बोले--हे देवगण ! पृथिवीने जो कुछ कहा है वह सर्वथा सत्य ही है, वास्तवमें मैं, शंकर और आप सब लोग नारायणस्वरूप ही हैं विभूतियाँ हैं, उनकी परस्पर न्‍्यूनता और अधिकता ही बाध्य तथा बाधकरूपसे रहा करती है

English

assumed the emblems of Vishnu and sent an ambassador

अध्याय ११४

श्लोक 8

इत्य् उक्तः संप्रहस्यैनं दूतं प्राह जनार्दनः निजचिह्नम् अहं चक्रं समुत्स्रक्ष्ये त्वयीति वै

ity uktaḥ saṃprahasyainaṃ dūtaṃ prāha janārdanaḥ nijacihnam ahaṃ cakraṃ samutsrakṣye tvayīti vai

हिन्दी अर्थ

आओ, अब हमलोग क्षीरसागरके पवित्र तटपर चलें, वहाँ श्रीपराशरजी बोले--ऐसा कहकर देवताओंके ब्रह्माजी बोले--हे वेदवाणीके अगोचर प्रभो! परा और अपरा-ये दोनों विद्याएँ आप ही हैं। है नाथ! वे दोनों आपहीके मूर्त और अमूर्त रूप सामवेद और अथर्ववेद हैं तथा आप हो शिक्षा, प्रभो! है अधोक्षज! इतिहास, पुराण, व्याकरण, मीमांसा,

English

to the high->minded Krishna vvith this message. " Give up

अध्याय ११४

श्लोक 9

वाच्यश् च पौण्ड्रको गत्वा त्वया दूत वचो मम ज्ञातस् त्वद्वाक्यसद्भावो यत् कार्यं तद् विधीयताम्

vācyaś ca pauṇḍrako gatvā tvayā dūta vaco mama jñātas tvadvākyasadbhāvo yat kāryaṃ tad vidhīyatām

हिन्दी अर्थ

तथा उनका कारण अव्यक्त--इन सबके विचारसे युक्त जो वाक्य है, वह भी आपसे भिन्‍न नहीं है मचक्षरेको बहुरूपरूप: । यथाग्निरिको बहुधा समिध्यते विकारभेदेरविकाररूप: । तथा भवान्सर्वगतैकरूपी होकर भी सुनते हैं, नेत्रहीन होकर भी देखते हैं, एक होकर भी अनेक रूपोंमें प्रकट होते हैं, हस्त- पादादिसे रहित होकर भी बड़े वेगशाली और ग्रहण करनेवाले हैं तथा सबके अवेद्य होकर भी सबको हे परात्मन्! जिस धीर पुरुषको नहीं देखती, आपके अणुसे भी अणु और अज्ञाननिवृत्ति हो जाती है स्थित हैं तथा जो कुछ भूत, भविष्यत्ू और अणुसे भी अणु है वह सब आप प्रकृतिसे परे एकमात्र परमपुरुष ही हैं

English

thy discus, foolish man, lay a-side all my insignia, my name

अध्याय ११४

श्लोक 10

गृहीतचिह्न एवाहम् आगमिष्यामि ते पुरम् समुत्स्रक्ष्यामि ते चक्रं निजचिह्नम् असंशयम्

gṛhītacihna evāham āgamiṣyāmi te puram samutsrakṣyāmi te cakraṃ nijacihnam asaṃśayam

हिन्दी अर्थ

प्रकारकका अग्नि होकर संसारको तेज और विभूति दान करते हैं। है अनन्तमूर्त! आपके नेत्र सब ओर हैं। है धात:! आप ही (त्रिविक्रमावतारमें तीनों लोकमें अपने तीन पग रखते हैं जिस प्रकार एक ही अविकारी अग्नि विकृत सर्वगतरूप एक आप ही अनन्त रूप धारण कर एकमात्र जो श्रेष्ठ परमपद है; वह आप ही हैं, ज्ञानी पुरुष ज्ञानदृष्टिसे देखे जाने- योग्य आपको ही देखा करते हैं। है परात्मन्! भूत और भविष्यत् जो कुछ स्वरूप है वह आपसे आप हास और वृद्धिसे रहित, स्वाधीन, अनादि भय, क्रोध और काम आदि नहीं हैं आश्रय तथा सूर्यादे तेजोंके तेज एवं अविनाशी हैं

English

and the character of Vásudeva and come and do me homage

अध्याय ११४

श्लोक 11

आज्ञापूर्वं च यद् इदम् आगच्छेति त्वयोदितम् संपादयिष्ये श्वस् तुभ्यं तद् अप्य् एषो ऽविलम्बितम्

ājñāpūrvaṃ ca yad idam āgaccheti tvayoditam saṃpādayiṣye śvas tubhyaṃ tad apy eṣo 'vilambitam

हिन्दी अर्थ

नाकारणात्कारणाद्वा कारणाकारणानन च। तुष्टाव भूयो देवेषु साध्वसावनतात्मसु॥ ५४ विनाशसंस्थानकराप्रमेय मही देव महीप्रसूते- आप किसी कारण, अकारण अथवा कारणाकारणसे शरीर-ग्रहण नहीं करते, बल्कि केवल धर्म-रक्षाके लिये ही करते हैं श्रीपराशरजी बोले--इस प्रकार स्तुति सुनकर भगवान् अज अपना विश्वरूप प्रकट करते हुए तुमको मुझसे जिस वस्तुकी इच्छा हो वह सब कहो और उसे सिद्ध हुआ ही समझो श्रीपराशरजी बोले--तब श्रीहरिके उस दिव्य विश्वरूपको देखकर समस्त देवताओंके भयसे विनीत हो जानेपर ब्रह्माजी पुनः स्तुति करने लगे

English

and I shall grant thee, the means of subsistence." Hearing

अध्याय ११४

श्लोक 12

शरणं ते समभ्येत्य कर्तास्मि नृपते तथा यथा त्वत्तो भयं भूयो न मे किंचिद् भविष्यति

śaraṇaṃ te samabhyetya kartāsmi nṛpate tathā yathā tvatto bhayaṃ bhūyo na me kiṃcid bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

एवं चरणवाले! आपको हजारों बार नमस्कार हो। अप्रमेय/ आपको बारम्बार नमस्कार हो महत्तत्ते और अहंकारादिमें प्रधानभूत मूल पुरुषसे भी परे हैं; है भगवन! आप हमपर प्रसन्न हे देव! इस पृथिवीके पर्वतरूपी उत्पातसे शिथिल हो गये हैं। अत: है अपरिमितवीर्य ! यह संसारका भार उतारनेके लिये आपकी हे सुरनाथ! हम और यह समस्त देवगण यहाँ उपस्थित हैं, इन्हें अथवा मुझे जो कुछ करना उचित हो उन सब बातोंके लिये आज्ञा कौजिये। है ईश! आपहीकी आज्ञाका बोले--'मेरे ये दोनों केश पृथिवीपर अवतार लेकर पृथिवीके भाररूप कष्टको दूर करेंगे

English

those words and laugliing, Janðrddana said to the messenger

अध्याय ११४

श्लोक 13

इत्य् उक्ते ऽपगते दूते संस्मृत्याभ्यागतं हरिः गरुत्मन्तम् अथारुह्य त्वरितं तत्पुरं ययौ

ity ukte 'pagate dūte saṃsmṛtyābhyāgataṃ hariḥ garutmantam athāruhya tvaritaṃ tatpuraṃ yayau

हिन्दी अर्थ

सब देवगण अपने-अपने अंशोंसे पृथिवीपर अवतार हैत्योंके साथ युद्ध करें जो देवीके समान देवकी नामकी भार्या है उसके आठवें गर्भसे मेरा यह (श्याम) केश अवतार और इस प्रकार यहाँ अवतार लेकर यह कालनेमिके अवतार कंसका वध करेगा।' ऐसा कहकर श्रीहरि अन्तर्धाना हो गये करके देवगण सुमेरुपर्वतपर चले गये और फिर पृथिवीपर अवतीर्ण हुए इसी समय भगवान् नारदजीने कंससे आकर कहा कि देवकोके आठवें गर्भमें भगवान् धरणीधर

English

"Go back, messenger to Paundráka and teil him in my

अध्याय ११४

श्लोक 14

तस्यापि केशवोद्योगं श्रुत्वा काशिपतिस् तदा सर्वसैन्यपरीवारः पार्ष्णिग्राह उपाययौ

tasyāpi keśavodyogaṃ śrutvā kāśipatis tadā sarvasainyaparīvāraḥ pārṣṇigrāha upāyayau

हिन्दी अर्थ

नारदजीसे यह समाचार पाकर कंसने कुपित होकर वसुदेव और देवकीको कारागृहमें हे द्विज! वसुदेवजी भी, पुत्रको कंसको सौंपते रहे जिस अविद्या-रूपिणीसे सम्पूर्ण महामाया है उससे भगवान् श्रीहरिने कहा-- तू पातालमें स्थित छः: गर्भोको एक-एक करके देवकीकी कुक्षिमें स्थापित कर दे सबके मारे जानेपर शेष नामक मेरा अंश अपने अंशांशसे देवकौके सातवें गर्भमें स्थित होगा

English

name 'I shall hand over my eroblem, the discus to him.

अध्याय ११४

श्लोक 15

ततो बलेन महता काशिराजबलेन च पौण्ड्रको वासुदेवो ऽसौ केशवाभिमुखं ययौ

tato balena mahatā kāśirājabalena ca pauṇḍrako vāsudevo 'sau keśavābhimukhaṃ yayau

हिन्दी अर्थ

हाथसे ही मारे जाओगे। यह प्रसंग हरिवंशमें आया है। देवक्या: पतितो गर्भ इति लोको वदिष्यति॥ ७५ ततो5हं सम्भविष्यामि देवकीजठरे शुभे। कंसश्च त्वामुपादाय देवि शैलशिलातले। उसके विषयमें संसार यही कहेगा कि कारागारमें बन्द होनेके कारण भोजराज कंसके भयसे देवकौका सातवाँ वह श्वेत शैलशिखरके समान वीर पुरुष गर्भसे आकर्षण किये जानेके कारण संसारमें 'संकर्षण' नामसे प्रसिद्ध होगा तदनन्तर, है शुभे देवकीके आठवें गर्भमें में स्थित होऊँगा। उस समय तू भी तुरंत ही यशोदाके गर्भमें चली समय मैं जन्म लूँगा और तू नवमीको उत्पन्न होगी

English

Thou wilt properly understand my meaning and consider

अध्याय ११४

श्लोक 16

तं ददर्श हरिर् दूराद् उदारस्यन्दने स्थितम् चक्रहस्तं गदाखड्गबाहुं पाणिगताम्बुजम्

taṃ dadarśa harir dūrād udārasyandane sthitam cakrahastaṃ gadākhaḍgabāhuṃ pāṇigatāmbujam

हिन्दी अर्थ

हे अनिन्दिते! उस समय मेरी शक्तिसे अपनी मति फिर जानेके कारण वसुदेवजी मुझे तो यशोदाके और तुझे देवकीके शयनगृहमें ले जायँगे तुझे पकड़कर पर्वत-शिलापर पटक देगा; उसके पटकते ही तू आकाशमें स्थित हो जायगी उस समय मेरे गौरवसे सहस्ननयन इन्द्र सिर झुकाकर प्रणाम करनेके अनन्तर तुझे भगिनीरूपसे क्षान्ति और कान्ति है; तू ही आकाश, पृथिवी, धृति, लज्जा, पुष्टि और उषा है; इनके अतिरिक्त संसारमें और भी जो कोई शक्ति हैं वह सब तू ही है जो लोग प्रात:काल और सायंकालमें अत्यन्त भद्रकाली, क्षेमदा और भाग्यदा आदि कहकर तेरी स्तुति करेंगे, उनकी समस्त कामनाएँ मेरी कृपासे पूर्ण हो जायेगी ॥ ८४-८५ ॥ मदिरा और मांसकी भेंट चढ़ानेसे

English

what is to be done j for ! shall come to thy cily bringing

अध्याय ११४

श्लोक 17

स्रग्धरं धृतशार्ङ्गं च सुपर्णरचितध्वजम् वक्षःस्थले कृतं चास्य श्रीवत्सं ददृशे हरिः

sragdharaṃ dhṛtaśārṅgaṃ ca suparṇaracitadhvajam vakṣaḥsthale kṛtaṃ cāsya śrīvatsaṃ dadṛśe hariḥ

हिन्दी अर्थ

तेरे द्वारा दी हुई वे समस्त कामनाएँ मेरी कृपासे निस्सन्देह पूर्ण होंगी। है देवि! अब तू मेरे बतलाये हुए स्थानकों जा यथोक्त सा जगद्धात्री देवदेवेन वै तथा। लोकत्रयोपकाराय देवक्या: प्रविवेश ह॥ २ श्रीपपशरजी बोले--हे मैत्रेय!ः देवदेव श्रीविष्णुभगवानने जैसा कहा था उसके अनुसार इस प्रकार सातवें गर्भके रोहिणीके उदरमें पहुँच जानेपर श्रीहरिने तीनों लोकोंका उद्धार करनेकौ इच्छासे देवकीके गर्भमें प्रवेश किया परमेश्वरके आज्ञानुसार योगमाया भी उसी दिन यशोदाके गर्भमें स्थित हुई अंशके पृथिवीमें पधारनेपर आकाशमें ग्रहगण ठीक- ठीक गतिसे चलने लगे और ऋतुगण भी मंगलमय होकर शोभा पाने लगे

English

tbe discus vvith me and shall surcly give it over to thee. H

अध्याय ११४

श्लोक 18

किरीटकुण्डलधरं पीतवासःसमन्वितम् दृष्ट्वा तं भावगम्भीरं जहास गरुडध्वजः

kirīṭakuṇḍaladharaṃ pītavāsaḥsamanvitam dṛṣṭvā taṃ bhāvagambhīraṃ jahāsa garuḍadhvajaḥ

हिन्दी अर्थ

तेजसे देदीप्यमाना देवकीजीको कोई भी देख न सकता था। उन्हें देखकर दर्शकोंके चित्त थकित तब देवतागण अन्य पुरुष तथा स्त्रियोंकी दिखायी न देते हुए, अपने शरीरमें गर्भरूपसे भगवान् विष्णुकों धारण करनेवाली देवकोजीकी अहर्निश स्तुति करने लगे देवता बोले--हे शोभने! तू पहले ब्रह्म- जगद्ठिधाताकी वेदगर्भा वाणी हुई मयी अरणि है तथा तू ही देवमाता अदिति और हैत्यप्रसू तू ही दिनकरी प्रभा और ज्ञानगर्भा गुरुशुश्रषा है तथा तू ही न्‍्यायमयी परमनीति और विनयसम्पन्ना लज्जा है

English

thou dost comand me to come I immediately obey and

अध्याय ११४

श्लोक 19

युयुधे च बलेनास्य हस्त्यश्वबलिना द्विज निस्त्रिंशर्ष्टिगदाशूलशक्तिकार्मुकशालिना

yuyudhe ca balenāsya hastyaśvabalinā dvija nistriṃśarṣṭigadāśūlaśaktikārmukaśālinā

हिन्दी अर्थ

ग्रह, नक्षत्र और तारागणको धारण करनेवाला तथा वृष्टि आदिके द्वारा इस अखिल विश्वका कारणस्वरूप आकाश तू ही है। है जगद्धात्रि! हे देवि! ये सब तथा और भी सहस््नों और असंख्य समस्तवहनयोम्भांसि सकलाशए्च समीरणा: । अवकाशमशेषस्य यदददाति नभःस्थलम्। रूपकर्मस्वरूपाणि न परिच्छेदगोचरे। प्रीत्या तं धारयेशानं धृतं येनाखिलं जगत्॥ २१ भगवानूका आविर्भाव तथा योगमायाद्वारा कंसकी वबंचना एवं संस्तूयमाना सा देवैददेवमधारयत्। ततो5खिलजगत्पदाबोधायाच्युतभानुना । श्रीपराशरजी बोले--हे मैत्रेय! देवताओंसे इस तदनन्तर सम्पूर्ण संसाररूप कमलको अच्युतरूप सूर्यदेवका आविर्भाव हुआ आह्वादित करनेवाला हुआ और उस दिन सभी दिशाएँ

English

be with thee tomorrow and shall not delay, and having

अध्याय ११४

श्लोक 20

क्षणेन शार्ङ्गनिर्मुक्तैः शरैर् अरिविदारणैः गदाचक्रनिपातैश् च सूदयाम् आस तद्बलम्

kṣaṇena śārṅganirmuktaiḥ śarair arividāraṇaiḥ gadācakranipātaiś ca sūdayām āsa tadbalam

हिन्दी अर्थ

जातोउसि देवदेवेश शट्डुचक्रगदाधरम्। दिव्यरूपमिंदं देव प्रसादेनोपसंहर॥ १० अद्येव देव कंसो5यं कुरुते मम घातनम्। प्रसीदवामेष. स॒ देवदेवो श्रीजनार्दनके प्रकट होनेपर आकाशगामी देवगण पृथिवीपर पुष्प बरसाने लगे तथा शान्त हुए उन्हें खिले हुए कमलदलकी-सी आभावाले, हुए देख आनकदुन्दुभि वसुदेवजी स्तुति करने लगे भगवान्को स्तुति कर कंससे भयभीत रहनेके कारण इस प्रकार निवेदन किया वसुदेवजी बोले--हे देवदेवेश्वर! यद्यपि आप कृपा करके अब अपने इस शंख-चक्र-गदाधारी दिव्य रूपका उपसंहार कीजिये

English

sought thy protection I shall so manage, O king, tbat I sball

अध्याय ११४

श्लोक 21

काशिराजबलं चैव क्षयं नीत्वा जनार्दनः उवाच पौण्ड्रकं मूढम् आत्मचिह्नोपलक्षणम्

kāśirājabalaṃ caiva kṣayaṃ nītvā janārdanaḥ uvāca pauṇḍrakaṃ mūḍham ātmacihnopalakṣaṇam

हिन्दी अर्थ

हे देव! यह पता लगते ही कि आप मेरे इस गृहमें अवतीर्ण हुए हैं, कंस इसी समय मेरा सर्वनाश कर देगा देवकीजी बोलीं--जो अनन्तरूप और अखिल- सम्पूर्ण लोकोंको धारण करते हैं तथा जिन्होंने अपनी मायासे ही बालरूप धारण किया है वे देवदेव हमपर प्रसन्न हों आपके इस अवतारका वृत्तान्त न जानने पावे लिया है--इससे तेरी वह कामना पूर्ण हो गयी श्रीपराशरजी बोले--हे मुनिश्रेष्ठ ! ऐसा कहकर भगवान् मौन हो गये तथा वसुदेवजी भी उन्हें उस रात्रिमें ही लेकर बाहर निकले

English

not have to fear anything from thee," So saying he sent

अध्याय ११४

श्लोक 22

पौण्ड्रकोक्तं त्वया यत् तु दूतवक्त्रेण मां प्रति समुत्सृजेति चिह्नानि तत् ते संपादयाम्य् अहम्

pauṇḍrakoktaṃ tvayā yat tu dūtavaktreṇa māṃ prati samutsṛjeti cihnāni tat te saṃpādayāmy aham

हिन्दी अर्थ

वसुदेवजीके बाहर जाते समय कारागृहरक्षक और मथुराके द्वारपाल योगनिद्राके प्रभावसे अचेत हो गये यह कथा हरिवंशमें आयी है। उस रात्रिके समय वर्षा करते हुए मेघोंकी जलराशिको वसुदेवो वहन्विष्णुं जानुमात्रवहां ययौ॥ १८ तस्मिन्काले यशोदापि मोहिता योगनिद्रया । भगवान् विष्णुको ले जाते हुए वसुदेवजी यमुनाजीको घुटनोंतक रखकर ही पार कर गये उन्होंने वहाँ यमुनाजीके तटपर ही कंसको कर देनेके लिये आये हुए नन्‍्द आदि वृद्ध गोपोंको भी देखा मोहित हो जानेपर मोहित हुई यशोदाने भी उसी कन्याकों

English

*way the messenger to communicate these words uhto the

अध्याय ११४

श्लोक 23

चक्रम् एतत् समुत्सृष्टं गदेयं ते विसर्जिता गरुत्मान् एष निर्दिष्टः समारोहतु ते ध्वजम्

cakram etat samutsṛṣṭaṃ gadeyaṃ te visarjitā garutmān eṣa nirdiṣṭaḥ samārohatu te dhvajam

हिन्दी अर्थ

तब अतिशय कान्तिमान् वसुदेवजी भी उस बालकको सुलाकर और कन्याको लेकर तुरन्त यशोदाके शयन- कन्याको ले जाकर अपने महलमें देवकीके शयनगृहमें हे द्विज! तदनन्तर बालकके रोनेका शब्द सुनकर कारागृह-रक्षक सहसा उठ खड़े हुए और देवकीके सन्तान सुनते ही कंसने तुरन्त जाकर देवकीके रुँधे हुए कण्ठसे 'छोड़, छोड'--ऐसा कहकर रोकनेपर भी उस बालिकाको पकड़ लिया और उसे एक शिलापर पटक दिया। उसके एक महान् अष्टभुजरूप धारण कर लिया॥ २५-२६ ॥ वसुदेव-देवकीका कारागारसे मोक्ष हे प्रलम्ब महाबाहो केशिन् धेनुक पूतने। कार्यो देवापकाराय तेषां सर्वात्मना वध: ॥ ११ श्रीपराशरजी बोले--तब कंसने खिननचित्तसे

English

fovereign, and summoning Garnda mounted him and startea

अध्याय ११४

श्लोक 24

इत्य् उच्चार्य विमुक्तेन चक्रेणासौ विदारितः पोथितो गदया भग्नो गरुत्मांश् च गरुत्मता

ity uccārya vimuktena cakreṇāsau vidāritaḥ pothito gadayā bhagno garutmāṃś ca garutmatā

हिन्दी अर्थ

कंस बोला--हे प्रलम्ब! है महाबाहो केशिन्! हे धेनुक! है पूतने! तथा है अरिष्ट आदि अन्य हो रही है कि दुरात्मा देवताओंने मेरे मारनेके लिये कोई यत्न किया है; किन्तु मैं वीर पुरुष अपने वीर्यसे सताये हुए इन लोगोंको कुछ भी नहीं गिनता अथवा छिद्र (असावधानीका समय) दूँढ़कर हैत्योंका मेरे बाहुबलसे दलित आदित्यों, देवताओंसे भी मेरा क्या अनिष्ट हो सकता है? आपलोगोंने क्‍या देखा नहीं था कि मेरे साथ अपनी पीठपर बाणोंकी बौछार सहता हुआ भाग गया

English

iforthe city of Paundraka.

अध्याय ११४

श्लोक 25

ततो हाहाकृते लोके काशीनाम् अधिपो बली युयुधे वासुदेवेन मित्रस्यापचितौ स्थितः

tato hāhākṛte loke kāśīnām adhipo balī yuyudhe vāsudevena mitrasyāpacitau sthitaḥ

हिन्दी अर्थ

बन्द कर दिया था उस समय क्‍या मेघोंने मेरे बाणोंसे विंधकर ही यथेष्ट जल नहीं बरसाया? गुरु (श्वशुर) जरासन्धको छोड़कर क्या पृथिवीके और सभी नृपतिगण मेरे बाहुबलसे भयभीत होकर मेरे सामने सिर नहीं झुकाते 2 अवज्ञा होती है और है वीरगण।! उन्हें अपने (मेरे) वधका यत्न करते देखकर तो मुझे हँसी आती अपकारके लिये मुझे और भी अधिक प्रयत्न करना अतः पृथिवीमें जो कोई यशस्वी और यज्ञकर्ता हों उनका देवताओंके अपकारके लिये सर्वथा वध कर देना चाहिये

English

When the king of Kasi lieard of tlie preparations of Kesava he sent hjoljrrny to lielp Paundraka himself bringing up the rear. . AÍrAnfr h tlic army of the king of Klsi and his own troops, 'Átí^Bfí'% the false Vasudeva marclied to meet Krishna. H>J&»SHhim at a distance standing in his car holding a disc t ^Jví»b, a mace, a scimitar and a lotus in his hands adorned with a garland of flowers, and bearing a bow ; and having his standard made of gold, he had also the mystical mark Sribatsa on his brest ; he was robed in yellow raiment and embellished with ear rings, and a tiara. When the^god, wliose emblem is Garuda, saw him, he lauglied aloud and engaged in encounler with tlie hostile army of cavalry and elephants fighting with swords, scimitars, maces, tridents spears and bows. Sliowering upon the enemy the arrows from his S&ranga bow and hurling at them liis mace and discus he soon destroyed both tlie ariny of Paundraka and that of the king of Kási. He then addressed the former who was foolishly wearing his eniblems saying : — "Paundraka, you wanted me tlirough your rnessenger, to resign to you all my insignia, I now deliver tliem to you. Here is my discus; here is my mace; and here is Garuda, let him mount upon thy banner." Saying this he discliargd the discus and mace by which Paundtáka was sundered to pieces and cast on the ground ; whilst the Garuda vvhich was on the banner of Paundraka was destroyed by the Gáruda of Vishnu. Beholding this the people cried "alas 1 alas" ; but the brave king still siding the imposture of his friend carried on the encounter till Sauri, cut off his head with his arrows and »hot into tlie city of Kasi to the surprise of all the inhabitants. Having thus destroyed Paundraka and the king of Kasi with all their retinue Sauri came back to Dwarka where he resided enjoying heavenly delights..

अध्याय ११४

श्लोक 26

ततः शार्ङ्गधनुर्मुक्तैश् छित्त्वा तस्य शरैः शिरः काशिपुर्यां स चिक्षेप कुर्वंल् लोकस्य विस्मयम्

tataḥ śārṅgadhanurmuktaiś chittvā tasya śaraiḥ śiraḥ kāśipuryāṃ sa cikṣepa kurvaṃl lokasya vismayam

हिन्दी अर्थ

मुमोच वसुदेव॑ च देवकीं च निरोधतः ॥ १४ को5प्यन्य एव नाशाय बालो मम समुद्गत: ॥ १५ अर्भका युवयोदंषाच्चायुषो यद्वियोजिता: ॥ १६ देवकीके गर्भसे उत्पन्न हुई बालिकाने यह भी कहा उत्पन्न हुए बालकोंके विषयमें विशेष सावधानी रखनी चाहिये और जिस बालकमें विशेष बलका उद्रेक हो उसे यत्नपूर्वक मार डालना चाहिये असुरोंको इस प्रकार आज्ञा दे कंसने कारागृहमें जाकर तुरन्त ही वसुदेव और देवकीको बन्धनसे मुक्त कर दिया कंस बोला--मैंने अबतक आप दोनोंके बालकोंकी तो वृथा ही हत्या की, मेरा नाश करनेके लिये तो कोई और ही बालक उत्पन्न हो गया है इसका कुछ दुःख न मानें; क्योंकि उन बालकोंकी होनहार ऐसी ही थी। आपलोगोंके प्रारब्धदोषसे ही उन बालकोंको अपने जीवनसे हाथ धोना पड़ा है

English

When the inhabitants of Kasi beheld the head oj their king íhot into the city they were much surprised and won- dered how it could have been accomplished, Having comé

अध्याय ११४

श्लोक 27

हत्वा च पौण्ड्रकं शौरिः काशिराजं च सानुगम् पुनर् द्वारवतीं प्राप्तो रेमे स्वर्गगतो यथा

hatvā ca pauṇḍrakaṃ śauriḥ kāśirājaṃ ca sānugam punar dvāravatīṃ prāpto reme svargagato yathā

हिन्दी अर्थ

प्रकार ढाँडस बँधा और बन्धनसे मुक्तकर कंसने शंकित चित्तसे अपने अन्तःपुरमें प्रवेश किया विमुक्तो वसुदेवो5पि नन्दस्य शकटं गतः । श्रीपराशरजी बोले--बन्दीगृहसे छूटते ही वसुदेवजी नन्दजीके छकड़ेके पास गये तो उन्हें इस समाचारसे तब वसुदेवजीने भी उनसे आदरपूर्वक कहा--अब वृद्धावस्थामें भी आपने पुत्रका मुख देख लिया यह बड़े ही सौभाग्यकी बात है आपलोग जिसलिये यहाँ आये थे वह राजाका सार वार्षिक कर दे ही चुके हैं। यहाँ धनवान् पुरुषोंको और अधिक न ठहरना चाहिये आपलोग जिसलिये यहाँ आये थे वह कार्य पूरा हो चुका, अब और अधिक किसलिये ठहरे हुए हैं? यहाँ देरतक ठहरना ठीक नहीं है अत: है नन्दजी ! आपलोग शीघ्र ही अपने गोकुलको जाइये

English

to know that the king had hcen slain by Krishna, the kitig's son together witli the priest of the fjjöily propitiated Sankara.

अध्याय ११४

श्लोक 28

तच्छिरः पतितं दृष्ट्वा तत्र काशिपतेः पुरे जनः किम् एतद् इत्य् आह केनेत्य् अत्यन्तविस्मितः

tacchiraḥ patitaṃ dṛṣṭvā tatra kāśipateḥ pure janaḥ kim etad ity āha kenety atyantavismitaḥ

हिन्दी अर्थ

उत्पन्न हुआ जो मेरा पुत्र है उसकी भी आप उसी तरह रक्षा कीजियेगा जैसे अपने इस बालककी वसुदेवजीके ऐसा कहनेपर नन्द आदि महाबलवान् गोपगण छकड़ोमें रखकर लाये हुए भाण्डोंसे कर गोपुच्छभ्रामणेनाथ बालदोषमपाकरोत्ू॥ १२ गोपुरीषमुपादाय नन्दगोपो5पि मस्तके। उनके गोकुलमें रहते समय बालघातिनी पूतनाने रात्रिके समय सोये हुए कृष्णको गोदमें लेकर उनके रात्रिके समय पूतना जिस-जिस बालकके मुखमें अपना स्तन दे देती थी उसीका शरीर तत्काल नष्ट हो जाता था क्रोधपूर्वक उसके स्तनको अपने हाथोंसे खूब दबाकर पकड़ लिया और उसे उसके प्राणोंके सहित पीने

English

place Avimukta the deity askedR^V^ince to pray for a boon, on which he said : — "0 I°k&„j|jnigh t y god through tliy favour, let thy mystic spirit sfcjj^/'.shna, tbe tnurderer of my father i"

अध्याय ११४

श्लोक 29

ज्ञात्वा तं वासुदेवेन हतं तस्य सुतस् ततः पुरोहितेन सहितस् तोषयाम् आस शंकरम्

jñātvā taṃ vāsudevena hataṃ tasya sutas tataḥ purohitena sahitas toṣayām āsa śaṃkaram

हिन्दी अर्थ

तब स्नायु-बन्धनोंके शिथिल हो जानेसे पूतना घोर शब्द करती हुई मरते समय महाभयंकर रूप धारणकर पृथिवीपर गिर पड़ी नादको सुनकर भयभीत हुए ब्रजवासीगण जाग उठे और देखा कि कृष्ण पूतनाकी गोदमें हैं और वह मारी हे टद्विजोत्तम! तब भयभीता यशोदाने कृष्णको गोदमें लेकर उन्हें गौकी पूँछसे झाड़कर बालकका ननन्‍्दगोपने भी आगेके मस्तकपर गोबरका चूर्ण लगाया नन्दगोप बोले--जिनकी नाभिसे प्रकट हुए आदिस्थान श्रीहरि तेरी रक्षा करें

English

'It sliall be so' answered Sankara and frnm out of the southern fire up sprang a vast and formidable female like fiame out of fire, blazing with ruddy liglit and fiery radiance streaming amidst her hair. Worked up with ire she called upon Krishna and departed to Dwarka. There the people seeing her vvere struck with terror and ffed for protection to the slayer of Madhu the refuge of all vvorlds. Under- standing that the fiend had been creatíd by the son of tlie king of Kasi through his worship of the deity whosfe emblem is the bull, the wielder of the discus being engaged in sport and playing at dice said to the discus "Kill this dreadful creature whose tresses are of plaited flame." Accordingly Sudarshana, the discus of Vishnu, attacked the fiend in no time, dread- fully covered with fire and wearing tresses of plaited flame. Terrified at the miglit of Sudarshana, the creation of Mabes- wara did not wait for his attack but fled quickly followed by him with equal velocity until she arrived at Varanashi rcpelled by the superior prowess of the discus of Visnnu.

अध्याय ११४

श्लोक 30

अविमुक्ते महाक्षेत्रे तोषितस् तेन शंकरः वरं वृणीष्वेति तदा तं प्रोवाच नृपात्मजम्

avimukte mahākṣetre toṣitas tena śaṃkaraḥ varaṃ vṛṇīṣveti tadā taṃ provāca nṛpātmajam

हिन्दी अर्थ

करती है, वे वराह-रूप-धारी श्रीकेशव तेरी रक्षा धारण करके अपने तीन पगोंसे त्रिलोकौीको नाप लिया था, वे वामनभगवान् तेरी सर्वदा रक्षा करें तथा जनार्दन जंघा और चरणोंकी रक्षा करें राक्षस हों वे शार्क़ धनुष, चक्र और गदा धारण करनेवाले विष्णुभगवानकी शंख-ध्वनिसे नष्ट हो जायँ घुटनेके नीचेका भाग। हषीकेशो म्बरे भूमौ रक्षतु त्वां महीधर: ॥ २१ (कोणों )-में, हृषीकेश आकाशमें तथा पृथिवीको धारण श्रीपराशर उवाच करनेवाले श्रीशेषजी पृथिवीपर तेरी रक्षा करें

English

Thearms of the king of KSsi and the whole numberof the attendant divinities of Siva armed with variouí weapons marched out to oppose the discus. But an expert in the use of arms he consumed the whole host by his radiaace and then set fire to the city, ;in which the magic power of Siva had concealed herself. Thus was Varanashi burnt with all its- princes and their followers, its inhabitants, elephants, horses and men, treasures aed granaries, houses, palaces and markets. *ÍJw whole of the city that was inaccessible to the celestials wai thus covered witb flames by the discus of Hari and WW

अध्याय ११४

श्लोक 31

स वव्रे भगवन् कृत्या पितृहन्तुर् वधाय मे समुत्तिष्ठतु कृष्णस्य त्वत्प्रसादान् महेश्वर

sa vavre bhagavan kṛtyā pitṛhantur vadhāya me samuttiṣṭhatu kṛṣṇasya tvatprasādān maheśvara

हिन्दी अर्थ

शायितश्शकटस्यथाधो बालपर्यडकिकातले॥ २२ खटोलेपर सुला दिया मरी हुई पूतनाके महान् मृताया: परम त्रासं विस्मयं च तदा ययु:॥ २३ और विस्मय हुआ श्रीपराशर उवाच श्रीपराशरजी बोले--एक दिन छकड़ेके नीचे कदाचिच्छकटस्याधश्शयानो मथधुसूदन: । सोये हुए मधुसूदनने दूधके लिये रोते-रोते ऊपरको ततो हाहाकृतं सर्वो गोपगोपीजनो द्विज। वहाँ आ पहुँचे और उस बालकको उतान सोये हुए तब गोपगण पूछने लगे कि 'इस छकड़ेको आजगाधाध ददश आलपत्तातशा वक्त है किसने उलट दिया, किसने उलट दिया?” तो वहाँपर गोपाः केनेति केनेदं शकटं परिवर्तितम्। खेलते हुए बालकोंने कहा-''इस कृष्णने ही गिराया

English

totally destroyed. The discus, with unsootVd wrath, blazing fiercely and not satis^Awitli tlie accomplishment oí so easy a task, then retrj(S4*8Ítlie liands of Vishnu.

अध्याय ११४

श्लोक 32

एवं भविष्यतीत्य् उक्ते दक्षिणाग्नेर् अनन्तरम् महाकृत्या समुत्तस्थौ तस्यैवाग्निनिवेशनात्

evaṃ bhaviṣyatīty ukte dakṣiṇāgner anantaram mahākṛtyā samuttasthau tasyaivāgniniveśanāt

हिन्दी अर्थ

हमने अपनी आँखोंसे देखा है कि रोते-रोते हुआ तथा नन्दगोपने अत्यन्त चकित होकर बालकको फिर यशोदाने भी छकड़ेमें रखे हुए गोपानों संस्कारानकरोसयों: गोपोंसे छिपे-छिपे गोकुलमें आकर उन दोनों घृष्टजानुकरा विप्र बभूवतुरुभावषि॥ १० न निवारयितुं शेके यशोदा तौ न रोहिणी॥ ११९ तत: कटकटाशब्दसमाकर्णनतत्पर: । हे विप्र! वे दोनों बालक थोड़े ही दिनोंमें गौओंके

English

When it was said, "So it shall be," from the southern fire there arose a great kritya, because he had placed the fire there.

अध्याय ११४

श्लोक 33

ततो ज्वालाकरालास्या ज्वलत्केशकलापिका कृष्ण कृष्णेति कुपिता कृत्या द्वारवतीं ययौ

tato jvālākarālāsyā jvalatkeśakalāpikā kṛṣṇa kṛṣṇeti kupitā kṛtyā dvāravatīṃ yayau

हिन्दी अर्थ

गोबर और राख- भरे शरीरसे इधर-उधर घूमते हुए उन बालकोंको यशोदा और रोहिणी रोक नहीं सकती कभी वे गौओंके घोषमें खेलते और कभी बछड़ोंके मध्यमें चले जाते तथा कभी उसी दिन जन्मे हुए बछड़ोंकी पूँछ पकड़कर खींचने लगते साथ खेलनेवाले उन दोनों अत्यन्त चंचल बालकोंको न रोक सकी तो उसने अनायास ही सब कर्म करनेवाले कृष्णको रस्सीसे कटिभागमें कसकर ऊखलनमें बाँध दिया और रोषपूर्वक इस प्रकार कहने लगी-- ॥ १३-१४ ॥ '' अरे ऊखलको खींचते-खींचते यमलार्जुनके बीचमें गये और उन दोनों वृक्षोंके बीचमें तिरछी पड़ी हुई ऊखलको खींचते हुए उन्होंने ऊँची शाखाओंवाले यमलार्जुन वृक्षको

English

Then the kritya, her mouth terrible with flames and her mass of hair blazing, crying "Krishna, Krishna!" in anger, went to Dvaravati.

अध्याय ११४

श्लोक 34

ताम् अवेक्ष्य जनस् त्रासविचलल्लोचनो मुने ययौ शरण्यं जगतां शरणं मधुसूदनम्

tām avekṣya janas trāsavicalallocano mune yayau śaraṇyaṃ jagatāṃ śaraṇaṃ madhusūdanam

हिन्दी अर्थ

तब उनके उखड़नेका कट-कट शब्द सुनकर वहाँ ब्रजवासीलोग दौड़ आये और उन दोनों महावृक्षोंको तथा उनके बीचमें कमरमें रस्सीसे कसकर शुभ्र हास करते देखा। तभीसे रस्सीसे बँधनेके कारण “अब इस स्थानपर रहनेका हमारा कोई प्रयोजन नहीं है, हमें किसी और महावनको चलना चाहिये, क्‍योंकि यहाँ नाशके कारणस्वरूप, पूतना-वध, छकड़ेका लोट जाना तथा आँधी आदि इस प्रकार वे समस्त ब्रजवासी चलनेका विचारकर अपने-अपने कुटुम्बके लोगोंसे कहने लगे--'शीघ्र ही चलो, देरी मत करो! काकपक्षधरी बालो कुमाराविव पावकी। तब वे ब्रजवासी वत्सपाल दल बाँधकर एक क्षणमें ही छकड़ों और गौओंके साथ उन्हें हाँकते हुए चल वह ब्रजभूमि क्षणभरमें ही काक तथा भास आदि पक्षियोंसे व्याप्त हो गयी

English

Seeing her, the people, their eyes darting with terror, went to Madhusudana, refuge of the worlds, for refuge, sage.

अध्याय ११४

श्लोक 35

काशिराजसुतेनेयम् आराध्य वृषभध्वजम् उत्पादिता महाकृत्येत्य् अवगम्याथ चक्रिणा

kāśirājasuteneyam ārādhya vṛṣabhadhvajam utpāditā mahākṛtyety avagamyātha cakriṇā

हिन्दी अर्थ

तब लीलाविहारी भगवान् कृष्णने गौओंकी (नित्य-वृन्दावनधाम )-का चिन्तन किया समस्त ब्रजवासी वृन्दावनमें रहने लगे तदनन्तर राम और कृष्ण भी बछड़ोंके रक्षक हो गये और एक स्थानपर रहकर गोष्ठमें बाललीला करते हुए विचरने लगे वे काकपक्षधारी दोनों बालक सिरपर मयूर-पिच्छका मुकुट धारणकर तथा सब प्रकारके बाजोंकी ध्वनि करते तथा पत्तोंके खेलते हुए उस महावनमें विचरने लगे॥ ३२-३३॥ महाव्रजमें रहते-रहते कुछ समय बीतनेपर वे निखिललोकपालक वत्सपाल सात वर्षके हो गये

English

The discus-bearer, understanding that this great kritya had been produced by the son of the king of Kashi after worshipping the bull-bannered god,

अध्याय ११४

श्लोक 36

जहि कृत्याम् इमाम् उग्रां वह्निज्वालाजटाकुलाम् चक्रम् उत्सृष्टम् अक्षेषु क्रीडासक्तेन लीलया

jahi kṛtyām imām ugrāṃ vahnijvālājaṭākulām cakram utsṛṣṭam akṣeṣu krīḍāsaktena līlayā

हिन्दी अर्थ

तब मेघसमूहसे आकाशको आच्छादित करता हुआ तथा अतिशय वारिधाराओंसे दिशाओंको एकरूप करता बढ़ जाने और वीरबहूटियोंसे व्याप्त हो जानेके कारण जिस प्रकार नया धन पाकर दुष्ट पुरुषोंका चित्त उच्छुंखल हो जाता है, उसी प्रकार नदियोंका जल सब ओर अपना निर्दिष्ट मार्ग छोड़कर बहने लगा भी मलिन पड़ जाती है वैसे ही मलिन मेघोंसे आच्छादित रहनेके कारण निर्मल चन्द्रमा भी शोभाहीन हो गया क्वचिद्गर्जति जीमूते हाहाकाररवाकुलौ ॥ ४७ मयूरकेकानुगताी गोपवेणुप्रवादकौ ॥ ४८ विकाले च सम॑ गोभिगोंपव॒न्द्समन्वितौ। जिस प्रकार विवेकहीन राजाके संगमें गुणहीन मनुष्य भी

English

said, "Slay this fierce kritya, her matted hair a mass of fiery flames," and, absorbed in playing at dice, playfully released his discus.

अध्याय ११४

श्लोक 37

तदग्निमालाजटिलज्वालोद्गारातिभीषणाम् कृत्याम् अनुजगामाशु विष्णुचक्रं सुदर्शनम्

tadagnimālājaṭilajvālodgārātibhīṣaṇām kṛtyām anujagāmāśu viṣṇucakraṃ sudarśanam

हिन्दी अर्थ

कुलीन पुरुषकी निष्कपट शुभ चेष्टाके समान मेघमण्डलमें बगुलोंकी निर्मल पंक्ति सुशोभित होने लगी विद्युत् आकाशमें स्थिर न रह सकी महामूर्ख मनुष्योंकी आच्छादित होकर अस्पष्ट हो गये उस समय उन्मत्त मयूर और चातकगणसे सुशोभित वे दोनों कभी गौओंके साथ वृक्षतलका आश्रय लेते हुए विचरते रहते थे

English

Vishnu's discus Sudarshana quickly pursued the kritya, most terrible with her matted locks of garlanded fire and her spewing flames.

अध्याय ११४

श्लोक 38

चक्रप्रतापविध्वस्ता कृत्या माहेश्वरी तदा ननाश वेगिनी वेगात् तद् अप्य् अनुजगाम ताम्

cakrapratāpavidhvastā kṛtyā māheśvarī tadā nanāśa veginī vegāt tad apy anujagāma tām

हिन्दी अर्थ

कभी तो कदम्बपुष्पोंके हारसे विचित्र वेष बना लेते, कभी मयूरपिच्छकी मालासे सुशोभित होते और कभी नाना प्रकारकी पर्वतीय धातुओंसे अपने शरीरको लिप्त कभी कुछ झपकी लेनेकी इच्छासे पत्तोंकी शय्यापर लेट जाते और कभी मेघके गर्जनेपर 'हा-हा' करके कोलाहल मचाने लगते गोपोंके गानेपर आप दोनों उसकी प्रशंसा करते और कभी ग्वालोंकी-सी बाँसुरी बजाते हुए मयूरकी बोलीका सायंकालके समय वे महाबली बालक वनमें यथायोग्य विहार करनेके अनन्तर गौ और ग्वाल-बालोंके साथ ब्रजमें लौट आते थे तरह अपने समवयस्क गोपगणके साथ देवताओंके समान क्रीडा करते हुए वे महातेजस्वी राम और कृष्ण वहाँ रहने

English

Shattered by the might of the discus, the kritya of Maheshvara then fled swiftly, and it pursued her with speed.

अध्याय ११४

श्लोक 39

कृत्या वाराणसीम् एव प्रविवेश त्वरान्विता विष्णुचक्रप्रतिहतप्रभावा मुनिसत्तम

kṛtyā vārāṇasīm eva praviveśa tvarānvitā viṣṇucakrapratihataprabhāvā munisattama

हिन्दी अर्थ

स जगामाथ कालिन्दीं लोलकल्लोलशालिनीम्। विलोक्य चिन्तयामास भगवान्मधुसूदन:॥ ५ एतदर्थ तु लोके5स्मिन्नवतार: कृतो मया। श्रीपराशरजी बोले--एक दिन रामको बिना तरंगोंसे शोभित यमुनाके तटपर जा पहुँचे जो किनारोंपर फेनके इकट्ठे हो जानेसे मानो सब ओरसे हँस रही कालियनागका महाभयंकर कुण्ड देखा विषाग्निके प्रसारसे किनारेके वृक्ष जल गये थे और वायुके थपेड़ोंसे उछलते हुए जलकणोंका स्पर्श होनेसे मृत्युके अपर मुखके समान उस महाभयंकर कुण्डको देखकर भगवान् मधुसूदनने विचार किया--

English

The kritya, her power checked by Vishnu's discus, hurriedly entered Varanasi itself, best of sages.

अध्याय ११४

श्लोक 40

ततः काशिबलं भूरि प्रमथानां तथा बलम् समस्तशस्त्रास्त्रयुतं चक्रस्याभिमुखं ययौ

tataḥ kāśibalaṃ bhūri pramathānāṃ tathā balam samastaśastrāstrayutaṃ cakrasyābhimukhaṃ yayau

हिन्दी अर्थ

“इसमें दुष्टात्मा कालियनाग रहता है जिसका विष ही गरुड-से पराजित हो समुद्रको छोड़कर भाग आया इसने इस समुद्रगामिनी सम्पूर्ण यमुनाको दूषित कर दिया है, अब इसका जल प्यासे मनुष्यों और गौओंके भी काममें नहीं आता है मुझे इस नागराजका दमन करना चाहिये, जिससे ब्रजवासी लोग निर्भय होकर सुखपूर्वक रह सकें “इन कुमार्गगामी दुरात्माओंको शान्त करना चाहिये, इसलिये ही तो मैंने इस लोकमें अवतार लिया अत: अब मैं इस ऊँची-ऊँची शाखाओंवाले पासहीके कदम्बवृक्षपर चढ़कर वायुभक्षी नागराजके कुण्डमें कूदता हूँ!

English

Then the great army of Kashi and likewise the army of the pramathas, equipped with every weapon and missile, went out against the discus.

अध्याय ११४

श्लोक 41

शस्त्रास्त्रमोक्षचतुरं दग्ध्वा तद् बलम् ओजसा कृत्यागर्भाम् अशेषां तां तदा वाराणसीं पुरीम्

śastrāstramokṣacaturaṃ dagdhvā tad balam ojasā kṛtyāgarbhām aśeṣāṃ tāṃ tadā vārāṇasīṃ purīm

हिन्दी अर्थ

श्रीपराशरजी बोले--हे मैत्रेय! ऐसा विचारकर भगवान् अपनी कमर कसकर वेगपूर्वक नागराजके आताप्रनयन: कोपाद्विषज्वालाकुलै्मुखे: एष मोहं गत: कृष्णो मग्नो वै कालियहदे। यशोदा च महाभागा बभूव मुनिसत्तम॥ २४ विना वृषेण का गावो विना कृष्णेन को ब्रज: ॥ २७ ठोंका; उनका शब्द सुनते ही वह नागराज तुरंत उनके हो रहे थे, मुखोंसे अग्निकी लपटें निकल रही थीं और वह महाविषेले अन्य वायुभक्षी सर्पोंसि घिरा हुआ था उसके साथमें मनोहर हारोंसे भूषिता और शरीर-कम्पनसे हिलते हुए कुण्डलोंकी कान्तिसे सुशोभिता सैकड़ों

English

Having burned by its might that army skilled in discharging weapons, Hari's discus then burned the whole city of Varanasi, which had borne the kritya,

अध्याय ११४

श्लोक 42

सभूभृद्भृत्यपौरां तु साश्वमातङ्गमानवाम् अशेषकोशकोष्ठां तां दुर्निरीक्ष्यां सुरैर् अपि

sabhūbhṛdbhṛtyapaurāṃ tu sāśvamātaṅgamānavām aśeṣakośakoṣṭhāṃ tāṃ durnirīkṣyāṃ surair api

हिन्दी अर्थ

तब सप्पोने कुण्डलाकार होकर कृष्णचन्द्रको अपने शरीरसे बाँध लिया और अपने विषाग्नि-सन्तप्त मुखोंसे काटने लगे हुआ और सर्पोके फणोंसे पीडित होता देख ब्रजमें चले आये और शोकसे व्याकुल होकर रोने लगे गोपगण बोले-- आओ, आओ, देखो । यह कृष्ण कालीदहमें डूबकर मूच्छित हो गया है, देखो इसे नागराज वज्रपातके समान उनके इन अमंगल वाक्योंको सुनकर गोपगण और यशोदा आदि गोपियाँ तुरंत ही कालीदहपर दौड़ आयीं रोती हुई गोपियाँ यशोदाके साथ शीघ्रतासे गिरती-पड़ती

English

with its king, servants and citizens, with its horses, elephants and men, with all its treasuries and granaries, hard to look upon even for the gods,

अध्याय ११४

श्लोक 43

ज्वालापरिष्कृताशेषगृहप्राकारचत्वराम् ददाह तद् धरेश् चक्रं सकलाम् एव तां पुरीम्

jvālāpariṣkṛtāśeṣagṛhaprākāracatvarām dadāha tad dhareś cakraṃ sakalām eva tāṃ purīm

हिन्दी अर्थ

विक्रमशाली बलरामजी भी कृष्णदर्शनकी लालसासे चंगुलमें फँसे हुए हैं और उसने उन्हें अपने शरीरसे लपेटकर निरुपाय कर दिया है हे मुनिसत्तम ! महाभागा यशोदा दशामें देखा तो वे शोकाकुल होकर रोने लगीं और भय गोपियाँ बोलीं--अब हम सब भी यशोदाके साथ इस सर्पराजके महाकुण्डमें ही डूबी जाती हैं, अब हमें ब्रजमें जाना उचित नहीं है

English

all its houses, walls and squares wreathed in flames — it burned the entire city.

अध्याय ११४

श्लोक 44

अक्षीणामर्षम् अत्यल्पसाध्यसाधनसस्पृहम् तच् चक्रं प्रस्फुरद्दीप्ति विष्णोर् अभ्याययौ करम्

akṣīṇāmarṣam atyalpasādhyasādhanasaspṛham tac cakraṃ prasphuraddīpti viṣṇor abhyāyayau karam

हिन्दी अर्थ

सूर्यके बिना दिन कैसा ? ही कृष्णके बिना ब्रजमें भी क्‍या रखा है? अरम्यं नातिसेव्यं च वारिहीनं यथा सर:॥ २८ तेनापि मातुर्वासेन रतिरस्तीति विस्मय:॥ २९ किमिदं देवदेवेश भावो5यं मानुषस्त्वया। कृष्णके बिना साथ लिये अब हम गोकुल नहीं नीलकमलदलकी-सी आभावाले ये श्यामसुन्दर हरि नहीं अरी! खिले हुए कमलदलके सदृश कान्तियुक्त प्रकार ब्रजमें रह सकोगी 2 मनोहर बोलीसे हमारे सम्पूर्ण मनोरथोंको अपने वशीभूत कर गोकुलको नहीं जायँगी

English

Its wrath undiminished, eager for more though little remained to be done, that discus of Vishnu, flashing with brilliance, returned to his hand.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_viSNupurANa-crit.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vishnu Purana — Chapter 114
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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