Vishnu Purana· Viṣṇu Purāṇa
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अध्याय 115 / 126

Book 5 - Adhyaya 35

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अध्याय ११५

श्लोक 1

[[इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमे ऽंशे चतुस्त्रिंशो ऽध्यायः ]] भूय एवाहम् इच्छामि बलभद्रस्य धीमतः श्रोतुं पराक्रमं ब्रह्मन् तन् ममाख्यातुम् अर्हसि

[[iti śrīviṣṇupurāṇe pañcame 'ṃśe catustriṃśo 'dhyāyaḥ ]] bhūya evāham icchāmi balabhadrasya dhīmataḥ śrotuṃ parākramaṃ brahman tan mamākhyātum arhasi

हिन्दी अर्थ

जो पुरुष भगवान् कृष्णके इस चरित्रको

English

Lait«eya said: — O Brahman, I have a great desire to listen to some other exploits of Balaráma ; do thou describe them unto nie. You have related to me, reverend Sir, his diagging the Yamuna ^nd other mighty deeds ; do thou now recount soine other of his acls.

अध्याय ११५

श्लोक 2

यमुनाकर्षणादीनि श्रुतानि भगवन् मया तत् कथ्यतां महाभाग यद् अन्यत् कृतवान् बलः

yamunākarṣaṇādīni śrutāni bhagavan mayā tat kathyatāṃ mahābhāga yad anyat kṛtavān balaḥ

हिन्दी अर्थ

अरी गोपियो ! देखो, सर्पराजके फणसे आवृत होकर भी श्रीकृष्णका मुख हमें देखकर मधुर मुसकानसे सुशोभित हो रहा है श्रीपराशरजी बोले---गोपियोंके ऐसे वचन सुनकर देखकर महाबली रोहिणीनन्दन बलरामजीने अपने संकेतमें कृष्णजीसे कहा-- ॥ ३३-३४ ॥ '' है देवदेवेश्वर ! क्या आप अपनेको अनन्त नहीं जानते ? फिर किसलिये यह अत्यन्त जिस प्रकार अरोंका आश्रय होती है उसी प्रकार आप तथा समस्त योगिजन आपहीका चिन्तन करते हैं हे जगन्नाथ ! संसारके हितके लिये पृथिवीका भार उतारनेकी इच्छासे ही आपने मर्त्यलोकमें अवतार लिया है; आपका अग्रज मैं भी आपहीका अंश हूँ

English

PaRasARA said: — Listen O Maitreya, to the exploits accomplished by Ráma who is the eternal, illimitable Sesha, the upholder of the earth. At the clioice of a husband by the daughter of Duryodhana, the piinces* wastaken away by thc hero Sfimba, the son of Jámvavati. Being pursued by Duryo- dhana, Karna, Bhislima, Drona and other illustrious chiefs wao were enraged for his audacity, he was defeated and taken prisoner. When the Yádavas heard of this event they were greatly enraged with Duryodhana and his companions and addressed themselves to fight with them. But Baladeva, in accents suppressed by the effects of inebriety, forbade them and said. "I will go alone to the sons of Kuru and at my reques.1 they will let Sámba.free. Accordingly he went to Hastíná- pur and took hís abode in a grove outside the town which he did not enter. When Duryodhana and others were in- formed of his arrival, they sent him a cow, a present of fruita and flowers and water. Bala received the offerihg in t'ie customary form and said to the descendants of Kuru "Ugrasena commands you to liberate Sámba." When Duryodhana, Karná, Bhíshma, Ðrpna and others hearJ thisj

अध्याय ११५

श्लोक 3

मैत्रेय श्रूयतां कर्म यद् रामेणाभवत् कृतम् अनन्तेनाप्रमेयेन शेषेण धरणीभृता

maitreya śrūyatāṃ karma yad rāmeṇābhavat kṛtam anantenāprameyena śeṣeṇa dharaṇībhṛtā

हिन्दी अर्थ

मनुष्य-लीला करनेपर ये गोपवेषधारी समस्त देवगण भी आपकी लीलाओंका अनुकरण करते हुए आपहीके साथ देवांगनाओंको गोपीरूपसे गोकुलमें अवतीर्णकर पीछे आपने अवतार लिया है हे कृष्ण! यहाँ अवतीर्ण होनेपर हम दोनोंके तो ये गोप और गोपियाँ ही बान्धव हैं; फिर अपने इन दुःखी बान्धवोंकी आप क्‍यों उपेक्षा करते हे कृष्ण! यह मनुष्यभाव और बालचापल्य तो आप बहुत दिखा चुके, अब तो शीघ्र ही इस दुष्टात्माका जिसके शस्त्र दाँत ही हैं, दमन कीजिये”' कारणं कालियस्यास्य दमने श्रूयतां वच: ॥ ५३ श्रीपराशरजी बोले---इस प्रकार स्मरण कराये जानेपर, मधुर मुसकानसे अपने ओष्ठसम्पुटको खोलते बन्धनसे छुड़ा लिया

English

they were worked up with ire, and BShlika and other frlends of the Kauraras who considered tyP^adu race as having no

अध्याय ११५

श्लोक 4

दुर्योधनस्य तनयां स्वयंवरकृतक्षणाम् बलाद् आदत्तवान् वीरः साम्बो जाम्बवतीसुतः

duryodhanasya tanayāṃ svayaṃvarakṛtakṣaṇām balād ādattavān vīraḥ sāmbo jāmbavatīsutaḥ

हिन्दी अर्थ

हाथोंसे उसका बीचका फण झुकाकर उस नतमस्तक सर्पके ऊपर चढ़कर बड़े वेगसे नाचने लगे गये, वह अपने जिस मस्तकको उठाता उसीपर कूदकर भगवान् वह महासर्प मूरछित हो गया और उसने बहुत-सा रुधिर वमन इस प्रकार उसके सिर और ग्रीवाओंको झुके हुए तथा मुखोंसे रुधिर बहता देख उसकी पत्नियाँ करुणासे नागपत्नियाँ बोलीं --हे देवदेवेश्वर ! हमने आपको और परम ज्योति है आप उसीके अंश परमेश्वर हैं

English

is this, Balaráma, that thou ha« b|| What Yadava shall command the chiefs of the KuruEwW H Ugrasena thus commands the Kuravas, we vvilTnj|fj away the white um- brella which he has usurped and which is only fit for the kings. You should go away therefore, Balarama ; you are entitled to our respect ; but Sámba has been guilty of an improper conduct and we shall not let him free either at Ugrasena's commands or yours. The Kukkura and Andhaka races might not pay the homage due to us,' their superiors, but who ever heard of a servant commanding* his master? You.have been rendered arrogant by our treating, you equally .with seat and food ; we have committed •Vgrej»t'.«aistáke in neglecting the policy, for our great friendship, íát 1 yoa, Klhe present that we sent you-today 'was a sígn föf. peráönal regard, but it was not fit for us to have offered áor for jioura to bave expected."

अध्याय ११५

श्लोक 5

ततः क्रुद्धा महावीर्याः कर्णदुर्योधनादयः भीष्मद्रोणादयश् चैनं बबन्धुर् युधि निर्जितम्

tataḥ kruddhā mahāvīryāḥ karṇaduryodhanādayaḥ bhīṣmadroṇādayaś cainaṃ babandhur yudhi nirjitam

हिन्दी अर्थ

छोटे-से-छोटा अंश है, उसकी स्तुति हम किस प्रकार कर योगिजन जिनके नित्यस्वरूपको यत्न करनेपर भी नहीं जान पाते तथा जो परमार्थरूप अणुसे भी अणु और स्थूलसे भी स्थूल है उसे हम नमस्कार करती हैं जिनके जन्ममें विधाता और अन्तमें काल हेतु नहीं हैं तथा इस कालियनागके दमनमें आपको थोड़ा-सा भी क्रोध नहीं है, केवल लोकरक्षा ही इसका हेतु है; अत: हमारा निवेदन सुनिये सदा ही कृपा करनी चाहिये; अत: आप इस दीनका अपराध क्षमा कीजिये

English

Having said this, the Kuru chiefs unanimousfy refused to liberate Hari's sons and came back to' their city. Moving about with intoxication and anger cau$(5d. by their insoient words, Bala struck the ground furiously with his heel so that ít burst to pieces with a loud, sound that reverberated through the regions of space. His eyes reddened wíHif rage and his brow curved, with frowns he exclairaed. 'What pride is this in such vile and pithless creatures. The sovereignty of Kauravas as well as our own is the work of destiny whose decreeit alsois that they now disrespect or disobey the commands of Ugrasena. Indra may, as is his right, eommand the celestials and Ugrasena exercises equal authorky with the lq^d^fjgachi. Fie upon the pride that boasts a throne, "fljf leafrings >of >a ftuw&red mortals. Is not he the sovereign of '&e. eárth, the wiws' é|. %hose servants adorn themseíves with the blossams of the ; P>r|íta tree ? Ugrasena shall be the

अध्याय ११५

श्लोक 6

तच् छ्रुत्वा यादवाः सर्वे क्रोधं दुर्योधनादिषु मैत्रेय चक्रुश् चक्रुश् च तान् निहन्तुं महोद्यमम्

tac chrutvā yādavāḥ sarve krodhaṃ duryodhanādiṣu maitreya cakruś cakruś ca tān nihantuṃ mahodyamam

हिन्दी अर्थ

प्रभो ! आप सम्पूर्ण संसारके बलहीन है। आपके चरणोंसे पीडित होकर तो यह आधे मुहूर्तमें ही अपने प्राण छोड़ देगा जाते हैं; फिर कहाँ तो यह अल्पवीर्य सर्प और कहाँ प्रसीद देवदेवेति प्राह वाक्य शने: शने: ॥ ६० यस्यावताररूपाणि देवराजस्सदार्चति। सो5हं ते देवदेवेश नार्चनादौ स्तुतौ न च। अत: है जगत्स्वामिन्! इस दीनपर दया कीजिये। है प्रभो! अब यह नाग अपने प्राण छोड़ने ही चाहता है; कृपया हमें पतिकी भिक्षा दीजिये भुवनेश्वर ! है जगन्नाथ है महापुरुष ! है पूर्वज! यह नाग अब अपने प्राण छोड़ना ही चाहता है; कृपया आप हमें पतिकी भिक्षा दीजिये हे वेदान्तवेद्यदेवेश्वर ! हे दुष्ट-हैत्य-दलन !! अब यह नाग अपने प्राण छोड़ना ही चाहता है; आप हमें पतिकी भिक्षा दीजिये

English

tlndísrjuted lord of kings ; for I will not return to his capital until í have rid tbe. wpd^fholly of the sons of Kuru. I will destfoy Karna, .tí|w|£{jana, Drona, Bhisma, Bahlika, Dussasana, Bhurisravá'J^Ravatya, Salya, Bhima, Arjuna, Yudhishthira, the tvruafypi all the other wretched sons of Kuru with their horáes, elephants and chariots, I will liberate the hero Sámba, and carry him along wlth his wife to DwSraka where 1 shall again hehold Ugrasena and the rest of my kinsmen. Or commanded by the king of celestials. to remove the burden of the earth, I will take this capital of rhe KaUravas with all the sons of Kuru, and throw Hastinápur into the Bhagirathi."

अध्याय ११५

श्लोक 7

तान् निवार्य बलः प्राह मदलोलकलाक्षरम् मोक्ष्यन्ति ते मद्वचनाद् यास्याम्य् एको हि कौरवान्

tān nivārya balaḥ prāha madalolakalākṣaram mokṣyanti te madvacanād yāsyāmy eko hi kauravān

हिन्दी अर्थ

श्रीपराशरजी बोले--नागपत्नियोंके ऐसा कहनेपर थका-माँदा होनेपर भी नागराज कुछ ढाँढडस बाँधकर धीरे-धीरे कहने लगा “हे देवदेव ! प्रसन्‍न होइये'” कालियनाग बोला--हे नाथ ! आपका स्वाभाविक आपसे बढ़कर किसीका भी ऐश्वर्य नहीं है, अतः मैं किस प्रकार आपकी स्तुति कर सकूँगा ? पर हैं, आप पर (मूलप्रकृति)-के भी आदिकारण हैं, हे परात्मक! परकी प्रवृत्ति भी आपहीसे हुई है,अतः आप परसे भी पर हैं फिर मैं किस प्रकार आपकी स्तुति अवयवका एक सूक्ष्म अवयवांशमात्र है, उन आपकी मैं किस प्रकार स्तुति कर सकूँगा 2 आदि देवेश्वरगण भी नहीं जानते उन आपकी में किस प्रकार स्तुति कर सकूँगा 2

English

Saying this with his eyes reddened with ire, Baladeva, the wielder of tbe cluþ, plunged the blade of his ploughshare downwardi'hfneaththe ramparts of the city, and drew them towardá him. ' When ÍKe Kauravas beheld HastinSpur totter- ing, they were much afraid, andcalled loudly on Ráma.saying, "0 Kama! Ráma-! hold, hold; supress your anger and have compassion upon us. Here is Sámba and his wife also delivered up to you. Forgive the sins committed by us ignörantof your wondrous power." Accordingly the Kauravas burried out of the ciíy and delivered Sámba and his wife to the mighty Balarama, 'who, bowiug to Bhisma, Drona and Kripa, who pacified him, said, " I am satisfied," and desisted. Fhe citý baars the mark of the shock even to the present day — such was the might of Rama proving both his strength ind power. The Kauravas then, offering homage to Samba ind Bala, sent away the former with his wife and dowry.

अध्याय ११५

श्लोक 8

बलदेवस् ततो गत्वा नगरं नागसाह्वयम् बाह्योपवनमध्ये ऽभून् न विवेश च तत् पुरम्

baladevas tato gatvā nagaraṃ nāgasāhvayam bāhyopavanamadhye 'bhūn na viveśa ca tat puram

हिन्दी अर्थ

जिनकी पूजा ब्रह्मा आदिसे करते हैं उन आपकी मैं किस प्रकार पूजा कर देवराज इन्द्र जिनके अवताररूपोंकी सर्वदा पूजा करते हैं तथापि यथार्थ रूपको नहीं जान पाते, उन आपकी मैं किस प्रकार पूजा कर सकता योगिगण अपनी समस्त इन्द्रियॉँको उनके विषयोंसे खींचकर जिनका ध्यानद्वारा पूजन करते हैं, उन आपकी मैं किस प्रकार पूजा कर सकता हूँ जिन प्रभुके स्वरूपकी चित्तमें भावना करके योगिजन भावमय पुष्प आदिसे ध्यानद्वारा उपासना करते हैं उन आपको मैं किस प्रकार पूजा कर सकता हूँ? हे देवेश्वर! आपकी पूजा अथवा स्तुति करनेमें मैं सृज्यते भवता सर्व तथा संहियते जगत्। जीवितं दीयतामेकमाज्ञापय करोमि किम्॥ ७६ कृपाकी ओर ही लगी हुई है, अत: आप मुझपर प्रसन्न

English

Then Baladeva went to the city named after the elephant and stayed in the middle of an outer garden, not entering the city.

अध्याय ११५

श्लोक 9

बलम् आगतम् आज्ञाय भूपा दुर्योधनादयः गाम् अर्घ्यम् उदकं चैव रामाय प्रत्यवेदयन्

balam āgatam ājñāya bhūpā duryodhanādayaḥ gām arghyam udakaṃ caiva rāmāya pratyavedayan

हिन्दी अर्थ

हे केशव! मेरा जिसमें जन्म हुआ है वह है। है अच्युत! इसमें मेरा कोई अपराध नहीं है इस सम्पूर्ण जगत्की रचना और संहार आप ही करते हैं। संसारकी रचनाके साथ उसके जाति, रूप और स्वभावोंको भी आप ही बनाते हैं हे ईश्वर ! आपने मुझे जाति, रूप और स्वभावसे युक्त करके जैसा बनाया है उसीके अनुसार मैंने यह चेष्टा भी हे देवदेव ! यदि मेरा आचरण विपरीत हो तब तो अवश्य आपके कथनानुसार मुझे दण्ड देना उचित दण्ड दिया है वह आपसे मिला हुआ दण्ड मेरे लिये कहीं अच्छा है, किन्तु दूसरेका वर भी अच्छा नहीं

English

Learning that Bala had come, the kings Duryodhana and the others offered Rama a cow, guest-water and water.

अध्याय ११५

श्लोक 10

गृहीत्वा विधिवत् सर्वं ततस् तान् आह कौरवान् आज्ञापयत्य् उग्रसेनः साम्बम् आशु विमुञ्चत

gṛhītvā vidhivat sarvaṃ tatas tān āha kauravān ājñāpayaty ugrasenaḥ sāmbam āśu vimuñcata

हिन्दी अर्थ

अच्युत।! आपने मेरे पुरुषार्थ और विषको नष्ट करके मेरा भली प्रकार मानमर्दन कर दिया है। अब केवल मुझे प्राणदान दीजिये और आज्ञा कीजिये कि मैं क्या करूँ ? श्रीभगवान् बोले--हे सर्प ! अब तुझे इस यमुनाजलमें नहीं रहना चाहिये। तू शीघ्र ही अपने पुत्र और परिवारके सहित समुद्रके जलमें चला जा चरण-चिहनोंको देखकर समुद्रमें रहते हुए भी सर्पोंका शत्रु गरुड तुझपर प्रहार नहीं करेगा श्रीपराशरजी बोले--सर्पराज कालियसे ऐसा कह भगवान् हरिने उसे छोड़ दिया और वह उन्हें प्रणाम करके चला गया ॥ ७९-८० ॥ सर्पके चले जानेपर गोपगण, लौटे उनके मस्तकको नेत्रजलसे भिगोने लगे तदनन्तर अपने उत्तम चरित्रोंके कारण गोपियोंसे

English

Having duly accepted all this, he said to the Kauravas: "Ugrasena commands: release Samba at once."

अध्याय ११५

श्लोक 11

ततस् ते तद्वचः श्रुत्वा भीष्मद्रोणादयो द्विज कर्णदुर्योधनाद्याश् च चुक्रुधुर् द्विजसत्तम

tatas te tadvacaḥ śrutvā bhīṣmadroṇādayo dvija karṇaduryodhanādyāś ca cukrudhur dvijasattama

हिन्दी अर्थ

गा: पालयन्तौ च पुन: सहितो बलकेशवौ। तत्तु तालवनं दिव्यं धेनुको नाम दानव:। हे राम है कृष्ण सदा थेनुकेनेष रक्ष्यते। इति गोपकुमाराणां श्रुत्वा संकर्षणो बच: । उस दिव्य तालवनमें धेनुक नामक एक गधेके आकारवाला देत्य मृगमांसका आहार करता हुआ सदा रहा करता था गोपोंने कहा--भेया राम और कृष्ण! इस भूमिप्रदेशकी रक्षा सदा धेनुकासुर करता है, इसीलिये यहाँ ऐसे पके-पके फल लगे हुए हैं गन्धसे सम्पूर्ण दिशाओंको आमोदित करनेवाले ये ताल-फल तो देखो; हमें इन्हें खानेकी इच्छा है; यदि आपको अच्छा लगे तो थोड़े-से झाड़ दीजिये श्रीपराशरजी बोले--गोपकुमारोंके ये वचन सुनकर बलरामजीने "ऐसा ही करना चाहिये” यह कहकर

English

Hearing these words, Bhishma, Drona and the others, brahmin, Karna, Duryodhana and the rest grew angry, best of the twice-born.

अध्याय ११५

श्लोक 12

ऊचुश् च कुपिताः सर्वे बाह्लिकाद्याश् च कौरवाः अराज्यार्हं यदोर् वंशम् अवेक्ष्य मुसलायुधम्

ūcuś ca kupitāḥ sarve bāhlikādyāś ca kauravāḥ arājyārhaṃ yador vaṃśam avekṣya musalāyudham

हिन्दी अर्थ

गिरते हुए फलॉंका शब्द सुनकर पैरोंसे बलरामजीकी छातीमें लात मारी। बलरामजीने उसके उन पैरोंको पकड़ लिया और आकाशमें घुमाने लगे। जब वह निर्जीव हो गया तो उसे उसके सजातीय अन्य गर्दभासुरोंके हे मैत्रेय! इस प्रकार एक क्षणमें ही पके हुए तालफलों और गर्दभासुरोंके देहोंसे विभूषिता होकर पृथिवी अत्यन्त सुशोभित होने हे टद्विज! तबसे उस तालवनमें गौएँ निर्विघ्न होकर सुखपूर्वक नवीन तृण चरने लगीं जो उन्हें पहले कभी चरनेको नसीब नहीं हुआ था तस्मिन् रासभहैतेये सानुगे विनिपातिते। ततस्तोौ जातहषों तु वसुदेवसुतावुभौ। हत्वा धेनुकहैतेयं भाण्डीरवटमागतौ॥ २ श्रीपराशरजी बोले--अपने अनुचरोंसहित

English

All the Kauravas, Bahlika and the others, spoke in anger, regarding the line of Yadu as unfit for kingship, to the club-armed one:

अध्याय ११५

श्लोक 13

भो भोः किम् एतद् भवता बलभद्रेरितं वचः आज्ञां कुरुकुलोत्थानां यादवः कः प्रदास्यति

bho bhoḥ kim etad bhavatā balabhadreritaṃ vacaḥ ājñāṃ kurukulotthānāṃ yādavaḥ kaḥ pradāsyati

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर धेनुकासुरको मारकर वे दोनों बसुदेवपुत्र कन्धेपर गौ बाँधनेकी रस्सी डाले और वनमालासे विभूषित हुए वे दोनों महात्मा बालक सिंहनाद करते, गाते, वृक्षोंपर चढ़ते, दूरतक गौएँ चराते तथा उनका नाम ले-लेकर पुकारते हुए नये सींगोंवाले लोकपालोंके प्रभु पृथिवीपर अवतीर्ण होकर नाना प्रकाकी लौकिक लीलाओंसे परस्पर खेल रहे सम्मान करते हुए वे मनुष्यजातिके गुणोंकी क्रीडाएँ करते हुए वनमें विचर रहे थे बालक कभी झूलामें झूलकर, कभी परस्पर मल्लयुद्धकर और कभी पत्थर फेंककर नाना प्रकारसे व्यायाम

English

"Ho, what is this speech you have uttered, Balabhadra? What Yadava shall give commands to those born of the Kuru line?

अध्याय ११५

श्लोक 14

उग्रसेनो ऽपि यद्य् आज्ञां कौरवाणां प्रदास्यति तद् अलं पाण्डुरैश् छत्रैर् नृपयोग्यैर् विडम्बितैः

ugraseno 'pi yady ājñāṃ kauravāṇāṃ pradāsyati tad alaṃ pāṇḍuraiś chatrair nṛpayogyair viḍambitaiḥ

हिन्दी अर्थ

इसी समय उन दोनों खेलते हुए बालकोंको उठा ले जानेकी इच्छासे प्रलम्ब नामक हैत्य गोपवेषमें अपनेको छिपाकर वहाँ आया धारणकर निश्शंकभावसे उन बालकोंके बीच घुस उन दोनोंकी असावधानताका अवसर देखनेवाले उस हैत्यने कृष्णको तो सर्वथा अजेय समझा; अतः उसने बलरामजीको मारनेका निश्चय एक निश्चित लक्ष्यके पास दो-दो बालक एक-एक साथ हिरनकी भाँति उछलते हुए जाते हैं। जो दोनोंमें पहले पहुँच जाता है वह विजयी होता है, हारा हुआ बालक जीते हुएको अपनी पीठपर चढ़ाकर मुख्य स्थानतक ले आता है। यही वव॒धे स महाकायः प्रावृषीव बलाहकः ॥ १७ केनापि पश्य हैत्येन गोपालच्छडारूपिणा॥ २० उस खेलमें जो-जो बालक हाोरे थे, वे सब जीतनेवालोंको अपने-अपने कन्धोंपर चढ़ाकर भाण्डीरवटतक ले जाकर वहाँसे फिर लौट आये

English

If even Ugrasena is to give commands to the Kauravas, then enough of these white umbrellas fit for kings, which are made a mockery.

अध्याय ११५

श्लोक 15

तद् गच्छ बल मा वा त्वं साम्बम् अन्यायचेष्टितम् विमोक्ष्यामो न भवतो नोग्रसेनस्य शासनात्

tad gaccha bala mā vā tvaṃ sāmbam anyāyaceṣṭitam vimokṣyāmo na bhavato nograsenasya śāsanāt

हिन्दी अर्थ

रोहिणीनन्दन श्रीबलभद्रजीके भारको सहन न कर सकनेके कारण वर्षाकालीन मेघके समान बढ़कर अत्यन्त आभूषण धारण किये, सिरपर मुकुट पहने, गाड़ीके पहियोंके समान भयानक नेत्रोंवाले, अपने पादप्रहारसे पृथिवीको कम्पायमान करते हुए तथा दग्धपर्वतके समान आकारवाले उस हैत्यको देखकर उस निर्भय मुझे क्या करना चाहिये, यह बतलाओ। देखो, यह दुरात्मा बड़ी शीघ्रतासे दौड़ा जा रहा है'” श्रीपराशरजी बोले--तब रोहिणीनन्दनके मुसकानसे अपने ओष्ठसम्पुटको खोलते हुए उन मानवभाव क्‍यों अवलम्बन कर रहे हैं?

English

So go, Bala, or not; we shall not release Samba, who acted unjustly, at your command or Ugrasena's.

अध्याय ११५

श्लोक 16

प्रणतिर् या कृतास्माकं मान्यानां कुकुरान्धकैः ननाम सा कृता केयम् आज्ञा स्वामिनि भृत्यतः

praṇatir yā kṛtāsmākaṃ mānyānāṃ kukurāndhakaiḥ nanāma sā kṛtā keyam ājñā svāmini bhṛtyataḥ

हिन्दी अर्थ

आप अपने उस स्वरूपका स्मरण कीजिये जो समस्त संसारका कारण तथा कारणका भी पूर्ववर्ती है और प्रलयकालमें भी स्थित रहनेवाला है क्या आपको मालूम नहीं है कि आप और मैं दोनों ही इस संसारके एकमात्र कारण हैं और पृथिवीका भार उतारनेके लिये ही मर्त्यलोकमें आये हैं है अनन्त! आकाश आपका सिर है, मेघ केश देवेरशेषैरवताररूपम् । कृतादिभेदेरज कालरूपो अत्तं यथा बाडववह्निनाम्बु हे भगवन्)! आप महाकाय हैं, आपके सहस््र मुख हैं तथा सहस्रों हाथ, पाँव आदि शरीरके भेद हैं। आप सहसीरों ब्रह्माओंके आदिकारण हैं, मुनिजन आपका सहस्ं्रों प्रकार वर्णन करते हैं आपके दिव्य रूपको आपके अतिरिक्त और कोई नहीं जानता, अत: समस्त देवगण आपके अवताररूपकी ही उपासना करते हैं। क्या आपको विदित नहीं है

English

The obeisance that the Kukuras and Andhakas made to us, who are to be honoured, they have made; what is this command from servant to master?

अध्याय ११५

श्लोक 17

गर्वम् आरोपिता यूयं समानासनभोजनैः को दोषो भवतां नीतिर् यत् प्रीत्या नावलोकिता

garvam āropitā yūyaṃ samānāsanabhojanaiḥ ko doṣo bhavatāṃ nītir yat prītyā nāvalokitā

हिन्दी अर्थ

हे अनन्तमूर्त! आपहीसे धारण को हुई यह पृथिवी सम्पूर्ण चराचर विश्वको धारण करती है। है अज! निमेषादि कालस्वरूप आप ही कृतयुग आदि भेदोंसे इस जगत्का ग्रास करते जिस प्रकार बडवानलसे पीया हुआ जल वायुद्वारा हिमालयतक पहुँचाये जानेपर हिमका रूप धारण कर लेता है और फिर सूर्यकिरणोंका संयोग होनेसे जलरूप हो जाता है, उसी प्रकार अत: है अमेयात्मन! आप अपने स्वरूपको स्मरण कीजिये और मनुष्यभावका ही अवलम्बन कर इस देत्यको मारकर बन्धुजनोंका हित-साधन श्रीपराशरजी बोले--हे विप्र! महात्मा महाबलवान् बलरामजी हँसते हुए प्रलम्बासुरको उन्होंने क्रोधसे नेत्र लाल करके उसके मस्तकपर एक घूँसा मारा, जिसकी चोटसे उस हैत्यके दोनों नेत्र बाहर निकल आये

English

You have been made proud by sharing seats and meals with us; what fault is ours, that policy was not observed out of affection?

अध्याय ११५

श्लोक 18

अस्माभिर् अर्घो भवतो यो ऽयं बल निवेदितः प्रेम्णैतन् नैतद् अस्माकं कुलाद् युष्मत्कुलोचितम्

asmābhir argho bhavato yo 'yaṃ bala niveditaḥ premṇaitan naitad asmākaṃ kulād yuṣmatkulocitam

हिन्दी अर्थ

जानेपर मुखसे रक्त वमन करता हुआ पृथिवीपर गिर अद्भुतकर्मा बलरामजीद्वारा 'साधु, साधु” कहते हुए उनकी प्रशंसा करने लगे होते हुए कृष्णचन्द्रके साथ गोकुलमें लौट आये शरद्वर्णन तथा गोवर्धनकी पूजा तयोर्विंहरतोरेवं रामकेशवसयोर्त्रजे । असारतां परिज्ञाय संसारस्येव योगिन:॥ श्रीपराशरजी बोले--इस प्रकार उन राम और सन्‍्ताप पाते हैं, उसी प्रकार मछलियाँ गड्ढोंके जलमें

English

This guest-offering we presented to you, Bala, was out of love; it is not what befits your family from ours."

अध्याय ११५

श्लोक 19

इत्य् उक्त्वा कुरवः सर्वे न मुञ्चामो हरेः सुतम् कृतैकनिश्चयास् तूर्णं विविशुर् गजसाह्वयम्

ity uktvā kuravaḥ sarve na muñcāmo hareḥ sutam kṛtaikaniścayās tūrṇaṃ viviśur gajasāhvayam

हिन्दी अर्थ

संसारकी असारताको जानकर जिस प्रकार योगिजन शान्त हो जाते हैं, उसी प्रकार मयूरगण मदहीन होकर मौन हो गये विज्ञानिगण सब प्रकारकी ममता छोड़कर जैसे घरका त्याग कर देते हैं, वैसे ही आकाशमण्डलका परित्याग कर दिया ममता करनेसे जैसे देहधारियोंके हृदय सारहीन हो जाते हैं वैसे ही शरत्कालीन सूर्यके तापसे सरोवर सूख गये प्रकार साधु-कुलमें चरम-देह-धारी योगी सुशोभित होता पूर्णचन्द्र विराजमान हुआ विवेकीजन शनै:-शनै: त्याग देते हैं, वैसे ही जलाशयोंका जल धीरे-धीरे अपने तटको छोड़ने लगा

English

Having said this, all the Kurus, firmly resolved, "We shall not release Hari's son," quickly entered the elephant city.

अध्याय ११५

श्लोक 20

मत्तः कोपेन चाघूर्णस् ततो ऽधिक्षेपजन्मना उत्थाय पार्ष्ण्या वसुधां जघान स हलायुधः

mattaḥ kopena cāghūrṇas tato 'dhikṣepajanmanā utthāya pārṣṇyā vasudhāṃ jaghāna sa halāyudhaḥ

हिन्दी अर्थ

अभ्यस्यते5नुदिवरसं रेचकाकुम्भकादिभि: ॥ १५ को5यं शक्रमखो नाम येन वो हर्ष आगत: । मेघानां पयसां चेशो देवराजश्शतक्रतु: । क्लेशों से पुनः संयोग हो जाता है उसी प्रकार पहले कर लेनेपर जैसे यति निश्चलात्मा हो जाता है, वैसे ही जलके स्थिर हो जानेसे समुद्र निश्चल हो गया मेधावी पुरुषोंके चित्त शान्त हो जाते हैं वैसे ही समस्त जलाशयोंका जल स्वच्छ हो गया कारण मेघोंके लीन हो जानेसे आकाश निर्मल हो गया जिस प्रकार अहंकारजनित महान् दुःखको विवेक शान्त तापको चन्द्रमाने शान्त कर दिया

English

Then, intoxicated and reeling with anger born of the insult, the plough-armed one rose and struck the earth with his heel.

अध्याय ११५

श्लोक 21

ततो विदारिता पृथ्वी पार्ष्णिघातान् महात्मनः आस्फोटयाम् आस तदा दिशः शब्देन पूरयन्

tato vidāritā pṛthvī pārṣṇighātān mahātmanaḥ āsphoṭayām āsa tadā diśaḥ śabdena pūrayan

हिन्दी अर्थ

इन्द्रियोंको उनके विषयोंसे खींच लेता है वैसे ही शरत्कालने आकाशसे मेघोंको, पृथिवीसे धूलिको और जलसे मलको दूर कर दिया कारण मानो तालाबोंके जल पूरक कर चुकनेपर अब स्थिर रहने और सूखनेसे रात-दिन कुम्भक एवं रेचक महामति कृष्णने उन गोपोंको उत्सवकी बड़े-बूढ़ोंसे पूछा-- '' आपलोग जिसके लिये फूले आदरपूर्वक पूछनेपर उनसे नन्दगोपने कहा-- नन्दगोप बोले--मेघ और जलका स्वामी देवराज

English

The earth was split by the heel-blow of the great-souled one; he clapped his arms, filling the quarters with the sound,

अध्याय ११५

श्लोक 22

उवाच चातिताम्राक्षो भृकुटीकुटिलाननः

uvāca cātitāmrākṣo bhṛkuṭīkuṭilānanaḥ

हिन्दी अर्थ

हम और अन्य समस्त देहधारी उस वर्षसे लाते हुए देवताओंको भी तृप्त करते हैं बलेश पाँच हैं; जैसे-- नवयं कृषिकर्त्तारो वाणिज्याजीविनो न च। गावोउस्महैवत॑ तात वयं वनचरा यतः॥ २६ सैव पूज्यार्चनीया च सैव तस्योपकारिका ॥ ३० उसपर कभी अन्न और तृणका अभाव नहीं होता और न कभी वहाँके लोग भूखे रहते ही देखे जाते हैं पृथिवीपर बरसा देते हैं। इसलिये वर्षा ऋतुमें समस्त ऐसे वचन सुनकर श्रीदामोदर देवराजको कुपित करनेके लिये ही इस प्रकार कहने लगे-- तो कृषक हैं और न व्यापारी, हमारे देवता तो गौएं ही हैं; क्योंकि हमलोग वनचर हैं

English

and spoke, his eyes deep red, his face twisted with frowning brows:

अध्याय ११५

श्लोक 23

अहो मदावलेपो ऽयम् असाराणां दुरात्मनाम् कौरवाणाम् आधिपत्यम् अस्माकं किल कालजम् उग्रसेनस्य येनाज्ञां मन्यन्ते ऽद्यापि लङ्घनम्

aho madāvalepo 'yam asārāṇāṃ durātmanām kauravāṇām ādhipatyam asmākaṃ kila kālajam ugrasenasya yenājñāṃ manyante 'dyāpi laṅghanam

हिन्दी अर्थ

हैं, इनमेंसे केवल वार्ताका विवरण सुनो वार्ता नामकी विद्या कृषि, वाणिज्य और पशुपालन इन तीन वृत्तियोंकी आश्रयभूता है भेदोंमेंसे कृषि किसानोंकी, वाणिज्य व्यापारियोंकी और गोपालन हमलोगोंकी उत्तम वृत्ति है जिस विद्यासे युक्त है उसकी वही इष्टदेवता है, वही पूजा-अचकि योग्य है और वही परम उपकारिणी है जो पुरुष एक व्यक्तिसे फल-लाभ करके अन्यकी पूजा करता है, उसका इहलोक अथवा परलोकमें कहीं भी

English

"Oh, this arrogance of intoxication of the worthless, wicked Kauravas! Our sovereignty, it seems, is a matter of time, since they still regard Ugrasena's command as something to be transgressed.

अध्याय ११५

श्लोक 24

आज्ञां प्रतीच्छेद् धर्मेण सह देवैः शचीपतिः मारुतस्य मते स्थित्वा तुष्टे राज्ञां सभां ददौ समध्यास्ते सुधर्मां ताम् उग्रसेनः शचीपतेः उग्रसेनः समध्यास्ते सुधर्मां न शचीपतिः

ājñāṃ pratīcched dharmeṇa saha devaiḥ śacīpatiḥ mārutasya mate sthitvā tuṣṭe rājñāṃ sabhāṃ dadau samadhyāste sudharmāṃ tām ugrasenaḥ śacīpateḥ ugrasenaḥ samadhyāste sudharmāṃ na śacīpatiḥ

हिन्दी अर्थ

खेतोंके अन्तमें सीमा है तथा सीमाके पर्वत ही हमारी परमगति हैं तथा भित्तिके अन्दर रहनेवाले हैं और न निश्चित गृह अथवा खेतवाले किसान ही हैं, बल्कि वन-पर्वतादिमें समस्त जनसमुदायमें सुखी हैं अत: गृहस्थ किसानोंकी भाँति हमें इन्द्रकी पूजा करनेका कोई काम नहीं '” “सुना जाता है कि इस वनके पर्वतगण कामरूपी (इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले) हैं। वे मनोवांछित रूप धारण करके अपने-अपने शिखरोंपर विहार किया शाम हो जाती है वहीं रह जाते हैं। अतः उन्हें 'सायंगृह' भी कहते हैं। जब कभी वनवासीगण इन गिरिदेवोंको किसी यदा चेतै: प्रबाध्यन्ते तेषां ये काननौकस: । तरहकी बाधा पहुँचाते हैं तो वे सिंहादि रूप धारणकर कृषकगण सीरयज्ञ (हलका पूजन) करते हैं, अत: पर्वत और वनोंमें रहनेवाले हमलोगोंको गिरियज्ञ और गोयज्ञ

English

The lord of Shachi, with the gods, should accept his command in accordance with dharma; ... Ugrasena presides over Sudharma, not the lord of Shachi.

अध्याय ११५

श्लोक 25

धिङ् मनुष्यशतोच्छिष्टे तुष्टिर् एषां नृपासने पारिजाततरोः पुष्पमञ्जरीर् वनिताजनः बिभर्ति यस्य भृत्यानां सो ऽप्य् एषां न महीपतिः

dhiṅ manuṣyaśatocchiṣṭe tuṣṭir eṣāṃ nṛpāsane pārijātataroḥ puṣpamañjarīr vanitājanaḥ bibharti yasya bhṛtyānāṃ so 'py eṣāṃ na mahīpatiḥ

हिन्दी अर्थ

' अतएवं आपलोग विधिपूर्बक मेध्य पशुओंकी बलि इस विषयमें और अधिक सोच-विचार मत करो शरद्-ऋतुके पुष्पोंसे सजे हुए मस्तकवाली गौएँ गिरिराजकी मेरी इस सम्मतिके अनुसार कार्य करेंगे तो इससे गौओंको,

English

Fie on their satisfaction with a royal seat left over by a hundred men! He whose servants' wives wear clusters of flowers of the Parijata tree — is even he not their king?

अध्याय ११५

श्लोक 26

समस्तभूभृतां नाथ उग्रसेनः स तिष्ठतु अद्य निष्कौरवाम् उर्वीं कृत्वा यास्यामि तत्पुरीम्

samastabhūbhṛtāṃ nātha ugrasenaḥ sa tiṣṭhatu adya niṣkauravām urvīṃ kṛtvā yāsyāmi tatpurīm

हिन्दी अर्थ

तुमने अपना जो विचार प्रकट किया है वह बड़ा ही सुन्दर है; हम सब ऐसा ही करेंगे; आज गिरियज्ञ किया जाय किया तथा दही, खीर और मांस आदिसे पर्वतराजको सेकड़ों, हजारों ब्राह्मणोंको भोजन कराया तथा पुष्पाचित गौओं और सजल जलधरके समान गर्जनेवाले साँड़ोंने गोवर्धनकी परिक्रमा की ॥ ४५-४६ ॥ प्रकट होकर यह दिखलाते हुए कि मैं मूर्तिमान् गिरिराज तदनन्तर उनके अन्तर्धान होनेपर गोपगण अपने अभीष्ट बर पाकर गिरियज्ञ समाप्त करके फिर अपने-अपने गोष्ठोंमें चले आये अन्धकारीकृते लोके वर्षद्धिरनिशं घने:। श्रीपराशरजी बोले--हे मैत्रेय!/ अपने यज्ञके नामक मेघोंके दलसे इस प्रकार कहा--

English

Let Ugrasena stand as lord of all kings; today I shall rid the earth of the Kauravas and go to his city.

अध्याय ११५

श्लोक 27

कर्णं दुर्योधनं द्रोणम् अद्य भीष्मं सबाह्लिकम् दुःशासनादीन् भूरिं च भूरिश्रवसम् एव च

karṇaṃ duryodhanaṃ droṇam adya bhīṣmaṃ sabāhlikam duḥśāsanādīn bhūriṃ ca bhūriśravasam eva ca

हिन्दी अर्थ

मेघो! मेरा यह वचन सुनो और मैं जो कुछ कहूँ उसे मेरी आज्ञा सुनते ही, बिना कुछ सोचे- विचारे तुरन्त पूरा करो बलसे अन्धा होकर मेरा यज्ञ भंग कर दिया है अत: जो उनकी परम जीविका और उनके गोपत्वका कारण है, उन गौओंको तुम मेरी आज्ञासे वर्षा और वायुके द्वारा पीडित कर दो पर्वत शिखरके समान अत्यन्त ऊँचे अपने ऐरावत हाथीपर चढ़कर वायु और जल छोड़नेके समय तुम्हारी सहायता करूँगा!”

English

Karna, Duryodhana, Drona, Bhishma with Bahlika, Duhshasana and the rest, Bhuri and Bhurishravas,

अध्याय ११५

श्लोक 28

सोमदत्तं शलं भीमम् अर्जुनं सयुधिष्ठिरम् यमजौ कौरवांश् चान्यान् हत्वा साश्वरथद्विपान्

somadattaṃ śalaṃ bhīmam arjunaṃ sayudhiṣṭhiram yamajau kauravāṃś cānyān hatvā sāśvarathadvipān

हिन्दी अर्थ

ऐसी आज्ञा होनेपर गौओंको नष्ट करनेके लिये हे मुने! उस समय एक क्षणमें ही मेघोंकी छोड़ी हुई महान् जलधाराओंसे पृथिवी, दिशाएँ और दिशाओंको व्याप्त करते हुए मूसलाधार पानी इस प्रकार मेघोंके अहर्निश बरसनेसे संसारके अन्धकारपूर्ण हो जानेपर ऊपर- नीचे और सब ओरसे समस्त लोक जलमय-सा वर्षा और वायुके वेगपूर्वक चलते रहनेसे गौओंके कटि, जंघा और ग्रीवा आदि सुनन्‍न हो गये और काँपते-काँपते अपने प्राण छोड़ने लगीं अर्थात् मूच्छित हो गयीं

English

Somadatta, Shala, Bhima, Arjuna with Yudhishthira, the twins and the other Kauravas — slaying them with their horses, chariots and elephants,

अध्याय ११५

श्लोक 29

वीरम् आदाय तं साम्बं सपत्नीकं ततः पुरीम् द्वारकाम् उग्रसेनादीन् गत्वा द्रक्ष्यामि बान्धवान्

vīram ādāya taṃ sāmbaṃ sapatnīkaṃ tataḥ purīm dvārakām ugrasenādīn gatvā drakṣyāmi bāndhavān

हिन्दी अर्थ

महामुने! कोई गौएँ तो अपने बछड़ोंको अपने नीचे छिपाये खड़ी रहीं और कोई जलके वेगसे वत्सहीना हो गयीं हुए दीनवदन बछड़े मानो व्याकुल होकर मन्द- उत्पाट्यैककरेणैव धारयामास लीलया॥ १६ इन्द्रेण चोदिता विप्र गोपानां नाशकारिणा॥ २२ हे मैत्रेय!/ उस समय गो, गोपी और गोपगणके यज्ञ-भंगके कारण विरोध मानकर यह ब्रजकी रक्षा करनी चाहिये

English

and taking the hero Samba with his wife, I shall go to the city of Dvaraka and see Ugrasena and my other kinsmen.

अध्याय ११५

श्लोक 30

अथवा कौरवाधानीं समस्तैः कुरुभिः सह भारावतरणे शीघ्रं देवराजेन चोदितः भागीरथ्यां क्षिपाम्य् आशु नगरं नागसाह्वयम्

athavā kauravādhānīṃ samastaiḥ kurubhiḥ saha bhārāvataraṇe śīghraṃ devarājena coditaḥ bhāgīrathyāṃ kṣipāmy āśu nagaraṃ nāgasāhvayam

हिन्दी अर्थ

बड़ी-बड़ी शिलाओंसे घनीभूत इस पर्वतको उखाड़कर इसे एक बड़े छत्रके समान ब्रजके ऊपर धारण करूँगा गोवर्धनपर्वतको उखाड़ लिया और उसे लीलासे ही “आओ, शीघ्र ही इस पर्वतके नीचे आ जाओ, मैंने वर्षसे बचनेका प्रबन्ध कर दिया है स्थानोंमें आकर सुखपूर्वक बैठ जाओ; निर्भय होकर प्रवेश करो, पर्वतके गिरने आदिका भय मत करो '” पीडित गोप और गोपी अपने बर्तन-भाँडोंको छकड़ोंमें रखकर गौंओंके साथ पर्वतके नीचे चले गये

English

Or, urged by the king of the gods to relieve the earth's burden quickly, I shall at once cast the Kaurava capital, the city named after the elephant, with all the Kurus into the Bhagirathi."

अध्याय ११५

श्लोक 31

इत्य् उक्त्वा मदरक्ताक्षः कर्षणाधोमुखं हलम् प्राकारवप्रे विन्यस्य चकर्ष मुसलायुधः

ity uktvā madaraktākṣaḥ karṣaṇādhomukhaṃ halam prākāravapre vinyasya cakarṣa musalāyudhaḥ

हिन्दी अर्थ

आँखें फाड़कर देख रहे थे उन हर्षितचित्त गोप और पर्वतको धारण किये रहे गोकुलमें सात रात्रितक महाभयंकर मेघ बरसते विस्मयपूर्वक देखते-देखते गिरिराज गोवर्धनको अपने मखभंगविरोधेन मया गोकुलनाशका:। तेनाहं तोषितो वीरकर्मणात्यद्धुतेन ते॥ ९ त्वयायमद्रिप्रवर: करेणैकेन यदधृतः ॥ १० गोभिएच चोदित: कृष्ण त्वत्सकाशमिहागत:।

English

Having said this, his eyes red with intoxication, the club-armed one set his plough point-downward against the rampart and dragged it.

अध्याय ११५

श्लोक 32

आघूर्णितं तत् सहसा ततो वै हस्तिनापुरम् दृष्ट्वा संक्षुब्धहृदयाश् चुक्रुशुः सर्वकौरवाः

āghūrṇitaṃ tat sahasā tato vai hastināpuram dṛṣṭvā saṃkṣubdhahṛdayāś cukruśuḥ sarvakauravāḥ

हिन्दी अर्थ

अतः शशनत्रुजितू देवराज गजराज ऐरावतपर चढ़कर साथ गौएँ चराते देखा॥ २-३॥ है द्विज! उन्होंने यह ऊपर रहकर अपने पंखोंसे उनकी छाया कर रहे तब वे ऐरावतसे उतर पड़े और एकान्तमें आपके पास आया हूँ, वह सुनिये--हे महाबाहो! आप इसे अन्यथा न समझें परमेश्वर! आपने पृथिवीका भार उतारनेके लिये ही पृथिवीपर अवतार लिया है मानकर ही मैंने गोकुलको नष्ट करनेके लिये महामेघोंको आज्ञा दी थी, उन्हींने यह संहार मचाया था

English

Seeing Hastinapura suddenly shaken, all the Kauravas cried out with agitated hearts:

अध्याय ११५

श्लोक 33

राम राम महाबाहो क्षम्यतां क्षम्यतां त्वया उपसंह्रियतां कोपः प्रसीद मुसलायुध

rāma rāma mahābāho kṣamyatāṃ kṣamyatāṃ tvayā upasaṃhriyatāṃ kopaḥ prasīda musalāyudha

हिन्दी अर्थ

किन्तु आपने पर्वतको उखाड़कर गौओंको बचा लिया। है वीर! आपके इस अद्भुत कर्मसे मैं अति धारण किया है, इससे में देवताओंका प्रयोजन आपके द्वारा सिद्ध हुआ ही समझता हूँ रक्षाद्वारास आपसे रक्षित कामधेनु आदि गौओंसे प्रेरित होकर ही मैं आपका विशेष सत्कार करनेके लिये यहाँ आपके पास आया हूँ अब मैं गौओंके वाक्यानुसार ही आपका उपेन्द्र- पदपर अभिषेक करूँगा तथा आप गौओंके इन्द्र (स्वामी) हैं इसलिये आपका नाम “गोविन्द” भी

English

"Rama, Rama, mighty-armed one, forgive, forgive! Withdraw your anger; be gracious, club-armed one.

अध्याय ११५

श्लोक 34

एष साम्बः सपत्नीकस् तव निर्यातितो बल अविज्ञातप्रभावाणां क्षम्यताम् अपराधिनाम्

eṣa sāmbaḥ sapatnīkas tava niryātito bala avijñātaprabhāvāṇāṃ kṣamyatām aparādhinām

हिन्दी अर्थ

भारावतरणे साहां स ते वीर: करिष्यति। केशी कुवलयापीडो नरकाद्यास्तथा परे॥ २१ हतेषु तेषु देवेन्द्र भविष्यति महाहव:। गजराज ऐरावतका घण्टा लिया और उसमें पवित्र अपने स्तनोंसे टपकते हुए दुग्धसे पृथिवीको भिगो इस प्रकार गौओंके कथनानुसार श्रीजनार्दनको प्रीति और विनयपूर्वक कहा-- यह तो मैंने गौओंका वचन पूरा किया, अब पृथिवीके भार उतारनेकी इच्छासे में आपसे जो कुछ और निवेदन करता हूँ वह भी सुनिये अवतार लिया है; आप कृपा करके उसकी सर्वदा

English

Here is Samba with his wife, handed over to you, Bala; forgive us offenders who did not know your power."

अध्याय ११५

श्लोक 35

ततो निर्यातयाम् आसुः साम्बं पत्न्या समन्वितम् निष्क्रम्य स्वपुरात् तूर्णं कौरवा मुनिपुंगव

tato niryātayām āsuḥ sāmbaṃ patnyā samanvitam niṣkramya svapurāt tūrṇaṃ kauravā munipuṃgava

हिन्दी अर्थ

हे मधुसूदन! वह वीर पृथिवीका भार उतारनेमें आपका साथ देगा, अत: आप उसकी अपने शरीरके समान हो रक्षा करें'' तुम्होीरे अंशसे अवतार लिया है--यह मैं जानता हूँ। मैं जबतक पृथिवीपर रहूँगा, उसकी रक्षा करूँगा शत्रुसूदन देवेन्द्र! में जबतक महीतलपर रहूँगा तबतक अर्जुनको युद्धमें कोई भी न जीत सकेगा विशाल भुजाओंवाला कंस नामक हैत्य, अरिष्टासुर, केशी, कुवलयापीड और नरकासुर आदि अन्यान्य हैत्योंका नाश होनेपर यहाँ महाभारत-युद्ध होगा। है सहस्नाक्ष उसी समय पृथिवीका भार उतरा हुआ समझना ॥ २१-२२ ॥ अब तुम

English

Then the Kauravas quickly came out of their city and handed over Samba together with his wife, bull among sages.

अध्याय ११५

श्लोक 36

भीष्मद्रोणकृपादीनां प्रणम्य वदतां प्रियम् क्षान्तम् एव मयेत्य् आह बलो बलवतां वरः

bhīṣmadroṇakṛpādīnāṃ praṇamya vadatāṃ priyam kṣāntam eva mayety āha balo balavatāṃ varaḥ

हिन्दी अर्थ

अर्जुनके लिये ही में अक्षत-शरीरसे कुन्तीको दूँगा देवराज इन्द्र उनका आलिंगन कर ऐरावत हाथीपर आरूढ हो स्वर्गको चले गये और गौओंके साथ ब्रजको लौट आये गावशएु्च भवता त्राता गिरिधारणकर्मणा॥ २ कालियो दमितस्तोये धेनुको विनिपातित: । श्रीपपशरजी बोले--इन्द्रके चले जानेपर पर्वत धारण करते देख गोपगण उनसे प्रीतिपूर्वक हे भगवन्! है महाभाग! आपने गिरिराजको धारण कर हमारी और गौओंकी इस महान् भयसे

English

To Bhishma, Drona, Kripa and the others, who bowed and spoke kindly, Bala, best of the strong, said, "I have forgiven."

अध्याय ११५

श्लोक 37

अद्याप्य् आघूर्णिताकारं लक्ष्यते तत् पुरं द्विज एष प्रभावो रामस्य बलशौर्योपलक्षणः

adyāpy āghūrṇitākāraṃ lakṣyate tat puraṃ dvija eṣa prabhāvo rāmasya balaśauryopalakṣaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

हे तात! कहाँ आपकी यह अनुपम बाललीला, कहाँ निन्दित गोपजाति और कहाँ ये दिव्य कर्म ? यह सब क्‍या है, कृपया हमें बतलाइये आपने यमुनाजलमें कालियनागका दमन किया, धेनुकासुरको मारा और फिर यह गोवर्धनपर्वत धारण किया; आपके इन अदभुत कर्मोसे हमारे चिक्तमें बड़ी शंका हो रही है भगवान् हरिके चरणोंकी शपथ करके आपसे सच-सच कहते हैं कि आपके ऐसे बल-वीर्यको देखकर हम आपको मनुष्य नहीं मान सकते हे केशव! स्त्री और बालकोंके सहित सभी ब्रजवासियोंकी देवताओंके लिये भी दुष्कर है

English

Even today that city is seen with a tilted shape, brahmin; such is the power of Rama, marked by strength and valour.

अध्याय ११५

श्लोक 38

ततस् तु कौरवाः साम्बं संपूज्य हलिना सह प्रेषयाम् आसुर् उद्वाहधनभार्यासमन्वितम्

tatas tu kauravāḥ sāmbaṃ saṃpūjya halinā saha preṣayām āsur udvāhadhanabhāryāsamanvitam

हिन्दी अर्थ

नीच पुरुषोंमें जन्म लेना--हे अमेयात्मन्! ये सब बातें विचार करनेपर हमें शंकामें डाल देती हैं आप देवता हों, दानव हों, यक्ष हों अथवा गन्धर्व हों; इन बातोंका विचार करनेसे हमें क्‍या प्रयोजन है? हमारे तो आप बन्धु ही हैं, अतः आपको श्रीपराशरजी बोले--गोपगणके ऐसा कहनेपर श्रीभगवान्ने कहा--हे गोपगण ! यदि आपलोगोंको आपलोगोंसे प्रशंसनीय हूँ इस बातका विचार करनेकी भी क्‍या आवश्यकता है? प्रीति है और यदि मैं आपकी प्रशंसाका पात्र हूँ तो आपलोग मुझमें बान्धव-बुद्धि ही करें

English

Then the Kauravas, having honoured Samba, sent him with the plough-bearer, together with wedding wealth and his wife.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_viSNupurANa-crit.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vishnu Purana — Chapter 115
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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