Vishnu Purana· Viṣṇu Purāṇa
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अध्याय 117 / 126

Book 5 - Adhyaya 37

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अध्याय ११७

श्लोक 1

[[इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमे ऽंशे षट्त्रिंशो ऽध्यायः ]] एवं दैत्यवधं कृष्णो बलदेवसहायवान् चक्रे दुष्टक्षितीशानां तथैव जगतः कृते

[[iti śrīviṣṇupurāṇe pañcame 'ṃśe ṣaṭtriṃśo 'dhyāyaḥ ]] evaṃ daityavadhaṃ kṛṣṇo baladevasahāyavān cakre duṣṭakṣitīśānāṃ tathaiva jagataḥ kṛte

हिन्दी अर्थ

जो पुरुष भगवान् कृष्णके इस चरित्रको

English

LN this way, Krishna, aided by Baladeva, destroyed, for the behoof of the earth, demons and iniquitous kings, and along with Phalguna also did he relieve earth of her burdeo by the death of seven Akshauhini hosts. Having thus

अध्याय ११७

श्लोक 2

क्षितेश् च भारं भगवान् फाल्गुनेन समं विभुः अवतारयाम् आस हरिः समस्ताक्षौहिणीवधात्

kṣiteś ca bhāraṃ bhagavān phālgunena samaṃ vibhuḥ avatārayām āsa hariḥ samastākṣauhiṇīvadhāt

हिन्दी अर्थ

अक्वूरजीकी गोकुलयात्रा श्रीपपशर उवाच श्रीपराशरजी बोले--अक्रूरजी भी तुरंत ही चकार जगतो यो5ज: सोउद्य मां प्रलपिष्यति॥ १० कोई नहीं है; क्योंकि अपने अंशसे अवतीर्ण चक्रधारी आज मेरा जन्म सफल हो गया; आजकी रात्रि अवश्य सुन्दर प्रभातवाली थी, जिससे कि मैं मुखका दर्शन करूँगा प्रभुका जो संकल्पमय मुखारविन्द स्मरणमात्रसे पुरुषोंके पापोंको दूर कर देता है, आज मैं विष्णुभगवानके उसी कमलनयन

English

relíeved tbe earth of her load and destroyed many impious kings, be exterminated, by the plea of an imprecation de- nounced by Brahmanas, his own jjjadava race. Thereupon quitting Dwaraka and renouncingJKTRiortal frame, the self. born with all his emanations re-Wtered his own spbere of

अध्याय ११७

श्लोक 3

कृत्वा भारावतरणं भुवो हत्वाखिलान् नृपान् व्यक्तो मानुष्यकं भावं देवदेवो जनार्दनः कृत्वा चान्यानि कार्याणि देवानां हितकाम्यया दुर्योधनस्य विप्रर्षे युधिष्ठिरपुरोगमैः पाण्डवैर् भेदम् उत्पन्नम् उपेक्षेत विभुस् तदा अन्यमोदछतः [??] कृष्णस् ततो वैरम् अकारयत् तत्र हत्वा कुरून् सर्वान् पाण्डवेयैः परस्परम् जगाम निर्वृतिं देवो जगतां पतिर् ईश्वरः अक्षोहिन्यो हतास् तत्र अष्टादश महामुने शापव्याजेन विप्राणाम् उपसंहृतवान् कुलम्

kṛtvā bhārāvataraṇaṃ bhuvo hatvākhilān nṛpān vyakto mānuṣyakaṃ bhāvaṃ devadevo janārdanaḥ kṛtvā cānyāni kāryāṇi devānāṃ hitakāmyayā duryodhanasya viprarṣe yudhiṣṭhirapurogamaiḥ pāṇḍavair bhedam utpannam upekṣeta vibhus tadā anyamodachataḥ [??] kṛṣṇas tato vairam akārayat tatra hatvā kurūn sarvān pāṇḍaveyaiḥ parasparam jagāma nirvṛtiṃ devo jagatāṃ patir īśvaraḥ akṣohinyo hatās tatra aṣṭādaśa mahāmune śāpavyājena viprāṇām upasaṃhṛtavān kulam

हिन्दी अर्थ

जिससे सम्पूर्ण वेद और वेदांगोंकी आधारभूत पुरुषोत्तमका यज्ञपुरुषरूपसे यजन (पूजन) किया जाता है, आज मैं उन्हीं जगत्पतिका दर्शन जिनका सौ यज्ञोंसे यजन करके इन्द्रने देवराज-पदवी प्राप्त की है, आज मैं उन्हीं अनादि और अनन्त केशवका दर्शन करूंगा आदित्य और मरुद्गण आदि कोई भी नहीं जानते अहो! आज स्वयं वे ही मेरे साथ बातें करेंगे

English

MAlTRr-YA said : — Tell me how Janarddana brought about the extermination of his own family under the pretext of a BrhJminical curse and in what manner did he renounce his

अध्याय ११७

श्लोक 4

उत्सृज्य द्वारकां कृष्णस् त्यक्त्वा मानुष्यम् आत्मभूः सांशो विष्णुमयं स्थानं प्रविवेश पुनर् निजम्

utsṛjya dvārakāṃ kṛṣṇas tyaktvā mānuṣyam ātmabhūḥ sāṃśo viṣṇumayaṃ sthānaṃ praviveśa punar nijam

हिन्दी अर्थ

नूसिंह आदि रूप धारणकर जगत्की रक्षा की है, आज वे ही मुझसे वार्तालाप करेंगे मनमें सोचा हुआ कार्य करनेके लिये अपनी ही इच्छासे मनुष्य-देह धारण किया है (शेषजी) अपने मस्तकपर रखी हुई पृथिवीको धारण करते हैं, संसारके हितके लिये अवतीर्ण हुए वे ही आज मुझसे 'अक्रूर' कहकर बोलेंगे सेन्दुनीलाचलाभं तं सिताम्भोजावतंसकम्॥ २२ “जिनकी इस पिता, पुत्र, सुहृद्, भ्राता, माता और बन्‍्धुरूपिणी मायाको पार करनेमें संसार सर्वथा असमर्थ है, उन मायापतिको बारम्बार नमस्कार है

English

PARAsARAsaid : — At theholy place of Pindarika,Viswamitra, Kanwa and the great sage, Nárada, were seen by some boys of the Yadu family. Inflated with their youths and influenced by predestined results, tliey dressed and adorned Samba, the son of Jámbavati, as a female and taking her to the sages, they addressed them with usual reverence, saying : — " What child with this female, the wife of Bábru, who is anxious to have a son, give birth to ?" The sages, who were gifted with divine wisdom, enraged at this insult, said : — " She vvill give birth to a club that will exterminate the entire Yádava race."

अध्याय ११७

श्लोक 5

स विप्रशापव्याजेन संजह्रे स्वकुलं कथम् कथं च मानुषं देहम् उत्ससर्ज जनार्दनः

sa vipraśāpavyājena saṃjahre svakulaṃ katham kathaṃ ca mānuṣaṃ deham utsasarja janārdanaḥ

हिन्दी अर्थ

जिनमें हृदयको लगा देनेसे पुरुष इस योगमायारूप श्रीहरिको नमस्कार है सात्वत (यादव अथवा भगवद्धक्त)-गण “वासुदेव' जिस (सत्य)-से यह सदसद्रुप जगत् उस जगदाधार विधातामें ही स्थित हैं उस कुछ-कुछ सूर्य रहते ही गोकुलमें पहुँच गये वहाँ पहुँचनेपर पहले उन्होंने खिले हुए नीलकमलकी- बछड़ोंके बीच विराजमान देखा

English

Thus addressed by the sages, the boys went to Ugrasena and related to him what had happened ; and after sometime, as foretold, a club was produced from the belly of Samba. Ugrasena had the club, which was made of iron, ground to dust and throvvn into the sea, and particles of the dust there became rushes, There was one part of the iron club which was like the blade of a lance and which the Andhakas could not break ; this wheu thrown into the sea was swal- lowed by a fish ; the fish was caught, the iron spike was extracted from its belly, and was taken by a hunter named jAra. The all-wise and illustrious slayer of Madhu did not think it proper to counteract the predestination of fate.

अध्याय ११७

श्लोक 6

विश्वामित्रस् तथा कण्वो नारदश् च महामुनिः दुर्वासाद्याश् च ऋषयस् तीर्थे पिण्डारके मुने पिण्डारके महातीर्थे दृष्टा यदुकुमारकैः

viśvāmitras tathā kaṇvo nāradaś ca mahāmuniḥ durvāsādyāś ca ṛṣayas tīrthe piṇḍārake mune piṇḍārake mahātīrthe dṛṣṭā yadukumārakaiḥ

हिन्दी अर्थ

विशाल और ऊँचा था तथा नासिका उन्नत थी जो सविलास हासयुक्त मनोहर मुखारविन्दसे सुशोभित थे तथा उन्‍नत और रक्तनखयुक्त चरणोंसे पृथिवीपर थे, वन्यपुष्पोंसे विभूषित थे तथा जिनका श्वेत कमलके घिरे हुए दूसरे केलासपर्वतके समान जान पड़ते थे

English

In the interval an emissarry despatched by the celestials came to Krishna and said to liitn in private :— " I am sent

अध्याय ११७

श्लोक 7

ततस् ते यौवनोन्मत्ता भाविकार्यप्रचोदिताः साम्बं जाम्बवतीपुत्रं भूषयित्वा स्त्रियं यथा

tatas te yauvanonmattā bhāvikāryapracoditāḥ sāmbaṃ jāmbavatīputraṃ bhūṣayitvā striyaṃ yathā

हिन्दी अर्थ

हे मुने! उन दोनों बालकोंको देखकर महामति अक्रूरजीका मुखकमल प्रफुल्लित हो गया तथा उनके सर्वागमें पुलकावली छा गयी मन कहने लगे-- इन दो रूपोंमें जो यह भगवान् वासुदेवका अंश स्थित है वही परमधाम है और वही इन जगद्ठिधाताके दर्शन पाकर आज चक्र. घ्नतता हैत्यपतेईतानि कर्तावमानोपहतं धिगस्तु कि वा जगत्यत्र समस्तपुंसा- वे अनन्तमूर्ति श्रीमानू हरि मेरी पीठपर अपना सेनाको नष्ट करते हुए असुर-सुन्दरियोंकी आँखोंके

English

to thee, lord, by the celestials ; and do tliou hear what Indra

अध्याय ११७

श्लोक 8

प्रसृतास् तान् मुनीन् ऊचुः प्रणिपातपुरःसरम् इयं स्त्री पुत्रकामस्य बभ्रोः किं जनयिष्यति

prasṛtās tān munīn ūcuḥ praṇipātapuraḥsaram iyaṃ strī putrakāmasya babhroḥ kiṃ janayiṣyati

हिन्दी अर्थ

प्रदान करनेसे राजा बलिने पृथिवीतलमें अति मनोज्ञ वे ही विष्णुभगवान् मुझ निर्दोषको भी कंसके संसर्गसे दोषी ठहराकर क्‍या मेरी अवज्ञा कर देंगे? मेरे ऐसे साधुजनबहिष्कृत पुरुषके जन्मको अत: में उन ईश्वरोंके ईश्वर, आदि, जाता हूँ। मुझे पूर्ण आशा है, वे मेरी कभी अवज्ञा कृतसंवन्दनाौ तेन यथावद्बलकेशवौ। यथा च देवकी देवी दानवेन दुरात्मना॥ निशेयं नीयतां वीर न चिन्तां कर्त्तुमहसि। समादिश्य ततो गोपानक्रूरोडपि च केशव: ।

English

together with tlie Viswas, Maruts, Adityas, Sadhyas and

अध्याय ११७

श्लोक 9

दिव्यज्ञानोपपन्नास् ते विप्रलब्धाः कुमारकैः मुनयः कुपिताः प्रोचुर् मुसलं जनयिष्यति सर्वयादवसंहारकारणं बलवत्तरम् येनाखिलकुलोत्सादो यादवानां भविष्यति कृत्रिमस् त्रिनाभितलं भीत्वाद्यैवं भविष्यति

divyajñānopapannās te vipralabdhāḥ kumārakaiḥ munayaḥ kupitāḥ procur musalaṃ janayiṣyati sarvayādavasaṃhārakāraṇaṃ balavattaram yenākhilakulotsādo yādavānāṃ bhaviṣyati kṛtrimas trinābhitalaṃ bhītvādyaivaṃ bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

भगवानने भी अपने ध्वजा- अपनी ओर खींचकर गाढ़ आलिंगन किया फिर उनके द्वारा सत्कृत होकर यथायोग्य भोजनादि कर चुकनेपर अक्रूरने उनसे वह दानव कंसने आनकदुन्दुभि वसुदेव और देवी देवकीको डाँटा था तथा जिस प्रकार वह दुरात्मा अपने पिता हे महाभाग ! इस विषयमें मुझे जो उपयुक्त जान पड़ेगा वही करूँगा। अब तुम कंसको मेरेद्वारा मरा हुआ ही समझो, इसमें किसी और तरहका विचार न करो हे वीर! आप यह रात्रि सुखपूर्वक बिताइये, किसी प्रकारकी चिन्ता न कीजिये। तीन रात्रिके भीतर मैं कंसको उसके अनुचरोंसहित और बलरामजी सम्पूर्ण गोपोंको कंसकी आज्ञा सुना नन्दगोपके घर सो गये

English

Rudras respectfully rejdbent. More than a century has

अध्याय ११७

श्लोक 10

इत्य् उक्तास् तैः कुमारास् ते आचचक्षुर् यथातथम् उग्रसेनाय मुसलं जज्ञे साम्बस्य चोदरात्

ity uktās taiḥ kumārās te ācacakṣur yathātatham ugrasenāya musalaṃ jajñe sāmbasya codarāt

हिन्दी अर्थ

दूसरे दिन निर्मल प्रभातकाल होते ही महातेजस्वी राम और कृष्णको अक्रूरके साथ मथुरा चलनेकी तैयारी करते देख जिनकी भुजाओंके कंकण ढीले हो गये हैं वे गोपियाँ नेत्रोंमें आँसू भरकर एषेष रथमारुहय मथुरां याति केशव:। नगरकी विदग्ध वनिताओंके विलासयुक्त वचनोंके रसपानमें आसक्त होकर फिर इनका चित्त गँवारी गोपियोंकी ओर क्‍यों जाने लगा 2 नगरकी नारियोंमें भावपूर्ण मुसकानमयी बोली, विलासललित गति और कररक्षपूर्ण चितवनकी स्वभावसे ही अधिकता होती है। उनके विलास-बन्धनोंसे बँधकर यह ग्राम्य हरि फिर किस नृशंस अक्रूर क्या अनुरागीजनोंके हृदयका भाव तनिक भी नहीं जानता ? जो यह इस प्रकार हमारे नयनानन्दवर्धन

English

gone by since thou" il^pómpliance with the request of the

अध्याय ११७

श्लोक 11

तद् उग्रसेनो मुसलम् अयश्चूर्णम् अकारयत् जज्ञे स चैरकाश् चूर्णः प्रक्षिप्तस् तैर् महोदधौ

tad ugraseno musalam ayaścūrṇam akārayat jajñe sa cairakāś cūrṇaḥ prakṣiptas tair mahodadhau

हिन्दी अर्थ

रहे हैं; अरी! इन्हें रोकनेमें शीघ्रता करो'” इसपर गुरुजनोंके सामने ऐसा करनेमें असमर्थता प्रकट करनेवाली किसी गोपीको लक्ष्य करके उसने फिर कहा-- “अरी! तू क्‍या कह रही है कि अपने गुरुजनोंके सामने हम ऐसा नहीं कर सकतीं ?”” भला देखो, यह नन्दगोप आदि गोपगण भी उन्हींके साथ जानेकी तैयारी कर रहे हैं। इनमेंसे भी कोई गोविन्दको लौटानेका प्रयत्न नहीं करता हुई है; क्योंकि आज उनके नयन-भंग श्रीअच्युतके मुखारविन्दका मकरन्द पान करेंगे रहे हैं वे धन्य हैं; क्योंकि वे उनका दर्शन करते हुए अपने रोमांचयुक्त शरीरका वहन करेंगे

English

celestials, descended upon earth for the purpose of re-

अध्याय ११७

श्लोक 12

मुसलस्याथ लोहस्य चूर्णितस्यान्धकैर् द्विज खण्डं चूर्णयितुं शेकुर् नैकं ते तोमराकृति

musalasyātha lohasya cūrṇitasyāndhakair dvija khaṇḍaṃ cūrṇayituṃ śekur naikaṃ te tomarākṛti

हिन्दी अर्थ

उन भाग्यशालिनियोंने ऐसा कौन शुभ स्वप्न देखा है जो वे कान्तिमय विशाल नयनोंवाली (मथुरापुरीकी स्त्रियाँ) निष्ठुर विधाताने गोपियोंको महानिधि दिखलाकर आज उनके नेत्र निकाल लिये श्रीहरिके अनुरागमें शिथिलता आ जानेसे हमारे हार्थोके कंकण भी तुरंत ही ढीले पड़ गये हैं तत्याज ब्रजभूभागं सह रामेण केशवः॥ ३२ भला हम-जैसी दुःखिनी अबलाओंपर किसे दया न आवेगी? परन्तु देखो, यह क्रूर-हदय अक्रूर तो बड़ी शीघ्रतासे घोड़ोंकों हाँक रहा है!

English

Iieving it of its load. The demons have been destroyed

अध्याय ११७

श्लोक 13

तद् अप्य् अम्बुनिधौ क्षिप्तं मत्स्यो जग्राह जालिभिः घातितस्योदरात् तस्य लुब्धो जग्राह तं जराः

tad apy ambunidhau kṣiptaṃ matsyo jagrāha jālibhiḥ ghātitasyodarāt tasya lubdho jagrāha taṃ jarāḥ

हिन्दी अर्थ

देखो, यह कृष्णचन्द्रके रथकी धूलि दिखलायी दे रही है; किन्तु हा! अब तो श्रीहरि इतनी दूर चले गये कि वह धूलि भी नहीं दीखती' श्रीपराशरजी बोले--इस प्रकार गोपियोंके अति सहित ब्रजभूमिको त्याग दिया कृष्ण और अक्रूर शीघ्रगामी घोड़ोंवाले रथसे चलते- चलते मध्याहनके समय यमुनातटपर आ गये मैं यमुनाजलमें मध्याहमकालीन उपासनासे निवृत्त होऊँ तबतक आप दोनों यहीं विराजें'” श्रीपराशरजी बोले--हे विप्र ! तब भगवान्के “बहुत अच्छा' कहनेपर महामति अक्रूरजी यमुनाजलमें

English

and the burden of earth has been removed ; now let the

अध्याय ११७

श्लोक 14

विज्ञातपरमार्थो ऽपि भगवान् मधुसूदनः नैच्छत् तद् अन्यथाकर्तुं विधिना यत् समाहितम्

vijñātaparamārtho 'pi bhagavān madhusūdanaḥ naicchat tad anyathākartuṃ vidhinā yat samāhitam

हिन्दी अर्थ

बलभद्रजी सहस्नफणावलिसे सुशोभित हैं, उनका शरीर कमलदलके समान विशाल हैं और रम्भ आदि महासर्पोंसे घिरकर उनसे प्रशंसित हो रहे हैं तथा अत्यन्त सुगन्धित वनमालाओंसे विभूषित कर्णभूषण पहने तथा मनोहर कुण्डली (गँडुली) मारे जलके भीतर विराजमान हेैं उनकी गोदमें उन्होंने आनन्दमय कमलभूषण अंगोपांगोंवाले तथा शंख-चक्रादि आयुधोंसे सुशोभित हैं; जो पीताम्बर पहने हुए हैं और विचित्र वनमालासे विभूषित हैं, तथा उनके कारण इन्द्रधनुष और

English

immortals once again see their king in heaven. More than a

अध्याय ११७

श्लोक 15

देवैश् च प्रहितो दूतः प्रणिपत्याह केशवम् रहस्य् एवम् अहं दूतः प्रहितो भगवन् सुरैः

devaiś ca prahito dūtaḥ praṇipatyāha keśavam rahasy evam ahaṃ dūtaḥ prahito bhagavan suraiḥ

हिन्दी अर्थ

व्यापिने नेकरूपैकस्वरूपाय नमो नमः॥ ४८ तद्नद्दा परमं नित्यमविकारि भवानज:॥ ५३ विश्वात्मा त्वमिति विकारहीनमेत- तोयेशो धनपतिरन्तकस्त्वमेको कुछ कहना चाहा तो भगवान्ने उनकी वाणी रोक दी। तब वे जलसे निकलकर रथके पास आये और देखा कि वहाँ रथपर बेठे हुए हैं॥४४-४५॥ तदनन्तर, उन्होंने जलमें सर्वव्यापक तथा कार्यरूपसे अनेक और कारणरूपसे एक रूप हैं उन परमात्माको नमस्कार है, नमस्कार है परे हैं, आपको बारम्बार नमस्कार है और परमात्मा हैं। इस प्रकार आप अकेले ही पाँच प्रकारसे

English

hundred years have passed, and if thou dost wish, do thou

अध्याय ११७

श्लोक 16

वस्वश्विमरुदादित्यरुद्रसाध्यादिभिः सह विज्ञापयति वः शक्रस् तद् इदं श्रूयतां प्रभो

vasvaśvimarudādityarudrasādhyādibhiḥ saha vijñāpayati vaḥ śakras tad idaṃ śrūyatāṃ prabho

हिन्दी अर्थ

आदि कल्पनाओंसे वर्णन किये जाते हैं आपके स्वरूप, प्रयोजन और नाम आदि सभी अनिर्वचनीय हैं। में आपको नमस्कार करता हूँ है नाथ! जहाँ नाम और जाति आदि कल्पनाओंका सर्वथा अभाव है आप वही नित्य अविकारी और अजन्मा क्योंकि कल्पनाके बिना किसी भी पदार्थका और विष्णु आदि नामोंसे स्तवन किया जाता है वास्तवमें तो आपका किसी भी नामसे निर्देश नहीं किया जा

English

return to heaven. This is the prayer of the celestials. And

अध्याय ११७

श्लोक 17

भारावतारणार्थाय वर्षाणाम् अधिकं शतम् भगवान् अवतीर्णो ऽत्र त्रिदशैः संप्रसादितः

bhārāvatāraṇārthāya varṣāṇām adhikaṃ śatam bhagavān avatīrṇo 'tra tridaśaiḥ saṃprasāditaḥ

हिन्दी अर्थ

हे अज! जिन देवता आदि कल्पनामय आप ही हैं तथा आप ही विकारहीन आत्मवस्तु हैं, अतः आप ही ब्रह्मा, महादेव, अर्यमा, गुणमय प्रपंच आपका ही रूप है। 'सत्”' पद 3७ तत्, रूप परं सदिति वाचकमक्षरं य- सत्” इस रूपसे जिसका वाचक है वह '3' अक्षर भगवान्का मथुरा-प्रवेश, रजक-वबध तथा मालीपर कृपा उन्होंने अपने मनको अन्य विषयोंसे हिलेरी ३0400 4प नह हटाकर उन्हींमें लगा दिया और चिरकालतक उन ब्रह्मभूतमें

English

if thjs be not thy will, do thou remain here as long as it may

अध्याय ११७

श्लोक 18

दुर्वृत्ता निहता दैत्या भुवो भारो ऽवतारितः त्वया सनाथास् त्रिदशा भवन्तु त्रिदिवे सदा

durvṛttā nihatā daityā bhuvo bhāro 'vatāritaḥ tvayā sanāthās tridaśā bhavantu tridive sadā

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर महामति अक्रूरजी अपनेको कृतकृत्य- आजगाम रथं भूयो निर्गम्य यमुनाम्भस:॥ ३ 4 हुए यमुनाजलसे 344 3345 4 8 अक्वूर उवाच अक्रूरजी बोले--हे अच्युत ! मैंने यमुनाजलमें जो आश्चर्य देखा है उसे में इस समय भी अपने सामने तत्किमेतेन मथुरां यास्यामो मधुसूदन। . या है? चलो, हमें शीघ्र ही मथुरा पहुँचना है; मुझे पदभ्यां यातं महावीरी रथेनेको विशाम्यहम्॥ १० युवयोहिं कृते वृद्धस्स कंसेन निरस्यते॥ ११ कृष्णरामौ मुदा युक्तौ मालाकारगुहं गतौ ॥ १७ विकासिनेत्रयुगलो मालाकारोतिविस्मित: ।

English

be desirable to thy dependants." Whereto Krishna replied,

अध्याय ११७

श्लोक 19

तद् अतीतं जगन्नाथ वर्षाणाम् अधिकं शतम् इदानीं गम्यतां स्वर्गो भवता यदि रोचते

tad atītaṃ jagannātha varṣāṇām adhikaṃ śatam idānīṃ gamyatāṃ svargo bhavatā yadi rocate

हिन्दी अर्थ

आप वसुदेवजीके घर न जाये; क्योंकि आपके कारण ही उन वृद्ध वसुदेवजीका कंस सर्वदा निरादर श्रीपराशरजी बोले--ऐसा कह--अक्रूरजी मथुरापुरीमें चले गये उनके पीछे राम और कृष्ण भी नगरमें प्रवेशकर वहाँके नर-नारियोंसे आनन्दपूर्वक देखे जाते हुए वे दोनों वीर मतवाले तरुण हाथियोंके देख उससे रंग-विरंगे सुन्दर वस्त्र माँगे कंसका था और राजाके मुँहलगा होनेसे बड़ा घमण्डी हो गया था, अत: राम और कृष्णके वस्त्र माँगनेपर उसने विस्मित होकर उनसे बड़े जोरोंके साथ अनेक दुर्वाक्य

English

"I am well aware of all thou hast said. The earth is not

अध्याय ११७

श्लोक 20

देवैर् विज्ञाप्यते चेदं अथात्रैव रतिस् तव तत् स्थीयतां यथाकालम् आख्येयम् अनुजीविभिः

devair vijñāpyate cedaṃ athātraiva ratis tava tat sthīyatāṃ yathākālam ākhyeyam anujīvibhiḥ

हिन्दी अर्थ

प्रहारसे उस दुष्ट रजकका सिर पृथिवीपर गिरा दिया छीन लिये तथा क्रमश: नील और पीत वस्त्र धारणकर वे प्रसन्‍नचित्तसे मालीके घर गये खिल गये और वह आश्चर्यचकित होकर सोचने लगा कि 'ये किसके पुत्र हैं और कहाँसे आये हैं?' बालकोंको देखकर उसने समझा मानो दो देवगण ही पृथिवीतलपर पधारे हैं

English

relieved of her load until the Yádavas are extirpated. I

अध्याय ११७

श्लोक 21

यत् त्वम् आत्थाखिलं दूत वेद्म्य् एतद् अहम् अप्य् उत प्रारब्ध एव हि मया यादवानाम् अपि क्षयः

yat tvam ātthākhilaṃ dūta vedmy etad aham apy uta prārabdha eva hi mayā yādavānām api kṣayaḥ

हिन्दी अर्थ

बालकोंने उससे पुष्प माँगे तो उसने अपने दोनों हाथ पृथिवीपर टेककर सिरसे भूमिको स्पर्श किया फिर उस मालीने कहा--''हे नाथ! आपलोग बड़े ही कृपालु हैं जो मेरे घर पधारे। मैं धन्य हूँ, क्योंकि आज मैं आपका पूजन कर सकूँगा”' लुभा-लुभाकर उन्हें इच्छानुसार पुष्प दिये तू भी यावज्जीवन नाना प्रकारके भोग श्रीपराशरजी बोले--हे मुनिश्रेष्ठ ! ऐसा कहकर निर्जगाम मुनिश्रेष्ठ मालाकारेण पूजितः ॥ २९ हो उसके घरसे चल दिये

English

shall also speedily bring it about in my descent, and it shall

अध्याय ११७

श्लोक 22

भुवो नाद्यापि भारो ऽयं यादवैर् अनिबर्हितैः अवतार्य करोम्य् एतत् सप्तरात्रेण सत्वरः

bhuvo nādyāpi bhāro 'yaṃ yādavair anibarhitaiḥ avatārya karomy etat saptarātreṇa satvaraḥ

हिन्दी अर्थ

कुब्जापर कृपा, धनुर्भग, कुवलयापीड और चाणूरादि मल्लोंका नाश तथा कंस-वध तब श्रीकृष्णने उससे विलासपूर्वक कहा--अयि कमललोचने! तू सच- तामाह ललितं कृष्ण: कस्येदमनुलेपनम् । सच बता यह अनुलेपन किसके लिये ले जा रही भवत्या नीयते सत्यं वरदेन्दीवरलोचने। २ है?'' भगवान् कृष्णके कामुक पुरुषकी भाँति ललित हठातू आकृष्टचित्त हो अति ललितभावसे इस “हे कान्‍त! क्‍या आप मुझे नहीं

English

take place in seven nights. Having restored the land of

अध्याय ११७

श्लोक 23

यथा गृहीतम् अम्भोधेर् दत्त्वाहं द्वारकाभुवम् यादवान् उपसंहृत्य यास्यामि त्रिदशालयम्

yathā gṛhītam ambhodher dattvāhaṃ dvārakābhuvam yādavān upasaṃhṛtya yāsyāmi tridaśālayam

हिन्दी अर्थ

राजा कंसको मेरे अतिरिक्त और किसीका पीसा हुआ रुचिरं श्रीकृष्णजी बोले--हे सुमुखि! यह सुन्दर आवयोगगात्रसदृशं॑ दीयतामनुलेपनम्॥ ६ शरीरके योग्य भी कोई अनुलेपन हो तो दो ततस्तां चिबुके शौरिरुल्लापनविधानवित्। चकार सुमहच्छब्दं मथुरा येन पूरिता॥ १६ श्रीपराशरजी बोले---यह सुनकर कुब्जाने कहा-- “लीजिये! और फिर उन दोनोंको आदरपूर्वक उनके शरीरयोग्य आदि अंगोंमें पत्ररचनाविधिसे यथावत् अनुलिप्त होकर तत्पश्चात् उललापन (सीधे करनेकी ) -विधिके आगेकी दो अँगुलियाँ लगा उसे उचकाकर हिलाया तथा उसके पैर अपने पैरोंसे दबा लिये। इस प्रकार श्रीकेशवने उसे ऋजुकाय (सीधे शरीरवाली) कर दी। तब सीधी हो

English

Dwáraká to the ocean and destroyed the race of Jadu, I shall

अध्याय ११७

श्लोक 24

मनुष्यदेहम् उत्सृज्य संकर्षणसहायवान् प्राप्त एवास्मि मन्तव्यो देवेन्द्रेण तथा सुरैः

manuṣyadeham utsṛjya saṃkarṣaṇasahāyavān prāpta evāsmi mantavyo devendreṇa tathā suraiḥ

हिन्दी अर्थ

टेढ़ी थी, परंतु अब सुन्दरी हो गयी थी, बलरामजीके मुखकी ओर देखकर हँसते हुए कहा-- घर भी आऊँगा'--ऐसा कहकर श्रीहरिने उसे मुसकाते हुए विदा किया और बलभद्रजीके मुखकी ओर देखते हुए जोर-जोरसे हँसने लगे और पीताम्बर धारण किये हुए यज्ञशालातक आये उसे सहसा उठाकर प्रत्यंचा (डोरी) चढ़ा दी

English

proceed to the region of the celestials. Inform tlie celestials

अध्याय ११७

श्लोक 25

जरासंधादयो ये ऽन्ये निहता भारहेतवः क्षितेस् तेभ्यः कुमारो ऽपि यदूनां नापचीयते

jarāsaṃdhādayo ye 'nye nihatā bhārahetavaḥ kṣites tebhyaḥ kumāro 'pi yadūnāṃ nāpacīyate

हिन्दी अर्थ

बलपूर्वक प्रत्यंचा चढ़ाते समय वह धनुष टूट गया, उस समय उसने ऐसा घोर शब्द किया कि उससे सम्पूर्ण तब धनुष टूट जानेपर उसके रक्षकोंने उनपर आक्रमण किया, उस रक्षक सेनाका संहार कर वे दोनों बालक धनुश्शालासे बाहर आये तदनन्तर अक्रूरके आनेका समाचार पाकर तथा उस महान् धनुषको भग्न हुआ सुनकर कंसने चाणुर कंस बोला--यहाँ दोनों गोपालबालक आ गये हैं। वे मेरा प्राण-हरण करनेवाले हैं, अत: तुम दोनों मल्लयुद्धसे उन्हें मेरे सामने मार डालो। यदि तुमलोग हाहाकारपरे लोके ह्यास्फोटयति मुष्टिके ॥ ३० प्रात:काल होनेपर समस्त मंचोंपर नागरिक लोग और राजमंचोंपर अपने अनुचरोंके सहित राजालोग

English

that having renounced my mortal frame and been accompanied

अध्याय ११७

श्लोक 26

तद् एनं सुमहाभारम् अवतार्य क्षितेर् अहम् यास्याम्य् अमरलोकस्य पालनाय ब्रवीहि तान्

tad enaṃ sumahābhāram avatārya kṣiter aham yāsyāmy amaralokasya pālanāya bravīhi tān

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर रंगभूमिके मध्यभागके समीप कंसने युद्धपरीक्षकोंको बैठाया और फिर स्वयं आप भी एक वहाँ अन्त:पुरकी स्त्रियोंके और नगरकी महिलाओंके लिये भी अलग-अलग मंच बिठाये गये थे और उन मंचोंके पास ही अक्रूर और नगरकी नारियोंके बीचमें ' चलो, अन्तकालमें ही पुत्रका मुख तो देख लूँगी' ऐसा विचारकर पुत्रंक लिये मंगलकामना करती हुई देवकीजी बैठी थीं

English

by Sankarshana, I will then return to them. The tyrants that

अध्याय ११७

श्लोक 27

इत्य् उक्तो वासुदेवेन देवदूतः प्रणम्य तम् मैत्रेय दिव्यया गत्या देवराजान्तिकं ययौ

ity ukto vāsudevena devadūtaḥ praṇamya tam maitreya divyayā gatyā devarājāntikaṃ yayau

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर जिस समय तूर्य आदिके बजने तथा चाणूरके हाहाकार कर रहे थे, गोपवेषधारी वीर बालक बलभद्र और कृष्ण कुछ हँसते हुए रंगभूमिके ट्वारपर आये ॥ ३०-३१ ॥ वहाँ आते ही महावतकी प्रेरणासे कुवलयापीड नामक हाथी गया तथा बलदेवजीने अपने अनुज कृष्णकी ओर देखकर कहा--'' है महाभाग ! इस हाथीको शशत्रुने ही प्रेरित किया है; अत: इसे मार डालना चाहिये '”॥ ३३-३४ ॥ फिर केशिनिषूदन भगवान् श्रीकृष्णे बलमें ऐरावतके समान उस महाबली हाथीकी सूँड अपने हाथसे पकड़कर उसे घुमाया जघान वामपादेन मस्तके हस्तिनं रुषा॥ ४० सो5यं यः कालियं नागं ममर्दारुह्य बालक: । अरिष्टो धेनुकः केशी लीलयैव महात्मना। युवेव वसुदेवो5भूद्विहायाभ्यागतां जराम्॥ ५२ महाबली रोहिणीनन्दनने रोषपूर्वक अति वेगसे उछलकर उस हाथीके मस्तकपर अपनी बायीं लात मारी

English

oppressed the earth, Jarásandha and the rest, have been slain

अध्याय ११७

श्लोक 28

भगवान् अप्य् अथोत्पातान् दिव्यभौमान्तरिक्षगान् ददर्श द्वारकापुर्यां विनाशाय दिवानिशम्

bhagavān apy athotpātān divyabhaumāntarikṣagān dadarśa dvārakāpuryāṃ vināśāya divāniśam

हिन्दी अर्थ

इन्द्र-वज़से आहत पर्वतके समान गिर पड़ा तब महावतसे प्रेरित कुवलयापीडको मारकर उसके मद और रक्तसे लथपथ राम और कृष्ण उसके दाँतोंको लिये हुए गर्वयुक्त लीलामयी चितवनसे निहारते उस महान् रंगभूमिमें इस प्रकार आये जेसे मृगसमूहके बीचमें सिंह पूतनाको मारा था, शकटको उलट दिया था और यमलार्जुनको उखाड़ डाला था वह यही है । जिस बालकने कालियनागके ऊपर चढ़कर उसका मान मर्दन किया था और सात था वह यही है॥ ४५-४६॥ जिस महात्माने अरिष्टासुर, आगे इनके बड़े भाई महाबाहु बलभद्रजी हैं जो बड़े लीलापूर्वक चल रहे हैं। ये स्त्रियोंके मन और नयनोंको बड़ा ही आनन्द देनेवाले हैं 2

English

and a youth even of the race of Yadu is so less than they

अध्याय ११७

श्लोक 29

तान् दृष्ट्वा यादवान् आह पश्यध्वम् अतिदारुणान् महोत्पाताञ् छमायैषां प्रभासं याम मा चिरम् इत्य् उक्तवति गोविन्दे यातुकामे दिवं पुनः एवम् उक्ते तु कृष्णेन यादवप्रवरस् ततः

tān dṛṣṭvā yādavān āha paśyadhvam atidāruṇān mahotpātāñ chamāyaiṣāṃ prabhāsaṃ yāma mā ciram ity uktavati govinde yātukāme divaṃ punaḥ evam ukte tu kṛṣṇena yādavapravaras tataḥ

हिन्दी अर्थ

लोग कहते हैं कि ये गोपालजी डूबे हुए यदुवंशका उद्धार ये सर्वलोकमय और सर्वकारण भगवान् विष्णुके ही अंश हैं, इन्होंने पृथिवीका भार उतारनेके लिये ही भूमिपर अवतार लिया है”” राम और कृष्णके विषयमें पुरवासियोंके इस प्रकार कहते समय देवकीके स्तनोंसे स्नेहके कारण दूध बहने लगा और उनके हृदयमें बड़ा अनुताप हुआ कारण वसुदेवजी भी मानो आयी हुई जराको छोड़कर फिरसे नवयुवक-से हो गये वल्गता मुष्टिकेनेव चाणूरेण तथा सखि। राजाके अन्त:पुरकी स्त्रियाँ तथा नगर निवासिनो

English

an incumbrance. Having removed this huge weight of the

अध्याय ११७

श्लोक 30

महाभागवतः प्राह प्रणिपत्योद्धवो हरिम् भगवन् यन् मया कार्यं तद् आज्ञापय साम्प्रतम् मन्ये कुलम् इदं सर्वं भगवान् संहरिष्यति

mahābhāgavataḥ prāha praṇipatyoddhavo harim bhagavan yan mayā kāryaṃ tad ājñāpaya sāmpratam manye kulam idaṃ sarvaṃ bhagavān saṃhariṣyati

हिन्दी अर्थ

देखो, जो कुवलयापीडके साथ युद्ध करनेके परिश्रमसे कमलको लज्जित कर रहा है। अरी ! इसका दर्शन करके अपने नेत्रोंका होना सफल कर लो''॥ ५४-५५ ॥ एक स्त्री बोली-- “हे भामिनि! इस बलदेवजीको आते हुए नहीं देखती हो ?2// तीसरी०--- ““अरी सखियो! अखाड़ेमें चक्कर देकर घूमनेवाले चाणूर और मुष्टिकके साथ क्रीडा करते हुए बलभद्र तथा कृष्णका हँसना देख चौथी०--- “हाय! सखियो! देखो तो चाणूरसे लड़नेके लिये ये हरि आगे बढ़ रहे हैं; क्‍या इन्हें छुड़ानेवाले कोई भी बड़े-बूढ़े यहाँ नहीं हैं ?''

English

earth, I will proceed to the mansions of the celestials. Say

अध्याय ११७

श्लोक 31

नाशायास्य निमित्तानि कुलस्याच्युत लक्षये

nāśāyāsya nimittāni kulasyācyuta lakṣaye

हिन्दी अर्थ

'कहाँ तो यौवनमें प्रवेश करनेवाले सुकुमार-शरीर श्याम और कहाँ वचज्रके समान कठोर शरीरवाला यह सुकुमार शरीरवाले हैं, किंतु इनके प्रतिपक्षी ये चाणूर आदि हैत्य मलल अत्यन्त दारुण हैं जो वे मध्यस्थ होकर भी इन बालक और बलवान् मल्लोंके बीच युद्ध करा रहे हैं कसकर उन समस्त दर्शकोंके बीचमें पृथिवीको कम्पायमान करते हुए रंगभूमिमें कूद पड़े श्रीबलभद्रजी भी अपने भुजदण्डोंको ठोंकते हुए अति मनोहरभावसे उछलने लगे। उस समय उनके पद- पदपर पृथिवी नहीं फटी, यही बड़ा आश्चर्य है

English

PaRASArA said ;— Maitreya, being thus addressed by Vasudeva, the messenger of the celestials bowed and took his heavenly course to tlie king of the deities. Th* illus- trious Krishna too now espied sigus and portents b-th on earth and in heaven prognosticating day and night the des- truction of Dwlraká. Beholding those evil omen», be said to the Yádavas; " Behold these dreadíul portents; let us hasten to Prabhisa to avert them." When he had thus said 'o the eminent Yádavas, the illustrious Uddhaba saluted *«d said to him : " Tell rae, lord, what it is proper that

अध्याय ११७

श्लोक 32

गच्छ त्वं दिव्यया गत्या मत्प्रसादसमुत्थया बदरीकाश्रमं पुण्यं गन्धमादनपर्वते नरनारायणस्थाने तत्पावितमहीतले

gaccha tvaṃ divyayā gatyā matprasādasamutthayā badarīkāśramaṃ puṇyaṃ gandhamādanaparvate naranārāyaṇasthāne tatpāvitamahītale

हिन्दी अर्थ

खेदाच्चालयता कोपान्निशशेखरकेसरम्॥ ७० वारयामास तूर्याणि कंस: कोपपरायण: ॥ ७१ जय गोविन्द चाणूरं जहि केशव दानवम्। चाणूरेण चिरं कालं॑ क्रीडित्वा मधुसूदन: । भगवानूसे भिड़ता गया वेसे-ही-वैसे उसको प्राणशक्ति थोड़ी-थोड़ी करके अत्यन्त क्षीण होती गयी शिरोभूषणोंमें लगे हुए केशरको हिलानेवाले उस चाणूरसे उस समय चाणूरके बलका तूर्य आदि बाजे बन्द करा दिये

English

I should do, for it seems to me tliat thou wilt destroy all this race. The signs that are manifestdeclare nothing less than tlie anniliilation of the race. "Thedtton Krishna replied: —

अध्याय ११७

श्लोक 33

मन्मना मत्प्रसादेन तत्र सिद्धिम् अवाप्स्यसि अहं स्वर्गं गमिष्यामि उपसंहृत्य वै कुलम्

manmanā matprasādena tatra siddhim avāpsyasi ahaṃ svargaṃ gamiṣyāmi upasaṃhṛtya vai kulam

हिन्दी अर्थ

और तूर्य आदिके बन्द हो जानेपर आकाशमें अनेक दिव्य हर्षित होकर अलक्षितभावसे कहने लगे--'' है गोविन्द ! आपकी जय हो। है केशव ! आप शीघ्र ही इस चाणूर दानवको मार डालिये।”' भगवान् मधुसूदन बहुत देरतक चाणूरके साथ खेल करते रहे, फिर उसका वध करनेके लिये उद्यत होकर उस हैत्य मललको सैकड़ों बार घुमाकर आकाशमें ही द्वारा पृथिवीपर गिराये जाते ही चाणूरके शरीरके सैकड़ों टुकड़े हो गये और उस समय उसने रक्तस्नावसे पृथिवीको अत्यन्त कीचड़मय कर दिया

English

to the holy place Badrikasrama in the Gandhamadana mountain, the shrine of Nara Nárayana ; and on that spot sanctified by them, thou, meditating upon me, shalt ohtain perfection through my favour. Having extirpated this Yadu race, I shall proceed to Baikuntha; and after I have quitted Dwaraka; the ocean shall inundate it."

अध्याय ११७

श्लोक 34

द्वारकां च मया त्यक्तां समुद्रः प्लावयिष्यति मद्वेश्म चैतं मुक्त्वैव भयान् मत्तो जलाशयः तत्र संनिहितश् चाहं भक्तानां हितकाम्यया

dvārakāṃ ca mayā tyaktāṃ samudraḥ plāvayiṣyati madveśma caitaṃ muktvaiva bhayān matto jalāśayaḥ tatra saṃnihitaś cāhaṃ bhaktānāṃ hitakāmyayā

हिन्दी अर्थ

भगवान् कृष्ण चाणूरसे लड़ रहे थे, उसी प्रकार महाबली बलरामजीने उसके मस्तकपर घूँसोंसे तथा पृथिवीपर पटककर राोंद डाला बायें हाथसे घूँसा मारकर पृथिवीपर गिरा दिया मल्लराज तोशलके नष्ट होनेपर समस्त मललगण भाग

English

PARASARA said : — Being thus addressed by him and crfm- manded by Kesava, Uddhaba proceeded to the holy shrine of Nara Naráyana. And the Yádavas, with Krishna, Balarama and others, having ascended swift-coursing cars, proceeded to Prabhasa. Having reached Prabhasa, the Kukkuras and Andhakas bathed there and, being excited by Krishna, in- dulged in liquor. As they drank, the destructive fire of dessension was engendered amongst them by mutual colli- sion and fed with the fuel of abuse. Worked up with ire by the divine influence, they attacked one another with missle weapons, and when these were finished, they had recourse to the rushes growing nigh. The rushes in their hands became like thunder-bolts, and they assailed one another with them. Pradyumna, Syamba, Kritavarman, Sátyaki Aniruddha, Pritliu, Vipathu, Cháruvarman, Cháruka, Akrura, and many others, struck one another with the rushes, which became hard like thunder-bolts. Thereupon Krishna arriving there prevented them : but they thought that he was taking part with each severally and continued the conflict.

अध्याय ११७

श्लोक 35

इत्य् उक्तः प्रणिपत्यैनं जगाम स तदोद्धवः नरनारायणस्थानं केशवेनानुमोदितः

ity uktaḥ praṇipatyainaṃ jagāma sa tadoddhavaḥ naranārāyaṇasthānaṃ keśavenānumoditaḥ

हिन्दी अर्थ

तब कृष्ण और संकर्षण अपने समवयस्क गोपोंको बलपूर्वक खींचकर आलिंगन करते हुए हर्षसे रंगभूमिमें उछलने लगे केशेष्वाकृष्प विगलत्किरीटमवनीतले। मृतस्य केशेषु तदा गुहीत्वा मधुसूदन:। देवक्याशच महाबाहुर्बलदेवसहायवान्॥ ९२ प्रसीद सीदतां दत्तो देवानां यो वरः प्रभो। लोहेकी श्रृंखलामें बाँधकर पकड़ लो तथा वृद्ध पुरुषोंके अयोग्य दण्ड देकर वसुदेवको भी मार डालो मेरे सामने कृष्णके साथ ये जितने गोपवालक उछल रहे हैं इन सबको भी मार डालो तथा इनकी गौएँ और जो कुछ अन्य धन हो वह सब छीन लो”! समय कंस इस प्रकार आज्ञा दे रहा था, उसी समय श्रीमधुसूदन हँसते-हँसते उछलकर मंचपर चढ़ गये और शीघ्रतासे उसे पकड़ लिया

English

Thereupon, enraged, Krishna took up a handíul of rushes to destroy them, which became a club of iron ; and with thts he killed many of the murderous Yádavas, whilst others fighting fiercely destroyed one another. At this time w the very presence of Krishna's charioteer, his swift steeos carried off his Jaitra car and errtered into the sea. The dts-

अध्याय ११७

श्लोक 36

ततस् ते यादवाः सर्वे रथान् आरुह्य शीघ्रगान् प्रभासं प्रययुः सार्धं कृष्णरामादिभिर् द्विज

tatas te yādavāḥ sarve rathān āruhya śīghragān prabhāsaṃ prayayuḥ sārdhaṃ kṛṣṇarāmādibhir dvija

हिन्दी अर्थ

उसके केशोंको खींचकर उसे पृथिवीपर पटक दिया तथा उसके ऊपर आप भी कूद पड़े, इस समय उसका मुकुट सिरसे खिसककर अलग जा पड़ा कृष्णचन्द्रने मृतक कंसके केश पकड़कर उसके देहको कंसका देह बहुत भारी था, इसलिये उसे घसीटनेसे जलके महान् वेगसे हुई दरारके भाई सुमालीने क्रोधपूर्वक आक्रमण किया उसे बलरामजीने लीलासे ही मार डाला

English

cus, the club, the bow, the quiver, the sliell and the sword of Kesava, having circumambulated their master, flew along the path of the sun. In mjliort time there was not a single Yadava left alive sa'^Rhe mighty Krishna and Dáruka. Going towards Ráma, who was sitting at the root of a tree, they saw a huge scrpent coining out of his mouth. Having issued out of his mouth, the niighty snake proceeded towards the ocean hymned by saints and other 'great snakes. Bringing an offering of respect. the ocean carae to him and then the majestic being worshipped' of all the attendant snakes, entered into the waters of the deep. Beholding the departure of the spirit of Baladeva, K(i<ava said to Dáruka— " Do thou go to Vasudeva and Ugrasena and communicate unto him this. Go and inform them of the departnre of Bala- bhadra, and the destruction of the Yadava race, and also that I shall engage in religious meditation and renounce my body. Do thou also inform Ahuka and the inhabitants of Dwáraká that their city shall be inundated by the ocean. And do ye await the arrival of Arjuna at Dwáraká. When Arjuna, the descendant of PSndu, shall issue out of the city, none of you should wait there but go whither the descendant of Kuru shall repair. Do thou also go to the son of Kunti and tell him that he may at myrequest protect my family according to his might. Then go to Hastinapur with Arjuna and all the inhabitants of Dwaraka and, let Vajra be installed king over the race of Yadu."

अध्याय ११७

श्लोक 37

प्राप्य प्रभासं प्रयताः स्नातास् ते कुकुरान्धकाः चक्रुस् तत्र मुदा पानं वासुदेवानुमोदिताः

prāpya prabhāsaṃ prayatāḥ snātās te kukurāndhakāḥ cakrus tatra mudā pānaṃ vāsudevānumoditāḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार मथुरापति कंसको उपस्थित सम्पूर्ण जनता हाहाकार करने लगी समय महाबाहु कृष्णचन्द्र बलदेवजी-सहित वसुदेव और देवकीके चरण पकड़ लिये आया और उन्होंने श्रीजनार्दनको पृथिवीपरसे उठा लिया तथा उनके सामने प्रणतभावसे खड़े हो गये श्रीवसुदेवजी बोले--हे प्रभो! अब आप हमपर प्रसन्‍न होइये। है केशव! आपने आरत्त देवगणोंको जो वर दिया था, वह हम दोनोंपर अनुग्रह करके पूर्ण भगवन्! आपने जो मेरी आराधनासे दुष्टजनोंके नाशके लिये मेरे घरमें जन्म लिया, उससे हमारे कुलको पवित्र कर दिया है

English

PARASARA said : — Thus instructed and having bowed unto and circumambulated Krishna again and again, Dáruka de- parted as he had been desired ; and having conducted Arjuna to DwSravati, the intelligent servant of Krishna established Vajra as king. Thereupon having concentrated in himself that supreme spirit which is identical with Vasudeva, the divine Govinda was identified with all beings. Respecting 'he worlds of the Brlhmana, the curse of Durvásas, the iílus- trious Krishna sat engaged in meditation, placing his foot

अध्याय ११७

श्लोक 38

पिबतां तत्र वै तेषां संघर्षेण परस्परम् अतिवादेन्धनो जज्ञे कलहाग्निः क्षयावहः स्वं स्वं तु भुज्यतां तेषां कलहो निर्निमित्तयाः संघर्षो वा द्विजश्रेष्ठ तन् ममाख्यातुम् अर्हसि मृष्टं मदीयम् अन्नं ते न मृष्टम् इति भाषताम् मृष्टामृष्टकथा जज्ञे संघर्षकलहौ तदा ततश् चान्योन्यम् अभ्येत्य क्रोधसंरक्तलोचनाः

pibatāṃ tatra vai teṣāṃ saṃgharṣeṇa parasparam ativādendhano jajñe kalahāgniḥ kṣayāvahaḥ svaṃ svaṃ tu bhujyatāṃ teṣāṃ kalaho nirnimittayāḥ saṃgharṣo vā dvijaśreṣṭha tan mamākhyātum arhasi mṛṣṭaṃ madīyam annaṃ te na mṛṣṭam iti bhāṣatām mṛṣṭāmṛṣṭakathā jajñe saṃgharṣakalahau tadā tataś cānyonyam abhyetya krodhasaṃraktalocanāḥ

हिन्दी अर्थ

मंशावतारकरणैर्न ममासि पुत्र: । त्व॑ विष्णुरीश जगतामुपकारहेतो: यज्ञोंसे आपहीका यजन किया जाता है तथा है परमेश्वर! ही हँसीको बात है॥९८-९९॥ आप आदि और हैं, ऐसा कौन मनुष्य है जिसकी जिह्ाा आपको “पुत्र” कहकर सम्बोधन करेगी 2 उत्पन्न हुआ है वही आप बिना मायाशक्तिके और किस प्रकार हमसे उत्पन्न हो सकते हैं कुक्षि (कोख) और गोदमें शयन करनेवाला मनुष्य

English

As they drank there, through friction with one another a fire of strife arose, fuelled by abusive words, bringing destruction. [Maitreya asked:] "As each was eating his own, how did the quarrel or friction arise without cause, best of brahmins? You should tell me." [Parashara said:] As they said, "My food is tasty, yours is not," a dispute about tasty and untasty arose, then friction and strife; and then, rushing at one another, their eyes red with anger,

अध्याय ११७

श्लोक 39

जघ्नुः परस्परं ते तु शस्त्रैर् दैवबलात्कृताः क्षीणशस्त्राश् च जगृहुः प्रत्यासन्नाम् अथैरकाम्

jaghnuḥ parasparaṃ te tu śastrair daivabalātkṛtāḥ kṣīṇaśastrāś ca jagṛhuḥ pratyāsannām athairakām

हिन्दी अर्थ

हे परमेश्वर! वही आप हमपर प्रसन्‍न होइये और अपने अंशावतारसे विश्वकी रक्षा कीजिये। आप मेरे पुत्र हमें क्‍यों मोहित कर रहे हैं 2 मेरे पुत्र हैं' इस मायासे मोहित होकर मैंने कंससे अत्यन्त भय माना था और उस शत्रुके भयसे ही मैं आपको गोकुल ले गया था। है ईश! आप वहीं रहकर इतने बड़े हुए हैं, इसलिये अब आपमें मेरी ममता नहीं रही है अबतक मैंने आपके ऐसे अनेक कर्म देखे हैं जो रुद्र, नहीं हैं। अब मेरा मोह दूर हो गया है। है ईश! मैंने ही जगत्के उपकारके लिये प्रकट हुए हैं श्रीपराशर उवाच श्रीपराशरजी बोले--- अपने अति अदभुत कर्मोको भगवानने यदुवंशियोंको मोहित करनेके लिये अपनी वैष्णवी देवकीवसुदेवौ तु दृष्ट्वा हित े-48 मायाका विस्तार किया कुर्वतां याति य: कालो मातापित्रोरपूजनम् । सेवा किये बिना बीतता है वह असाधु पुरुषोंकी ही आयुका

English

they struck each other with weapons, compelled by the power of fate; when their weapons were exhausted they seized the eraka reeds growing nearby.

अध्याय ११७

श्लोक 40

एरका तु गृहीता तैर् वज्रभूतेव लक्ष्यते तया परस्परं जघ्नुः संप्रहारे सुदारुणे

erakā tu gṛhītā tair vajrabhūteva lakṣyate tayā parasparaṃ jaghnuḥ saṃprahāre sudāruṇe

हिन्दी अर्थ

हे तात! गुरु, देव, ब्राह्मण और तत्खण्डमायुषो ॥ क रहनेसे देहधारियोंका का अत: है तात! कंसके वीर्य और कुर्वतां सफल: कालो देहिनां तात जायते॥ ४ प्रतापसे भीत हम परवशोंसे जो कुछ अपराध हुआ हो वह यदुवृद्धोंका यथायोग्य अभिवादन कर पुरवासियोंका उस समय कंसकी पत्नियाँ और यथावदभिपूज्याथ चक्रतु: पौरमाननम्॥ ६ माताएँ पृथिवीपर पड़े हुए मृतक कंसको घेरकर दुःख-

English

The eraka grass seized by them looked like thunderbolts; with it they struck each other in a most dreadful fight.

अध्याय ११७

श्लोक 41

प्रद्युम्नसाम्बप्रमुखाः कृतवर्माथ सात्यकिः अनिरुद्धादयश् चान्ये पृथुर् विपृथुर् एव च

pradyumnasāmbapramukhāḥ kṛtavarmātha sātyakiḥ aniruddhādayaś cānye pṛthur vipṛthur eva ca

हिन्दी अर्थ

उग्रसेनें ततो बन्धान्मुमोच मधुसूदन:। किया कृतौर्द्धवहैहिक चैन सिंहासनगतं “'हे विभो! हमारे योग्य जो सेवा हो उसके लिये हमें ययातिका शाप होनेसे कि ओंको भी आज्ञा दे सकते हैं'' भृत्ये स्थिते देवानाज्ञापयतु कि नृपैः ॥ १२ 032, मयि भू आस 2 £ श्रीपराशरजी बोले--उग्रसेनसे इस प्रकार कह उबाच चैनं भगवान्केशवः कार्यमानुष: ॥ १३ वहाँ उपस्थित हो गया तब भगवानने उससे कहा-- दीयतामुग्रसेनाय सुधर्मा भवता सभा॥ १४ ददौ सो5पि सुधर्माख्यां सभां वायो: पुरन्दरः ॥ १६ अयाचत मृतं पुत्र प्रभासे लवणार्णवे॥ २५ “'हे वायो! तुम जाओ और इन्द्रसे कहो कि है वासव!

English

Pradyumna, Samba and the others, Kritavarman and Satyaki, Aniruddha and the rest, Prithu and Viprithu,

अध्याय ११७

श्लोक 42

चारुवर्मा चारुकश् च तथाक्रूरादयो द्विज एरकारूपिभिर् वज्रैस् ते निजघ्नुः परस्परम्

cāruvarmā cārukaś ca tathākrūrādayo dvija erakārūpibhir vajrais te nijaghnuḥ parasparam

हिन्दी अर्थ

इसमें यादवोंका विराजमान होना उपयुक्त है'” श्रीपराशरजी बोले--भगवान्की ऐसी आज्ञा होनेपर वायुने यह सारा समाचार इन्द्रसे जाकर कह दिया और भुजाओंके आश्रित रहकर करने लगे सम्पन्न होते हुए भी वीरवर कृष्ण और बलराम गुरु- अवन्‍्तिपुरवासी सान्दीपनि मुनिके यहाँ गये॥ १८-१९॥

English

Charuvarman, Charuka and Akrura and the others, brahmin, struck each other with thunderbolts in the form of eraka reeds.

अध्याय ११७

श्लोक 43

निवारयाम् आस हरिर् यादवांस् ते च केशवम् सहायं मेनिरे प्राप्तं ते निजघ्नुः परस्परम्

nivārayām āsa harir yādavāṃs te ca keśavam sahāyaṃ menire prāptaṃ te nijaghnuḥ parasparam

हिन्दी अर्थ

हे द्विज! यह बड़े आश्चर्यकी बात हुई कि सान्दीपनिने जब उनके इस असम्भव और और चन्द्रमा ही मेरे घर आ गये हैं फिर गुरुजीसे कहा--''कहिये, आपको क्‍या गुरुदक्षिणा दें ?”'॥ २३-२४ ॥ महामति सान्दीपनिने उनके अतीन्द्रिय- अपने पुत्रको माँगा उपस्थित हुआ और कहा--'' मैंने सान्दीपनिका पुत्र हरण हे देत्यदवन! मेरे जलमें ही पंचजन नामक एक हैत्य शंखरूपसे रहता है; उसीने उस बालकको

English

Hari tried to stop the Yadavas, but they thought Keshava had come as an ally of their opponents, and struck each other.

अध्याय ११७

श्लोक 44

कृष्णो ऽपि कुपितस् तेषाम् एरकामुष्टिम् आददे वधाय सो ऽपि मुसलं मुष्टिर् लोहम् अभूत् तदा

kṛṣṇo 'pi kupitas teṣām erakāmuṣṭim ādade vadhāya so 'pi musalaṃ muṣṭir loham abhūt tadā

हिन्दी अर्थ

श्रीपराशरजी बोले--समुद्रके इस प्रकार कहनेपर कृष्णचन्द्रने जलके भीतर जाकर पंचजनका वध किया और उसको अस्थियोंसे उत्पन्न हुए शंखको ले लिया बलदेवशए्च बलवाउिजत्वा वैवस्वतं यमम्॥ ३० जिसके शब्दसे हैत्योंका बल नष्ट हो जाता है, देवताओंका तेज बढ़ता है और अधर्मका क्षय होता तदनन्तर उस पांचजन्य शंखको बजाते हुए और सूर्यपुत्र यमको जीतकर यमयातना भोगते हुए उस बालकको पूर्ववत् शरीरयुक्तकर उसके पिताको परिपालित मथुरापुरीमें, जहाँके स्त्री-पुरुष उनके युयुधाते सम॑ तस्य बलिनौ बलिसैनिकेै: ॥ आयुधानां पुराणानामादाने मुनिसत्तम॥ आकाशादागतौ विप्र तथा कौमोदकी गदा॥ श्रीपराशरजी बोले--हे मैत्रेय! महाबली कंसने

English

Krishna too, angered, took a handful of eraka to slay them, and that handful became an iron club.

अध्याय ११७

श्लोक 45

जघान तेन निःशेषान् यादवान् आततायिनः जघ्नुश् च सहसाभ्येत्य तथान्ये वै परस्परम्

jaghāna tena niḥśeṣān yādavān ātatāyinaḥ jaghnuś ca sahasābhyetya tathānye vai parasparam

हिन्दी अर्थ

तब महाबली राम और जनार्दन थोड़ी-सी सेनाके साथ नगरसे निकलकर जरासन्धके प्रबल सैनिकोंसे हे विप्र! हरिके स्मरण करते ही कौमोदकी नामकी गदा आकाशसे आकर उपस्थित हे द्विज! बलभद्रजीके पास भी उनका तदनन्तर दोनों वीर राम और कृष्ण सेनाके सहित मगधराजको युद्धमें हराकर मथुरापुरीमें चले हे महामुने! दुराचारी जरासन्धको जीत लेनेपर भी उसके जीवित चले जानेके कारण कृष्णचद्रने अपनेको अपराजित नहीं समझा

English

With it he slew all the murderous Yadavas, and the others too, rushing suddenly, struck each other.

अध्याय ११७

श्लोक 46

ततश् चार्णवमध्येन जैत्रो ऽसौ चक्रिणो रथः पश्यतो दारुकस्याशु हृतो ऽश्वैर् द्विजसत्तम

tataś cārṇavamadhyena jaitro 'sau cakriṇo rathaḥ paśyato dārukasyāśu hṛto 'śvair dvijasattama

हिन्दी अर्थ

मनुष्यधर्मशीलस्य लीला सा जगतीपते:। मनसेव जगत्सृष्टिं संहारं च करोति यः। करोति दण्डपातं च क्वचिदेव पलायनम्॥ १७ हे द्विजोत्तम! जरासन्ध फिर उतनी ही सेना जरासन्धने राम और कृष्ण आदि यादवोंसे अट्टारह इन सभी युद्धोंमें अधिक सैन्यशाली जरासन्ध थोड़ी-सी सेनावाले यदुवंशियोंसे यादवोंकी थोड़ी-सी सेना भी जो उसकी अनेक बड़ी सेनाओंसे पराजित न सन्निधिका ही माहात्म्य था

English

Then, as Daruka watched, the victorious chariot of the discus-bearer was quickly carried off by the horses across the midst of the ocean, best of the twice-born.

अध्याय ११७

श्लोक 47

चक्रं तथा गदा शार्ङ्गतूणी शङ्खो ऽसिर् एव च प्रदक्षिणं हरिं कृत्वा जग्मुर् आदित्यवर्त्मना

cakraṃ tathā gadā śārṅgatūṇī śaṅkho 'sir eva ca pradakṣiṇaṃ hariṃ kṛtvā jagmur ādityavartmanā

हिन्दी अर्थ

जगत्पतिकी यह लीला ही है जो कि ये अपने संहार कर देते हैं, उन्हें अपने शत्नुपक्षका नाश करनेके लिये भला उद्योग फैलानेकी कितनी आवश्यकता तथापि वे बलवानोंसे सन्धि और बलहीनोंसे युद्ध करके मानव-धर्मोका अनुवर्तन कर रहे थे वे कहीं साम, कहीं दान और कहीं भेदनीतिका व्यवहार करते थे तथा कहीं दण्ड देते और कहींसे स्वयं ततः कोपपरीतात्मा दक्षिणापथमेत्य सः। श्रीपराशरजी बोले--हे द्विज! एक बार महर्षि गार्ग्यसे उनके सालेने यादवोंकी गोष्ठीमें नपुंसक कह

English

The discus, the mace, the Sharnga bow, the quivers, the conch and the sword circumambulated Hari and went by the path of the sun.

अध्याय ११७

श्लोक 48

क्षणेन नाभवत् कश्चिद् यादवानाम् अघातितः ऋते कृष्णं महाबाहुं दारुकं च महामुने

kṣaṇena nābhavat kaścid yādavānām aghātitaḥ ṛte kṛṣṇaṃ mahābāhuṃ dārukaṃ ca mahāmune

हिन्दी अर्थ

यादवसेनाको भयभीत करनेवाले पुत्रकी प्राप्तिके लिये उन्होंने श्रीमहादेवजीकी उपासना करते हुए केवल लोहचूर्ण भक्षण किया तब भगवान् शंकरने ४ इनके एक भौरेके समान कृष्णवर्ण बालक हुआ त॑ कालयवनं नाम राज्ये स्वे यवनेश्वर: मागधस्य बलं॑ क्षीणं स कालयवनो बली। हन्तेतदेवमायातं यदूनां व्यसन द्विधा॥ १० यादवाभिभवं दुष्टा मा कुर्वन्तवरयोडधिका: ॥ १२

English

In a moment there was no Yadava left unslain except mighty-armed Krishna and Daruka, great sage.

अध्याय ११७

श्लोक 49

चङ्क्रम्यमाणौ तौ रामं वृक्षमूले कृतासनम् ददृशाते मुखाच् चास्य निष्क्रामन्तं महोरगम्

caṅkramyamāṇau tau rāmaṃ vṛkṣamūle kṛtāsanam dadṛśāte mukhāc cāsya niṣkrāmantaṃ mahoragam

हिन्दी अर्थ

कि पृथिवीपर बलवान् राजा कौन-कौनसे हैं? इसपर नारदजीने उसे यादवोंको ही सबसे अधिक बलशाली यह सुनकर कालयवनने हजारों हाथी, घोड़े और रथोंके सहित सहस्रों करोड़ म्लेच्छसेनाको साथ ले बड़ी भारी तेयारी की और याददवोंके प्रति क्रुद्ध होकर वह प्रतिदिन हाथी, घोड़े आदिके थक जानेपर उन वाहनोंका त्याग करता हुआ अन्य वाहनोंपर चढ़कर अविच्छिन्न-गतिसे मथुरापुरीपर चढ़ आया एक ओर जरासन्धका आक्रमण और दूसरी ओर “यवनोंके साथ युद्ध करनेसे क्षीण हुई यादव-सेना अवश्य ही मगधनरेशसे पराजित हो जायगी मगधनरेशसे लड़ते हैं तो उससे क्षीण हुई यादवसेनाको बलवान् कालयवन नष्ट कर देगा हाय ! इस प्रकार यादवोंपर एक ही साथ यह दो तरहकी आपत्ति आ पहुँची है

English

Walking about, the two saw Rama seated at the foot of a tree, and a great serpent coming out of his mouth.

अध्याय ११७

श्लोक 50

निष्क्रम्य स मुखात् तस्य महाभोगो भुजंगमः प्रययाव् अर्णवं सिद्धैः पूज्यमानस् तथोरगैः

niṣkramya sa mukhāt tasya mahābhogo bhujaṃgamaḥ prayayāv arṇavaṃ siddhaiḥ pūjyamānas tathoragaiḥ

हिन्दी अर्थ

अत: मैं यादवोंके लिये एक ऐसा दुर्जय दुर्ग तैयार कराता है, स्त्रियाँ भी युद्ध कर सकें उस दुर्गमें रहनेपर यदि में मत्त, प्रमत्त (असावधान), सोया अथवा कहाँ बाहर भी गया होऊँ तब भी, अधिक-से-अधिक दुष्ट शत्रुगण भी यादवोंको पराभूत न कर सकें '! ऐसा विचारकर श्रीगोविन्दने समुद्रसे बारह योजन भूमि माँगी और उसमें द्वारकापुरी निर्माण की सैकड़ों सरोवर तथा अनेकों महलोंसे सुशोभित थी

English

Having come out of his mouth, the serpent of great coils went to the ocean, worshipped by siddhas and serpents.

अध्याय ११७

श्लोक 51

ततो ऽर्घम् आदाय तदा जलधिः संमुखं ययौ प्रविवेश च तत्तोयं पूजितः पन्नगोत्तमैः

tato 'rgham ādāya tadā jaladhiḥ saṃmukhaṃ yayau praviveśa ca tattoyaṃ pūjitaḥ pannagottamaiḥ

हिन्दी अर्थ

निवासियोंको द्वारकामें ले आये और फिर स्वयं मथुरा जब कालयवनकी सेनाने मथुराको घेर निकल आये तब यवनराज कालयवनने उन्हें देखा हाथ देखकर वह उनके पीछे दौड़ा महा गुहामें घुस गये जिसमें महावीर्यशाली राजा मुचुकुन्द स हि देवासुरे युद्धे गतो हत्वा महासुरान्। वसुदेवस्थ तनयो यदोर्वशसमुद्धव: ॥ २४ देवासुरमहायुद्धे. हैत्यसैन्यमहाभटा: उस दुर्मति यवनने भी उस गुफामें जाकर सोये हुए राजाकों कृष्ण समझकर लात मारी

English

Then the ocean, taking a guest-offering, came before him, and he entered its waters, worshipped by the best of serpents.

अध्याय ११७

श्लोक 52

दृष्ट्वा बलस्य निर्याणं दारुकं प्राह केशवः इदं सर्वं त्वम् आचक्ष्व वसुदेवोग्रसेनयोः

dṛṣṭvā balasya niryāṇaṃ dārukaṃ prāha keśavaḥ idaṃ sarvaṃ tvam ācakṣva vasudevograsenayoḥ

हिन्दी अर्थ

उसके लात मारनेसे उठकर राजा मुचुकुन्दने उस यवनराजको देखा। है मैत्रेय ! उनके देखते ही वह यवन उसकी क्रोधाग्निसे जलकर भस्मीभूत हो गया॥ २०-२१॥ पूर्वकालमें राजा मुचुकुन्द देवताओंकी ओरसे उस समय देवताओंने कहा था कि तुम्हारे शयन करनेपर तुम्हें जो कोई जगावेगा इस प्रकार पापी कालयवनको दग्ध कर चुकनेपर राजा मुचुकुन्दने श्रीमधुसूदनकों देखकर पूछा--'आप यदुकुलमें वसुदेवजीके पुत्ररूपसे उत्पन्न हुआ हूँ/” श्रीहरिको प्रणाम करके कहा--'' है परमेश्वर ! मैंने आपको हैं॥ २५-२६॥ पूर्वकालमें गार्ग्य मुनिने कहा था कि

English

Seeing Bala's departure, Keshava said to Daruka: "Tell all this to Vasudeva and Ugrasena —

अध्याय ११७

श्लोक 53

निर्याणं बलभद्रस्य यादवानां तथा क्षयम् योगे स्थित्वाहम् अप्य् एतत् परित्यक्ष्ये कलेवरम्

niryāṇaṃ balabhadrasya yādavānāṃ tathā kṣayam yoge sthitvāham apy etat parityakṣye kalevaram

हिन्दी अर्थ

अंश हैं और मनुष्योंक उपकारके लिये ही अवतीर्ण हुए हैं तथापि में आपके महान् तेजकों सहन करनेमें समर्थ हे भगवन्! आपका शब्द सजल मेघकी घोर गर्जनाके समान अति गम्भीर है तथा आपके चरणोंसे पीडिता होकर पृथिवी झुकी हुई है महासंग्राममें हैत्य-सेनाके बड़े-बड़े योद्धागण भी मेरा तेज नहीं सह सके थे और में आपका तेज सहन नहीं कर संसारमें पतित जीवोंके एकमात्र आप ही परम आश्रय हैं। है शरणागतोंका दुःख दूर करनेवाले! आप प्रसन्‍न होइये और मेरे अमंगलोंको नष्ट कीजिये आप ही समुद्र हैं, आप ही पर्वत हैं, आप ही नदियाँ हैं और आप ही वन हैं तथा आप ही पृथिवी, आकाश, वायु, जल, अग्नि और मन हैं

English

the departure of Balabhadra and the destruction of the Yadavas; I too, abiding in yoga, shall give up this body.

अध्याय ११७

श्लोक 54

वाच्यश् च द्वारकावासी जनः सर्वस् तथाहुकः यथेमां नगरीं सर्वां समुद्रः प्लावयिष्यति

vācyaś ca dvārakāvāsī janaḥ sarvas tathāhukaḥ yathemāṃ nagarīṃ sarvāṃ samudraḥ plāvayiṣyati

हिन्दी अर्थ

हैं; तथा पुरुषसे भी परे जो व्यापक और जन्म तथा विकारसे शून्य तत्त्व है वह भी आप हीं हैं शब्दादिसे रहित, अजर, अमेय, अक्षय और नाश तथा परिणामे तदेवेश तापात्मकमभून्मम ॥ ४९ देवलोकगतिं प्राप्तो नाथ देवगणो5पि हि। ततो निजक्रियासूति नरकेष्वतिदारुणम्। संसारभ्रमपरितापतप्तचेता हे भगवन्! तापत्रयसे अभिभूत होकर सर्वदा इस संसार-चक्रमें भ्रमण करते हुए मुझे कभी शान्ति

English

And tell all the people dwelling in Dvaraka, and Ahuka, that the ocean will flood this whole city.

अध्याय ११७

श्लोक 55

तस्माद् भवद्भिः सज्जैस् तु प्रतीक्ष्यो ह्य् अर्जुनागमः न स्थेयं द्वारकामध्ये निष्क्रान्ते तत्र पाण्डवे

tasmād bhavadbhiḥ sajjais tu pratīkṣyo hy arjunāgamaḥ na stheyaṃ dvārakāmadhye niṣkrānte tatra pāṇḍave

हिन्दी अर्थ

हे नाथ! जलकी आशासे मृगतृष्णाके समान मैंने दुःखोंकों ही सुख समझकर ग्रहण किया था; परन्तु वे मेरे सन्‍्तापके ही कारण हुए स्‍त्री तथा सेवक आदि और शब्दादि विषय इन सबको मैंने अविनाशी तथा सुख-बुद्धिसे ही अपनाया था; किन्तु है ईश! परिणाममें वे ही दुःखरूप सिद्ध हुए॥ ४०-४१॥ है नाथ! जब देवलोक प्राप्त करके आपकी आराधना किये बिना कौन शाश्वत शान्ति प्राप्त कर सकता है ? हे प्रभो! आपकी मायासे मूढ हुए पुरुष जन्म, मृत्यु और जरा आदि सन्तापोंको भोगते हुए अन्तमें यमराजका दर्शन करते हैं आपके स्वरूपको न जाननेवाले पुरुष नरकोंमें पड़कर अपने कमोके फलस्वरूप नाना प्रकारके दारुण क्लेश

English

Therefore, being ready, you should await the coming of Arjuna; do not stay in Dvaraka once the Pandava has left;

अध्याय ११७

श्लोक 56

तेनैव सह गन्तव्यं यत्र याति स कौरवः

tenaiva saha gantavyaṃ yatra yāti sa kauravaḥ

हिन्दी अर्थ

और आपकी मायासे मोहित होकर ममत्वाभिमानके गड्ढडेमें भटकता रहा हूँ और अप्रमेय परमपदरूप आप परमेश्वरकी शरणमें आया हूँ जिससे भिन्‍न दूसरा कुछ भी नहीं है और संसारभ्रमणके खेदसे खिनन्‍न-चित्त होकर मैं निरतिशय तेजोमय निर्वाणस्वरूप आपका ही अभिलाषी हूँ'' सौभाग्यमानमधिकं करोति क्षणसौहद: ॥ १३ श्रीपराशरजी बोले--परम बुद्धिमान् राजा अनादिनिधन भगवान् हरि बोले श्रीभगवानने कहा--हे नरेश्वर! तुम अपने अभिमत दिव्य लोकोंको जाओ; मेरी कृपासे तुम्हें

English

you should go with him wherever that Kaurava goes.

अध्याय ११७

श्लोक 57

गत्वा च ब्रूहि कौन्तेयम् अर्जुनं वचनान् मम पालनीयस् त्वया शक्त्या जनो ऽयं मत्परिग्रहः

gatvā ca brūhi kaunteyam arjunaṃ vacanān mama pālanīyas tvayā śaktyā jano 'yaṃ matparigrahaḥ

हिन्दी अर्थ

दिव्य भोगोंको भोगकर तुम अन्तमें एक महान् कुलमें स्मरण रहेगा और फिर मेरी कृपासे तुम मोक्षपद श्रीपराशरजी बोले--भगवान्के इस प्रकार कहनेपर और गुफासे निकलकर देखा कि लोग बहुत छोटे- उस समय कलियुगको वर्तमान समझकर राजा तपस्या करनेके लिये श्रीनरनारायणके आ उसको हाथी, घोड़े और रथादिसे सुशोभित सेनाको अपने वशीभूत किया और उसे द्वारकामें लाकर राजा उग्रसेनको अर्पण कर दिया। तबसे यदुवंश शत्रुओंके दमनसे निःशंक हो गया॥ ६-७॥ वहाँ पहुँचकर शत्रुजित् बलभद्रजीने गोप और गोपियोंका पहलेहीकी भाँति अति आदर और प्रेमके साथ अभिवादन किया

English

And go and tell Arjuna, son of Kunti, in my words: 'These people, my dependants, are to be protected by you according to your strength.'

अध्याय ११७

श्लोक 58

इत्य् अर्जुनेन सहितो द्वारवत्या भवाञ् जनम् गृहीत्वा यातु वज्रश् च यदुराजो भविष्यति

ity arjunena sahito dvāravatyā bhavāñ janam gṛhītvā yātu vajraś ca yadurājo bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

उनका आलिंगन किया और किसीको उन्होंने गले लगाया तथा किन्हीं गोप और गोपियोंके साथ उन्होंने गोपोंने बलरामजीसे अनेकों प्रिय वचन कहे तथा गोपियोंमेंसे कोई प्रणयकुपित होकर बोलीं और किन्हींने उपालम्भयुक्त बातें की करना ही जिनका स्वभाव है, वे नगर-नारियोंके प्राणाधार कृष्ण तो आनन्दमें हैं न? महिलाओंके सौभाग्यका मान नहीं बढ़ाया करते 2

English

So take the people of Dvaravati and go with Arjuna, and Vajra shall be king of the Yadus."

अध्याय ११७

श्लोक 59

इत्य् उक्तो दारुकः कृष्णं प्रणिपत्य पुनः पुनः प्रदक्षिणं च बहुशः कृत्वा प्रायाद् यथोदितम्

ity ukto dārukaḥ kṛṣṇaṃ praṇipatya punaḥ punaḥ pradakṣiṇaṃ ca bahuśaḥ kṛtvā prāyād yathoditam

हिन्दी अर्थ

किं तदालापै: देखनके लिये यहाँ आवेंगे 2 हमें ऐसा प्रतीत होता हैं कि दामोदर श्रीपराशर उवाच दुर्लभ ही जान पड़ता है हर लिया है, वे गोपियाँ बलरामजीको कृष्ण और दामोदर तब बलभद्रजीने कृष्णचन््रका अति मनोहर और तथा गोपोंके साथ हास्य करते हुए श्च पृ : परिहासमनोहरा:। उन्होंने पहलेकी भाँति बहुत-सी मनोहर बातें कीं और

English

Thus addressed, Daruka bowed to Krishna again and again, circumambulated him many times and went as instructed.

अध्याय ११७

श्लोक 60

स गत्वा च तथा चक्रे द्वारकायां तथार्जुनम् आनिनाय महाबुद्धिर् वज्रं चक्रे तथा नृपम्

sa gatvā ca tathā cakre dvārakāyāṃ tathārjunam ānināya mahābuddhir vajraṃ cakre tathā nṛpam

हिन्दी अर्थ

बलभद्रजीका ब्रज-विहार तथा यमुनाकर्षण श्रीपपशर उवाच श्रीपराशरजी बोले--अपने कार्योंसे पृथिवीको कहा--॥ १-२॥ “हे मदिरे! जिन महाबलशाली तब मनोहर मुखवाले बलदेवजीको वनमें विचरते हुए मदिराकी अति उत्तम गन्ध सूँघनेसे उसे पीनेकी इच्छा हे मैत्रेय! उसी समय कदम्बसे मद्यकी धारा गिरती देख हलधारी बलरामजी बड़े प्रसन्‍न हुए तथा गाने-बजानेमें कुशल गोप और गोपियोंके मधुर स्वरसे

English

Having gone, the wise one did so in Dvaraka, brought Arjuna, and made Vajra king.

अध्याय ११७

श्लोक 61

भगवान् अपि गोविन्दो वासुदेवात्मकं परम् ब्रह्मात्मनि समारोप्य सर्वभूतेष्व् अधारयत् निष्प्रपञ्चे महाभाग संयोज्यात्मानम् आत्मनि तुर्यावस्थसलीलं च शेते स्म पुरुषोत्तमः

bhagavān api govindo vāsudevātmakaṃ param brahmātmani samāropya sarvabhūteṣv adhārayat niṣprapañce mahābhāga saṃyojyātmānam ātmani turyāvasthasalīlaṃ ca śete sma puruṣottamaḥ

हिन्दी अर्थ

मोतियोंसे सुशोभित मदोन्मत्त बलरामजीने विहल होकर कहा--''यमुने ! आ, मैं स्नान करना चाहता हूँ/' कुछ भी ध्यान न दिया और वह वहाँ न आयी। इसपर हलधरने क्रोधित होकर अपना हल उठाया मदसे विह्ल होकर यमुनाको हलकी नोकसे पकड़कर खींचते हुए कहा--“'अरी पापिनि! तू नहीं आती थी! '” इस प्रकार बलरामजीके खींचनेपर वनमें बलरामजी खड़े थे उसे आप्लावित कर दिया तब वह शरीर धारणकर बलरामजीके पास आयी और भयवश डबडबाती आँखोंसे कहने लगी-- “'हे मुसलायुध !

English

The blessed Govinda too, placing the supreme Brahman consisting of Vasudeva in himself, held it in all beings; uniting himself, fortunate one, with the self beyond the manifold, the Supreme Person lay in the fourth state, as in play.

अध्याय ११७

श्लोक 62

संमानयन् द्विजवचो दुर्वासा यद् उवाच ह योगयुक्तो ऽभवत् पादं कृत्वा जानुनि सत्तम

saṃmānayan dvijavaco durvāsā yad uvāca ha yogayukto 'bhavat pādaṃ kṛtvā jānuni sattama

हिन्दी अर्थ

उन मधुर वचनोंको सुनकर हलायुध बलभद्रजीने कहा-- “' अरी नदि! क्या तू मेरे बल-वीर्यकी अवज्ञा करती है? देख, इस हलसे में अभी तेरे हजारों टुकड़े कर डालूँगा'” श्रीपरपाशरजी बोले--बलरामजीद्वारा इस प्रकार कही जानेसे भयभीत हुई यमुनाके उस भू-भागमें बहने लगनेपर उन्होंने प्रसन्‍न होकर उसे छोड़ दिया सुन्दर कर्णफूल, एक कुण्डल, एक वरुणकी भेजी हुई कभी न कुम्हलानेवाले कमल-पुष्पोंकी माला और दो मालाको धारणकर श्रीबलरामजी अतिशय कान्तियुक्त हो इस प्रकार विभूषित होकर श्रीबलभद्रजीने ब्रजमें अनेकों लीलाएँ कों और फिर दो मास पश्चात् द्वारकापुरीको चले आये

English

Honouring the brahmin's words that Durvasas had spoken, he sat absorbed in yoga, placing his foot on his knee, best of beings.

अध्याय ११७

श्लोक 63

आययौ च जरा नाम स तदा तत्र लुब्धकः मुसलावशेषलोहैकसायकन्यस्ततोमरः

āyayau ca jarā nāma sa tadā tatra lubdhakaḥ musalāvaśeṣalohaikasāyakanyastatomaraḥ

हिन्दी अर्थ

बलदेवजीने राजा रैवतकी पुत्री रेवतीसे विवाह किया; उससे उनके निशठ और उल्मुक नामक दो पुत्र हुए नामक नगरमें भीष्मक नामक एक राजा थे। उनके रुक्मी नामक पुत्र और रुक्मिणी नामकी एक सुमुखी श्रीकृष्णने रुक्मिणीकी और चारुहासिनी कारण रुक्‍मीने उन्हें रुक्मिणी न दी शिशुपालको रुक्मिणी देनेका निश्चय किया शिशुपालके हितेषी जरासन्ध आदि सम्पूर्ण राजागण विवाहमें सम्मिलित होनेके लिये भीष्मकके नगरमें

English

Then a hunter named Jara came there, having set as the head of his lance an arrow made from the iron remnant of the club.

अध्याय ११७

श्लोक 64

स तत्पादं मृगाकारम् अवेक्ष्याराद् अवस्थितः तले विव्याध तेनैव तोमरेण द्विजोत्तम

sa tatpādaṃ mṛgākāram avekṣyārād avasthitaḥ tale vivyādha tenaiva tomareṇa dvijottama

हिन्दी अर्थ

इधर बलभद्र आदि यदुवंशियोंके सहित तदनन्तर विवाहका एक दिन रहनेपर अपने विपक्षियोंका भार बलभद्र आदि बन्धुओंको सौंपकर श्रीहरिने उस कनन्‍्याका हरण कर लिया और शाल्व आदि राजाओंने क्रोधित होकर श्रीहरिको मारनेका महान् उद्योग किया, किन्तु वे सब बलराम आदि मारे बिना कुण्डिनपुरमें प्रवेश न करूँगा' कृष्णको मारनेके लिये उनका पीछा किया किन्तु श्रीकृष्णने लीलासे ही हाथी, घोड़े, रथ और पदातियोंसे युक्त उसकी सेनाको नष्ट करके उसे जीत लिया और पृथिवीमें गिरा दिया

English

Seeing from a distance that foot shaped like a deer, he pierced its sole with that very lance, best of the twice-born.

अध्याय ११७

श्लोक 65

गतश् च ददृशे तत्र चतुर्बाहुधरं नरम् प्रणिपत्याह चैवैनं प्रसीदेति पुनः पुनः

gataś ca dadṛśe tatra caturbāhudharaṃ naram praṇipatyāha caivainaṃ prasīdeti punaḥ punaḥ

हिन्दी अर्थ

ममैष हन्तेति मुने हतवान्कालशम्बर:॥ ३ कल्लोलजनितावर्त्ते सुघधोरे मकरालये॥ ४ कारयामास सूदानामाधिपत्यमनिन्दिता॥ ७ को5यं कथमयं मत्स्यजठरे प्रविवेशित:। पहले उसने हरण किया था उसीने पीछे उसे किस श्रीपराशरजी बोले--हे मुने! कालके समान दिन “यह मेरा मारनेवाला है” ऐसा जानकर सूतिकागृहसे उसको हरण करके शम्बरासुरने लवणसमुद्रमें डाल दिया, जो तरंगमालाजनित आवर्तोसे पूर्ण और बड़े भयानक मकरोंका घर है फेंके हुए उस बालकको एक मत्स्यने निगल लिया, किन्तु वह उसकी जठराग्निसि जलकर भी न मरा

English

Going there, he saw a man bearing four arms; he bowed and said to him again and again, "Be gracious!

अध्याय ११७

श्लोक 66

अजानता कृतम् इदं मया हरिणशङ्कया क्षम्यतां नात्मपापेन दग्धं मां दग्धुम् अर्हसि

ajānatā kṛtam idaṃ mayā hariṇaśaṅkayā kṣamyatāṃ nātmapāpena dagdhaṃ māṃ dagdhum arhasi

हिन्दी अर्थ

कालान्तरमें कुछ मछेरोंने उसे अन्य मछलियोंके साथ अपने जालमें फँसाया और असुरश्रेष्ठ शम्बरको उसकी नाममात्रकी पत्नी मायावती सम्पूर्ण सूदों (रसोइयों )-का आधिपत्य करती थी उस मछलीका पेट चीरते ही उसमें एक अति सुन्दर बालक दिखायी दिया जो दग्ध हुए कामवृक्षका प्रथम 'तब यह कौन है और किस प्रकार इस मछलीके पेटमें डाला गया' इस प्रकार अत्यन्त

English

I did this unknowingly, taking you for a deer; forgive me; you should not burn me, already burned by my own sin."

अध्याय ११७

श्लोक 67

ततस् तं भगवान् आह न ते ऽस्ति भयम् अण्व् अपि गच्छ त्वं मत्प्रसादेन लुब्ध स्वर्गं सुरास्पदम्

tatas taṃ bhagavān āha na te 'sti bhayam aṇv api gaccha tvaṃ matprasādena lubdha svargaṃ surāspadam

हिन्दी अर्थ

“'हे सुन्दर भृकुटिवाली! यह सम्पूर्ण है; इसे शम्बरासुरने सूतिकागृहसे चुराकर समुद्रमें फेंक दिया था। वहाँ इसे यह मत्स्य निगल गया और अब इसीके द्वारा यह तेरे घर आ गया है। तू इस हे महामते! जिस समय वह नवयौवनके समागमसे सुशोभित हुआ तब वह गजगामिनी उसके प्रति कामनायुक्त अनुराग प्रकट करने लगी तया जघान तं॑ हैत्यं मायया कालशम्बरम् । सभाग्या जननी वत्स सा त्वया का विभूषिता॥ २३ कर चुकी थी उस मायावतीने अनुरागसे अन्धी होकर उसे सब प्रकारकी माया सिखा दी कहा--'' आज तुम मातृभावको छोड़कर यह अन्य प्रकारका भाव क्‍यों प्रकट करती हो ?”” कहा--' तुम मेरे पुत्र नहीं हो, तुम भगवान् विष्णुके तनय हो तुम्हें कालशम्बरने हरकर समुद्रमें फेंक दिया था; तुम मुझे एक मत्स्यके उदरमें मिले हो। है कान्त! आपकी श्रीपराशरजी बोले---मायावतीके इस प्रकार कहनेपर

English

Then the Blessed One said to him: "You have not the least fear; go, hunter, by my grace, to heaven, the abode of the gods."

अध्याय ११७

श्लोक 68

विमानम् आगतं सद्यस् तद्वाक्यसमनन्तरम् आरुह्य प्रययौ स्वर्गं लुब्धकस् तत्प्रसादतः

vimānam āgataṃ sadyas tadvākyasamanantaram āruhya prayayau svargaṃ lubdhakas tatprasādataḥ

हिन्दी अर्थ

और उसकी सात मायाओंको जीतकर स्वयं आठवीं मायाका उस मायासे उन्होंने हैत्यराज कालशम्बरको मार डाला और मायावतीके साथ विमानद्वारा उड़कर आकाशमार्गसे अपने पिताके नगरमें आ गये रानियोंने उन्हें देखकर कृष्ण ही समझा वे कहने लगीं--'' अवश्य ही यह नवयौवनको प्राप्त हुआ किसी बड़भागिनीका पुत्र है

English

Immediately after his words an aerial car came, and mounting it the hunter went to heaven by his grace.

अध्याय ११७

श्लोक 69

गते तस्मिन् स भगवान् संयोज्यात्मानम् आत्मनि ब्रह्मभूते ऽव्यये ऽचिन्त्ये वासुदेवमये ऽमले

gate tasmin sa bhagavān saṃyojyātmānam ātmani brahmabhūte 'vyaye 'cintye vāsudevamaye 'male

हिन्दी अर्थ

जीवित होगा तो उसकी भी यही आयु होगी। है वत्स! तू ठीक-ठीक बता तूने किस भाग्यवती जननीको विभूषित हो रहा है और जैसा तेरा स्वरूप है, उससे मुझे ऐसा भी प्रतीत होता है कि तू श्रीहरिका ही पुत्र है'' साथ वहाँ नारदजी आ गये। उन्होंने अन्त:पुरनिवासिनी देवी रुक्मिणीको आनन्दित करते हुए कहा-- सुभ्ु! यह तेरा ही पुत्र है। यह शम्बरासुरको मारकर आ रहा है, जिसने कि इसे बाल्यावस्थामें सूतिकागृहसे यह सती मायावती भी तेरे पुत्रकी

English

When he had gone, the Blessed One, uniting himself with the self — Brahman, imperishable, inconceivable, consisting of Vasudeva, stainless,

अध्याय ११७

श्लोक 70

अजन्मन्य् अजरे ऽनाशिन्य् अप्रमेये ऽखिलात्मनि तत्याज मानुषं देहम् अतीत्य त्रिविधां गतिम्

ajanmany ajare 'nāśiny aprameye 'khilātmani tatyāja mānuṣaṃ deham atītya trividhāṃ gatim

हिन्दी अर्थ

पूर्वकालमें कामदेवके भस्म हो मायामयरूपसे शम्बरासुरको मोहित किया था ततो हर्षसमाविष्टो रुक्मिणीकेशवौ तदा। यह मत्तविलोचना उस हैत्यको विहारादि उपभोगोंके कामदेवने ही तेरे पुत्ररूपसे जन्म लिया है और यह सुन्दरी उसकी प्रिया रति ही है। हे शोभने! यह तेरी पुत्रवधू है, इसमें तू किसी प्रकारकी विपरीत शंका न कर”' यह सुनकर रुक्मिणी और कृष्णको अतिशय आनन्द हुआ तथा समस्त द्वारकापुरी भी 'साधु-साधु'

English

unborn, unaging, undying, immeasurable, the self of all — gave up his human body, passing beyond the threefold course.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_viSNupurANa-crit.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vishnu Purana — Chapter 117
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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