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प्रकरण 10: दसवाँ प्रकरणश्लोक ८/८100%

अध्याय 10 · तृष्णा से स्वतंत्रता

अष्टावक्र गीता, श्लोक 10.8

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल नहीं छपा; भावार्थ के संदर्भ से)

कृतं न कति जन्मानि कायेन मनसा गिरा । दुःखमायासदं कर्म तदद्याप्युपरम्यताम् ॥ ८ ॥

IAST लिप्यंतरण

kṛtaṃ na kati janmāni kāyena manasā girā | duḥkham āyāsadaṃ karma tad adyāpy uparamyatām || 8 ||

सरल उच्चारण: kritam na kati janmaani kaayena manasaa giraa duhkham aayaasadam karma tad adyaapy uparamyataam (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

कृतम्, न, कति, जन्मानि, कायेन, मनसा, गिरा, दुःखम्, आयासदम्, कर्म, तत्, अद्य, अपि, उपरम्यताम्

कति जन्मानि
कितने जन्मों तक
कायेन मनसा गिरा
शरीर, मन और वाणी से
न कृतम्
क्या नहीं किया गया?
दुःखम् आयासदम् कर्म
दुखदायी और परिश्रम देने वाला कर्म
अद्य अपि उपरम्यताम्
अब तो उपराम (विराम) कर

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

कितने जन्मों तक शरीर, मन और वाणी से दुखद और श्रमसाध्य कर्म नहीं किया गया? उसे अब तो विराम दे।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

पुस्तक के अनुसार अष्टावक्र तृष्णा के उपशम को पहले कहकर अब क्रिया के उपशम को कहते हैं। हे जनक, शरीर, मन और इन्द्रियों को परिश्रम देने वाले कर्मों को तुम अनेक जन्मों तक करते आए हो, और उनके फल जन्म-मरण के चक्र में भ्रमण करते चले आए हो। अब दिन-प्रतिदिन अनेक दुख उठाते आए, पर कुछ सुख न मिला, इसलिए तुम कर्मों से उपरामता को प्राप्त हो। क्योंकि पुरुष उपरामता के बिना जीवन्मुक्ति के सुख को नहीं पाता। इसके साथ दसवाँ प्रकरण समाप्त होता है।

सरल हिन्दी में समझें

अंतिम श्लोक थके हुए मन से कहा गया सीधा सुझाव है: कितने ही जन्मों तक शरीर, मन और वाणी से परिश्रम और दुख देने वाले कर्म होते रहे हैं; अब इस दौड़ को रोक दीजिए।

‘उपरम’ का अर्थ आलसी होकर बैठ जाना या अपनी ज़िम्मेदारियाँ छोड़ देना नहीं है। यह उस हड़बड़ी, तनाव और अहंकार-भरी जोड़-तोड़ से विराम है जो हर काम के पीछे चलती है। जो काम ज़रूरी हैं, वे शांत मन से होते रहते हैं।

इस श्लोक को थकान, निराशा या जीवन से हार मानने के समर्थन की तरह न पढ़ें। यदि आप सचमुच बहुत थके हैं या निराश हैं, तो आराम और किसी भरोसेमंद व्यक्ति या पेशेवर की मदद लीजिए।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. श्लोक कहता है कि दुखदायी और श्रमसाध्य कर्म बहुत हो चुका; अब उससे उपराम हो। 2. यह कर्म और दौड़ को ही जीवन का अर्थ मानने की पहचान को चुनौती देता है। 3. यह कर्म, थकान और उपरति के संबंध को प्रकट करता है। 4. अध्याय का समापन-श्लोक है, जो तृष्णा-शमन के बाद क्रिया-शमन पर ले जाता है। 5. 10.7 की थकान का निदान: कर्म की हड़बड़ी को ढीला करना। 6. यह परम दृष्टि है; व्यवहार में कर्तव्य और देखभाल जारी रहते हैं। 7. इसे अपने कर्तव्य, नौकरी या संबंधों से भाग निकलने का आधार न बनाएँ।

वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है।

उदाहरण से समझें: जैसे लंबी दौड़ के बाद धावक रुककर साँस लेता है पर जीवन नहीं रोकता, वैसे अनावश्यक भागमभाग को रोककर काम शांति से होता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

प्रतीकात्मक चित्र-व्याख्या

संपादकीय सहायक चित्र; यह श्लोक का शाब्दिक अर्थ नहीं है।

वैराग्य

वस्तु का उपयोग, पर उस पर मानसिक निर्भरता नहीं।

चित्र का वर्णन: एक खुली हथेली पर रखी गोल वस्तु, उँगलियाँ उसे जकड़ती नहीं।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

कोई व्यक्ति सालों तक हर समय व्यस्त रहा और फिर थककर एक हफ़्ते के विश्राम में सीखता है कि बहुत-से काम बिना उस हड़बड़ी के भी हो जाते हैं। वह अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाते हुए धीमा चलना सीखता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: दौड़ना ज़रूरी हो तो दौड़िए, पर यह भी पूछिए कि कौन-सी दौड़ अब रुकनी चाहिए।

सामान्य गलतफहमी

सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। ‘उपराम’ का अर्थ निष्क्रियता, पलायन या जीवन से हार नहीं है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज एक ऐसा काम चुनिए जो केवल आदत या हड़बड़ी में हो रहा है, और उसे आज बिना हड़बड़ी के कीजिए या रोककर देखिए। (लगभग 5 मिनट)

आत्मचिंतन प्रश्न: मेरी कौन-सी दौड़ अब सचमुच रुकनी चाहिए, और कौन-सी जारी रहनी चाहिए?

छोटा अभ्यास: चार मिनट बैठकर लिखिए: आज के पाँच काम। हर एक के आगे लिखिए: ‘ज़रूरी’ या ‘आदत/हड़बड़ी’। केवल देखिए।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: श्रमसाध्य कर्म की हड़बड़ी को अब विराम दीजिए; ज़िम्मेदारियाँ शांति से निभती रहती हैं।

English

Translation: How many births have been spent in action by body, mind and speech? That painful, wearying activity: let it come to rest even now.

Simple explanation: The chapter ends with a tired mind’s plain advice to stop the exhausting rush of action. It does not mean abandoning duties or giving up on life; it means resting from the frantic striving. If despair is present, rest and a trusted person or professional are the right resources.

विषय और संबंधित श्लोक

  • उपरति
  • कर्म-शमन
  • वैराग्य
  • विश्राम
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 10.7: संसार-वन में थकान।
  • श्लोक 9.8: वासना-त्याग।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 162–163 (PDF पृ. 169–170)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पृष्ठ से पढ़ा गया। पुस्तक में अध्याय के अंत में ‘इति श्रीअष्टावक्रगीतायां दशमं प्रकरणं समाप्तम् ॥ १० ॥’ छपा है (PDF पृ. 170)। छपे अन्वय में ‘कर्म्म’ की जगह ‘कम्म’ जैसा रूप दिखता है; मूल ‘कर्म’ है।