श्लोक 10.1
विहाय वैरिणं कामं अर्थं चानर्थसंकुलम् । धर्ममप्येतयोर्हेतुं सर्वत्रानादरं कुरु ॥ १ ॥
काम, अर्थ और उनके हेतु-रूप सकाम कर्म में आसक्ति छोड़िए; कर्तव्य और नैतिकता नहीं।
पूरी व्याख्या पढ़ेंअध्याय 10 · दसवाँ प्रकरण
आठ श्लोकों के इस दसवें प्रकरण में अष्टावक्र काम, अर्थ और सकाम कर्मों की तृष्णा छोड़ने और अंततः व्यर्थ श्रम व कर्म की बेचैन दौड़ से उपराम होने का उपदेश देते हैं।
नौवें प्रकरण में अष्टावक्र ने 'निर्वेदाष्टक' के माध्यम से वैराग्य का स्वरूप दिखाया था और वासनाओं के शमन को संसार-मुक्ति का द्वार बताया था। दसवें प्रकरण में गुरु अष्टावक्र तृष्णा के समूल त्याग और क्रिया की उपरामता का उपदेश करते हैं। पुस्तक में कोई वक्ता-लेबल नहीं छपा; संदर्भ और भावार्थ से वक्ता अष्टावक्र मुनि हैं।
आठ श्लोकों की यह यात्रा बहुत सुव्यवस्थित है। पहला श्लोक काम, अर्थ और फल-इच्छा से किए जाने वाले धर्म के प्रति अनादर की प्रेरणा देता है (10.1)। दूसरा श्लोक परिवार, संपत्ति और संबंधों को कुछ दिनों का स्वप्न और इन्द्रजाल जैसा देखने की दृष्टि देता है (10.2)। तीसरा श्लोक सूत्र देता है कि जहाँ तृष्णा है वहीं संसार है, इसलिए प्रौढ़ वैराग्य का आश्रय लेकर सुखी हुआ जाए (10.3)। चौथा श्लोक बन्ध और मोक्ष की सबसे संक्षिप्त परिभाषा देता है: तृष्णा ही बन्ध है और उसका नाश ही मोक्ष (10.4)। पाँचवाँ श्लोक आत्मा को चेतन व शुद्ध और जगत् को असत् बताकर ज्ञान की बेचैनी को भी शांत करता है (10.5)। छठा श्लोक याद दिलाता है कि राज्य, संतान और शरीर हर जन्म में नष्ट होते रहे हैं (10.6)। सातवाँ श्लोक स्वीकार करता है कि अर्थ, काम और सुकृत-कर्म से भी मन को संसार-वन में विश्राम नहीं मिला (10.7)। और आठवाँ श्लोक अनेक जन्मों के थका देने वाले श्रमसाध्य कर्मों से उपराम होने का करुणामय आह्वान करता है (10.8)।
सावधानी: पुस्तक की टीका में इस प्रकरण में स्त्री, संतान और संबंधियों के विषय में तथा अन्य दार्शनिक मतों पर कुछ कठोर कथन हैं; उन्हें यहाँ शब्दशः नहीं दोहराया गया है और किसी व्यक्ति, लिंग या वर्ग को निम्न ठहराना उद्देश्य नहीं है। 'तृष्णा-त्याग' और 'कर्मों से उपरामता' का अर्थ आलस्य, पलायन या कर्तव्यों का परित्याग नहीं है।
क्या मेरी शांति बाहरी उपलब्धियों और इच्छाओं पर टिकी है, या तृष्णा के शांत होने में है?
पुस्तक के अनुसार तृष्णा ही संसार और बंधन की जड़ है। काम, अर्थ और फल की इच्छा से किए जाने वाले कर्म कभी अंतिम विश्राम नहीं देते। जब मन परिपक्व वैराग्य से तृष्णा की पकड़ ढीली करता है, तब अपने भीतर की तृप्ति प्रकट होती है और कर्मों की बेचैन दौड़ से उपरामता मिलती है। यह परम दृष्टि है; व्यावहारिक जीवन में कर्तव्य, नैतिकता, परिवार की देखभाल और स्वास्थ्य की रक्षा बनी रहती है।
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विहाय वैरिणं कामं अर्थं चानर्थसंकुलम् । धर्ममप्येतयोर्हेतुं सर्वत्रानादरं कुरु ॥ १ ॥
काम, अर्थ और उनके हेतु-रूप सकाम कर्म में आसक्ति छोड़िए; कर्तव्य और नैतिकता नहीं।
पूरी व्याख्या पढ़ेंस्वप्नेन्द्रजालवत्पश्य दिनानि त्रीणि पञ्च वा । मित्रक्षेत्रधनागारदारदायादिसम्पदः ॥ २ ॥
संपत्ति और संबंध अस्थायी हैं; उन्हें निभाइए, पर शांति की इकलौती नींव मत बनाइए।
पूरी व्याख्या पढ़ेंयत्र यत्र भवेत्तृष्णा संसारं विद्धि तत्र वै । प्रौढवैराग्यमाश्रित्य वीततृष्णः सुखी भव ॥ ३ ॥
जहाँ तृष्णा, वहीं संसार; परिपक्व वैराग्य से तृष्णा ढीली कर सुखी रहिए।
पूरी व्याख्या पढ़ेंतृष्णामात्रात्मको बन्धस्तन्नाशो मोक्ष उच्यते । भवासंसक्तिमात्रेण प्राप्तितुष्टिर्मुहुर्मुहुः ॥ ४ ॥
तृष्णा ही बंध है और उसका ढीला होना ही मोक्ष; इससे भीतर की तृप्ति खुलती है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंत्वमेकश्चेतनः शुद्धो जडं विश्वमसत्तथा । अविद्यापि न किञ्चित्सा का बुभुत्सा तथापि ते ॥ ५ ॥
जब आप चेतन और शुद्ध हैं, तो जानने की बेचैनी भी ढीली पड़ सकती है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंराज्यं सुताः कलत्राणि शरीराणि सुखानि च । संसक्तस्यापि नष्टानि तव जन्मनि जन्मनि ॥ ६ ॥
जो हर जन्म में बनता-बिगड़ता रहा, उसे अंतिम सहारा मत मानिए; उसके प्रति कृतज्ञ रहिए।
पूरी व्याख्या पढ़ेंअलमर्थेन कामेन सुकृतेनापि कर्मणा । एभ्यः संसारकान्तारे न विश्रान्तमभून्मनः ॥ ७ ॥
धन, काम और पुण्य से भी संसार-वन में विश्राम नहीं मिला; अंतिम विश्राम की माँग ढीली कीजिए।
पूरी व्याख्या पढ़ेंकृतं न कति जन्मानि कायेन मनसा गिरा । दुःखमायासदं कर्म तदद्याप्युपरम्यताम् ॥ ८ ॥
श्रमसाध्य कर्म की हड़बड़ी को अब विराम दीजिए; ज़िम्मेदारियाँ शांति से निभती रहती हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ेंदसवाँ प्रकरण तृष्णा-त्याग और कर्म-शमन का प्रकरण है। पहले बताया गया कि काम, अर्थ और सकाम कर्मों में अनादर रख तृष्णा ढीली की जाए। फिर परिवार और संपत्ति की क्षणभंगुरता को स्वप्नवत् देखने की बात कही गई। जहाँ तृष्णा है वहीं संसार है, और तृष्णा का नाश ही मोक्ष है। आत्मा के शुद्ध स्वरूप को जानकर ज्ञान की बेचैनी शांत होती है। हर जन्म में नश्वर होने वाले भोगों की सीमा देखकर अंततः श्रमसाध्य कर्मों से उपराम होने का मार्ग दिखाया गया। यह परम दृष्टि है; इसमें कर्तव्य, नैतिकता और संबंधों की संवेदना सुरक्षित रहती है।
पाँच मिनट शांत बैठिए। अपनी तीन बड़ी इच्छाओं को याद कीजिए। हर एक के लिए पूछिए: 'क्या यह पा लेने से मेरी प्यास सदा के लिए बुझ जाएगी?' केवल शांति से साक्षी होकर देखिए। कोई असुविधा या भारीपन बढ़े तो तुरंत रुकें।
दसवें प्रकरण का मुख्य विषय तृष्णा-त्याग और क्रिया-शमन (कर्मों से उपरामता) है।
यहाँ ‘धर्म’ से तात्पर्य सकाम कर्मों (स्वर्ग या भोग की इच्छा से किए जाने वाले अनुष्ठानों) से है, नैतिक आचरण से नहीं।
नहीं। इसका अर्थ अहंकार और फल की व्यग्रता से मुक्त होकर शांत मन से आवश्यक दायित्व निभाना है।
तृष्णा-मात्र ही बन्धन है, और तृष्णा का समूल नाश ही मोक्ष है (श्लोक १०.४)।