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अध्याय 10 · दसवाँ प्रकरण

तृष्णा से स्वतंत्रता

संपादकीय विषय-शीर्षक · पुस्तक में नाम: दसवाँ प्रकरण

आठ श्लोकों के इस दसवें प्रकरण में अष्टावक्र काम, अर्थ और सकाम कर्मों की तृष्णा छोड़ने और अंततः व्यर्थ श्रम व कर्म की बेचैन दौड़ से उपराम होने का उपदेश देते हैं।

श्लोकों की कुल संख्या
8
अनुमानित पठन समय
लगभग 30 से 45 मिनट (अनुमान: प्रति श्लोक 4 से 6 मिनट)
मुख्य संस्कृत शब्द
काम · अर्थ · तृष्णा · प्रौढवैराग्य · बन्ध · मोक्ष · उपरति
प्रमुख विषय
काम और अर्थ का त्याग · सम्पत्ति की अनित्यता · जहाँ तृष्णा वहीं संसार · तृष्णा ही बन्ध · आत्मा की शुद्धता · जन्म-जन्मान्तरों की नश्वरता · कर्म की सीमा · कर्मों से उपरामता

चित्र-विवरण (संपादकीय): चमकती रेत छोड़ते खुले हाथ। रेत तारों जैसी रोशनी बन जाती है, पकड़ी नहीं जाती। (इस अध्याय का अपना चित्र अभी बनना शेष है; यहाँ सरल सामान्य पृष्ठभूमि दिखाई गई है।)

अध्याय का परिचय

नौवें प्रकरण में अष्टावक्र ने 'निर्वेदाष्टक' के माध्यम से वैराग्य का स्वरूप दिखाया था और वासनाओं के शमन को संसार-मुक्ति का द्वार बताया था। दसवें प्रकरण में गुरु अष्टावक्र तृष्णा के समूल त्याग और क्रिया की उपरामता का उपदेश करते हैं। पुस्तक में कोई वक्ता-लेबल नहीं छपा; संदर्भ और भावार्थ से वक्ता अष्टावक्र मुनि हैं।

आठ श्लोकों की यह यात्रा बहुत सुव्यवस्थित है। पहला श्लोक काम, अर्थ और फल-इच्छा से किए जाने वाले धर्म के प्रति अनादर की प्रेरणा देता है (10.1)। दूसरा श्लोक परिवार, संपत्ति और संबंधों को कुछ दिनों का स्वप्न और इन्द्रजाल जैसा देखने की दृष्टि देता है (10.2)। तीसरा श्लोक सूत्र देता है कि जहाँ तृष्णा है वहीं संसार है, इसलिए प्रौढ़ वैराग्य का आश्रय लेकर सुखी हुआ जाए (10.3)। चौथा श्लोक बन्ध और मोक्ष की सबसे संक्षिप्त परिभाषा देता है: तृष्णा ही बन्ध है और उसका नाश ही मोक्ष (10.4)। पाँचवाँ श्लोक आत्मा को चेतन व शुद्ध और जगत् को असत् बताकर ज्ञान की बेचैनी को भी शांत करता है (10.5)। छठा श्लोक याद दिलाता है कि राज्य, संतान और शरीर हर जन्म में नष्ट होते रहे हैं (10.6)। सातवाँ श्लोक स्वीकार करता है कि अर्थ, काम और सुकृत-कर्म से भी मन को संसार-वन में विश्राम नहीं मिला (10.7)। और आठवाँ श्लोक अनेक जन्मों के थका देने वाले श्रमसाध्य कर्मों से उपराम होने का करुणामय आह्वान करता है (10.8)।

सावधानी: पुस्तक की टीका में इस प्रकरण में स्त्री, संतान और संबंधियों के विषय में तथा अन्य दार्शनिक मतों पर कुछ कठोर कथन हैं; उन्हें यहाँ शब्दशः नहीं दोहराया गया है और किसी व्यक्ति, लिंग या वर्ग को निम्न ठहराना उद्देश्य नहीं है। 'तृष्णा-त्याग' और 'कर्मों से उपरामता' का अर्थ आलस्य, पलायन या कर्तव्यों का परित्याग नहीं है।

केंद्रीय प्रश्न

क्या मेरी शांति बाहरी उपलब्धियों और इच्छाओं पर टिकी है, या तृष्णा के शांत होने में है?

अध्याय की मुख्य शिक्षा

पुस्तक के अनुसार तृष्णा ही संसार और बंधन की जड़ है। काम, अर्थ और फल की इच्छा से किए जाने वाले कर्म कभी अंतिम विश्राम नहीं देते। जब मन परिपक्व वैराग्य से तृष्णा की पकड़ ढीली करता है, तब अपने भीतर की तृप्ति प्रकट होती है और कर्मों की बेचैन दौड़ से उपरामता मिलती है। यह परम दृष्टि है; व्यावहारिक जीवन में कर्तव्य, नैतिकता, परिवार की देखभाल और स्वास्थ्य की रक्षा बनी रहती है।

पढ़ने से पहले समझें

  • तृष्णा-त्याग का अर्थ अपनी ज़िम्मेदारियों, परिवार या समाज के प्रति कर्तव्य छोड़ देना नहीं है; यह मानसिक निर्भरता और बेचैन पकड़ से मुक्ति है। वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है।
  • ‘काम और अर्थ को वैरी जानना’ का अर्थ जीवन की सहज आवश्यकताओं की उपेक्षा करना नहीं है।
  • ‘धर्म में अनादर’ से तात्पर्य सकाम कर्मों (फल की इच्छा से किए जाने वाले अनुष्ठानों) में आसक्ति छोड़ने से है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती।
  • यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें।
  • ‘कर्मों से उपरामता’ का अर्थ आलस्य या पलायन नहीं है; तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है।

प्रमुख अवधारणाएँ

तृष्णा
विषयों को पाने और पकड़े रखने की निरंतर आंतरिक प्यास या ललक।
प्रौढ़ वैराग्य
विचार और तत्त्व-बोध से उपजा परिपक्व वैराग्य, जो केवल तात्कालिक संवेग नहीं है।
उपराम / उपरति
अहंकार-युक्त व्यर्थ भागदौड़ और कर्म के तनाव से सहज विश्राम पाना।
सकाम कर्म
फल या सांसारिक भोग की लालसा से किया जाने वाला कर्म।
असंग
संसार और उपाधियों से अप्रभावित, निर्लेप साक्षी भाव।

श्लोक-दर-श्लोक व्याख्या

8 श्लोक, पुस्तक के क्रम में। सभी श्लोक पृष्ठ से मिलान किए गए हैं।

सत्यापितसमीक्षा आवश्यक

श्लोक 10.1

सत्यापित

विहाय वैरिणं कामं अर्थं चानर्थसंकुलम् । धर्ममप्येतयोर्हेतुं सर्वत्रानादरं कुरु ॥ १ ॥

काम, अर्थ और उनके हेतु-रूप सकाम कर्म में आसक्ति छोड़िए; कर्तव्य और नैतिकता नहीं।

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श्लोक 10.2

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स्वप्नेन्द्रजालवत्पश्य दिनानि त्रीणि पञ्च वा । मित्रक्षेत्रधनागारदारदायादिसम्पदः ॥ २ ॥

संपत्ति और संबंध अस्थायी हैं; उन्हें निभाइए, पर शांति की इकलौती नींव मत बनाइए।

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श्लोक 10.3

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यत्र यत्र भवेत्तृष्णा संसारं विद्धि तत्र वै । प्रौढवैराग्यमाश्रित्य वीततृष्णः सुखी भव ॥ ३ ॥

जहाँ तृष्णा, वहीं संसार; परिपक्व वैराग्य से तृष्णा ढीली कर सुखी रहिए।

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श्लोक 10.4

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तृष्णामात्रात्मको बन्धस्तन्नाशो मोक्ष उच्यते । भवासंसक्तिमात्रेण प्राप्तितुष्टिर्मुहुर्मुहुः ॥ ४ ॥

तृष्णा ही बंध है और उसका ढीला होना ही मोक्ष; इससे भीतर की तृप्ति खुलती है।

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श्लोक 10.5

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त्वमेकश्चेतनः शुद्धो जडं विश्वमसत्तथा । अविद्यापि न किञ्चित्सा का बुभुत्सा तथापि ते ॥ ५ ॥

जब आप चेतन और शुद्ध हैं, तो जानने की बेचैनी भी ढीली पड़ सकती है।

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श्लोक 10.6

सत्यापित

राज्यं सुताः कलत्राणि शरीराणि सुखानि च । संसक्तस्यापि नष्टानि तव जन्मनि जन्मनि ॥ ६ ॥

जो हर जन्म में बनता-बिगड़ता रहा, उसे अंतिम सहारा मत मानिए; उसके प्रति कृतज्ञ रहिए।

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श्लोक 10.7

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अलमर्थेन कामेन सुकृतेनापि कर्मणा । एभ्यः संसारकान्तारे न विश्रान्तमभून्मनः ॥ ७ ॥

धन, काम और पुण्य से भी संसार-वन में विश्राम नहीं मिला; अंतिम विश्राम की माँग ढीली कीजिए।

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श्लोक 10.8

सत्यापित

कृतं न कति जन्मानि कायेन मनसा गिरा । दुःखमायासदं कर्म तदद्याप्युपरम्यताम् ॥ ८ ॥

श्रमसाध्य कर्म की हड़बड़ी को अब विराम दीजिए; ज़िम्मेदारियाँ शांति से निभती रहती हैं।

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अध्याय का सरल सार

दसवाँ प्रकरण तृष्णा-त्याग और कर्म-शमन का प्रकरण है। पहले बताया गया कि काम, अर्थ और सकाम कर्मों में अनादर रख तृष्णा ढीली की जाए। फिर परिवार और संपत्ति की क्षणभंगुरता को स्वप्नवत् देखने की बात कही गई। जहाँ तृष्णा है वहीं संसार है, और तृष्णा का नाश ही मोक्ष है। आत्मा के शुद्ध स्वरूप को जानकर ज्ञान की बेचैनी शांत होती है। हर जन्म में नश्वर होने वाले भोगों की सीमा देखकर अंततः श्रमसाध्य कर्मों से उपराम होने का मार्ग दिखाया गया। यह परम दृष्टि है; इसमें कर्तव्य, नैतिकता और संबंधों की संवेदना सुरक्षित रहती है।

पाँच प्रमुख शिक्षाएँ

  1. काम, अर्थ और सकाम कर्मों में अनासक्ति ही तृष्णा-त्याग का पहला कदम है; कर्तव्य और नैतिकता बने रहते हैं। (10.1, 10.7)
  2. संसार और संपत्तियाँ अल्पकालिक हैं; उन्हें स्वप्नवत देखने से ममता की पकड़ ढीली होती है। (10.2, 10.6)
  3. जहाँ तृष्णा है वहीं बंधन है; प्रौढ़ वैराग्य से तृष्णा ढीली होना ही सच्चा सुख है। (10.3)
  4. तृष्णा ही बन्ध है और उसका अंत ही मोक्ष; असंग होने से भीतर की तृप्ति बार-बार अनुभव होती है। (10.4)
  5. अनेक जन्मों के श्रमसाध्य कर्मों से अब उपराम होना चाहिए; बेचैन दौड़ रुकने पर सहज शांति मिलती है। (10.5, 10.8)

सामान्य गलतफहमियाँ

  • तृष्णा-त्याग का अर्थ जीवन की बुनियादी ज़रूरतों का तिरस्कार नहीं है।
  • सकाम धर्म में अनादर का अर्थ नैतिकता, कानून या सामाजिक उत्तरदायित्वों को छोड़ना नहीं है।
  • संपत्तियों को स्वप्नवत् देखने का अर्थ परिजनों या मित्रों के प्रति उपेक्षा नहीं है।
  • कर्मों से उपरामता का अर्थ आलस्य, उत्तरदायित्वहीनता या पलायन नहीं है।
  • यदि जीवन से निराशा या अवसाद के विचार आएँ, तो किसी पेशेवर या सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें।

आत्मचिंतन प्रश्न

  1. मेरी कौन-सी चाहत ज़रूरत है और कौन-सी अंधी तृष्णा?
  2. मैं किन चीज़ों से ऐसा विश्राम माँग रहा हूँ जो वे दे नहीं सकतीं?
  3. मेरे जीवन की कौन-सी दौड़ अब सचमुच रुकनी चाहिए?

संक्षिप्त चिंतन अभ्यास

पाँच मिनट शांत बैठिए। अपनी तीन बड़ी इच्छाओं को याद कीजिए। हर एक के लिए पूछिए: 'क्या यह पा लेने से मेरी प्यास सदा के लिए बुझ जाएगी?' केवल शांति से साक्षी होकर देखिए। कोई असुविधा या भारीपन बढ़े तो तुरंत रुकें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दसवें प्रकरण का मुख्य विषय क्या है?

दसवें प्रकरण का मुख्य विषय तृष्णा-त्याग और क्रिया-शमन (कर्मों से उपरामता) है।

‘विहाय वैरिणं कामम्’ में धर्म को छोड़ने की बात क्यों कही गई है?

यहाँ ‘धर्म’ से तात्पर्य सकाम कर्मों (स्वर्ग या भोग की इच्छा से किए जाने वाले अनुष्ठानों) से है, नैतिक आचरण से नहीं।

क्या कर्मों से उपराम होने का अर्थ काम छोड़ देना है?

नहीं। इसका अर्थ अहंकार और फल की व्यग्रता से मुक्त होकर शांत मन से आवश्यक दायित्व निभाना है।

अष्टावक्र के अनुसार बन्धन और मोक्ष की परिभाषा क्या है?

तृष्णा-मात्र ही बन्धन है, और तृष्णा का समूल नाश ही मोक्ष है (श्लोक १०.४)।