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प्रकरण 10: दसवाँ प्रकरणश्लोक ७/८88%

अध्याय 10 · तृष्णा से स्वतंत्रता

अष्टावक्र गीता, श्लोक 10.7

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल नहीं छपा; भावार्थ के संदर्भ से)

अलमर्थेन कामेन सुकृतेनापि कर्मणा । एभ्यः संसारकान्तारे न विश्रान्तमभून्मनः ॥ ७ ॥

IAST लिप्यंतरण

alam arthena kāmena sukṛtenāpi karmaṇā | ebhyaḥ saṃsārakāntāre na viśrāntam abhūn manaḥ || 7 ||

सरल उच्चारण: alam arthena kaamena sukritenaapi karmanaa ebhyah samsaarakaantaare na vishraantam abhoon manah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

अलम्, अर्थेन, कामेन, सुकृतेन, अपि, कर्मणा, एभ्यः, संसारकान्तारे, न, विश्रान्तम्, अभूत्, मनः

अलम् अर्थेन कामेन
अर्थ और काम से बस (बहुत हो चुका)
सुकृतेन अपि कर्मणा
पुण्य-कर्म से भी
एभ्यः
इन तीनों से
संसारकान्तारे
संसार-रूपी वन में
न विश्रान्तम् अभूत् मनः
मन विश्राम नहीं पा सका

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

अर्थ से, काम से और सुकृत-कर्म से भी बस हुआ; इनसे संसार-रूपी वन में मन को विश्राम नहीं मिला।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

पुस्तक के अनुसार अष्टावक्र कहते हैं कि धर्म, अर्थ और काम की इच्छा का त्याग जीवन्मुक्ति का कारण है और इनमें जो दोष हैं, उन्हें देखो। टीका एक श्लोक-भाव देती है कि यदि यह सारी पृथ्वी समुद्र तक धन से भरी भी किसी को मिल जाए, तो भी वह नित्य स्वर्ग की इच्छा करता है। एक और भाव में कहा गया है कि जन्म का अंधा, कामातुर, मदिरा से उन्मत्त और धन का अर्थी, इन सबको कुछ भी दिखाई नहीं देता, इसलिए धनादि की इच्छा का त्याग विवेकी के लिए उत्तम है, क्योंकि संसार-रूपी वन में भ्रमण करते हुए पुरुष का मन धर्म, अर्थ और काम से व्याकुल हुआ कभी शांत नहीं होता।

सरल हिन्दी में समझें

यह श्लोक एक थकी हुई ईमानदार स्वीकारोक्ति जैसा है: धन से, कामना से और पुण्य-कर्म से भी जितना हो सका किया, पर संसार के इस जंगल में मन को विश्राम नहीं मिला। अब और इन्हीं रास्तों पर दौड़ना बंद कीजिए।

यहाँ भी ‘सुकृत’ पुण्य-कर्म है जो फल की इच्छा से किया जाता है। यह अच्छाई, दया या ईमानदारी को छोड़ने का न्योता नहीं है। इनका मूल्य बना रहता है; केवल इनके सहारे अंतिम विश्राम पाने की आशा ढीली की जाती है।

यह थकान और बेचैनी का वर्णन भी है; यदि आप स्वयं बहुत थके या निराश हैं, तो यह श्लोक आपका उपचार नहीं है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. श्लोक कहता है कि अर्थ, काम और सुकृत-कर्म से भी मन को संसार-वन में विश्राम नहीं मिला। 2. यह धन, भोग और पुण्य को अंतिम विश्राम का साधन मानने की पहचान को चुनौती देता है। 3. यह मन की थकान और विश्राम के संबंध को प्रकट करता है। 4. अध्याय का सातवाँ श्लोक है, जो पुरुषार्थ-त्रय की सीमा दिखाता है। 5. 10.1 के काम-अर्थ-धर्म का निचोड़ अनुभव के रूप में। 6. यह परम दृष्टि और अनुभव का वर्णन दोनों है। 7. इसे अपनी या दूसरों की मेहनत और पुण्य को व्यर्थ ठहराने का आधार न बनाएँ।

उदाहरण से समझें: जैसे रेगिस्तान में अलग-अलग मृग-मरीचिकाओं का पीछा करने वाला हर बार नई दिशा में दौड़ता है, वैसे मन हर नई उपलब्धि में विश्राम खोजता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

प्रतीकात्मक चित्र-व्याख्या

संपादकीय सहायक चित्र; यह श्लोक का शाब्दिक अर्थ नहीं है।

वैराग्य

वस्तु का उपयोग, पर उस पर मानसिक निर्भरता नहीं।

चित्र का वर्णन: एक खुली हथेली पर रखी गोल वस्तु, उँगलियाँ उसे जकड़ती नहीं।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

कोई व्यक्ति सफलता, परिवार की खुशी और समाज-सेवा तीनों में पूरी निष्ठा से लगा रहा, फिर भी भीतर कोई खालीपन-सा रहता है। जब वह सब जारी रखते हुए ‘मैं इनसे क्या माँग रहा हूँ?’ पूछता है, तो माँग हल्की पड़ती है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: अच्छा काम कीजिए, और उससे ऐसा विश्राम मत माँगिए जो वह दे नहीं सकता।

सामान्य गलतफहमी

ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। पुस्तक के योगवासिष्ठ-जैसे उद्धरणों में अंधे या मदोन्मत्त की उपमाएँ हैं; उन्हें किसी व्यक्ति या समूह पर अपमान के रूप में न लें। तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज एक सुकृत या सेवा का काम कीजिए और उसके बाद स्वयं से पूछिए: ‘मैं इससे क्या माँग रहा था?’ (लगभग 10 मिनट)

आत्मचिंतन प्रश्न: मैं अपने अच्छे कर्मों, धन या सुखों से कौन-सा विश्राम माँग रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट बैठकर लिखिए: ‘मैंने ____ किया ताकि ____।’ तीन बार पूरा कीजिए और देखिए कि कौन-सी माँग बार-बार आती है।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: धन, काम और पुण्य से भी संसार-वन में विश्राम नहीं मिला; अंतिम विश्राम की माँग ढीली कीजिए।

English

Translation: Enough of wealth, desire and even good deeds; through these the mind has found no rest in the forest of the world.

Simple explanation: The verse speaks of the weariness that remains even after wealth, pleasure and good deeds. It does not devalue goodness or effort; it questions seeking final rest from them. If exhaustion or hopelessness is heavy, support from a trusted person is the right resource.

विषय और संबंधित श्लोक

  • थकान
  • पुरुषार्थ-त्रय
  • वैराग्य
  • विश्राम
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 10.1: काम, अर्थ और सकाम धर्म।
  • श्लोक 10.8: अब कर्मों से उपरम।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 161–162 (PDF पृ. 168–169)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पृष्ठ से पढ़ा गया। टीका के जन्मांध, कामातुर और मदोन्मत्त वाले उद्धरण केवल संक्षेप में लिए गए।