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अध्याय 13 · सहज सुख
अष्टावक्र गीता, श्लोक 13.5
सत्यापित
मूल संस्कृत
अर्थानर्थौ न मे स्थित्या गत्या न शयनेन वा । तिष्ठन्गच्छन्स्वपंस्तस्मादहमासे यथासुखम् ॥ ५ ॥
IAST लिप्यंतरण
arthānarthau na me sthityā gatyā na śayanena vā | tiṣṭhan gacchan svapan tasmād aham āse yathāsukham || 5 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
अर्थ-अनर्थौ, न, मे, स्थित्या, गत्या, न, शयनेन, वा, तिष्ठन्, गच्छन्, स्वपन्, तस्मात्, अहम्, आसे, यथासुखम्
- स्थित्या
- बैठने या रुकने से
- गत्या
- चलने-फिरने से
- शयनेन वा
- अथवा सोने से
- मे अर्थ-अनर्थौ न
- मेरा कोई लाभ या नुकसान (कल्याण या अकल्याण) नहीं होता
- तस्मात्
- इसलिए
- तिष्ठन्
- बैठते हुए
- गच्छन्
- चलते हुए
- स्वपन्
- सोते हुए
- अहम् यथासुखम् आसे
- मैं सर्वदा सहज सुख में स्थित रहता हूँ
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
बैठने, चलने या सोने से मेरा कोई लाभ या हानि नहीं होती; इसलिए बैठते, चलते या सोते हुए भी मैं सुखपूर्वक स्थित रहता हूँ।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: साधारण व्यक्ति यह मानता है कि एक विशेष मुद्रा में बैठने से ही पुण्य होता है या सोने से समय नष्ट होता है। राजा जनक कहते हैं कि शरीर चाहे खड़ा हो, चल रहा हो या सो रहा हो, इन प्राकृतिक चेष्टाओं से साक्षी आत्मा के अखंड आनंद में न कोई वृद्धि होती है और न कोई कमी। इसलिए वे शारीरिक क्रियाओं के प्रति पूर्णतः समदर्शी होकर हर अवस्था में आत्मा के सहज सुख में टिके रहते हैं।
सरल हिन्दी में समझें
इस श्लोक में राजा जनक जीवन की सबसे स्वाभाविक अवस्थाओं—उठने, बैठने, चलने और सोने—का रहस्य बताते हैं।
लोग सोचते हैं कि केवल पद्मासन में आँख मूँदकर बैठने पर ही ईश्वर मिलते हैं, और चलते-फिरते या सोते समय हम उनसे दूर हो जाते हैं।
जनक कहते हैं कि आत्मा तो हर क्षण आपके साथ है। चाहे आप चल रहे हों, आराम से बैठे हों या गहरी नींद में सो रहे हों, आपकी असली चेतना में कोई घट-बढ़ नहीं होती। इसलिए हर क्षण, हर काम में वे उसी आनंद का अनुभव करते हैं।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. आत्मा की नित्य-अविकारी सत्ता सभी शारीरिक अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) में एकरस रहती है। 2. अर्थ और अनर्थ (लाभ और हानि) की सांसारिक धारणाएं शरीर और मन के स्तर तक सीमित हैं। 3. तिष्ठन्गच्छन्स्वपन् गीता के 5.8-9 के तत्त्ववेत्ता के लक्षण का प्रत्यक्ष प्रतिफलन है। 4. यह साधना को किसी कमरे या आसन तक सीमित न रखकर संपूर्ण जीवन में व्यापक बनाता है। 5. समरसता का यह स्तर व्यक्ति को हर प्रकार के अपराध-बोध (guilt) से मुक्त करता है। 6. यह सहज योग का शिखर है जहाँ व्यवहार और विश्राम में कोई भेद नहीं रहता।
उदाहरण से समझें: जैसे सूर्य चाहे दिन में चमके या रात में पृथ्वी के दूसरी ओर हो, सूर्य के अपने प्रकाश में कभी कोई अंतर नहीं आता, वैसे ही शरीर की अवस्थाओं से आत्मा अप्रभावित रहती है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
आधुनिक जीवन में जब लोग दिनभर की यात्रा, ऑफिस के काम और रात की नींद को अलग-अलग तनाव मान लेते हैं, तो जनक सिखाते हैं कि इन सभी गतिविधियों के साक्षी बनकर भीतर की शांति को लगातार जिया जा सकता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: अपनी शांति को किसी विशेष आसन या स्थान का मोहताज मत बनाइए; उठते, बैठते, चलते और सोते हुए भी साक्षी रहिए।
सामान्य गलतफहमी
आत्मा के शरीर तक सीमित न होने की पहचान का अर्थ स्वास्थ्य, सुरक्षा, विश्राम या आवश्यक उपचार की उपेक्षा को उचित ठहराना नहीं है। वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। ‘स्वपन् तस्मादहमासे’ का अर्थ प्रमादवश दिनभर सोते रहना या स्वास्थ्य, सुरक्षा, विश्राम और व्यायाम की उपेक्षा करना नहीं है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज चलते समय, कुर्सी पर बैठते समय या बिस्तर पर लेटते समय एक पल के लिए यह स्मरण करें कि इन सब स्थितियों में “मैं” वही स्थिर चेतना हूँ। (दिनभर)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपनी मनःस्थिति को केवल बाह्य परिस्थितियों और शारीरिक मुद्राओं पर निर्भर मान रहा हूँ?
छोटा अभ्यास: चलते हुए कुछ कदम सजगता से रखें और अनुभव करें कि पैर चल रहे हैं, किंतु देखने वाली चेतना पूरी तरह अचल है।
एक पंक्ति में सार: उठने, चलने या सोने से आत्मा की कोई हानि-लाभ नहीं होती; अतः हर अवस्था में मैं सुखपूर्वक स्थित हूँ।
English
Translation: Neither gain nor loss comes to me by standing, walking, or lying down; therefore, standing, walking, or sleeping, I abide in ease.
Simple explanation: King Janaka recognizes that the unchanging witness is unaffected by bodily postures or states. Whether resting, moving, or sleeping, he remains anchored in steady, continuous peace.
विषय और संबंधित श्लोक
- अवस्थातीत
- सहज जीवन
- समता
- यथासुखम्
- श्लोक 12.5: आश्रमानाश्नमं वाऽपि।
- श्लोक 13.6: स्वपतो नास्ति मे हानिः।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अवस्थातीत आत्मस्थिति।