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अध्याय 14 · संस्कारों से स्वतंत्रता
अष्टावक्र गीता, श्लोक 14.2
सत्यापित
मूल संस्कृत
क्व धनानि क्व मित्राणि क्व मे विषयदस्यवः । क्व शास्त्रं क्व च विज्ञानं यदा मे गलिता स्पृहा ॥ २ ॥
IAST लिप्यंतरण
kva dhanāni kva mitrāṇi kva me viṣayadasyavaḥ | kva śāstraṃ kva ca vijñānaṃ yadā me galitā spṛhā || 2 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
क्व, धनानि, क्व, मित्राणि, क्व, मे, विषय-दस्यवः, क्व, शास्त्रम्, क्व, च, विज्ञानम्, यदा, मे, गलिता, स्पृहा
- यदा मे स्पृहा गलिता
- जब मेरी समस्त तृष्णा और सांसारिक चाह भीतर से गलकर समाप्त हो गई
- क्व धनानि
- तब मेरे लिए कहाँ धन-दौलत
- क्व मित्राणि
- कहाँ मित्र और सांसारिक सम्बन्धी
- क्व मे विषय-दस्यवः
- कहाँ मुझे लूटने वाले विषय-भोग रूपी डाकू
- क्व शास्त्रम्
- कहाँ शास्त्रों के विधि-विधान
- क्व च विज्ञानम्
- और कहाँ विशेष बौद्धिक ज्ञान
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
जब मेरी तृष्णा गलकर समाप्त हो गई, तब मेरे लिए कहाँ धन, कहाँ मित्र, कहाँ विषय-रूपी डाकू, कहाँ शास्त्र और कहाँ विशेष ज्ञान?
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: मनुष्य को संसार से बाँधने वाली एकमात्र रस्सी उसकी अपनी ‘स्पृहा’ (तृष्णा या वासना) है। जब तक भीतर चाह है, तभी तक धन की चिंता है, मित्रों की आवश्यकता है, और विषय-भोग मन को लूटने वाले डाकुओं की तरह सताते हैं। यहाँ तक कि शास्त्रों और विद्या का अहंकार भी तृष्णा से ही पोषण पाता है। राजा जनक कहते हैं कि जब आत्मज्ञान से तृष्णा ही गल गई, तो ये सारे प्रपंच स्वप्न की तरह विलीन हो गए।
सरल हिन्दी में समझें
इस श्लोक में राजा जनक इच्छाओं के मिट जाने के बाद की परम स्वतंत्रता का गान करते हैं।
जब तक हमारे मन में पाने की भूख होती है, तभी तक धन की कमी सताती है, दूसरों के अनुमोदन की चाह रहती है, और सांसारिक आकर्षण हमें परेशान करते हैं। हम शास्त्रों की बातें भी अक्सर केवल दूसरों पर रौब जमाने के लिए सीखते हैं।
जनक कहते हैं कि जब आत्मा की पूर्णता का अनुभव हुआ और सारी चाहतें पिघल गईं, तो यह सारा मानसिक नाटक खत्म हो गया। अब न किसी चीज़ का डर है और न किसी नई चीज़ की भूख।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. गलिता स्पृहा अद्वैत वेदान्त का परम वैराग्य-सूचक पद है। 2. विषयदस्यवः (विषय-रूपी डाकू) उपमा दिखाती है कि वासना कैसे चेतना की शांति को लूट लेती है। 3. शास्त्र और विज्ञान की सीमा: आत्म-साक्षात्कार के बाद शास्त्रीय वाद-विवाद गौण हो जाते हैं। 4. धन, मित्र और संबंध बाह्य हैं; आंतरिक स्वतंत्रता केवल निष्कामता से आती है। 5. यह श्लोक किसी वस्तु के प्रति घृणा नहीं, बल्कि उन पर निर्भरता की समाप्ति दर्शाता है। 6. तृष्णा के मिटते ही संसार का सारा भय और भ्रम तत्काल विलीन हो जाता है।
उदाहरण से समझें: जैसे पेट पूरी तरह भरा होने पर स्वादिष्ट से स्वादिष्ट भोजन भी आकर्षित नहीं करता और न कोई उसे छीनने का डर रहता है, वैसे ही तृष्णा गलने पर संसार का आकर्षण समाप्त हो जाता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
आधुनिक समाज में जब कोई व्यक्ति लगातार नए गैजेट्स, शोहरत और सोशल मीडिया लाइक्स की अंधी दौड़ से पूरी तरह तृप्त होकर बाहर आ जाता है, तो उसे समझ आता है कि वास्तविक शांति चाहत के न होने में है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: भीतर की तृष्णा को ज्ञान के आलोक में पिघलने दीजिए; जब चाह समाप्त होगी तो सारी मानसिक चिंताएं स्वयं विलीन हो जाएँगी।
सामान्य गलतफहमी
तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। ‘क्व धनानि क्व मित्राणि’ का अर्थ परिवार या मित्रों के प्रति क्रूर हो जाना अथवा जीवनयापन के साधनों को नष्ट कर देना नहीं है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब भी मन में किसी नई वस्तु या प्रशंसा को पाने की तीव्र इच्छा उठे, तो ठहरकर पूछें: "क्या इसके बिना भी मेरी आत्मा इस क्षण पूर्ण नहीं है?" (लगभग 2 मिनट)
आत्मचिंतन प्रश्न: मेरी कौन-सी इच्छाएं ऐसी हैं जो मुझे लगातार बेचैन रखती हैं और मेरी वर्तमान शांति को लूट रही हैं?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर मन में दोहराएं: "मुझे इस क्षण कुछ नहीं चाहिए, मुझे कहीं नहीं पहुँचना, मैं अपने स्वरूप में तृप्त हूँ।"
एक पंक्ति में सार: जब मेरी तृष्णा गल गई, तब धन, मित्र, विषय-वासना, शास्त्र और विशेष ज्ञान के सारे प्रपंच विलीन हो गए।
English
Translation: Where are riches, where are friends, where are the thieves of sense-objects, where scriptures and learning, when my desire has melted away?
Simple explanation: King Janaka proclaims that once desire itself dissolves, the entire drama of worldly clinging, social dependencies, sensual temptations, and scholastic pride simply vanishes.
विषय और संबंधित श्लोक
- गलित-स्पृहा
- तृष्णा-मुक्ति
- स्वाधीनता
- विषय-दस्यवः
- श्लोक 10.1: विहाय वैरिणं कामम्।
- श्लोक 14.3: विज्ञाते साक्षिपुरुषे।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। तृष्णा-मुक्ति का शिखर श्लोक।