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अध्याय 10 · तृष्णा से स्वतंत्रता
अष्टावक्र गीता, श्लोक 10.1
सत्यापित
मूल संस्कृत
विहाय वैरिणं कामं अर्थं चानर्थसंकुलम् । धर्ममप्येतयोर्हेतुं सर्वत्रानादरं कुरु ॥ १ ॥
IAST लिप्यंतरण
vihāya vairiṇaṃ kāmaṃ arthaṃ cānarthasaṅkulam | dharmam apy etayor hetuṃ sarvatrānādaraṃ kuru || 1 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
विहाय, वैरिणम्, कामम्, अर्थम्, च, अनर्थसंकुलम्, धर्मम्, अपि, एतयोः, हेतुम्, सर्वत्र, अनादरम्, कुरु
- वैरिणम् कामम्
- वैरी-रूप कामना को
- अनर्थसंकुलम् अर्थम्
- अनर्थ से भरे अर्थ (धन) को
- विहाय
- छोड़कर
- एतयोः हेतुम् धर्मम् अपि
- इन दोनों के कारण-रूप धर्म को भी
- सर्वत्र अनादरम् कुरु
- सब जगह अनादर (अनासक्ति) कर
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
वैरी-रूप काम को और अनर्थ से भरे अर्थ को छोड़कर, इन दोनों के हेतु-रूप धर्म को भी, सर्वत्र अनादर (अनासक्ति) रख।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
पुस्तक के अनुसार पहले प्रकरण में विषयों के बिना भी संतोष-रूप वैराग्य का निरूपण हुआ था, और अब इस प्रकरण में विषयों की तृष्णा के त्याग का निरूपण है। अष्टावक्र कहते हैं कि काम शत्रु है; यह सम्पूर्ण अनर्थों का मूल और बड़ा दुर्जय है। टीका आत्मपुराण का एक श्लोक-भाव देती है कि कामदेव ने ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र और महादेव तक को जीता है, इसलिए सब अनर्थों की जड़ काम है। धन के संग्रह और रक्षा में दुख और उसके नाश में शोक का मुख्य कारण भी काम ही है।
इसलिए टीका कहती है कि काम का कारण जो धर्म है, यानी वह धर्म जो भोग की कामना से किया जाता है, और सकाम कर्म, इनका भी त्याग करो, क्योंकि ये जीवन्मुक्ति में बाधक हैं। (पुस्तक यहाँ ‘धर्म’ से फल की इच्छा से किए जाने वाले कर्मों को लेती है, नैतिक आचरण को नहीं।)
सरल हिन्दी में समझें
दसवाँ प्रकरण तृष्णा के त्याग पर है और पहला श्लोक सीधा वाक्य कहता है: जो कामना भीतर शत्रु जैसा काम करती है, जो धन अनर्थ पैदा करता है, और जो धर्म इन्हीं की पूर्ति के लिए किया जाता है, इन सबके प्रति आदर या लगाव का भाव छोड़ दे।
यहाँ सबसे ज़रूरी बात समझ लेना ज़रूरी है: पुस्तक ‘धर्म’ से वह कर्म ले रही है जो फल या भोग की कामना से किया जाता है। यह किसी को नैतिकता, ईमानदारी, दया या कर्तव्य छोड़ने की अनुमति नहीं है। ‘अनादर’ का अर्थ उन चीज़ों से जुड़ी पकड़ और आसक्ति का ढीला होना है।
काम और अर्थ भी जीवन की सहज ज़रूरतों के रूप में गलत नहीं बताए गए; यहाँ ज़ोर उस तृष्णा पर है जो मन को बाँध लेती है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. श्लोक कहता है कि काम और अर्थ को वैरी-रूप और अनर्थ से भरा जानकर और उनके हेतु-रूप सकाम धर्म को भी आसक्ति से छोड़कर सर्वत्र अनादर रख। 2. यह भोग की कामना में सुख खोजने और उसे पुण्य-कर्म से सजाने की पहचान को चुनौती देता है। 3. यह काम, अर्थ, सकाम कर्म और बंधन के संबंध को प्रकट करता है। 4. अध्याय का पहला श्लोक है, जो तृष्णा-त्याग का प्रवेश-द्वार है। 5. 9.8 में वासना-त्याग के बाद यहाँ उसी का सीधा, तीन तरफ़ा रूप है। 6. यह परम दृष्टि है; ‘धर्म’ यहाँ सकाम कर्म का अर्थ लिए है। 7. इसे नैतिकता, कर्तव्य या ईमानदारी छोड़ने का आधार न बनाएँ।
वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है।
उदाहरण से समझें: जैसे नमक वाले पानी से प्यास बुझाने की कोशिश प्यास को और बढ़ाती है, वैसे भोग की कामना से भोग का सुख खोजना कामना को बढ़ाता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
प्रतीकात्मक चित्र-व्याख्या
वैराग्य
वस्तु का उपयोग, पर उस पर मानसिक निर्भरता नहीं।
आज की जिंदगी से उदाहरण
कोई व्यक्ति कमाई, पद और अच्छे कामों की प्रतिष्ठा के पीछे लगातार दौड़ता है और हर पड़ाव पर और चाहता है। जब वह देखता है कि दौड़ का ईंधन तृष्णा है, तो वह काम और दान जारी रखते हुए भी उनके परिणाम की पकड़ ढीली करने लगता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: काम, धन और अच्छे कर्मों से जुड़ी पकड़ पहचानिए; पकड़ ढीली कीजिए, कर्तव्य नहीं।
सामान्य गलतफहमी
ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। पुस्तक की टीका में यहाँ स्त्री, संतान और संबंधियों को केवल ‘भोग के साधन’ या बंधन की तरह वर्णित करने वाले अंश हैं; यह किसी व्यक्ति या वर्ग को निम्न ठहराने के रूप में न पढ़ें। संबंध मनुष्यों के साथ हैं, वस्तुएँ नहीं। ‘वैरी’ और ‘अनर्थ’ जैसे शब्द काम या अर्थ को स्वभाव से बुरा नहीं ठहराते; वे तृष्णा की पकड़ के बारे में हैं।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज एक काम चुनिए जिसे आप फल की इच्छा से कर रहे हैं, और उसे बिना बदले की इच्छा के करके देखिए कि पकड़ कहाँ ढीली होती है। (लगभग 5 मिनट)
आत्मचिंतन प्रश्न: मेरी कौन-सी कामना या कौन-सा ‘अच्छा’ कर्म सबसे ज़्यादा तृष्णा से चलता है?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट बैठकर लिखिए: तीन काम जो आप फल की इच्छा से करते हैं। हर एक के आगे लिखिए: ‘अगर फल न मिले तो भी क्या मैं यह करता?’ केवल देखिए।
एक पंक्ति में सार: काम, अर्थ और उनके हेतु-रूप सकाम कर्म में आसक्ति छोड़िए; कर्तव्य और नैतिकता नहीं।
English
Translation: Give up desire, the enemy, and wealth, full of harm; and also the dharma that serves them. Hold no attachment to any of it.
Simple explanation: The chapter on giving up thirst opens by naming desire, wealth and desire-driven action as bonds to loosen. The book means action done for reward, not ethics; it is not permission to drop duty, honesty or compassion.
विषय और संबंधित श्लोक
- तृष्णा-त्याग
- वैराग्य
- सकाम कर्म
- अनासक्ति
- श्लोक 9.8: वासना ही संसार है।
- श्लोक 10.3: जहाँ तृष्णा वहाँ संसार।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पृष्ठ से पढ़ा गया। छपे मूल में ‘कामं अर्थं’ और पदच्छेद ‘कामम्, अर्थम्’ में सुसंगत हैं। टीका के ‘धर्म’ का अर्थ सकाम कर्म लिया गया है; यह संपादकीय स्पष्टीकरण पुस्तक की टिप्पणी पर आधारित है।