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प्रकरण 15: पंद्रहवाँ प्रकरणश्लोक १०/२०50%

अध्याय 15 · मुक्त पुरुष की अवस्था

अष्टावक्र गीता, श्लोक 15.10

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

देहस्तिष्ठतु कल्पान्तं गच्छत्वद्यैव वा पुनः । क्व वृद्धिः क्व च वा हानिस्तव चिन्मात्ररूपिणः ॥ १० ॥

IAST लिप्यंतरण

dehas tiṣṭhatu kalpāntaṃ gacchatv adyaiva vā punaḥ |\nkva vṛddhiḥ kva ca vā hānis tava cinmātrarūpiṇaḥ || 10 ||

सरल उच्चारण: dehas tishthatu kalpaantam gachchhatv adyaiva vaa punah \nkva vriddhih kva cha vaa haanis tava chinmaatraroopinah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

देहः, तिष्ठतु, कल्पान्तम्, गच्छतु, अद्य, एव, वा, पुनः, क्व, वृद्धिः, क्व, च, वा, हानिः, तव, चिन्मात्र-रूपिणः

देहः कल्पान्तम् तिष्ठतु
यह शरीर कल्प के अंत तक बना रहे
अद्य एव वा पुनः गच्छतु
अथवा आज ही अभी इसी क्षण नष्ट हो जाए
चिन्मात्र-रूपिणः तव
शुद्ध ज्ञान-स्वरूप तुम्हारी
क्व वृद्धिः
कहाँ कोई वृद्धि या लाभ है
क्व च वा हानिः
और कहाँ कोई हानि या नुकसान है?

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

यह शरीर कल्प के अंत तक रहे या आज ही नष्ट हो जाए; तुम चिन्मात्र स्वरूप की इसमें क्या वृद्धि और क्या हानि?

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: गुरु अष्टावक्र वैराग्य और निर्भयता की पराकाष्ठा दिखाते हैं। देह की दीर्घायु या अल्पायु से आत्मा के अखंड स्वरूप में रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ता। यदि कोई शरीर हजारों साल तक जीवित रहे तो भी आत्मा में कुछ नया नहीं जुड़ता, और यदि शरीर अभी छूट जाए तो भी आत्मा में कोई कमी नहीं आती। तुम केवल शुद्ध चैतन्य (चिन्मात्र) हो; इसलिए देह के रहने या न रहने की चिंता से सर्वथा मुक्त हो जाओ।

सरल हिन्दी में समझें

यह श्लोक जीवन और मृत्यु की सारी चिंता को एक ही झटके में मिटा देता है।

लोग लंबी उम्र पाने के लिए क्या-क्या नहीं करते, और जरा-सी बीमारी में घबरा जाते हैं।

अष्टावक्र कहते हैं कि यह शरीर चाहे लाखों साल जिए या आज शाम को ही खत्म हो जाए, आप जो शुद्ध चेतना हैं, न तो उसमें कोई नई चीज़ जुड़ती है और न कुछ कम होता है। जैसे आकाश में बादल करोड़ों साल रहें या अभी उड़ जाएँ, आकाश वैसा ही रहता है। इसलिए देह की उम्र की चिंता छोड़कर अपने अमर स्वरूप में जिएँ।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. चिन्मात्ररूपिणः आत्मा की पूर्ण और अखंड सत्ता का सूचक पद है। 2. देह की काल-सीमा (time span) सापेक्ष है; आत्मा कालातीत (timeless) है। 3. क्व वृद्धिः क्व च वा हानिः आत्मा की पूर्णता का उद्घोष है। 4. यह दीर्घायु की वासना और मृत्यु के भय दोनों का एक साथ विसर्जन करता है। 5. यह साधक को देह के प्रति आसक्ति से पूर्णतः अनासक्त कर देता है। 6. अद्वैत का यह साहस ही साधक को वास्तविक अभय प्रदान करता है।

उदाहरण से समझें: जैसे मिट्टी का घड़ा चाहे सौ साल सुरक्षित रहे या आज ही फूट जाए, उसके अंदर का आकाश कभी नहीं घटता-बढ़ता, वैसे ही देह की आयु से आत्मा अप्रभावित रहती है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जैसे किसी ऑनलाइन गेम में आपके अवतार का कैरेक्टर चाहे पूरे गेम में बचा रहे या पहले राउंड में आउट हो जाए, खेलने वाले वास्तविक व्यक्ति को कोई चोट नहीं लगती, वैसे ही देह के जाने से आत्मा का कोई नुकसान नहीं होता। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: शरीर की आयु की व्यर्थ चिंता छोड़िए; आप चिन्मात्र अमर आत्मा हैं जिसकी कभी न वृद्धि होती है और न हानि।

सामान्य गलतफहमी

आत्मा के शरीर तक सीमित न होने की पहचान का अर्थ स्वास्थ्य, सुरक्षा, विश्राम या आवश्यक उपचार की उपेक्षा को उचित ठहराना नहीं है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘गच्छत्वद्यैव वा’ का अर्थ आत्महत्या, आत्मघात या स्वास्थ्य की उपेक्षा करना नहीं है; यह मृत्यु के मनोवैज्ञानिक भय से मुक्ति का दार्शनिक सूत्र है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब भी अपनी उम्र या स्वास्थ्य को लेकर कोई चिंता सताए, तो शांत होकर कहें: "मैं चिन्मात्र हूँ, मेरा न कोई नुकसान है और न कोई अंत।" (लगभग 2 मिनट)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मेरी शांति केवल इस बात पर टिकी है कि मेरा शरीर कितने साल जीवित रहेगा?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें कि आप समय और काल की सीमाओं से परे एक असीम, अमर उपस्थिति हैं।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: शरीर कल्पान्त तक रहे या आज ही जाए; चिन्मात्र स्वरूप तुम्हारी क्या वृद्धि और क्या हानि?

English

Translation: Let the body last until the end of the kalpa, or let it perish this very day. Where is gain or loss for you who are pure consciousness?

Simple explanation: Whether the body endures for cosmic eons or dissolves this very moment, nothing is added to or subtracted from you, the immaculate consciousness. Abide fearless beyond time.

विषय और संबंधित श्लोक

  • चिन्मात्र
  • कालातीत
  • अभय
  • पूर्णता
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 15.9: आत्मा न गन्ता नागन्ता।
  • श्लोक 15.11: त्वय्यनन्तमहाम्भोधौ।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 215–216 (PDF पृ. 222–223)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। काल और आयु से परे आत्मबोध।