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अध्याय 15 · मुक्त पुरुष की अवस्था
अष्टावक्र गीता, श्लोक 15.9
सत्यापित
मूल संस्कृत
गुणैः संवेष्टितो देहस्तिष्ठत्यायाति याति च । आत्मा न गन्ता नागन्ता किमेनमनुशोचसि ॥ ९ ॥
IAST लिप्यंतरण
guṇaiḥ saṃveṣṭito dehas tiṣṭhaty āyāti yāti ca |\nātmā na gantā nāgantā kim enam anuśocasi || 9 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
गुणैः, संवेष्टितः, देहः, तिष्ठति, आयाति, याति, च, आत्मा, न, गन्ता, न, आगन्ता, किम्, एनम्, अनुशोचसि
- गुणैः संवेष्टितः देहः
- प्रकृति के गुणों (सत्त्व, रज, तम) से घिरा हुआ यह शरीर
- तिष्ठति आयाति याति च
- रहता है, उत्पन्न होता है और नष्ट होता है
- आत्मा न गन्ता न आगन्ता
- किंतु आत्मा न कहीं जाने वाली है और न कहीं आने वाली
- एनम् किम् अनुशोचसि
- फिर तुम इस शरीर के लिए व्यर्थ शोक क्यों करते हो?
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
प्रकृति के गुणों से घिरा हुआ शरीर रहता है, आता है और जाता है; आत्मा न जाने वाली है न आने वाली, फिर तुम इसके लिए शोक क्यों करते हो?
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: मनुष्य का सबसे बड़ा भय मृत्यु और शरीर का नाश है। अष्टावक्र मुनि समझाते हैं कि जन्म, जीवन और मृत्यु केवल स्थूल शरीर के धर्म हैं, जो पंचभूतों और तीन गुणों का बना है। जैसे कपड़े पुराने होकर बदल दिए जाते हैं, वैसे ही शरीर आता-जाता है। सर्वव्यापी आत्मा आकाश की तरह अचल है; वह न कहीं से आती है और न कहीं जाती है। फिर इस देह के नष्ट होने पर ज्ञानी शोक क्यों करे?
सरल हिन्दी में समझें
यह श्लोक मृत्यु के भय को हमेशा के लिए समाप्त कर देता है।
हम हर पल यह सोचकर डरते हैं कि एक दिन हमारा शरीर बीमार हो जाएगा या मर जाएगा।
अष्टावक्र कहते हैं कि शरीर प्रकृति का खिलौना है—वह बनता है, कुछ दिन टिकता है और फिर मिट्टी में मिल जाता है। लेकिन आप जो इस शरीर के भीतर हैं, वह कभी नहीं मरता। आत्मा न कहीं जाती है और न आती है, क्योंकि वह हर जगह पहले से मौजूद है। जब आपका असली स्वरूप अमर है, तो फिर इस मिट्टी के पुतले के लिए रोना क्यों?
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. जन्म-मरण का संबंध केवल प्रकृति-निर्मित देह से है, आत्मा से नहीं। 2. आत्मा की सर्वव्यापकता और अचल सत्ता (कूटस्थत्व) का स्पष्ट प्रतिपादन। 3. किमेनमनुशोचसि गीता के 2.11 (अशोच्यानन्वशोचस्त्वं) की अनुगूँज है। 4. शोक केवल अज्ञान और मिथ्या तादात्म्य से उत्पन्न होता है। 5. यह मृत्यु के मनोवैज्ञानिक भय को समूल नष्ट करने वाली परम औषधि है। 6. प्रकृति अपने नियमों से काम करती है; ज्ञानी उसके खेल का साक्षी रहता है।
उदाहरण से समझें: जैसे घड़े के बनने या फूटने से घड़े के अंदर का आकाश न बनता है और न नष्ट होता है, वह महाकाश ही रहता है, वैसे ही देह के आने-जाने से आत्मा अप्रभावित रहती है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब आपका पुराना कंप्यूटर या फोन खराब होकर बदल दिया जाता है, तो आपका इंटरनेट डेटा नष्ट नहीं होता; वैसे ही देह बदलने से आपकी मूल चेतना कभी नष्ट नहीं होती। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: मृत्यु के भय से मुक्त हो जाइए; शरीर प्रकृति का चक्र है, आपकी आत्मा नित्य, अचल और अमर है।
सामान्य गलतफहमी
आत्मा के शरीर तक सीमित न होने की पहचान का अर्थ स्वास्थ्य, सुरक्षा, विश्राम या आवश्यक उपचार की उपेक्षा को उचित ठहराना नहीं है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘किमेनमनुशोचसि’ का अर्थ किसी अपने की मृत्यु पर संवेदनहीन हो जाना या शरीर के जीवन की रक्षा न करना नहीं है, बल्कि अमर सत्य को पहचानना है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब भी बुढ़ापे, बीमारी या मृत्यु का कोई भय मन में आए, तो याद रखें: "देह बदलेगी पर मेरी साक्षी चेतना सदा अमर है।" (लगभग 2 मिनट)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपने नश्वर शरीर को ही सब कुछ मानकर मृत्यु के काल्पनिक डर में जी रहा हूँ?
छोटा अभ्यास: दो मिनट शांत बैठकर अनुभव करें कि आप वह अचल आकाश हैं जिसमें सांसें आ रही हैं और जा रही हैं, पर आप स्थिर हैं।
एक पंक्ति में सार: गुणों से घिरा शरीर आता और जाता है, आत्मा न आती है न जाती; फिर इसके लिए शोक क्यों?
English
Translation: Enveloped by the qualities of nature, the body arises, stays, and departs. The Self neither goes nor comes; why then do you grieve over it?
Simple explanation: Birth, decay, and death belong exclusively to the bodily apparatus shaped by the gunas. The omnipresent Self neither arrives nor departs; mourn not over the transience of form.
विषय और संबंधित श्लोक
- अमरता
- मृत्यु-अभय
- देहातीत
- कूटस्थ
- श्लोक 15.8: ज्ञानस्वरूपो भगवानात्मा।
- श्लोक 15.10: देहस्तिष्ठतु कल्पान्तं।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। मृत्यु के भय का निवारण।