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अध्याय 15 · पंद्रहवाँ प्रकरण

मुक्त पुरुष की अवस्था

संपादकीय विषय-शीर्षक · पुस्तक में नाम: पंद्रहवाँ प्रकरण

बीस श्लोकों के इस पंद्रहवें प्रकरण में गुरु अष्टावक्र शिष्य जनक को सर्वोच्च अद्वैत तत्त्वोपदेश देते हुए चिन्मात्र, साक्षी और नित्य-मुक्त आत्मस्वरूप की पहचान कराते हैं।

श्लोकों की कुल संख्या
20
अनुमानित पठन समय
लगभग 45 से 60 मिनट (अनुमान: प्रति श्लोक 4 से 5 मिनट)
मुख्य संस्कृत शब्द
सत्त्वबुद्धिमान् · विषयवैरस्यम् · चिद्रूप · विज्वर · चिदाकाश · निःसङ्कल्प · सुखं चर
प्रमुख विषय
अधिकारी-भेद और तत्त्वबोध की तत्कालता · विषय-वैरस्य ही मोक्ष का सार · देहाध्यास और कर्ता-भोक्ता भाव से मुक्ति · राग-द्वेष मन के धर्म, आत्मा निर्विकार · सर्वभूतों में आत्मा का दर्शन · महासागर और तरंगों की भाँति विश्व की उत्पत्ति-लय · सोने और आभूषणों के दृष्टांत से अद्वैत का बोध · द्वैत-विभाजन का त्याग और नित्य-मुक्त स्थिति · ध्यान और मानसिक संकल्पों के पार विश्रांति

चित्र-विवरण (संपादकीय): प्रकाश से बनी पारदर्शी आकृति-रूपी जगह (बिना चित्र के)। बाहरी लेबल धीरे-धीरे दूर बहते हैं, जागरूकता बनी रहती है। (इस अध्याय का अपना चित्र अभी बनना शेष है; यहाँ सरल सामान्य पृष्ठभूमि दिखाई गई है।)

अध्याय का परिचय

बारहवें, तेरहवें और चौदहवें प्रकरण में शिष्य राजा जनक द्वारा अपनी आंतरिक अनुभूति और सहज स्थिति का निवेदन सुनने के बाद, पंद्रहवें प्रकरण में सद्गुरु अष्टावक्र पुनः उपदेश का सूत्र संभालते हैं। यह प्रकरण अष्टावक्र गीता के सबसे प्रभावशाली और सारगर्भित अध्यायों में से एक है, जिसमें बीस श्लोकों के माध्यम से अद्वैत वेदांत का निचोड़ प्रस्तुत किया गया है।

गुरु अष्टावक्र पहले ही श्लोक (15.1) में कहते हैं कि शुद्ध बुद्धि वाला सात्त्विक साधक उपदेश मात्र से कृतार्थ हो जाता है, जबकि मंद बुद्धि वाला जीवन भर केवल प्रश्नों में ही उलझा रहता है। दूसरे श्लोक (15.2) में वे मोक्ष की अचूक परिभाषा देते हैं: 'विषयों में रस न रहना ही मोक्ष है, और विषयों में आसक्ति ही बंधन है।' तीसरे से पाँचवें श्लोक में वे समझाते हैं कि यह ज्ञान वाचालता को शांत कर देता है; मनुष्य न शरीर है, न कर्ता, न भोक्ता। राग और द्वेष मन के धर्म हैं, आत्मा तो सदा निर्विकार साक्षी है (15.4-15.5)।

छठे से ग्यारहवें श्लोक में वे विश्व और आत्मा के संबंध को महासागर और लहरों के दृष्टांत से समझाते हैं: जैसे सागर में लहरों के उठने-गिरने से जल की कोई हानि-लाभ नहीं होती, वैसे ही विश्व के आने-जाने से चिन्मात्र आत्मा में कोई विकार नहीं होता। बारहवें से चौदहवें श्लोक में वे सोने और आभूषणों के प्रसिद्ध दृष्टांत द्वारा दिखाते हैं कि दृश्य जगत आत्मा से भिन्न नहीं है। अंत में (15.18-15.20) वे घोषणा करते हैं कि न कोई बंधन था और न मोक्ष; अब ध्यान लगाने का हठ भी छोड़कर अपनी नित्य-मुक्त अवस्था में 'सुखं चर'—आनंदपूर्वक विचरण करो।

सावधानी: 'सुखं चर' और 'यथेच्छसि तथा कुरु' का अर्थ उच्छृंखल या अनैतिक आचरण नहीं है; यह कर्तापन के अहंकार से मुक्त होकर अपने सहज, नैतिक कर्तव्य में जीने का आध्यात्मिक आदेश है।

केंद्रीय प्रश्न

यदि आत्मा सदा शुद्ध, चैतन्य और नित्य-मुक्त है, तो साधक को अब किस साधना या ध्यान की आवश्यकता शेष है?

अध्याय की मुख्य शिक्षा

गुरु अष्टावक्र स्पष्ट करते हैं कि आत्मा किसी साधना का फल नहीं बल्कि सबका अधिष्ठान है। जैसे सोने के गहने सोने से अलग नहीं हैं और समुद्र की लहरें जल से भिन्न नहीं हैं, वैसे ही संपूर्ण जगत चिदाकाश स्वरूप आत्मा ही है। इसलिए समस्त संशय, राग-द्वेष और ध्यान के हठ को छोड़कर अपनी नित्य-मुक्त स्थिति में 'सुखं चर'—आनंदपूर्वक जियो।

पढ़ने से पहले समझें

  • ‘यथेच्छसि तथा कुरु’ और ‘सुखं चर’ का अर्थ सामाजिक या कानूनी मर्यादाओं को तोड़ना नहीं है। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती।
  • ‘त्यजैव ध्यानं सर्वत्र’ प्रारंभिक साधकों के लिए नहीं, बल्कि उस स्थिति के लिए है जहाँ ध्याता-ध्येय का द्वैत मिट चुका है। साधना के अनुशासन का अपना महत्व बना रहता है।
  • सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है।
  • वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है।
  • यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें।

प्रमुख अवधारणाएँ

सत्त्वबुद्धिमान्
वह विशुद्ध अंतःकरण वाला अधिकारी साधक जो उपदेश सुनते ही सत्य को तत्काल अनुभव में उतार लेता है।
विषयवैरस्यम्
इंद्रिय-भोगों के प्रति मानसिक आसक्ति और रस की पूर्ण समाप्ति; वास्तविक मोक्ष।
चिदाकाश
चेतना का वह अनंत, अविनाशी और निर्मल विस्तार जिसमें संपूर्ण विश्व आकाश की भाँति अवस्थित है।
सुखं चर
बिना किसी भय, अपेक्षा या बंधन के अपनी नित्य-मुक्त साक्षी आत्मा में आनंदपूर्वक जीवन जीना।

श्लोक-दर-श्लोक व्याख्या

20 श्लोक, पुस्तक के क्रम में। सभी श्लोक पृष्ठ से मिलान किए गए हैं।

सत्यापितसमीक्षा आवश्यक

श्लोक 15.1

सत्यापित

यथातथोपदेशेन कृतार्थः सत्त्वबुद्धिमान् । आजीवमपि जिज्ञासुः परस्तत्र विमुह्यति ॥ १ ॥

सात्त्विक बुद्धि वाला सहज उपदेश से कृतार्थ हो जाता है, जबकि अशुद्ध मन वाला जीवन भर भ्रमित रहता है।

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श्लोक 15.2

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मोक्षो विषयवैरस्यं बन्धो वैषयिको रसः । एतावदेव विज्ञानं यथेच्छसि तथा कुरु ॥ २ ॥

विषयों से विरक्ति ही मोक्ष है और विषयों में रस ही बंधन है; यही सारा ज्ञान है।

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श्लोक 15.3

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वाग्मिप्राज्ञामहोद्योगं जनं मूकजडालसम् । करोति तत्त्वबोधोऽयमतस्त्यक्तो बुभुक्षुभिः ॥ ३ ॥

आत्मज्ञान वाचाल और चंचल मनुष्य को भी शांत कर देता है; इसीलिए संसारी भोगी इससे कतराते हैं।

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श्लोक 15.4

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न त्वं देहो न ते देहो भोक्ता कर्ता न वा भवान् । चिद्रूपोऽसि सदा साक्षी निरपेक्षः सुखं चर ॥ ४ ॥

तुम न शरीर हो, न कर्ता, न भोक्ता; तुम चैतन्य साक्षी और निरपेक्ष हो, सुखपूर्वक विचरण करो।

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श्लोक 15.5

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रागद्वेषौ मनोधर्मौ न मनस्ते कदाचन । निर्विकल्पोऽसि बोधात्मा निर्विकारः सुखं चर ॥ ५ ॥

राग और द्वेष मन के धर्म हैं, तुम्हारा स्वरूप नहीं; तुम निर्विकार ज्ञान-स्वरूप हो, सुखपूर्वक विचरण करो।

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श्लोक 15.6

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सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । विज्ञाय निरहङ्कारो निर्ममस्त्वं सुखी भव ॥ ६ ॥

सब प्राणियों में आत्मा को और आत्मा में सबको जानकर, अहंकार और ममत्व त्यागकर सुखी हो जाओ।

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श्लोक 15.7

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विश्वं स्फुरति यत्रेदं तरङ्गा इव सागरे । तत्त्वमेव न सन्देहश्चिन्मूर्ते विज्वरो भव ॥ ७ ॥

जिसमें यह विश्व सागर की तरंगों की तरह स्फुरित होता है, वह तत्त्व तुम ही हो; संताप-मुक्त हो जाओ।

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श्लोक 15.8

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श्रद्धस्व तात श्रद्धस्व नात्र मोहं कुरुष्व भोः । ज्ञानस्वरूपो भगवानात्मा त्वं प्रकृतेः परः ॥ ८ ॥

श्रद्धा करो, तनिक भी संशय मत करो; तुम ज्ञान-स्वरूप, भगवान और प्रकृति से परे आत्मा हो।

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श्लोक 15.9

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गुणैः संवेष्टितो देहस्तिष्ठत्यायाति याति च । आत्मा न गन्ता नागन्ता किमेनमनुशोचसि ॥ ९ ॥

गुणों से घिरा शरीर आता और जाता है, आत्मा न आती है न जाती; फिर इसके लिए शोक क्यों?

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श्लोक 15.10

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देहस्तिष्ठतु कल्पान्तं गच्छत्वद्यैव वा पुनः । क्व वृद्धिः क्व च वा हानिस्तव चिन्मात्ररूपिणः ॥ १० ॥

शरीर कल्पान्त तक रहे या आज ही जाए; चिन्मात्र स्वरूप तुम्हारी क्या वृद्धि और क्या हानि?

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श्लोक 15.11

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त्वय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्ववीचिः स्वभावतः । उदेतु वास्तमायातु न ते वृद्धिर्न वा क्षतिः ॥ ११ ॥

तुम अनंत महासागर में यह विश्व-लहर उठे या अस्त हो; तुम्हारी न कोई वृद्धि है और न कोई हानि।

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श्लोक 15.12

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तात चिन्मात्ररूपोऽसि न ते भिन्नमिदं जगत् । अतः कस्य कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना ॥ १२ ॥

तुम चिन्मात्र हो और जगत तुमसे भिन्न नहीं; फिर कहाँ और किसका त्याग या ग्रहण?

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श्लोक 15.13

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एकस्मिन्नव्यये शान्ते चिदाकाशेऽमले त्वयि । कुतो जन्म कुतो कर्म कुतोऽहङ्कार एव च ॥ १३ ॥

एक, अविनाशी, शांत और निर्मल चिदाकाश तुममें कहाँ जन्म, कहाँ कर्म और कहाँ अहंकार?

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श्लोक 15.14

सत्यापित

यत्त्वं पश्यसि तत्रैकस्त्वमेव प्रतिभाससे । किं पृथग्भासते स्वर्णात्कटकाङ्गदनूपुरम् ॥ १४ ॥

तुम जो कुछ देखते हो उसमें तुम ही भासते हो; जैसे सोने से अलग कंगन और नूपुर नहीं होते।

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श्लोक 15.15

सत्यापित

अयं सोऽहमयं नाहं विभागमिति सन्त्यज । सर्वमात्मेति निश्चित्य निःसङ्कल्पः सुखी भव ॥ १५ ॥

‘यह मैं हूँ, यह मैं नहीं’ का भेद छोड़ो; सब कुछ आत्मा जानकर संकल्प-रहित होकर सुखी हो जाओ।

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श्लोक 15.16

सत्यापित

तवैवाज्ञानतो विश्वं त्वमेकः परमार्थतः । त्वत्तोऽन्यो नास्ति संसारी नासंसारी च कश्चन ॥ १६ ॥

तुम्हारे अज्ञान से ही विश्व भासता है, परमार्थ में तुम एक हो; तुमसे अलग न कोई संसारी है न असंसारी।

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श्लोक 15.17

सत्यापित

भ्रान्तिमात्रमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चयी । निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किञ्चिदिव शाम्यति ॥ १७ ॥

विश्व को भ्रांति मात्र जानकर, वासना-रहित और शुद्ध चैतन्य रूप ज्ञानी परम शांति पा लेता है।

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श्लोक 15.18

सत्यापित

एक एव भवाम्भोधावासीदस्ति भविष्यति । न ते बन्धोऽस्ति मोक्षो वा कृतकृत्यः सुखं चर ॥ १८ ॥

संसार में केवल एक ही सत्य था, है और रहेगा; तुममें न बंधन है न मोक्ष, कृतार्थ होकर सुखी रहो।

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श्लोक 15.19

सत्यापित

मा सङ्कल्पविकल्पाभ्यां चित्तं क्षोभय चिन्मय । उपशाम्य सुखं तिष्ठ स्वात्मन्यानन्दविग्रहे ॥ १९ ॥

हे चिन्मय! संकल्प-विकल्पों से चित्त को अशांत मत करो; शांत होकर आनंदमयी आत्मा में सुख से स्थित रहो।

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श्लोक 15.20

सत्यापित

त्यजैव ध्यानं सर्वत्र मा किञ्चिद्धृदि धारय । आत्मा त्वं मुक्त एवासि किं विमृश्य करिष्यसि ॥ २० ॥

सब प्रकार के ध्यान का हठ छोड़ो, मन में कुछ मत धरो; तुम नित्य-मुक्त आत्मा हो, विचार करके क्या करोगे?

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अध्याय का सरल सार

पंद्रहवाँ प्रकरण गुरु अष्टावक्र का अत्यंत तेजस्वी तत्त्वोपदेश है जहाँ वे अधिकारी-भेद से आरंभ कर आत्मा के चिन्मात्र, साक्षी और सर्वव्यापी स्वरूप का साक्षात कराते हैं। समुद्र में उठती लहरों और सोने से बने आभूषणों के दृष्टांतों से वे सिद्ध करते हैं कि जगत आत्मा से भिन्न नहीं है। न कोई बंधन है, न मोक्ष; राग-द्वेष मन के धर्म हैं। इसलिए वे जनक को ध्यान का हठ भी छोड़कर अपनी नित्य-मुक्त, आनंदमयी सत्ता में सहज सुखपूर्वक जीने का निर्देश देते हैं।

पाँच प्रमुख शिक्षाएँ

  1. विषयों से विरक्ति ही मोक्ष है और विषयों में रस ही बंधन है; यह समस्त ज्ञान का मूल सार है। (15.2)
  2. तुम न देह हो, न कर्ता, न भोक्ता; राग-द्वेष मन के धर्म हैं, तुम नित्य निर्विकार साक्षी हो। (15.4, 15.5)
  3. जैसे समुद्र में तरंगें और सोने में आभूषण हैं, वैसे ही संपूर्ण जगत तुम्हारी अपनी ही चेतना का विस्तार है। (15.7, 15.11, 15.14)
  4. 'यह मैं हूँ' और 'यह मैं नहीं हूँ' का मानसिक भेद त्यागकर सब कुछ आत्मा जानकर निःसंकल्प हो जाओ। (15.15, 15.16)
  5. तुम नित्य-मुक्त हो; ध्यान और विचार-मंथन का हठ छोड़कर अपनी स्वाभाविक आनंदमयी सत्ता में सुखपूर्वक विचरण करो। (15.18, 15.19, 15.20)

सामान्य गलतफहमियाँ

  • ‘यथेच्छसि तथा कुरु’ का अर्थ मनमाना, अनैतिक या गैर-कानूनी आचरण करना नहीं है।
  • ‘त्यजैव ध्यानं सर्वत्र’ का अर्थ ध्यान के अभ्यास का अपमान करना या आरंभिक साधना को छोड़ना नहीं है।
  • ‘देहस्तिष्ठतु गच्छतु’ का अर्थ शरीर के स्वास्थ्य, सुरक्षा या उपचार की उपेक्षा करना नहीं है।
  • ‘सर्वमात्मेति निश्चित्य’ का अर्थ व्यावहारिक जगत में मर्यादाओं और कर्तव्यों को नकारना नहीं है।
  • यदि अवसाद या निराशा के विचार आएँ, तो पेशेवर चिकित्सक या हेल्पलाइन से संपर्क करें।

आत्मचिंतन प्रश्न

  1. क्या मैं अभी भी ज्ञान को केवल किताबों में खोज रहा हूँ, या उसे अपने भीतर साक्षात कर रहा हूँ?
  2. मेरे मन के राग और द्वेष मुझे कितना नचा रहे हैं, और क्या मैं उनके साक्षी के रूप में ठहर सकता हूँ?
  3. यदि मैं पहले से ही नित्य-मुक्त हूँ, तो मैं किस काल्पनिक बंधन से छूटने का प्रयास कर रहा हूँ?

संक्षिप्त चिंतन अभ्यास

पाँच मिनट शांत बैठें। शरीर को स्थिर करें। मन में उठने वाले विचारों को समुद्र की लहरों की तरह केवल आते-जाते देखें। याद रखें: 'मैं लहर नहीं, अगाध महासागर हूँ; मैं साक्षी हूँ।' बिना किसी संकल्प के सहज शांति में विश्राम करें। यदि कोई असुविधा हो तो सामान्य स्थिति में आ जाएँ।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पंद्रहवें प्रकरण का मुख्य विषय क्या है?

पंद्रहवें प्रकरण में गुरु अष्टावक्र शिष्य जनक को सर्वोच्च अद्वैत तत्त्वोपदेश देते हुए चिन्मात्र, साक्षी और नित्य-मुक्त आत्मा का साक्षात कराते हैं।

मोक्ष और बंधन का सार क्या बताया गया है?

श्लोक 15.2 के अनुसार, सांसारिक विषयों से विरक्ति (विषय-वैरस्य) ही मोक्ष है और विषयों में रस लेना (आसक्ति) ही बंधन है।

स्वर्ण और आभूषण का दृष्टांत क्या सिखाता है?

जैसे कंगन और कुंडल सोने से अलग नहीं हैं, वैसे ही संपूर्ण दृश्य जगत चैतन्य आत्मा से भिन्न नहीं है; सब कुछ एक ही चेतना का विस्तार है।