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प्रकरण 15: पंद्रहवाँ प्रकरणश्लोक १२/२०60%

अध्याय 15 · मुक्त पुरुष की अवस्था

अष्टावक्र गीता, श्लोक 15.12

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

तात चिन्मात्ररूपोऽसि न ते भिन्नमिदं जगत् । अतः कस्य कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना ॥ १२ ॥

IAST लिप्यंतरण

tāta cinmātrarūpo'si na te bhinnam idaṃ jagat |\nataḥ kasya kathaṃ kutra heyopādeyakalpanā || 12 ||

सरल उच्चारण: taata chinmaatrarooposi na te bhinnam idam jagat \natah kasya katham kutra heyopaadeyakalpanaa (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

तात, चिन्मात्र-रूपः, असि, न, ते, भिन्नम्, इदम्, जगत्, अतः, कस्य, कथम्, कुत्र, हेय-उपादेय-कल्पना

तात
हे प्रिय जनक!
त्वम् चिन्मात्र-रूपः असि
तुम केवल शुद्ध ज्ञान-स्वरूप हो
इदम् जगत् ते भिन्नम् न
यह संपूर्ण जगत तुमसे अलग या भिन्न नहीं है
अतः
इसलिए
कस्य कथम् कुत्र
किसका, कैसे और कहाँ
हेय-उपादेय-कल्पना
त्याग करने योग्य या ग्रहण करने योग्य की कल्पना हो सकती है?

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

हे तात! तुम चिन्मात्र स्वरूप हो और यह जगत तुमसे भिन्न नहीं है; अतः किसका, कैसे और कहाँ त्याग या ग्रहण की कल्पना हो सकती है?

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: जब तक मनुष्य यह समझता है कि "मैं अलग हूँ और जगत अलग है", तभी तक यह द्वंद्व रहता है कि "मैं इस बुरी चीज़ को त्याग दूँ (हेय) और उस अच्छी चीज़ को ग्रहण कर लूँ (उपादेय)।" अष्टावक्र मुनि कहते हैं कि जब सब कुछ तुम्हारी ही चैतन्य सत्ता का विस्तार है, तो तुम किससे भागोगे और किसे पकड़ोगे? अद्वैत में त्याग और ग्रहण दोनों की कल्पनाएं निरर्थक हो जाती हैं।

सरल हिन्दी में समझें

इस श्लोक में अष्टावक्र त्याग और भोग के सारे झगड़े को जड़ से खत्म कर देते हैं।

साधक हमेशा इसी तनाव में रहते हैं कि "मुझे क्या छोड़ना चाहिए और क्या अपनाना चाहिए।"

अष्टावक्र कहते हैं कि हे प्यारे, जब सब कुछ आपकी ही चेतना का फैलाव है, तो आप किसे छोड़ेंगे और किसे पकड़ेंगे? क्या आप अपनी ही परछाईं को छोड़ सकते हैं या पकड़ सकते हैं? जब दूसरा कोई है ही नहीं, तो पकड़ने और छोड़ने का नाटक बंद कीजिए और शांत हो जाइए।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. अद्वैत वेदान्त का मूल सिद्धांत: सर्वं खल्विदं ब्रह्म (सब कुछ वही एक चेतना है)। 2. हेयोपादेय की समाप्ति ही परम संन्यास और परम शांति है। 3. द्वैत की भ्रांति मिटते ही इच्छा और अनिच्छा दोनों का अंत हो जाता है। 4. कस्य कथं कुत्र प्रश्न शैली द्वारा द्वैत की असंभवता को तार्किक रूप से सिद्ध करना। 5. यह बाह्य संन्यास के आग्रह से मुक्त करके सहज आत्मस्थिति में प्रतिष्ठित करता है। 6. जब सब अपना ही स्वरूप है, तो कोई शत्रु या त्याज्य नहीं बचता।

उदाहरण से समझें: जैसे अपने ही शरीर के किसी अंग को कोई न तो फेंक सकता है और न अलग से ग्रहण कर सकता है क्योंकि वह स्वयं ही है, वैसे ही अद्वैत में त्याग और ग्रहण असंभव है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

प्रतीकात्मक चित्र-व्याख्या

संपादकीय सहायक चित्र; यह श्लोक का शाब्दिक अर्थ नहीं है।

महासागर और लहरें

अनुभव बदलते हैं, चेतना का आधार बना रहता है।

चित्र का वर्णन: एक ही समुद्र में छोटी-बड़ी लहरें उठती और गिरती हैं।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब आप यह समझ लेते हैं कि परिवार या टीम के सभी लोग एक ही उद्देश्य से जुड़े हैं, तो आप छोटी-मोटी बातों पर चिढ़कर किसी को ठुकराने या किसी पर कब्जा जमाने की ज़िद छोड़ देते हैं। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: पकड़ने और छोड़ने के मानसिक द्वंद्व से बाहर निकलिए; सब कुछ एक ही चैतन्य का विस्तार है।

सामान्य गलतफहमी

यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। ‘हेयोपादेयकल्पना’ के निषेध का अर्थ यह नहीं है कि जहर और अमृत में भेद न किया जाए; व्यावहारिक स्तर पर विवेक और मर्यादा बनी रहती है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब भी किसी व्यक्ति या परिस्थिति को लेकर मन में तीव्र घृणा या आसक्ति उठे, तो याद रखें: "यह भी उसी एक चेतना का रूप है।" (लगभग 2 मिनट)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अभी भी कुछ चीजों को जबरन त्यागने और कुछ को पकड़ने के मानसिक द्वंद्व में अपनी शांति खो रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: दो मिनट शांत बैठकर विचार करें: "न कुछ त्याज्य है, न कुछ ग्राह्य; सब कुछ साक्षी चेतना में सहज विद्यमान है।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: तुम चिन्मात्र हो और जगत तुमसे भिन्न नहीं; फिर कहाँ और किसका त्याग या ग्रहण?

English

Translation: Dear child, you are pure consciousness alone, and this world is not separate from you. Therefore, whose, how, or where could there be any thought of rejecting or accepting?

Simple explanation: When non-dual reality is realized, the spiritual friction of renunciation and acquisition evaporates. Because the entire phenomenal display is not other than pure awareness, what is there to clutch or discard?

विषय और संबंधित श्लोक

  • चिन्मात्र
  • अद्वैत
  • हेयोपादेय-मुक्ति
  • सर्वव्यापक
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 12.4: हेयोपादेयविरहात्।
  • श्लोक 15.13: एकस्मिन्नव्यये शान्ते।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 217–218 (PDF पृ. 224–225)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। हेय और उपादेय का निषेध।