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अध्याय 15 · मुक्त पुरुष की अवस्था
अष्टावक्र गीता, श्लोक 15.13
सत्यापित
मूल संस्कृत
एकस्मिन्नव्यये शान्ते चिदाकाशेऽमले त्वयि । कुतो जन्म कुतो कर्म कुतोऽहङ्कार एव च ॥ १३ ॥
IAST लिप्यंतरण
ekasminn avyaye śānte cidākāśe'male tvayi |\nkuto janma kuto karma kuto'haṅkāra eva ca || 13 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
एकस्मिन्, अव्यये, शान्ते, चिदाकाशे, अमले, त्वयि, कुतः, जन्म, कुतः, कर्म, कुतः, अहङ्कारः, एव, च
- एकस्मिन् अव्यये शान्ते अमले
- एक, अविनाशी, शांत और निर्मल
- चिदाकाशे त्वयि
- चेतना रूपी आकाश स्वरूप तुममें
- कुतः जन्म
- कहाँ का जन्म?
- कुतः कर्म
- कहाँ का कर्म?
- कुतः अहङ्कारः एव च
- और अहंकार भी कहाँ से हो सकता है?
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
उस एक, अविनाशी, शांत, निर्मल चिदाकाश स्वरूप तुममें कहाँ जन्म, कहाँ कर्म और कहाँ अहंकार?
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: आत्मा को यहाँ ‘चिदाकाश’ (चेतना का आकाश) कहा गया है। जैसे भौतिक आकाश में आंधियाँ चलती हैं, बादल आते हैं, पर आकाश में न कोई खरोंच लगती है और न वह पुराना होता है। वैसे ही चिदाकाश स्वरूप आत्मा में जन्म-मरण, पाप-पुण्य रूपी कर्म और ‘मैं कर्ता हूँ’ का अहंकार कभी प्रवेश ही नहीं कर सकते। यह सब केवल मन की भ्रांति है। तुम सदा निर्मल और शांत हो।
सरल हिन्दी में समझें
यह श्लोक आपको आपके सबसे पवित्र और अछूते स्वरूप का अनुभव कराता है।
हम सोचते हैं कि हमारे पुराने कर्म बहुत खराब हैं, हमारा जन्म किसी गलत परिवार में हुआ, या हमारा अहंकार बहुत बड़ा है।
अष्टावक्र कहते हैं कि आप आकाश की तरह हैं। क्या आकाश कभी गंदा हो सकता है? क्या आकाश का कभी जन्म या मरण होता है? चिदाकाश में न कोई पाप है, न पुण्य, न जन्म, न कर्म और न अहंकार। आप सदा से वैसे ही शुद्ध, शांत और निर्मल हैं जैसे हमेशा थे।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. चिदाकाश उपमा आत्मा की असीम, अमूर्त और असंग सत्ता का निरूपण करती है। 2. अव्यये शान्ते अमले पद आत्मा के चार मुख्य लक्षणों को संक्षेप में स्पष्ट करते हैं। 3. जन्म, कर्म और अहंकार का आत्यंतिक अभाव (अत्यन्ताभाव) अद्वैत का परम सिद्धांत है। 4. यह पूर्वजन्म, प्रारब्ध और कर्म-बंधन के सारे अपराध-बोध को तत्काल धो डालता है। 5. आत्मा में कोई दाग या मलिनता कभी लगी ही नहीं थी, केवल अज्ञान की छाया थी। 6. यह साधक को तुरंत परम विश्रांति और निर्दोषता का बोध कराता है।
उदाहरण से समझें: जैसे खुले नीले आकाश में बादलों के आने-जाने से आकाश कभी बंधता या मैला नहीं होता, वैसे ही चिदाकाश में जन्म और कर्म का कोई दाग नहीं लगता। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जैसे किसी सफेद दीवार पर प्रोजेक्टर से डरावनी फिल्म चलाने पर फिल्म खत्म होते ही दीवार पर कोई खून या आग का निशान नहीं बचता, वैसे ही जीवन के अनुभवों से आपकी आत्मा बिल्कुल साफ रहती है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: अपने अतीत के कर्मों और गलतियों के अपराध-बोध से बाहर निकलिए; आप चिदाकाश की भाँति सदा निर्मल और निर्दोष हैं।
सामान्य गलतफहमी
सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। आत्मा के शरीर तक सीमित न होने की पहचान का अर्थ स्वास्थ्य, सुरक्षा, विश्राम या आवश्यक उपचार की उपेक्षा को उचित ठहराना नहीं है। ‘कुतो कर्म’ का अर्थ यह नहीं है कि समाज में अपने कर्तव्यों को छोड़ दिया जाए या गलत काम किए जाएँ, बल्कि कर्तापन के अहंकार से मुक्त होना है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब भी अतीत की कोई पुरानी गलती या पछतावा मन को घेरे, तो कहें: "चिदाकाश में कोई दाग नहीं टिकता, मैं इस क्षण पूर्णतः शुद्ध हूँ।" (लगभग 2 मिनट)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपने पुराने कर्मों और गलतियों के बोझ को ढोकर खुद को पापी या अयोग्य मान रहा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें कि आपका स्वरूप भौतिक आकाश से भी अधिक सूक्ष्म, शांत और निर्मल चिदाकाश है।
एक पंक्ति में सार: एक, अविनाशी, शांत और निर्मल चिदाकाश तुममें कहाँ जन्म, कहाँ कर्म और कहाँ अहंकार?
English
Translation: In you—the one, imperishable, tranquil, and spotless sky of consciousness—whence is birth, whence action, and whence even egoism?
Simple explanation: Sage Ashtavakra evokes the pristine metaphor of Chidakasha (the sky of consciousness): immutably serene, spotless, and unconditioned. Within this vast, untainted expanse, where can birth, karma, or ego find any footing?
विषय और संबंधित श्लोक
- चिदाकाश
- अमलता
- अहंकार-शून्यता
- नित्य-शुद्ध
- श्लोक 15.12: तात चिन्मात्ररूपोऽसि।
- श्लोक 15.14: यत्त्वं पश्यसि तत्रैकः।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। चिदाकाश स्वरूप का निरूपण।