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अध्याय 15 · मुक्त पुरुष की अवस्था
अष्टावक्र गीता, श्लोक 15.2
सत्यापित
मूल संस्कृत
मोक्षो विषयवैरस्यं बन्धो वैषयिको रसः । एतावदेव विज्ञानं यथेच्छसि तथा कुरु ॥ २ ॥
IAST लिप्यंतरण
mokṣo viṣayavairasyaṃ bandho vaiṣayiko rasaḥ |\netāvad eva vijñānaṃ yathecchasi tathā kuru || 2 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
मोक्षः, विषय-वैरस्यम्, बन्धः, वैषयिकः, रसः, एतावत्, एव, विज्ञानम्, यथा, इच्छसि, तथा, कुरु
- विषय-वैरस्यम्
- इंद्रियों के भोगों के प्रति विरक्ति और उदासीनता
- मोक्षः
- वास्तविक मोक्ष है
- वैषयिकः रसः
- और विषयों में आसक्ति (रस लेना)
- बन्धः
- बंधन है
- एतावत् एव विज्ञानम्
- बस इतना ही सम्पूर्ण ज्ञान (विज्ञान) है
- यथा इच्छसि तथा कुरु
- अब जैसा तुम उचित समझो, वैसा करो
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
विषयों से विरक्ति ही मोक्ष है और विषयों में रस लेना ही बंधन है; इतना ही सारा ज्ञान है, अब जैसी तुम्हारी इच्छा हो वैसा करो।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: अष्टावक्र मुनि मोक्ष और बंधन के समस्त शास्त्रार्थ को एक ही सूत्र में समेट देते हैं। जब तक चित्त में सांसारिक भोगों के प्रति राग और आकर्षण है, तब तक मनुष्य बँधा हुआ है। जब यह रस सूख जाता है, तब वह मुक्त है। यह स्पष्ट करके गुरु शिष्य को पूर्ण स्वतंत्रता देते हैं: ‘यथेच्छसि तथा कुरु’—अर्थात अब तुम स्वयं अपने जीवन के मार्ग का चयन करो।
सरल हिन्दी में समझें
यह श्लोक पूरे अध्यात्म का सबसे सीधा और पारदर्शी पैमाना देता है।
लोग सोचते हैं कि मोक्ष मरने के बाद मिलने वाला कोई स्वर्ग है। लेकिन अष्टावक्र कहते हैं कि मोक्ष इसी क्षण है—अगर सांसारिक चीज़ों की ललक और भूख आपके मन से हट गई, तो आप अभी मुक्त हैं।
और अगर आप चौबीसों घंटे भोगों, पद और प्रशंसा के पीछे भाग रहे हैं, तो आप बँधे हुए हैं। बात इतनी सीधी है; अब फैसला आपके अपने हाथ में है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. मोक्ष की मनोवैज्ञानिक और तत्त्वनिष्ठ परिभाषा: विषय-वैरस्य ही मुक्ति है। 2. वैषयिको रसः बंधन का मूल कारण है, बाह्य वस्तुएं नहीं बल्कि मन की आसक्ति। 3. एतावदेव विज्ञानम् घोषणा करता है कि इसके अतिरिक्त अन्य कोई रहस्यमय ज्ञान नहीं है। 4. यथेच्छसि तथा कुरु गुरु द्वारा शिष्य के विवेक और उत्तरदायित्व का पूर्ण सम्मान है। 5. गीता के 18.63 (यथेच्छसि तथा कुरु) के समान यह सर्वोच्च स्वतंत्रता का उद्घोष है। 6. यह बाह्य संन्यास के स्थान पर आंतरिक अनासक्ति को केंद्र में स्थापित करता है।
उदाहरण से समझें: जैसे पिंजरे का दरवाज़ा खुला होने पर भी यदि पक्षी अंदर रखे दाने के लोभ में बैठा रहे तो वह बद्ध है, और दाने का लोभ छोड़ते ही मुक्त हो जाता है, वैसे ही मन का रस ही बंधन है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
आधुनिक जीवन में जब कोई व्यक्ति सोशल मीडिया के निरंतर नोटिफिकेशन और लाइक्स के ‘रस’ का गुलाम बना रहता है, तो वह बंधा हुआ है; जब वह इससे मुक्त होकर शांति चुनता है, तो वह मोक्ष का अनुभव करता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: मुक्ति कहीं दूर नहीं है; सांसारिक आकर्षणों का मानसिक रस छोड़िए और इसी क्षण अपनी स्वतंत्रता को पाइए।
सामान्य गलतफहमी
वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। ‘यथेच्छसि तथा कुरु’ का अर्थ मनमाना, उच्छृंखल या अनैतिक आचरण करना नहीं है, बल्कि अपने विवेक से धर्मानुकूल जीवन जीना है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब भी किसी भोग या आदत की तीव्र ललक उठे, तो ठहरकर देखें कि यह रस मुझे बाँध रहा है और दो मिनट के लिए रुकें। (लगभग 2 मिनट)
आत्मचिंतन प्रश्न: मेरे जीवन में ऐसा कौन-सा वैषयिक रस है जिसके बिना मैं बेचैन हो जाता हूँ?
छोटा अभ्यास: भोजन या किसी प्रिय वस्तु के सामने आने पर पहले एक क्षण रुकें, मानसिक आसक्ति को अलग करें और शांत रहकर स्वीकार करें।
एक पंक्ति में सार: विषयों से विरक्ति ही मोक्ष है और विषयों में रस ही बंधन है; यही सारा ज्ञान है।
English
Translation: Liberation is distaste for sense-objects; bondage is relish for them. This alone is all wisdom; now do as you wish.
Simple explanation: Sage Ashtavakra distills all spirituality into an uncompromising truth: bondage is the psychological thirst for sensory indulgence, and freedom is dispassion. Empowered with this clarity, the seeker chooses freely.
विषय और संबंधित श्लोक
- मोक्ष
- बंधन
- विषयवैरस्य
- स्वाधीनता
- श्लोक 1.2: मुक्तिमिच्छसि चेत्तात।
- श्लोक 15.3: वाग्मिप्राज्ञामहोद्योगं।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अष्टावक्र गीता का अत्यंत प्रसिद्ध सूत्र।