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अध्याय 15 · मुक्त पुरुष की अवस्था
अष्टावक्र गीता, श्लोक 15.3
सत्यापित
मूल संस्कृत
वाग्मिप्राज्ञामहोद्योगं जनं मूकजडालसम् । करोति तत्त्वबोधोऽयमतस्त्यक्तो बुभुक्षुभिः ॥ ३ ॥
IAST लिप्यंतरण
vāgmiprājñamahodyogaṃ janaṃ mūkajaḍālasam |\nkaroti tattvabodho'yam atas tyakto bubhukṣubhiḥ || 3 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
वाग्मि-प्राज्ञ-महोद्योगम्, जनम्, मूक-जड-अलसम्, करोति, तत्त्व-बोधः, अयम्, अतः, त्यक्तः, बुभुक्षुभिः
- अयम् तत्त्व-बोधः
- यह आत्मतत्त्व का सच्चा ज्ञान
- वाग्मि-प्राज्ञ-महोद्योगम् जनम्
- वाचाल, चतुर और अत्यधिक भागदौड़ करने वाले मनुष्य को भी
- मूक-जड-अलसम् करोति
- मौन, स्थिर और बाह्य व्यर्थ चेष्टाओं से उपराम कर देता है
- अतः
- इसी कारण से
- बुभुक्षुभिः
- सांसारिक भोगों और प्रतिष्ठा की इच्छा रखने वालों द्वारा
- त्यक्तः
- यह ज्ञान छोड़ दिया जाता है (वे इससे दूर भागते हैं)
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
यह तत्त्वज्ञान वाचाल, चतुर और उद्योगी मनुष्य को भी मूक, जड़ और शांत बना देता है; इसलिए सांसारिक भोगियों द्वारा यह त्याग दिया जाता है।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: संसार में चतुरता, वाक्पटुता और लगातार कर्मों की भागदौड़ को सफलता माना जाता है। किंतु जब आत्मज्ञान होता है, तो व्यर्थ का बोलना बंद हो जाता है (मूक), मन की चंचलता अचल हो जाती है (जड़), और सकाम कर्मों की दौड़ रुक जाती है (अलस)। संसारी भोगी लोग इस अवस्था से डरते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उनका सांसारिक ऐश्वर्य और अहंकार समाप्त हो जाएगा। इसलिए वे इस ज्ञान से कतराते हैं।
सरल हिन्दी में समझें
इस श्लोक में अष्टावक्र एक गहरा व्यंग्य और सच्चाई प्रकट करते हैं।
दुनिया में उसी की तारीफ होती है जो बहुत बोलता है, बड़ी-बड़ी योजनाएं बनाता है और दिन-रात पागलों की तरह भागता है।
लेकिन जब किसी को जीवन का गहरा सच समझ आ जाता है, तो उसकी व्यर्थ की बातें रुक जाती हैं, उसका मन शांत हो जाता है और वह दिखावे की दौड़ से बाहर आ जाता है। संसारी लोग इसे "उदासी" या "आलस्य" समझकर डरते हैं, इसलिए वे आत्मज्ञान से दूर भागते हैं। वास्तव में यह आलस्य नहीं, परम शांति है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. सांसारिक सक्रियता और आत्मिक विश्रांति के विरोधाभास का सजीव चित्रण। 2. मूक-जड-अलसम् पद बाह्य दृष्टि से उपरामता का सूचक है, आंतरिक जड़ता का नहीं। 3. बुभुक्षुभिः त्यक्तः स्पष्ट करता है कि भोग की तृष्णा वाले व्यक्ति के लिए अद्वैत ज्ञान असहज होता है। 4. सच्चा ज्ञान मनुष्य को शांत और गंभीर बनाता है, प्रचारक या वाद-विवादी नहीं। 5. यह सामाजिक प्रतिष्ठा और आंतरिक शांति के बीच के संघर्ष को उद्घाटित करता है। 6. अनावश्यक महत्वाकांक्षाओं की व्यर्थता का बोध ही इस श्लोक का मूल स्वर है।
उदाहरण से समझें: जैसे बाजार का शोर केवल तभी तक अच्छा लगता है जब तक ग्राहक खरीदारी में व्यस्त हो; जिसे कुछ नहीं खरीदना, वह शोर छोड़कर शांत स्थान पर बैठ जाता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
कॉर्पोरेट की चूहा-दौड़ (rat race) में जब कोई व्यक्ति व्यर्थ की नेटवर्किंग और दिखावे को छोड़कर अपनी आंतरिक शांति में संतुष्ट रहने लगता है, तो दुनिया वाले उसे ‘धीमा’ समझने लगते हैं। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: दुनिया के शोर और अंधी दौड़ से बाहर आने में संकोच मत कीजिए; मौन और आंतरिक स्थिरता ही जीवन का वास्तविक शिखर है।
सामान्य गलतफहमी
तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘मूकजडालसम्’ का अर्थ वास्तव में अकर्मण्य, उत्तरदायित्वहीन या अवसादग्रस्त हो जाना नहीं है, बल्कि मानसिक व्यग्रता का शांत होना है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब भी दूसरों को प्रभावित करने के लिए बहुत बोलने या बहस करने का मन करे, तो मौन साधकर अपनी आंतरिक शांति का आनंद लें। (लगभग 5 मिनट)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं केवल समाज में सक्रिय और सफल दिखने के लिए ऐसी भागदौड़ कर रहा हूँ जो मेरे भीतर अशांति पैदा कर रही है?
छोटा अभ्यास: दो मिनट के लिए बोलना और भविष्य की योजना बनाना पूरी तरह बंद करें और अपने अचल, शांत केंद्र में विश्राम करें।
एक पंक्ति में सार: आत्मज्ञान वाचाल और चंचल मनुष्य को भी शांत कर देता है; इसीलिए संसारी भोगी इससे कतराते हैं।
English
Translation: This knowledge of truth makes an eloquent, clever, and energetic person silent, motionless, and still; hence it is avoided by those craving worldly enjoyment.
Simple explanation: Self-knowledge stills the frantic impulse to lecture, strategize, and conquer the external world. Because worldly minds equate restlessness with vitality, they shy away from the profound stillness of the Self.
विषय और संबंधित श्लोक
- उपराम
- मौन
- बुभुक्षा
- तत्त्वबोध
- श्लोक 12.1: ततो वाग्विस्तरासहः।
- श्लोक 15.4: न त्वं देहो न ते देहः।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। भोगियों द्वारा ज्ञान की उपेक्षा।