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अध्याय 15 · मुक्त पुरुष की अवस्था
अष्टावक्र गीता, श्लोक 15.6
सत्यापित
मूल संस्कृत
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । विज्ञाय निरहङ्कारो निर्ममस्त्वं सुखी भव ॥ ६ ॥
IAST लिप्यंतरण
sarvabhūteṣu cātmānaṃ sarvabhūtāni cātmani |\nvijñāya nirahaṅkāro nirmamas tvaṃ sukhī bhava || 6 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
सर्व-भूतेषु, च, आत्मानम्, सर्व-भूतानि, च, आत्मनि, विज्ञाय, निरहङ्कारः, निर्ममः, त्वम्, सुखी, भव
- सर्वभूतेषु आत्मानम्
- समस्त प्राणियों में अपनी ही आत्मा को
- सर्वभूतानि च आत्मनि
- और अपनी आत्मा में समस्त प्राणियों को
- विज्ञाय
- प्रत्यक्ष अनुभव करके
- निरहङ्कारः
- अहंकार से रहित
- निर्ममः
- ममत्व (मेरे-पन) से रहित होकर
- त्वम् सुखी भव
- तुम परमानंद में सुखी हो जाओ
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
समस्त प्राणियों में अपने आप को और अपने आप में समस्त प्राणियों को जानकर, अहंकार और ममत्व से रहित होकर तुम सुखी हो जाओ।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह उपनिषदों की सर्वोत्कृष्ट साधना है जिसे ईशावास्योपनिषद् ने भी प्रतिपादित किया है। जब साधक यह अनुभव करता है कि जो चेतना मुझमें है वही चींटी से लेकर ब्रह्मा तक सबमें विद्यमान है, तो दूसरों के प्रति परायापन, द्वेष और भय समाप्त हो जाता है। ‘मैं श्रेष्ठ हूँ’ का अहंकार और ‘यह मेरा है’ का ममत्व गल जाता है। इस अद्वैत दृष्टि से जीव अखंड सुखी हो जाता है।
सरल हिन्दी में समझें
यह श्लोक प्रेम और एकता का सर्वोच्च शिखर दिखाता है।
दुनिया के सारे झगड़े और तनाव इस एक सोच से पैदा होते हैं कि "मैं अलग हूँ और बाकी दुनिया अलग है।" हम अपनों से प्यार करते हैं और परायों से नफरत।
अष्टावक्र कहते हैं कि जिस दिन आप यह देख लेंगे कि सभी जीवों में वही एक जान, वही एक चेतना सांस ले रही है जो आपके भीतर है, उस दिन सारा अहंकार और स्वार्थ खत्म हो जाएगा। तब किसी से नफरत करना खुद से नफरत करने जैसा लगेगा, और आप सहज ही सुखी हो जाएंगे।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. ईशावास्योपनिषद् के प्रसिद्ध मंत्र (यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति) का अद्वैत भाष्य। 2. निरहंकार और निर्मम होना आत्मज्ञान का स्वाभाविक परिणाम है, कृत्रिम यत्न नहीं। 3. सर्वभूतेषु आत्मदर्शन ही करुणा, अहिंसा और प्रेम की सर्वोच्च दार्शनिक नींव है। 4. यह संकीर्ण व्यक्तिवादी चेतना को वैश्विक कॉस्मिक चेतना में विस्तारित करता है। 5. सुखी भव का आशीर्वाद दिखाता है कि अद्वैत दर्शन का अंतिम फल अखंड आनंद है। 6. भेद-दृष्टि ही भय का कारण है; अभेद-दृष्टि ही परम अभय और शांति है।
उदाहरण से समझें: जैसे शरीर का दायाँ हाथ कभी बाएँ हाथ को चोट नहीं पहुँचाता क्योंकि दोनों एक ही शरीर के अंग हैं, वैसे ही सबमें आत्मा को देखने वाला कभी किसी से द्रोह नहीं करता। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब आप किसी अनजान व्यक्ति की परेशानी देखकर उसे अपनी ही परेशानी समझकर बिना किसी स्वार्थ के सहायता करते हैं, तो आप इस श्लोक की एकता को जी रहे होते हैं। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: दूसरों में परायापन देखना छोड़िए; सबमें उसी एक चेतन आत्मा का दर्शन कीजिए और अहंकार-मुक्त होकर जिएँ।
सामान्य गलतफहमी
यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। ‘निर्ममस्त्वं’ का अर्थ परिवार या समाज के प्रति उपेक्षा या कठोरता नहीं है, बल्कि संकीर्ण स्वार्थ और स्वामित्व की भावना से मुक्ति है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज रास्ते में, दफ्तर में या घर में जिससे भी मिलें, एक पल के लिए अनुभव करें: "इनके भीतर भी वही एक चैतन्य ज्योति है जो मुझमें है।" (दिनभर)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अभी भी लोगों को जाति, पद या स्वार्थ के आधार पर ‘अपने’ और ‘पराए’ में बाँटकर देख रहा हूँ?
छोटा अभ्यास: दो मिनट शांत बैठकर पूरे संसार के सभी जीवों के लिए मंगल-कामना करें और अनुभव करें कि आप पूरे विश्व से जुड़े हुए हैं।
एक पंक्ति में सार: सब प्राणियों में आत्मा को और आत्मा में सबको जानकर, अहंकार और ममत्व त्यागकर सुखी हो जाओ।
English
Translation: Knowing the Self in all beings and all beings in the Self, free from egoism and mine-ness, be happy.
Simple explanation: Echoing the Isha Upanishad, Sage Ashtavakra directs Janaka to behold the single indivisible consciousness pulsing through all forms. Dropping the fictitious boundaries of "I" and "mine", boundless joy unfolds naturally.
विषय और संबंधित श्लोक
- एकात्मता
- निरहंकार
- निर्मम
- सर्वभूतहित
- श्लोक 15.5: निर्विकल्पोऽसि बोधात्मा।
- श्लोक 15.7: विश्वं स्फुरति यत्रेदं।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। सर्वभूत आत्मदर्शन।