दृश्य, गति और थीम की सेटिंग
अध्याय 15 · मुक्त पुरुष की अवस्था
अष्टावक्र गीता, श्लोक 15.7
सत्यापित
मूल संस्कृत
विश्वं स्फुरति यत्रेदं तरङ्गा इव सागरे । तत्त्वमेव न सन्देहश्चिन्मूर्ते विज्वरो भव ॥ ७ ॥
IAST लिप्यंतरण
viśvaṃ sphurati yatredaṃ taraṅgā iva sāgare |\ntat tvam eva na sandehaś cinmūrte vijvaro bhava || 7 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
विश्वम्, स्फुरति, यत्र, इदम्, तरङ्गाः, इव, सागरे, तत्, त्वम्, एव, न, सन्देहः, चिन्मूर्ते, विज्वरः, भव
- यत्र
- जिस आधार में
- इदम् विश्वम्
- यह संपूर्ण दृश्य जगत
- सागरे तरङ्गाः इव
- समुद्र में लहरों की भाँति
- स्फुरति
- प्रकट और विलीन होता है
- तत् त्वम् एव
- वह अधिष्ठान तत्त्व तुम ही हो
- न सन्देहः
- इसमें तनिक भी संशय नहीं है
- चिन्मूर्ते
- हे ज्ञानस्वरूप!
- विज्वरः भव
- तुम संताप और चिंताओं के ज्वर से मुक्त हो जाओ
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
जिसमें यह संपूर्ण विश्व समुद्र में तरंगों की तरह प्रकट होता है, वह तत्त्व तुम ही हो, इसमें कोई संशय नहीं; हे चिन्मय! संताप-रहित हो जाओ।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: गुरु अष्टावक्र समुद्र और तरंगों का प्रसिद्ध दृष्टांत देकर जनक के भ्रम को दूर करते हैं। समुद्र में हजारों लहरें उठती हैं, टकराती हैं और शांत हो जाती हैं, किंतु समुद्र वही रहता है। इसी प्रकार यह संपूर्ण ब्रह्मांड तुम्हारी ही चेतना में लहरों की तरह उठता और बैठता है। तुम वही असीम समुद्र हो। ‘चिन्मूर्ते विज्वरो भव’—हे ज्ञानमूर्त! तुम सांसारिक चिंताओं और दुखों के मानसिक ज्वर को त्यागकर शांत हो जाओ।
सरल हिन्दी में समझें
यह श्लोक आपके अंदर के विराट स्वरूप का दर्शन कराता है।
हम खुद को दुनिया का एक छोटा-सा, बेबस हिस्सा मानकर दिन-रात चिंताओं की आग (ज्वर) में जलते रहते हैं।
अष्टावक्र कहते हैं कि आप दुनिया के अंदर नहीं हैं, बल्कि यह पूरी दुनिया आपकी चेतना के अंदर एक लहर की तरह उठ रही है और मिट रही है। जैसे लहरों के आने-जाने से समुद्र नहीं सूखता, वैसे ही दुनिया की घटनाओं से आपकी आत्मा को कोई आंच नहीं आ सकती। इसलिए बेफिक्र होकर अपनी शांति में विश्राम कीजिए।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. समुद्र-तरंग दृष्टांत अद्वैत वेदान्त का विवर्तवाद सिद्ध करने वाला प्रमुख प्रमाण है। 2. विश्व चेतना का स्फुरण है, कोई स्वतंत्र या पृथक सत्ता नहीं। 3. चिन्मूर्ते का संबोधन साधक को उसकी चैतन्यमय अमरता का स्मरण कराता है। 4. विज्वरो भव गीता के 3.30 (विगतज्वरः) के समान समस्त मानसिक संतापों की निवृत्ति का आदेश है। 5. न सन्देहः गुरु की अपरोक्ष अनुभूति और अधिकार-युक्त वाणी की दृढ़ता है। 6. यह साधक की हीन-भावना (inferiority complex) को समूल नष्ट कर देता है।
उदाहरण से समझें: जैसे समुद्र में उठने वाला फेन और बुलबुले पानी से अलग कुछ नहीं होते, वैसे ही यह ब्रह्मांड चेतना से अलग कुछ नहीं है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जैसे सिनेमा हॉल में पर्दे पर तूफान, बाढ़ या युद्ध का दृश्य चलने पर भी सफेद पर्दा गीला या जला हुआ नहीं होता, वैसे ही विश्व के उतार-चढ़ाव से आपकी साक्षी चेतना अप्रभावित रहती है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: संसार की चिंताओं के ज्वर में मत जलिए; आप वह अनंत सागर हैं जिसमें यह पूरा जगत केवल एक शांत लहर है।
सामान्य गलतफहमी
यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘विज्वरो भव’ का अर्थ शारीरिक बुखार या बीमारी में दवा न लेना नहीं है, बल्कि मानसिक शोक और भय के संताप से मुक्त होना है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब भी किसी समस्या से भारी घबराहट या तनाव महसूस हो, तो कहें: "यह समस्या चेतना में एक छोटी लहर है, मैं असीम सागर हूँ।" (लगभग 2 मिनट)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं जीवन की छोटी-मोटी परिस्थितियों को इतना बड़ा मान रहा हूँ कि अपनी असीम आत्मा को भूल बैठा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट आँखें मूँदकर अनुभव करें कि आपकी चेतना एक शांत, अंतहीन महासागर है और सारे विचार केवल सतह की हल्की तरंगें हैं।
एक पंक्ति में सार: जिसमें यह विश्व सागर की तरंगों की तरह स्फुरित होता है, वह तत्त्व तुम ही हो; संताप-मुक्त हो जाओ।
English
Translation: That in which this universe shines forth like waves in the ocean, that very truth are you, without doubt. O embodiment of consciousness, be free of feverish anxiety.
Simple explanation: Using the classic ocean-wave metaphor, Sage Ashtavakra reveals that the entire cosmos is but a ripple upon the vast sea of pure awareness. Recognizing that you are this infinite sea, shed all feverish angst.
विषय और संबंधित श्लोक
- चिन्मूर्ति
- समुद्र-तरंग
- विज्वर
- अधिष्ठान
- श्लोक 7.1: मय्यनन्तमहाम्भोधौ।
- श्लोक 15.8: श्रद्धस्व तात श्रद्धस्व।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। समुद्र-तरंग दृष्टांत।