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अध्याय 17 · मुक्त आचरण
अष्टावक्र गीता, श्लोक 17.11
सत्यापित
मूल संस्कृत
सर्वत्र दृश्यते स्वस्थः सर्वत्र विमलाशयः । समस्तवासनामुक्तो मुक्तः सर्वत्र राजते ॥ ११ ॥
IAST लिप्यंतरण
sarvatra dṛśyate svasthaḥ sarvatra vimalāśayaḥ | samastavāsanāmukto muktaḥ sarvatra rājate || 11 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
सर्वत्र, दृश्यते, स्वस्थः, सर्वत्र, विमल-आशयः, समस्त-वासना-मुक्तः, मुक्तः, सर्वत्र, राजते
- मुक्तः
- वह मुक्त महापुरुष
- सर्वत्र स्वस्थः दृश्यते
- हर स्थान और हर परिस्थिति में अपने स्वरूप में स्थित (स्वस्थ) दिखाई देता है
- सर्वत्र विमल-आशयः
- उसका अंतःकरण सब जगह अत्यंत निर्मल और निष्कलंक रहता है
- समस्त-वासना-मुक्तः
- समस्त वासनाओं से सर्वथा मुक्त होकर
- सर्वत्र राजते
- वह सब जगह शोभायमान और प्रकाशित रहता है
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
वह मुक्त पुरुष हर परिस्थिति में आत्म-स्थित (स्वस्थ) दिखाई देता है, उसका चित्त सर्वत्र निर्मल रहता है; सब वासनाओं से छूटकर वह सर्वत्र सुशोभित होता है।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: मुक्त पुरुष की महिमा किसी विशेष स्थान या वेशभूषा पर निर्भर नहीं करती। वह चाहे राजसिंहासन पर बैठा हो या धूल में, एकांत वन में हो या भीड़ भरे नगर में—वह हर जगह ‘स्वस्थ’ (स्वयं अपने आत्मा में स्थित) रहता है। उसके अंतःकरण में न किसी के प्रति ईर्ष्या है, न द्वेष, न काम। समस्त वासनाओं की आग बुझ जाने के कारण उसका जीवन स्वतः एक शांत ज्योति की तरह हर जगह प्रकाशित और शोभायमान रहता है।
सरल हिन्दी में समझें
सच्चा ज्ञानी किसी खास जगह का मोहताज नहीं होता।
वह चाहे किसी शांत मंदिर में हो या शोरगुल भरे बाज़ार में, वह हर जगह एक जैसा शांत और स्थिर रहता है। उसका मन बिल्कुल साफ आईने की तरह होता है जिसमें कोई मैल या दाग नहीं होता।
क्योंकि उसके अंदर किसी चीज़ को पाने की कोई वासना या भूख नहीं बची होती, इसलिए वह जहाँ भी जाता है, अपनी स्वाभाविक शांति और सरलता से सबको प्रभावित करता है। वह बिना किसी दिखावे के हर जगह चमकता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. स्वस्थः का गूढ़ दार्शनिक अर्थ है: ‘स्वरूपे तिष्ठति’—सदा अपने आत्म-स्वरूप में प्रतिष्ठित। 2. विमलाशयः अंतःकरण की उस पूर्ण शुद्धि को दर्शाता है जहाँ राग-द्वेष का कोई लेश नहीं बचा। 3. समस्तवासनामुक्तः ही वास्तविक जीवनमुक्ति की अनिवार्य शर्त है। 4. राजते शब्द सिद्ध करता है कि आत्मज्ञानी की दिव्यता बिना किसी बाह्य प्रयास के स्वतः प्रकाशित होती है। 5. यह परिस्थिति-निरपेक्ष शांति का प्रतिपादन करता है; स्थान बदलने से नहीं, मन बदलने से शांति मिलती है। 6. साधक को बाहरी आडंबरों के बजाय अंतःकरण की निर्मलता पर ध्यान देने की प्रेरणा मिलती है।
उदाहरण से समझें: जैसे सूरज चाहे महल पर चमके या झोपड़ी पर, उसका प्रकाश कभी मैला नहीं होता; वैसे ही ज्ञानी चाहे किसी भी परिस्थिति में हो, उसकी आंतरिक शांति कभी मलिन नहीं होती। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब कोई व्यक्ति बहुत कठिन और तनावपूर्ण माहौल में भी अपनी गरिमा, मुस्कान और शांति बनाए रखता है, तो वह इसी आत्म-स्थिति का उदाहरण प्रस्तुत करता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: शांति ढूँढने के लिए जगह मत बदलिए; अपने मन को वासनाओं से खाली करके जहाँ हैं वहीं अपने स्वरूप में टिकिए।
सामान्य गलतफहमी
आत्मा के शरीर तक सीमित न होने की पहचान का अर्थ स्वास्थ्य, सुरक्षा, विश्राम या आवश्यक उपचार की उपेक्षा को उचित ठहराना नहीं है। तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। ‘सर्वत्र दृश्यते स्वस्थः’ का अर्थ शारीरिक बीमारी में डॉक्टर की सलाह न लेना नहीं है; यह मानसिक और आत्मिक स्वास्थ्य की बात है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब भी किसी भीड़-भाड़ या शोरगुल वाली जगह पर जाना पड़े, तो मन में दोहराएँ: "शोर बाहर है, मेरे भीतर अखंड शांति है।" (भीड़ के समय)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मेरी शांति केवल शांत कमरे में टिकती है, या मैं चुनौतियों के बीच भी अपने स्वरूप में टिक सकता हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट आँखें मूँदकर अपने अंतःकरण को एक स्वच्छ, निर्मल और पारदर्शी दर्पण की तरह महसूस करें।
एक पंक्ति में सार: मुक्त पुरुष हर जगह आत्म-स्थित और निर्मल चित्त रहता है; समस्त वासनाओं से मुक्त होकर वह सर्वत्र सुशोभित होता है।
English
Translation: Everywhere he appears centered in himself, everywhere pure of heart. Liberated from all latent desires, the free soul shines resplendent everywhere.
Simple explanation: Independent of external circumstances, the sage remains settled in his true nature (svastha). Having dissolved all latent tendencies (vāsanās), his transparent heart radiates peace whether in solitude or amid the bustling world.
विषय और संबंधित श्लोक
- सर्वत्र-स्वस्थ
- विमलाशय
- वासना-मुक्ति
- आत्म-दीप्ति
- श्लोक 17.10: अहो परदशा क्वापि।
- श्लोक 17.12: पश्यञ्छृण्वन्स्पृशन्।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। सत्रहवें प्रकरण का ग्यारहवाँ श्लोक।