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प्रकरण 17: सत्रहवाँ प्रकरणश्लोक १०/२०50%

अध्याय 17 · मुक्त आचरण

अष्टावक्र गीता, श्लोक 17.10

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

न जागर्ति न निद्राति नोन्मीलति न मीलति । अहो परदशा क्वापि वर्तते मुक्तचेतसः ॥ १० ॥

IAST लिप्यंतरण

na jāgarti na nidrāti nonmīlati na mīlati | aho paradaśā kvāpi vartate muktacetasaḥ || 10 ||

सरल उच्चारण: na jaagarti na nidraati nonmeelati na meelati aho paradashaa kvaapi vartate muktachetasah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

न, जागर्ति, न, निद्राति, न, उन्मीलति, न, मीलति, अहो, पर-दशा, क्वापि, वर्तते, मुक्त-चेतसः

मुक्त-चेतसः
मुक्त चित्त वाले महापुरुष की
अहो
अहो! आश्चर्य है कि
क्वापि पर-दशा वर्तते
कोई एक अनिर्वचनीय, अलौकिक परम दशा होती है!
न जागर्ति
वह न तो संसारी अज्ञानियों की तरह जागता है
न निद्राति
न वह अज्ञान की नींद में सोता है
न उन्मीलति न मीलति
और न वह आँखें खोलता है न मूँदता है (वह तुरीय में रहता है)

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

मुक्त चित्त वाले पुरुष की कोई अलौकिक परम अवस्था होती है! वह न जागता है, न सोता है, न आँखें खोलता है और न मूँदता है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह श्लोक जीवनमुक्त की तुरीयावस्था (पर-दशा) का विस्मयकारी चित्रण करता है। साधारण मनुष्य या तो जागता है या सोता है; जागने में वह संसार के भ्रम में भटकता है और सोने में अज्ञान के अंधेरे में चला जाता है। किंतु ज्ञानी की चेतना इन दोनों से परे है। वह संसार में रहते हुए भी उसके भ्रम में नहीं जागता, और निद्रा में भी उसकी साक्षी चेतना नहीं सोती। वह आँखें खोलकर भी केवल आत्मा को देखता है और आँखें बंद करके भी उसी में रहता है। यह अवस्था वाणी से परे है।

सरल हिन्दी में समझें

इस श्लोक में अष्टावक्र एक बहुत हैरान कर देने वाली बात कहते हैं कि मुक्त व्यक्ति की अवस्था को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।

हम लोग जब जागते हैं, तो चिंताओं और दुनिया की भागदौड़ में उलझे रहते हैं; और जब सोते हैं, तो बेहोश हो जाते हैं।

लेकिन ज्ञानी व्यक्ति इन दोनों अवस्थाओं से परे एक तीसरी ही दुनिया में रहता है। वह दुनिया के बीच जागते हुए भी अंदर से बिल्कुल शांत रहता है, और सोते समय भी उसकी आत्मा का दीया जलता रहता है। वह आँखें खोले या बंद रखे, वह हमेशा अपने सच्चे स्वरूप में टिका रहता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. परदशा माण्डूक्योपनिषद् की चतुर्थ (तुरीय) अवस्था है जो तीनों अवस्थाओं का साक्षी है। 2. जागृति और सुषुप्ति दोनों अविद्या के कार्य हैं—एक में विक्षेप, दूसरे में आवरण। 3. ज्ञानी की चेतना में न विक्षेप का प्रमाद है और न आवरण का अंधकार। 4. गीता के २.६९ ‘या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी’ का यह साक्षात अनुभव है। 5. अहो पद ज्ञानी की इस दिव्य स्थिति के प्रति अष्टावक्र के विस्मय और आदर को प्रकट करता है। 6. यह साधक को जाग्रत और स्वप्न के द्वंद्व से ऊपर उठकर नित्य साक्षी में टिकने का निर्देश देता है।

उदाहरण से समझें: जैसे अंतरिक्ष में न दिन होता है न रात, वहाँ केवल नित्य प्रकाश होता है; वैसे ही ज्ञानी की चेतना में जागने और सोने का कोई भेद नहीं बचता। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब कोई संगीतकार अपने संगीत में या कोई वैज्ञानिक अपनी खोज में ऐसा लीन हो जाता है कि उसे भूख, प्यास या समय का कोई होश नहीं रहता, तो यह उसी एकाग्रता का एक छोटा-सा रूप है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: दुनिया की चिंताओं में जागना बंद कीजिए और अज्ञान की नींद से बाहर आइए; अपने नित्य जाग्रत साक्षी स्वरूप को पहचानिए।

सामान्य गलतफहमी

आत्मा के शरीर तक सीमित न होने की पहचान का अर्थ स्वास्थ्य, सुरक्षा, विश्राम या आवश्यक उपचार की उपेक्षा को उचित ठहराना नहीं है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘न जागर्ति न निद्राति’ का अर्थ शारीरिक नींद और विश्राम का त्याग करना नहीं है; शरीर के स्वास्थ्य के लिए उचित नींद अनिवार्य है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज रात सोने से पहले बिस्तर पर लेटकर 2 मिनट अनुभव करें कि आप शरीर और नींद दोनों को देखने वाले साक्षी हैं। (सोते समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं दिनभर दुनिया के भ्रम में जागकर अपनी ऊर्जा नष्ट कर रहा हूँ, या अपने भीतर भी सजग हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट आँखें मूँदकर विचार करें: "शरीर सोता और जागता है, मन विचार करता है; मैं वह प्रकाश हूँ जो कभी नहीं सोता।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: मुक्त चित्त वाले की अनिर्वचनीय परम दशा होती है; वह न जागता है, न सोता है, न आँखें खोलता है और न मूँदता है।

English

Translation: Neither does he wake nor sleep, neither opens his eyes nor shuts them. Oh, wondrous is that supreme state belonging to the one whose mind is utterly free!

Simple explanation: Beyond the waking state of projection and the sleeping state of darkness lies the unconditioned realm of the Fourth (turīya). The liberated mind rests in this transcendent poise, defying all conventional categories of activity and repose.

विषय और संबंधित श्लोक

  • पर-दशा
  • तुरीय-चेतना
  • जाग्रत-सुषुप्त-पार
  • मुक्त-चित्त
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 17.9: विकलानीन्द्रियाणि च।
  • श्लोक 17.11: सर्वत्र दृश्यते स्वस्थः।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 247–248 (PDF पृ. 254–255)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। सत्रहवें प्रकरण का दसवाँ श्लोक।