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अध्याय 17 · मुक्त आचरण
अष्टावक्र गीता, श्लोक 17.18
सत्यापित
मूल संस्कृत
समाधानासमाधानहिताहितविकल्पनाः । शून्यचित्तो न जानाति कैवल्यमिव संस्थितः ॥ १८ ॥
IAST लिप्यंतरण
samādhānāsamādhānahitāhitavikalpanāḥ | śūnyacitto na jānāti kaivalyam iva saṃsthitaḥ || 18 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
समाधान-असमाधान-हित-अहित-विकल्पनाः, शून्य-चित्तः, न, जानाति, कैवल्यम्, इव, संस्थितः
- कैवल्यम् इव संस्थितः
- कैवल्य (अद्वितीय आत्म-स्वरूप) में भली-भाँति प्रतिष्ठित होकर
- शून्य-चित्तः
- समस्त वासनाओं और विकल्पों से शून्य चित्त वाला ज्ञानी
- समाधान-असमाधान-हित-अहित-विकल्पनाः
- चित्त की एकाग्रता-विक्षेप और अपने भले-बुरे के मानसिक विकल्पों को
- न जानाति
- तनिक भी नहीं जानता (वह इन सबसे पार हो चुका है)
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
कैवल्य में स्थित होकर शून्य-चित्त पुरुष समाधि और विक्षेप, तथा हित और अहित के मानसिक विकल्पों को तनिक भी नहीं जानता।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह श्लोक कैवल्य (मोक्ष) की चरम विश्रांति को दर्शाता है। साधक जब तक अभ्यास की अवस्था में रहता है, तब तक वह इस चिंता में रहता है कि "मेरा ध्यान लगा या नहीं लगा (समाधान-असमाधान), और क्या मेरे लिए फायदेमंद है या नुकसानदेह (हिताहित)।" किंतु जब वह अपने अद्वितीय कैवल्य स्वरूप को जान लेता है, तब उसका चित्त समस्त विकल्पों से शून्य हो जाता है। उसे अब ध्यान लगाने का भी कोई प्रयास नहीं करना पड़ता, क्योंकि वह स्वयं समाधि-स्वरूप बन चुका है।
सरल हिन्दी में समझें
अक्सर ध्यान लगाने वाले लोग इस बात से बहुत परेशान रहते हैं कि "आज मेरा ध्यान ठीक से नहीं लगा" या "मेरा मन भटक गया।"
लेकिन जो व्यक्ति सचमुच मुक्त हो चुका है, उसके लिए ध्यान लगाना या न लगाना कोई मुद्दा ही नहीं रह जाता। उसका मन इतना शांत और खाली (शून्य) हो चुका होता है कि उसमें कोई विकल्प या उलझन उठती ही नहीं।
वह यह भी सोचना बंद कर देता है कि क्या उसके भले के लिए है और क्या बुरे के लिए। वह अपनी आत्मा में ऐसा लीन हो जाता है कि सारे मानसिक हिसाब-किताब पीछे छूट जाते हैं।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. कैवल्यम् अद्वैत वेदांत और सांख्य का वह परम पद है जहाँ केवल शुद्ध पुरुष/चेतना ही शेष रहती है। 2. समाधान (समाधि) और असमाधान (विक्षेप) मन की अवस्थाएं हैं; आत्मा इन दोनों का साक्षी है। 3. शून्यचित्तः का अर्थ बौद्ध शून्यता या अज्ञान नहीं, बल्कि चित्त का समस्त विकल्पों से उपराम हो जाना है। 4. हिताहित की चिंता तब तक रहती है जब तक व्यक्ति स्वयं को एक परिमित देह मानता है। 5. यह साधक को साधना के अंतिम तनाव (spiritual stress) से मुक्त करने वाला सर्वोच्च सूत्र है। 6. सिद्ध पुरुष साधना की विधि को पार करके साक्षात सिद्धावस्था में विश्राम करता है।
उदाहरण से समझें: जैसे नदी जब महासागर में मिल जाती है, तो वह यह नहीं सोचती कि उसका पानी मीठा है या खारा; वैसे ही कैवल्य में स्थित मन सारे विकल्पों को भूल जाता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब आप अपने घर सुरक्षित पहुँच जाते हैं, तो आप रास्ते के गड्ढों या नक्शे की चिंता करना बंद कर देते हैं; ज्ञानी भी अपने आत्म-घर में पहुँचकर सारे साधनों की चिंता छोड़ देता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: साधना के नफा-नुकसान का हिसाब छोड़ दीजिए; अपने शुद्ध आत्मस्वरूप में विश्राम पाकर सारे विकल्पों को विदा कर दें।
सामान्य गलतफहमी
वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘हिताहितविकल्पनाः न जानाति’ का अर्थ अपने स्वास्थ्य या सुरक्षा की उपेक्षा करना नहीं है; यह मानसिक चिंताओं से मुक्ति की बात है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज ध्यान में बैठते समय यह परवाह मत करें कि मन एकाग्र हुआ या नहीं; केवल जो है उसे चुपचाप देखते रहें। (ध्यान के समय)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं ध्यान लगाने को भी एक नई परफॉर्मेंस और तनाव का कारण बना रहा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर मन को पूरी तरह खाली छोड़ दें: न कोई विचार पकड़ें, न कोई मंत्र जपें; केवल मौन में विश्राम करें।
एक पंक्ति में सार: कैवल्य में स्थित शून्य-चित्त पुरुष समाधि-विक्षेप और भले-बुरे के सारे मानसिक विकल्पों से परे हो जाता है।
English
Translation: Abiding as it were in absolute aloneness, with a mind emptied of constructs, he knows nothing of concentration or distraction, nor of benefit or harm.
Simple explanation: Firmly anchored in supreme solitude (kaivalya), the sage transcends the very concepts of meditative absorption and mental distraction. With an intellect emptied of dualistic calculations, he rests in unconditioned presence.
विषय और संबंधित श्लोक
- कैवल्य-स्थिति
- शून्य-चित्त
- समाधान-पार
- विकल्प-मुक्ति
- श्लोक 17.17: प्राप्ताप्राप्तमुपाश्नुते।
- श्लोक 17.19: निर्ममो निरहङ्कारो।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। सत्रहवें प्रकरण का अठारहवाँ श्लोक।