दृश्य, गति और थीम की सेटिंग
अध्याय 17 · मुक्त आचरण
अष्टावक्र गीता, श्लोक 17.19
सत्यापित
मूल संस्कृत
निर्ममो निरहङ्कारो न किञ्चिदिति निश्चितः । अन्तर्गलितसर्वाशः कुर्वन्नपि करोति न ॥ १९ ॥
IAST लिप्यंतरण
nirmamo nirahaṅkāro na kiñcid iti niścitaḥ | antargalitasarvāśaḥ kurvann api karoti na || 19 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
निर्ममः, निरहङ्कारः, न, किञ्चित्, इति, निश्चितः, अन्तर्-गलित-सर्व-आशः, कुर्वन्, अपि, करोति, न
- निर्ममः निरहङ्कारः
- जो ममता (मेरापन) और अहंकार (मैं-भाव) से सर्वथा रहित है
- न किञ्चित् इति निश्चितः
- जिसका यह दृढ़ निश्चय है कि 'संसार में कुछ भी स्वतंत्र सत्य नहीं है'
- अन्तर्-गलित-सर्व-आशः
- जिसके भीतर की समस्त आशाएं और तृष्णाएं पूरी तरह विगलित हो चुकी हैं
- कुर्वन् अपि न करोति
- वह बाहर से सब काम करते हुए भी वास्तव में कुछ नहीं करता
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
ममतारहित, अहंकाररहित, ‘संसार कुछ भी नहीं है’—इस निश्चय वाला और भीतर से आशारहित पुरुष सब कुछ करते हुए भी कुछ नहीं करता।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह श्लोक अद्वैत कर्म-योग का परम रहस्य प्रकट करता है। कर्म बंधन तब बनता है जब उसके पीछे ‘मैं करता हूँ’ का अहंकार और ‘यह मेरा है’ की ममता जुड़ी होती है। जब साधक का यह निश्चय हो जाता है कि संसार केवल एक कल्पित दृश्य है और उसके अंदर की सारी आशाएं समाप्त हो जाती हैं, तब वह राजा के रूप में युद्ध लड़े या भिक्षुक के रूप में भिक्षा माँगे—वह वास्तव में कुछ नहीं करता। क्योंकि उसकी आत्मा सदा अकर्ता और निर्लेप रहती है।
सरल हिन्दी में समझें
हम अक्सर सोचते हैं कि काम करने से बंधन होता है, इसलिए काम छोड़ देना चाहिए।
लेकिन अष्टावक्र कहते हैं कि काम करने से कोई बंधन नहीं होता; बंधन इस बात से होता है कि आप सोचते हैं "यह मैंने किया और इसका फल मुझे मिलना चाहिए।"
जिस व्यक्ति के अंदर से "मैं" (अहंकार) और "मेरा" (ममता) खत्म हो जाता है, वह दिनभर सारे काम करते हुए भी अंदर से बिल्कुल खाली और अछूता रहता है। वह दुनिया के सारे काम करता है, लेकिन उन कामों का कोई बोझ उसके सिर पर नहीं चढ़ता।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. निर्ममो निरहङ्कारः गीता के २.७१ और १२.१३ के समान जीवनमुक्ति का अनिवार्य लक्षण है। 2. न किञ्चिदिति निश्चितः संसार के मिथ्यात्व और अधिष्ठान की सत्यता का दृढ़ अपरोक्ष ज्ञान है। 3. अन्तर्गलितसर्वाशः भीतर की उस पूर्ण निष्कामता को दर्शाता है जहाँ कोई वासना शेष नहीं। 4. कुर्वन्नपि करोति न गीता के ४.२० ‘कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः’ का अद्वैत साक्षात्कार है। 5. कर्तृत्व देह और बुद्धि का धर्म है, आत्मा का नहीं; इस भेद की अनुभूति ही अकर्मण्यता की पराकाष्ठा है। 6. यह साधक को कर्म-संन्यास के स्थान पर कर्तृत्व-संन्यास की ओर ले जाता है।
उदाहरण से समझें: जैसे पेड़ की छाया ज़मीन पर चलती हुई दिखाई देती है लेकिन ज़मीन पर कोई निशान नहीं छोड़ती, वैसे ही ज्ञानी के शरीर द्वारा किए गए कर्म उसकी आत्मा पर कोई लेप नहीं लगाते। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब कोई अभिनेता नाटक के मंच पर राजा का किरदार पूरी गंभीरता से निभाता है लेकिन अंदर से जानता है कि वह राजा नहीं है, तो वह सब करते हुए भी अकर्ता रहता है; यही जीवन का सच्चा आचरण है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: अपने काम पूरी ईमानदारी से कीजिए, लेकिन ‘यह मैंने किया’ का घमंड छोड़ दीजिए; अकर्ता होकर जीने में ही सच्चा सुख है।
सामान्य गलतफहमी
सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। ‘कुर्वन्नपि करोति न’ का अर्थ अनैतिक कार्यों को करके अपनी ज़िम्मेदारी से बचना नहीं है; यह अहंकार-मुक्त कर्तव्य-पालन की आध्यात्मिक दृष्टि है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज कोई भी अच्छा काम पूरा होने पर मन में कहें: "यह प्रकृति और ईश्वर की कृपा से हुआ, मैंने कुछ नहीं किया।" (काम पूरा होने पर)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपने किए गए कामों का श्रेय लेने और उनका ढिंढोरा पीटने के लिए बेचैन रहता हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "हाथ-पैर और मन काम कर रहे हैं, मैं केवल वह अचल साक्षी हूँ जो कभी कुछ नहीं करता।"
एक पंक्ति में सार: ममतारहित, अहंकाररहित और आशारहित ज्ञानी पुरुष बाहर से सब कुछ करते हुए भी वास्तव में कुछ नहीं करता।
English
Translation: Free from possessiveness, devoid of ego, certain that "nothing truly exists," with all cravings dissolved within, he does nothing even while acting.
Simple explanation: Void of the notions of "I" and "mine," convinced of the unreality of phenomena, and stripped of inner craving, the sage is utterly detached. Even while actively functioning in the empirical world, he remains the non-acting, untainted witness.
विषय और संबंधित श्लोक
- निर्मम-निरहंकार
- कुर्वन्नपि-अकर्ता
- गलित-सर्वाश
- अद्वैत-कर्मरहस्य
- श्लोक 17.18: कैवल्यमिव संस्थितः।
- श्लोक 17.20: दशां कामपि सम्प्राप्तो।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। सत्रहवें प्रकरण का उन्नीसवाँ श्लोक।