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प्रकरण 17: सत्रहवाँ प्रकरणश्लोक ९/२०45%

अध्याय 17 · मुक्त आचरण

अष्टावक्र गीता, श्लोक 17.9

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

शून्या दृष्टिर्वृथा चेष्टा विकलानीन्द्रियाणि च । न स्पृहा न विरक्तिर्वा क्षीणसंसारसागरे ॥ ९ ॥

IAST लिप्यंतरण

śūnyā dṛṣṭir vṛthā ceṣṭā vikalānīndriyāṇi ca | na spṛhā na viraktir vā kṣīṇasaṃsārasāgare || 9 ||

सरल उच्चारण: shoonyaa drishtir vrithaa cheshtaa vikalaaneendriyaani cha na sprihaa na viraktir vaa ksheenasamsaarasaagare (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

शून्या, दृष्टिः, वृथा, चेष्टा, विकलानि, इन्द्रियाणि, च, न, स्पृहा, न, विरक्तिः, वा, क्षीण-संसार-सागरे

क्षीण-संसार-सागरे
जिसके लिए संसार रूपी सागर सर्वथा सूख चुका है, उस ज्ञानी की
दृष्टिः शून्या
दृष्टि किसी स्वार्थ या वासना से रहित (शून्य) होती है
चेष्टा वृथा
शारीरिक चेष्टाएं बिना किसी कर्तापन के निष्प्रयोजन होती हैं
इन्द्रियाणि विकलानि च
और इंद्रियाँ सांसारिक विषयों की पकड़ से मुक्त हो चुकी होती हैं
न स्पृहा न विरक्तिः वा
न उसके अंदर किसी वस्तु की चाह है और न किसी से कोई द्वेष या विरक्ति

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

जिसके लिए संसार-सागर सूख चुका है, उसकी दृष्टि वासना-शून्य होती है, चेष्टाएं निष्प्रयोजन होती हैं, इंद्रियाँ शिथिल हो जाती हैं; न उसमें चाह होती है न विरक्ति।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: जब साधक को यह साक्षात हो जाता है कि संसार का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, तब उसकी आँखें देखती तो हैं लेकिन उनमें किसी वस्तु को भोगने की वासना (दृष्टिः शून्या) नहीं होती। उसके हाथ-पैर हिलते हैं लेकिन उनमें कोई सकाम संकल्प (वृथा चेष्टा) नहीं होता। उसकी इंद्रियाँ विषयों को पकड़ने की ताकत खो देती हैं (विकलानीन्द्रियाणि)। वह न तो किसी चीज़ को पाने की चाह रखता है और न किसी चीज़ से भागने का पाखंड करता है। वह पूर्णतः शांत हो जाता है।

सरल हिन्दी में समझें

ज्ञानी व्यक्ति की आँखों में किसी चीज़ को छीनने या पाने की भूख नहीं होती।

वह दुनिया को देखता तो है, लेकिन उसकी नज़र में कोई स्वार्थ या छल नहीं होता। उसके हाथ-पाँव काम करते हैं, लेकिन वह किसी लालच या अहंकार के लिए भागदौड़ नहीं करता।

उसकी इंद्रियाँ शांत हो चुकी होती हैं। न तो वह किसी चीज़ के पीछे भागता है और न किसी चीज़ से नफरत करके जंगल भागता है। उसके लिए दुनिया की सारी उथल-पुथल शांत हो चुकी होती है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. शून्या दृष्टिः का अर्थ अंधापन नहीं, अपितु वासना-रहित शुद्ध अवधान (pure awareness) है। 2. वृथा चेष्टा निष्कामता और अक्रियता का प्रतीक है जहाँ कर्म फल की इच्छा से नहीं होता। 3. क्षीणसंसारसागरः अविद्या और वासना के पूर्ण क्षय को दर्शाता है। 4. न स्पृहा न विरक्तिः साधक को राग और द्वेष दोनों के बंधनों से ऊपर उठाती है। 5. यह योगवासिष्ठ के तुरीयातीत महापुरुष के लक्षणों से पूर्णतः मेल खाता है। 6. साधक को समझ आता है कि संसार बाहर नहीं, मन की वासनाओं में था जो अब शांत हो चुकी हैं।

उदाहरण से समझें: जैसे किसी रेगिस्तान में मृगतृष्णा (मरीचिका) का सच जान लेने के बाद कोई पानी पीने के लिए नहीं दौड़ता, वैसे ही ज्ञानी संसार के मिथ्यात्व को जानकर शांत हो जाता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब आप किसी जादूगर के खेल का सारा भेद पहले से जानते हों, तो आप खेल को देखते तो हैं लेकिन आश्चर्यचकित या बेचैन नहीं होते; ज्ञानी इसी शांत दृष्टि से जगत को देखता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: अपनी दृष्टि से स्वार्थ और लालच का चश्मा उतार दीजिए; जब चाहत खत्म होगी, तो सारी भागदौड़ अपने आप शांत हो जाएगी।

सामान्य गलतफहमी

तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। आत्मा के शरीर तक सीमित न होने की पहचान का अर्थ स्वास्थ्य, सुरक्षा, विश्राम या आवश्यक उपचार की उपेक्षा को उचित ठहराना नहीं है। ‘शून्या दृष्टिर्वृथा चेष्टा’ का अर्थ मंदबुद्धि या शारीरिक रूप से लाचार हो जाना नहीं है; यह केवल मानसिक वासनाओं की शांति है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज किसी सुंदर या महंगी वस्तु को देखते समय मन में कहें: "यह केवल एक दृश्य है, मुझे इसे पाने की कोई चाहत नहीं है।" (दुकान या बाज़ार में)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मेरी आँखों में अभी भी चीज़ों को देखकर उन्हें पाने की तीव्र लालसा उठती है?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट आँखें खोलकर किसी एक बिंदु को बिना किसी विचार या निर्णय के देखें। दृष्टि को शून्य और शांत रखें।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: संसार-सागर सूखने पर ज्ञानी की दृष्टि वासना-शून्य और चेष्टाएं निष्प्रयोजन हो जाती हैं; न उसमें चाह रहती है न विरक्ति।

English

Translation: His gaze is vacant, his movements purposeless, his senses muted; for him who has dried up the ocean of worldly existence, there is neither craving nor aversion.

Simple explanation: For the sage in whom the ocean of saṃsāra has evaporated, perception is purged of selfish calculation. His gaze holds no possessive hunger, his actions carry no egoic motive, and his heart harbors neither attachment nor aversion.

विषय और संबंधित श्लोक

  • शून्य-दृष्टि
  • निष्प्रयोजन-चेष्टा
  • संसार-क्षय
  • वीतराग-अवस्था
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 17.8: पश्यञ्छृण्वन्स्पृशन्।
  • श्लोक 17.10: न जागर्ति न निद्राति।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 246–247 (PDF पृ. 253–254)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। सत्रहवें प्रकरण का नवाँ श्लोक।