दृश्य, गति और थीम की सेटिंग
अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.30
सत्यापित
मूल संस्कृत
नोद्विग्नं न च सन्तुष्टमकर्तृ स्पन्दवर्जितम् । निराशं गतसन्देहं चित्तं मुक्तस्य राजते ॥ ३० ॥
IAST लिप्यंतरण
nodvignaṃ na ca santuṣṭam akartṛ spandavarjitam | nirāśaṃ gatasandehaṃ cittaṃ muktasya rājate || 30 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
न, उद्विग्नम्, न, च, सन्तुष्टम्, अकर्तृ, स्पन्द-वर्जितम्, निराशम्, गत-सन्देहम्, चित्तम्, मुक्तस्य, राजते
- न उद्विग्नम् न च सन्तुष्टम्
- न किसी दुख से उद्विग्न और न विषय-सुख से संतुष्ट
- अकर्तृ स्पन्द-वर्जितम्
- कर्तापन से रहित और चंचलता (कम्पन) से शून्य
- निराशम् गत-सन्देहम्
- आशा-तृष्णा से मुक्त और समस्त संशयों से परे
- मुक्तस्य चित्तम् राजते
- जीवनमुक्त का अंतःकरण इस प्रकार प्रकाशमान शोभा पाता है
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
न उद्विग्न, न सांसारिक सुखों से संतुष्ट, अकर्ता, चंचलता से रहित, आशा-तृष्णा से मुक्त और संशयरहित—ऐसा मुक्त पुरुष का चित्त परम प्रकाशमान होकर शोभा पाता है।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह श्लोक मुक्त पुरुष के अंतःकरण की पूर्ण शांत और पवित्र अवस्था का चित्र खींचता है। संसारी मन में हमेशा दो लहरें उठती हैं: दुख में उद्वेग और सुख में संतोष (हर्ष)। किंतु ज्ञानी का मन इन दोनों लहरों के शांत हो जाने पर शांत महासागर की तरह अचल (स्पन्दवर्जितम्) हो जाता है। उसमें न कोई भविष्य की आशा है और न कोई संशय। ऐसा चित्त ही परमात्मा का सच्चा मंदिर बनकर सुशोभित होता है।
सरल हिन्दी में समझें
एक शांत झील की कल्पना करें जहाँ कोई हवा नहीं चल रही और पानी की सतह शीशे की तरह स्थिर है।
मुक्त पुरुष का मन भी बिल्कुल वैसा ही हो जाता है। उसमें न तो किसी दुख की आंधी से घबराहट होती है, और न किसी खुशी से लहरें उठती हैं।
वह भविष्य की किसी उम्मीद या डर में नहीं जीता, और उसके मन में अपनी आत्मा को लेकर कोई शक नहीं बचता। उसका दिल हर समय ईश्वर के प्रकाश से जगमगाता रहता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. नोद्विग्नं न च सन्तुष्टम् राग और द्वेष के आत्यंतिक विलय को व्यक्त करता है। 2. अकर्तृ चित्त की उस निष्कलंक स्थिति का नाम है जहाँ कर्तापन का मैल नहीं है। 3. स्पन्दवर्जितम् समस्त मानसिक चंचलता और विक्षेपों का आत्यंतिक उपशम है। 4. निराशं भविष्य की कामनाओं और वासनाओं से पूर्ण मुक्ति का द्योतक है। 5. गतसन्देहं ‘छिद्यन्ते सर्वसंशयाः’ के उपनिषदिक सत्य की प्रत्यक्ष सिद्धि है। 6. साधक को मन की लहरों को शांत करके आत्म-दर्पण को स्वच्छ करने की प्रेरणा देता है।
उदाहरण से समझें: जैसे बिना हवा वाले स्थान में रखा हुआ दीपक तनिक भी नहीं हिलता और सीधा जलता है, वैसे ही ज्ञानी का चित्त स्पंदन-रहित होकर प्रकाशित रहता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब आप किसी शोरगुल वाले हवाई अड्डे पर नॉइज़-कैंसलेशन हेडफ़ोन लगा लेते हैं, तो बाहर की सारी आवाज़ें गायब हो जाती हैं और केवल गहरा सन्नाटा रहता है; ज्ञानी का चित्त संसार के शोर में ऐसे ही शांत रहता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: उम्मीदों और संशयों का जाल काटिए; जब मन की चंचलता थमेगी, तब आपकी आत्मा का सच्चा प्रकाश चमकेगा।
सामान्य गलतफहमी
यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘निराशम्’ का अर्थ अवसाद या मायूसी नहीं है; यह सांसारिक वासनाओं और तृष्णाओं के अभाव का आनंद है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब मन किसी बात पर बहुत उछलने या डरने लगे, तो 1 मिनट के लिए शांत होकर कहें: "मैं अचल और संशय-रहित आत्मा हूँ।" (मानसिक चंचलता में)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मेरा मन हर समय आने वाले कल की आशाओं और पुरानी बातों के संशयों में झूलता रहता है?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट अपनी छाती के केंद्र में ध्यान केंद्रित करें और अनुभव करें: "कोई हलचल नहीं, कोई संशय नहीं; केवल शांत और अखंड प्रकाश।"
एक पंक्ति में सार: न उद्विग्न न संतुष्ट, अकर्ता, कंपन-रहित, आशारहित और संशय-मुक्त ज्ञानी का चित्त प्रकाशित रहता है।
English
Translation: Neither anxious nor elated, free from agency and motionless, devoid of expectations and freed from all doubt, the mind of the liberated one shines gloriously.
Simple explanation: Neither agitated by grief nor intoxicated by worldly delight, inactive, motionless, desireless, and rid of all doubt, the consciousness of the liberated sage shines in unblemished splendor.
विषय और संबंधित श्लोक
- स्पन्दवर्जित-चित्त
- गतसन्देह
- निराश
- मुक्त-चित्त-शोभा
- श्लोक 18.29: निरहङ्कारधीरेण।
- श्लोक 18.31: निर्ध्यातुं चेष्टितुं वापि।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का तीसवाँ श्लोक।