दृश्य, गति और थीम की सेटिंग
अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.31
सत्यापित
मूल संस्कृत
निर्ध्यातुं चेष्टितुं वापि यच्चित्तं न प्रवर्तते । निर्निमित्तमिदं किन्तु निर्ध्यायति विचेष्टते ॥ ३१ ॥
IAST लिप्यंतरण
nirdhyātuṃ ceṣṭituṃ vāpi yaccittaṃ na pravartate | nirnimittam idaṃ kintu nirdhyāyati viceṣṭate || 31 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
निर्ध्यातुम्, चेष्टितुम्, वा, अपि, यत्, चित्तम्, न, प्रवर्तते, निर्निमित्तम्, इदम्, किन्तु, निर्ध्यायति, विचेष्टते
- यत् चित्तम् न प्रवर्तते
- जिसका चित्त किसी उद्देश्य से प्रवृत्त नहीं होता
- निर्ध्यातुम् चेष्टितुम् वा अपि
- ध्यान करने में अथवा लौकिक कर्म की चेष्टा करने में
- किन्तु इदम् निर्निमित्तम्
- किंतु उसका चित्त बिना किसी निमित्त (कामना) के
- निर्ध्यायति विचेष्टते
- सहज ध्यानस्थ रहता है और सहज क्रियाएँ करता है
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
जिसका चित्त ध्यान करने या कर्म करने में किसी स्वार्थ या संकल्प से प्रवृत्त नहीं होता, फिर भी वह बिना किसी कारण (निमित्त) के स्वतः ध्यानस्थ रहता है और सहज चेष्टा करता है।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: साधारण साधक ध्यान लगाने के लिए ज़बरदस्ती बैठता है और संसारी मनुष्य फल पाने के लिए कर्म में जुटता है। किंतु जीवनमुक्त का चित्त किसी उद्देश्य (निमित्त) से न तो ध्यान करने के पीछे भागता है और न कर्म करने के। उसका ध्यान और उसका कर्म दोनों स्वाभाविक (अहेतुक) होते हैं। वह बैठता है तो सहज ध्यान है, और चलता है तो सहज लीला। उसमें कोई कर्तापन या दबाव नहीं होता।
सरल हिन्दी में समझें
जब एक छोटा बच्चा हँसता है या खेलता है, तो क्या उसके पीछे कोई बहुत बड़ी योजना या स्वार्थ होता है? नहीं, वह बस अनायास खेलता है।
ज्ञानी व्यक्ति का जीवन भी वैसा ही निष्पाप और सहज हो जाता है। वह न तो ध्यान लगाने की कोई जबरदस्ती करता है और न काम करने की कोई ज़िद।
वह बिना किसी मतलब के अपनी आत्मा में शांत रहता है और जो काम सामने आए उसे सहजता से कर लेता है। उसका पूरा जीवन एक सहज उत्सव बन जाता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. निर्निमित्तम् का अर्थ है अहेतुक और निष्काम—जहाँ कोई व्यक्तिगत स्वार्थ या फल-कामना नहीं है। 2. निर्ध्यातुं चेष्टितुं न प्रवर्तते हठयोग और सकाम कर्म दोनों के अतिक्रमण को सिद्ध करता है। 3. सहज समाधि वह है जहाँ ध्यान करना नहीं पड़ता, बल्कि ध्यान ही स्वभाव बन जाता है। 4. विचेष्टते प्रारब्ध के अनुसार होने वाली शारीरिक और वाचिक क्रियाओं की स्वाभाविकता है। 5. यह दर्शाता है कि वास्तविक अध्यात्म किसी कसरत का नाम नहीं, बल्कि सहज होने की कला है। 6. साधक को साधना के तनाव से मुक्त होकर अपनी स्वाभाविक दिव्यता में जीने का संकेत देता है।
उदाहरण से समझें: जैसे पेड़ बिना किसी स्वार्थ या तनाव के फल देता है और हवा बिना किसी योजना के बहती है, वैसे ही ज्ञानी बिना किसी निमित्त के सहज रहता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब आप किसी खूबसूरत सूर्यास्त को देखते हैं तो आप ध्यान लगाने की कोशिश नहीं करते, ध्यान अपने आप घटित हो जाता है; ज्ञानी का पूरा जीवन ऐसे ही सहज ध्यान बन जाता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: साधना को कोई भारी तनाव मत बनाइए; सहज हो जाइए, जब स्वार्थ मिटता है तो हर सांस ध्यान बन जाती है।
सामान्य गलतफहमी
सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘निर्निमित्तम्’ का अर्थ आलस में पड़कर कर्तव्य भूल जाना नहीं है; यह स्वार्थ-शून्य सहजता की स्थिति है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज कोई भी काम करते समय मन में कोई अहंकार या दिखावा न रखें; उसे पूरी स्वाभाविकता से कीजिए। (काम करते समय)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपने ध्यान और पूजा-पाठ को भी एक तनावपूर्ण कर्तव्य मानकर खुद को थका रहा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर कोई प्रयास न करें; न ध्यान लगाने की कोशिश करें न विचार रोकने की; बस जो है उसे सहज रहने दें।
एक पंक्ति में सार: जिसका चित्त ध्यान या कर्म में हठ से नहीं लगता, वह बिना निमित्त के ही सहज ध्यानस्थ और चेष्टावान रहता है।
English
Translation: Whose mind does not intentionally set out either to meditate or to act, yet without any personal motive, it meditates and acts spontaneously.
Simple explanation: Whose mind is prompted by no contrivance either to practice contemplation or to undertake activity, yet without any motive whatsoever, spontaneously contemplates and effortlessly acts.
विषय और संबंधित श्लोक
- सहज-समाधि
- निर्निमित्त-चेष्टा
- अहेतुक-जीवन
- प्रवृत्ति-निवृत्ति-पार
- श्लोक 18.30: चित्तं मुक्तस्य राजते।
- श्लोक 18.32: तत्त्वं यथार्थमाकर्ण्य।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का इकतीसवाँ श्लोक।