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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ३२/१००32%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.32

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

तत्त्वं यथार्थमाकर्ण्य मन्दः प्राप्नोति मूढताम् । अथवा याति सङ्कोचममूढः कोऽपि मूढवत् ॥ ३२ ॥

IAST लिप्यंतरण

tattvaṃ yathārtham ākarṇya mandaḥ prāpnoti mūḍhatām | athavā yāti saṅkocam amūḍhaḥ ko'pi mūḍhavat || 32 ||

सरल उच्चारण: tattvam yathaartham aakarnya mandah praapnoti moodhataam athavaa yaati sangkocham amoodhah kopi moodhavat (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

तत्त्वम्, यथार्थम्, आकर्ण्य, मन्दः, प्राप्नोति, मूढताम्, अथवा, याति, सङ्कोचम्, अमूढः, कः, अपि, मूढवत्

यथार्थम् तत्त्वम् आकर्ण्य
परम सत्य तत्त्व को ज्यों का त्यों सुनकर
मन्दः मूढताम् प्राप्नोति
मंदबुद्धि अज्ञानी मनुष्य और अधिक भ्रमित या मूढ़ हो जाता है
अथवा सङ्कोचम् याति
अथवा भयवश संकोच में पड़ जाता है
कोऽपि अमूढः मूढवत्
जबकि कोई विरला तत्त्वज्ञानी बाह्य रूप से बालवत् या मूढ़ के समान शांत रहता है

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

यथार्थ सत्य को सुनकर मंदबुद्धि मनुष्य मूढ़ता (भ्रम) को प्राप्त होता है अथवा संकोच में पड़ जाता है; जबकि कोई विरला बुद्धिमान ज्ञानी बाह्य रूप से मूढ़ के समान शांत रहता है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: अद्वैत वेदांत का सत्य अत्यंत तीक्ष्ण और सीधा है कि "तू पहले से ही शुद्ध और मुक्त आत्मा है, कोई जगत नहीं है।" जब कोई मंदबुद्धि व्यक्ति इस सर्वोच्च सत्य को सुनता है, तो वह चकरा जाता है। वह सोचता है कि अगर कोई कर्म या पाप-पुण्य नहीं है तो वह मनमाना आचरण करने लगे, या फिर वह डरकर संकोच में पड़ जाता है। किंतु जो सच्चा अधिकारी और ज्ञानी (अमूढ़) है, वह इस सत्य को पचाकर बिना किसी अहंकार के बालवत् या मूढ़ के समान मौन और शांत हो जाता है।

सरल हिन्दी में समझें

अगर किसी छोटे बच्चे के हाथ में बहुत कीमती कैमरा थमा दिया जाए, तो वह समझ नहीं पाएगा कि क्या करे और शायद उसे गिरा दे।

आत्मज्ञान का यह गहरा सत्य भी हर किसी के हज़म करने की बात नहीं है। जब कोई नासमझ इंसान सुनता है कि "आत्मा अकर्ता है", तो वह या तो कन्फ्यूज़ हो जाता है या गलत रास्ते पर चल पड़ता है।

लेकिन जो सच्चा समझदार व्यक्ति होता है, वह इस सत्य को समझकर पूरी तरह विनम्र और शांत हो जाता है। वह अपनी विद्वत्ता का ढोल नहीं पीटता, बल्कि एक सीधे-सादे इंसान की तरह जीता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. अद्वैत सत्य का श्रवण केवल शुद्ध अंतःकरण वाले अधिकारी के लिए ही अमृत तुल्य होता है। 2. मंदबुद्धि मनुष्य का मूढ़ होना या संकोच में पड़ना चित्त-शुद्धि की कमी का परिणाम है। 3. अमूढः कोऽपि मूढवत् ज्ञानी की उस परम नम्रता को दर्शाता है जहाँ वह अज्ञानी की तरह सरल रहता है (बालवत्)। 4. यह उपनिषदों के ‘दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टम्’ (कठ उपनिषद्) के सत्य को पुष्ट करता है। 5. साधक को आगाह करता है कि केवल बौद्धिक रूप से वेदांत की बातें दोहराना ही ज्ञान नहीं है। 6. सच्ची समझ इंसान को अहंकारी बनाने के बजाय सरल, मौन और शांत बनाती है।

उदाहरण से समझें: जैसे सूरज की तेज़ धूप उल्लू को अंधा कर देती है लेकिन कमल को खिला देती है, वैसे ही अद्वैत सत्य मंदबुद्धि को भ्रमित करता है और ज्ञानी को शांत करता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब किसी नौसिखिए को वित्तीय बाज़ार के बहुत जटिल डेरिवेटिव्स समझाए जाएँ तो वह अपना पैसा गँवा बैठता है, जबकि अनुभवी ट्रेडर शांत रहता है; आध्यात्मिक सत्य को भी पचाने के लिए परिपक्वता चाहिए। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: आध्यात्मिक ज्ञान को अहंकार बढ़ाने का साधन मत बनाइए; सच्ची समझ आपको सरल, शांत और विनम्र बनाती है।

सामान्य गलतफहमी

ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘अमूढः मूढवत्’ का अर्थ बेवकूफ बन जाना नहीं है; यह ज्ञान के घमंड और विद्वत्ता के प्रदर्शन से मुक्ति का प्रतीक है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज किसी से बहस में जीतने की ज़िद न करें; अगर कोई आपको गलत भी समझे, तो मुस्कुराकर शांत रहें। (बहस के समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं आध्यात्मिक ज्ञान की बातें केवल दूसरों पर रौब जमाने और खुद को ज्ञानी साबित करने के लिए सीख रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "मुझे किसी को कुछ साबित नहीं करना है; मैं अपनी आत्मा की सहज शांति में मौन और तृप्त हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: परम सत्य सुनकर मंदबुद्धि मूढ़ हो जाता है; जबकि ज्ञानी सरल और मूढ़वत् रहकर शांत हो जाता है।

English

Translation: Hearing the truth as it is, the dull-witted falls into delusion or shrinks back; while a rare wise one abides quietly, appearing like a fool.

Simple explanation: Hearing the naked reality of the Self, the dull-witted person either falls into bewilderment or recoils in confusion; whereas a rare enlightened sage absorbs it effortlessly, moving through the world unassuming like a child.

विषय और संबंधित श्लोक

  • अधिकारी-भेद
  • तत्त्व-श्रवण
  • मूढवत्-स्थिति
  • सत्य-पचाना
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.31: निर्निमित्तमिदं किन्तु।
  • श्लोक 18.33: एकाग्रता निरोधो वा।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 296–298 (PDF पृ. 303–305)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का बत्तीसवाँ श्लोक।