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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ३३/१००33%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.33

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

एकाग्रता निरोधो वा मूढैरभ्यस्यते भृशम् । धीराः कृत्यं न पश्यन्ति सुप्तवत्स्वपदे स्थिताः ॥ ३३ ॥

IAST लिप्यंतरण

ekāgratā nirodho vā mūḍhair abhyasyate bhṛśam | dhīrāḥ kṛtyaṃ na paśyanti suptavat svapade sthitāḥ || 33 ||

सरल उच्चारण: ekaagrataa nirodho vaa moodhair abhyasyate bhrisham dheeraah krityam na pashyanti suptavat svapade sthitaah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

एकाग्रता, निरोधः, वा, मूढैः, अभ्यस्यते, भृशम्, धीराः, कृत्यम्, न, पश्यन्ति, सुप्तवत्, स्व-पदे, स्थिताः

मूढैः भृशम् अभ्यस्यते
अज्ञानी लोग बार-बार हठपूर्वक अभ्यास करते हैं
एकाग्रता निरोधः वा
मन की एकाग्रता अथवा चित्त-वृत्तियों के निरोध का
धीराः कृत्यम् न पश्यन्ति
किंतु धैर्यवान ज्ञानी अपने लिए कोई कर्तव्य नहीं देखते
सुप्तवत् स्व-पदे स्थिताः
सुषुप्ति की भाँति सहज अपने आत्मपद में स्थित रहते हैं

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

अज्ञानी लोग मन की एकाग्रता या वृत्तियों के निरोध का बार-बार हठपूर्वक अभ्यास करते हैं; किंतु धीर ज्ञानी गहरी नींद में सोए हुए पुरुष की तरह सहज अपने स्वरूप में स्थित रहकर कोई कर्तव्य नहीं देखते।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: हठयोग में मन को एकाग्र करने और सांसों को रोकने का बड़ा भारी अभ्यास किया जाता है। अष्टावक्र कहते हैं कि यह अभ्यास उन लोगों के लिए है जो अभी अज्ञानी हैं और जिन्होंने आत्मा को नहीं पहचाना। जो ज्ञानी यह जान चुका है कि आत्मा सदा असंग और पूर्ण है, उसके लिए मन को रोकने का कोई हठ नहीं रहता। जैसे गहरी नींद (सुषुप्ति) में कोई प्रयास नहीं होता और परम शांति रहती है, वैसे ही ज्ञानी जागते हुए भी अपने आत्म-पद में सहज स्थित रहता है।

सरल हिन्दी में समझें

जब आप रात को गहरी नींद में सो जाते हैं, तो क्या आपको शांत रहने के लिए कोई मेहनत करनी पड़ती है? नहीं, नींद में शांति अपने आप होती है।

अज्ञानी लोग मन को शांत करने के लिए दिन-रात माथापच्ची करते हैं—कभी ध्यान का हठ, कभी साँसों की ज़बरदस्ती।

लेकिन ज्ञानी समझता है कि वह खुद ही शांति का सागर है। उसे मन को ज़बरदस्ती बाँधने की ज़रूरत नहीं पड़ती। वह जागते हुए भी नींद जैसी गहरी और सहज शांति में मस्त रहता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. एकाग्रता और निरोध साधन हैं, साध्य नहीं; जब साध्य (आत्मा) सिद्ध हो गया तो साधन छूट जाते हैं। 2. मूढैः भृशम् अभ्यस्यते उन साधकों की ओर संकेत है जो केवल अभ्यास में ही उलझकर लक्ष्य को भूल जाते हैं। 3. धीराः कृत्यं न पश्यन्ति आत्मज्ञान के बाद किसी भी कर्तव्य के अभाव का सूचक है। 4. सुप्तवत् स्वपदे स्थिताः जाग्रत्-सुषुप्ति की वह अद्वैत स्थिति है जहाँ द्वैत का भान शांत हो जाता है। 5. यह योगवासिष्ठ के ‘जाग्रत्येव सुषुप्तस्थः’ के परम ज्ञानी के लक्षण से पूर्णतः मिलता है। 6. साधक को अभ्यास के संघर्ष से मुक्त करके आत्म-विश्रांति की ओर अग्रसर करता है।

उदाहरण से समझें: जैसे किसी नदी को रोकने के लिए बाँध बनाना पड़ता है, लेकिन जब नदी समुद्र में मिल जाती है तो बाँध की कोई ज़रूरत नहीं रह जाती; ज्ञानी का मन आत्म-समुद्र में मिलकर सहज शांत हो जाता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

गाड़ी चलाना सीखते समय आप हर गियर और पैडल पर तनावग्रस्त ध्यान देते हैं, लेकिन अनुभवी ड्राइवर बिना सोचे संगीत सुनते हुए सहज ड्राइव करता है; ज्ञानी की आत्म-स्थिति ऐसी ही सहज हो जाती है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: मन से लड़ना बंद कीजिए; यह जानिए कि आप आत्मा हैं, और अपनी स्वाभाविक शांति में विश्राम लीजिए।

सामान्य गलतफहमी

सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘कृत्यं न पश्यन्ति’ का अर्थ आलसी या गैर-जिम्मेदार हो जाना नहीं है; यह आंतरिक साधना के हठ से विश्रांति है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब ध्यान में मन इधर-उधर भटके, तो मन से लड़ने के बजाय कहें: "मैं शांत साक्षी हूँ, भटकने वाला मन मैं नहीं हूँ।" (ध्यान के समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं मन को शांत करने के लिए इतना संघर्ष कर रहा हूँ कि वही संघर्ष मेरी अशांति का कारण बन गया है?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "गहरी नींद जैसी असीम शांति इस क्षण भी मेरे भीतर मौजूद है; मुझे कुछ नहीं करना, केवल विश्राम लेना है।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: अज्ञानी एकाग्रता और निरोध का हठ करते हैं; ज्ञानी सुषुप्ति की तरह अपने आत्मपद में सहज स्थित रहते हैं।

English

Translation: Concentration and mental control are practiced incessantly by the deluded; the steadfast see nothing to be done, abiding in their own nature like one in deep sleep.

Simple explanation: The deluded endlessly strive to force one-pointed focus and mental restraint; whereas the steadfast sage sees nothing left to achieve, dwelling effortlessly in the Self as though resting in deep sleep.

विषय और संबंधित श्लोक

  • चित्त-निरोध-पार
  • सुप्तवत्-स्थिति
  • कृत्य-शून्यता
  • सहज-आत्मपद
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.32: अमूढः कोऽपि मूढवत्।
  • श्लोक 18.34: अप्रयत्नात्प्रयत्नाद्वा।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 298–300 (PDF पृ. 305–307)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का तैंतीसवाँ श्लोक।