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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ३५/१००35%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.35

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

शुद्धं बुद्धं प्रियं पूर्णं निष्प्रपञ्चं निरामयम् । आत्मानं तं न जानन्ति तत्राभ्यासपरा जनाः ॥ ३५ ॥

IAST लिप्यंतरण

śuddhaṃ buddhaṃ priyaṃ pūrṇaṃ niṣprapañcaṃ nirāmayam | ātmānaṃ taṃ na jānanti tatrābhyāsaparā janāḥ || 35 ||

सरल उच्चारण: shuddham buddham priyam poornam nishprapanycham niraamayam aatmaanam tam na jaananti tatraabhyaasaparaa janaah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

शुद्धम्, बुद्धम्, प्रियम्, पूर्णम्, निष्प्रपञ्चम्, निरामयम्, आत्मानम्, तम्, न, जानन्ति, तत्र, अभ्यास-पराः, जनाः

तम् आत्मानम् न जानन्ति
वे उस आत्मा को नहीं जान पाते
शुद्धम् बुद्धम् प्रियम् पूर्णम्
जो सर्वथा शुद्ध, ज्ञानस्वरूप, परमानंदप्रद और परिपूर्ण है
निष्प्रपञ्चम् निरामयम्
जो प्रपंचरहित और समस्त विकारों से मुक्त है
तत्र अभ्यास-पराः जनाः
क्योंकि वे केवल बाह्य क्रियाओं और हठ-अभ्यास में ही उलझे रहते हैं

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

जो आत्मा शुद्ध, ज्ञानस्वरूप, परम प्रिय, परिपूर्ण, प्रपंचरहित और निर्विकार है—केवल बाह्य अभ्यासों में लगे रहने वाले लोग उस आत्मा को नहीं जान पाते।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह श्लोक अष्टावक्र की अत्यंत क्रांतिकारी दृष्टि को प्रस्तुत करता है। आत्मा पहले से ही शुद्ध, चेतन और पूर्ण है। किंतु बहुत से साधक सोचते हैं कि जब वे हज़ारों साल तक कठिन प्राणायाम, आसन और जप करेंगे, तब आत्मा शुद्ध होगी। अष्टावक्र कहते हैं कि जो वस्तु पहले से ही शुद्ध और पूर्ण है, उसे अभ्यास से क्या शुद्ध करोगे? जो लोग केवल अभ्यास के अहंकार में उलझे रहते हैं, वे अपने ही भीतर मौजूद इस नित्य-प्राप्त आत्मा को नहीं पहचान पाते।

सरल हिन्दी में समझें

अगर आपके गले में सोने का हार पहले से पड़ा हो, और आप पूरे शहर में उसे ढूँढने के लिए दौड़ लगा रहे हों, तो क्या आपकी यह दौड़ आपको हार दिलाएगी? नहीं, आपको बस अपने गले पर हाथ रखकर देखना है।

आपकी आत्मा पहले से ही बिल्कुल साफ, समझदार, खुश और पूरी है। उसमें कोई कमी नहीं है जिसे पूरा करने के लिए कठिन कसरतें करनी पड़ें।

जो लोग दिन-रात केवल जटिल अभ्यासों में ही उलझे रहते हैं, वे इस सीधी-सी बात को भूल जाते हैं कि आत्मा तो पहले से ही उनके अंदर मुस्कुरा रही है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. शुद्धं बुद्धं प्रियं पूर्णं आत्मा के छह नित्य और स्वयंसिद्ध लक्षणों का संकलन है। 2. निष्प्रपञ्चं निरामयम् आत्मा के माया और तीनों तापों से सर्वथा अछूते रहने का प्रमाण है। 3. अभ्यासपराः जनाः उन लोगों की ओर इशारा करता है जो साधन को ही साध्य मान बैठते हैं। 4. आत्मा कोई कार्य (effect) नहीं है जिसे अभ्यास रूपी कारण से उत्पन्न किया जा सके (वेदांतसूत्र १.१.४)। 5. अज्ञान की निवृत्ति बोध से होती है, किसी शारीरिक या मानसिक कसरत से नहीं। 6. साधक को यह विश्वास दिलाता है कि वह पहले से ही पूर्ण और निर्दोष है।

उदाहरण से समझें: जैसे सूर्य को देखने के लिए मोमबत्ती जलाने की ज़रूरत नहीं होती, सूर्य अपने ही प्रकाश से दिखता है; वैसे ही स्वयंप्रकाश आत्मा को जानने के लिए किसी कृत्रिम अभ्यास की ज़रूरत नहीं होती। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब आप अपने स्मार्टफोन में कोई ऐप ढूँढ रहे हों जो पहले से ही होम स्क्रीन पर मौजूद है और आप सेटिंग्स में सिर खपा रहे हों; अभ्यास में उलझे लोग अपने नित्य स्वरूप को ऐसे ही नज़रअंदाज़ कर देते हैं। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: आप पहले से ही पूर्ण और शुद्ध हैं; अभ्यास का घमंड छोड़िए और अपने भीतर के इस सहज प्रकाश को पहचानिए।

सामान्य गलतफहमी

सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘अभ्यासपरा न जानन्ति’ का अर्थ यह नहीं है कि मन को शुद्ध करने वाले सात्विक अभ्यासों का अनादर किया जाए; यह अभ्यास के अहंकार की चेतावनी है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब भी लगे कि "मुझमें बहुत कमियाँ हैं", तो तुरंत याद करें: "मेरी आत्मा नित्य शुद्ध, बुद्ध और पूर्ण है।" (हीनभावना के समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं खुद को पापी या अधूरा मानकर कठिन साधनाओं में इसलिए लगा हूँ क्योंकि मैं अपनी नित्य पूर्णता से अनजान हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर इन छह शब्दों का मन में स्मरण करें: "शुद्ध, बुद्ध, प्रिय, पूर्ण, निष्प्रपंच, निरामय—यही मेरा सच्चा स्वरूप है।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: शुद्ध, ज्ञानस्वरूप, प्रिय, पूर्ण और विकाररहित आत्मा को अभ्यास के हठ में उलझे लोग नहीं जान पाते।

English

Translation: Pure, awakened, beloved, complete, free of manifestation and untainted—the Self they do not know, those who are perpetually obsessed with spiritual practice.

Simple explanation: Pure, conscious, dearly beloved, all-complete, beyond world-manifestation, and free of all affliction—that very Self remains unknown to those obsessed merely with mechanical spiritual techniques.

विषय और संबंधित श्लोक

  • शुद्ध-बुद्ध-आत्मा
  • अभ्यास-सीमा
  • पूर्णता-बोध
  • नित्य-प्राप्ति
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.34: तत्त्वनिश्चयमात्रेण।
  • श्लोक 18.36: नाप्नोति कर्मणा मोक्षम्।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 301–303 (PDF पृ. 308–310)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का पैंतीसवाँ श्लोक।