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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ३६/१००36%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.36

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

नाप्नोति कर्मणा मोक्षं विमूढोऽभ्यासरूपिणा । धन्यो विज्ञानमात्रेण मुक्तस्तिष्ठत्यविक्रियः ॥ ३६ ॥

IAST लिप्यंतरण

nāpnoti karmaṇā mokṣaṃ vimūḍho'bhyāsarūpiṇā | dhanyo vijñānamātreṇa muktas tiṣṭhaty avikriyaḥ || 36 ||

सरल उच्चारण: naapnoti karmanaa moksham vimoodhobhyaasaroopinaa dhanyo vijnyaanamaatrena muktas tishthaty avikriyah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

न, आप्नोति, कर्मणा, मोक्षम्, विमूढः, अभ्यास-रूपिणा, धन्यः, विज्ञान-मात्रेण, मुक्तः, तिष्ठति, अविक्रियः

विमूढः मोक्षम् न आप्नोति
अज्ञानी पुरुष मोक्ष को प्राप्त नहीं कर पाता
अभ्यास-रूपिणा कर्मणा
हठपूर्वक किए जाने वाले अभ्यासरूपी कर्मों से
धन्यः विज्ञान-मात्रेण
किंतु धन्य ज्ञानी केवल बोध (विज्ञान) मात्र से ही
मुक्तः अविक्रियः तिष्ठति
मुक्त होकर निर्विकार रूप से स्थित रहता है

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

अज्ञानी मनुष्य अभ्यासरूप कर्मों से मोक्ष को प्राप्त नहीं कर सकता; किंतु धन्य पुरुष केवल तत्त्वज्ञान (विज्ञान) मात्र से ही मुक्त होकर निर्विकार स्थित रहता है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: मोक्ष कोई ऐसी वस्तु नहीं है जो किसी कर्म को करने से पैदा हो (उत्पाद्य), या कहीं चलकर पहुँचने से मिले (प्राप्य), या किसी चीज़ को मांजने से चमके (संस्कार्य)। मोक्ष तो आत्मा का अपना नित्य स्वरूप है जो केवल अज्ञान से ढका हुआ जान पड़ता था। जो अज्ञानी कर्म और हठ-अभ्यास से मोक्ष पाना चाहता है, वह भूल करता है क्योंकि कर्म अनित्य फल देता है। धन्य वही ज्ञानी है जो केवल प्रत्यक्ष आत्म-साक्षात्कार (विज्ञान) से मुक्त होकर निर्विकार शांत रहता है।

सरल हिन्दी में समझें

अगर आपको यह गलतफहमी हो जाए कि आपकी जेब खाली है, तो क्या आपको पैसे कमाने के लिए नौकरी पर जाना पड़ेगा? नहीं, आपको बस जेब में हाथ डालकर देखना है कि पैसे तो पहले से मौजूद हैं।

मोक्ष कोई ऐसी डिग्री या इनाम नहीं है जो बहुत सारे कर्म करने के बाद भगवान आपको देंगे। मोक्ष तो आपकी अपनी असली आज़ादी है।

जो इंसान केवल यह सच जान लेता है कि वह कौन है, वह उसी पल बिना किसी फेरबदल के हमेशा के लिए आज़ाद और शांत हो जाता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः (कैवल्योपनिषद्) का यह प्रत्यक्ष प्रमाण है। 2. कर्म परिणामी होता है, अतः कर्म से प्राप्त मोक्ष भी अनित्य होगा; इसलिए मोक्ष केवल ज्ञान से संभव है। 3. विज्ञानमात्रेण अपरोक्ष आत्म-साक्षात्कार की शक्ति को रेखांकित करता है। 4. अविक्रियः सिद्ध करता है कि ज्ञान होने पर आत्मा में कोई नया विकार या परिवर्तन नहीं आता; वह जैसी थी वैसी ही रहती है। 5. धन्यः उस साधक का गौरवगान है जो अविद्या के जाल को काटकर सत्य में प्रतिष्ठित हो गया। 6. साधक को कर्मकांड के अंतहीन चक्र से छुड़ाकर विशुद्ध आत्म-ज्ञान की ओर प्रेरित करता है।

उदाहरण से समझें: जैसे सोए हुए व्यक्ति को जगाने के लिए केवल आवाज़ देना काफी है, उसे उठाकर कहीं दूसरी जगह ले जाने की ज़रूरत नहीं; वैसे ही विज्ञान मात्र से अज्ञान की नींद टूट जाती है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

कंप्यूटर पर जब स्क्रीन सेवर चल रहा हो, तो आपको नया कंप्यूटर खरीदने की ज़रूरत नहीं होती; बस स्पेसबार दबाते ही आपकी पूरी स्क्रीन सामने आ जाती है; विज्ञान मात्र से अविद्या का पर्दा ऐसे ही हटता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: मोक्ष पाने के लिए कर्मों के फेर में मत भटकिए; आत्मज्ञान की आँख खोलिए, आप सदा से मुक्त हैं।

सामान्य गलतफहमी

सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। ‘नाप्नोति कर्मणा मोक्षम्’ का अर्थ समाज में अपने कर्तव्यों को छोड़ देना नहीं है; यह मोक्ष के साधन के रूप में कर्म की सीमा का बोध है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब मन में मोक्ष पाने की कोई बेचैनी उठे, तो कहें: "मुक्ति कोई भविष्य का फल नहीं, मेरी आत्मा का वर्तमान स्वरूप है।" (साधना के समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं मोक्ष को कोई बाहरी वस्तु मानकर कर्मों के पहाड़ इकट्ठे करने में लगा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "मुझमें कोई विकार नहीं, कोई बदलाव नहीं; मैं विज्ञानस्वरूप, नित्य-मुक्त आत्मा हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: अज्ञानी अभ्यासरूपी कर्म से मोक्ष नहीं पाता; धन्य पुरुष केवल आत्मज्ञान से मुक्त और निर्विकार रहता है।

English

Translation: Through practice in the form of action, the deluded does not attain liberation; the fortunate one, merely through intuitive wisdom, remains liberated and changeless.

Simple explanation: The deluded person never attains liberation through repetitive spiritual actions; the blessed one, through direct intuitive wisdom alone, abides liberated and utterly changeless.

विषय और संबंधित श्लोक

  • विज्ञान-मुक्ति
  • कर्म-सीमा
  • अविक्रिय-आत्मा
  • धन्य-पुरुष
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.35: तत्राभ्यासपरा जनाः।
  • श्लोक 18.37: मूढो नाप्नोति तद्ब्रह्म।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 303–305 (PDF पृ. 310–312)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का छत्तीसवाँ श्लोक।