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अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.44
सत्यापित
मूल संस्कृत
मुमुक्षोर्बुद्धिरालम्बमन्तरेण न विद्यते । निरालम्बैव निष्कामा बुद्धिर्मुक्तस्य सर्वदा ॥ ४४ ॥
IAST लिप्यंतरण
mumukṣor buddhir ālambam antareṇa na vidyate | nirālambaiva niṣkāmā buddhir muktasya sarvadā || 44 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
मुमुक्षोः, बुद्धिः, आलम्बम्, अन्तरेण, न, विद्यते, निरालम्बा, एव, निष्कामा, बुद्धिः, मुक्तस्य, सर्वदा
- मुमुक्षोः बुद्धिः
- मोक्ष चाहने वाले साधक की बुद्धि
- आलम्बम् अन्तरेण न विद्यते
- किसी सहारे (आलंबन) के बिना ठहर नहीं सकती
- तु मुक्तस्य बुद्धिः
- किंतु जीवनमुक्त की बुद्धि
- सर्वदा निरालम्बा एव निष्कामा
- सदा सर्वथा बिना किसी सहारे के और निष्काम रहती है
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
मोक्ष की इच्छा रखने वाले साधक की बुद्धि किसी सहारे (आलंबन) के बिना नहीं रह सकती; किंतु मुक्त पुरुष की बुद्धि सदा निरालंब और पूर्णतः निष्काम रहती है।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: साधक जब साधना करता है, तो उसे किसी न किसी सहारे की ज़रूरत होती है—चाहे वह कोई मूर्ति हो, कोई मंत्र हो, गुरु का ध्यान हो, या कोई शास्त्र-विचार हो। इन आलंबनों के बिना उसका मन भटकने लगता है। किंतु जो जीवनमुक्त हो चुका है, उसकी बुद्धि को किसी बाहरी या मानसिक सहारे की ज़रूरत नहीं होती। वह स्वयं आकाश की तरह निराधार (निरालंब) और समस्त इच्छाओं से मुक्त होकर अपनी अखंड शांति में विश्राम करती है।
सरल हिन्दी में समझें
जब कोई बच्चा चलना सीखता है, तो उसे वॉकर या किसी की उंगली पकड़नी पड़ती है। लेकिन जब वह दौड़ने लगता है, तो क्या उसे किसी सहारे की ज़रूरत होती है?
साधक को ध्यान लगाने के लिए मंत्र, माला या किसी सहारे की ज़रूरत पड़ती है। लेकिन जिस ज्ञानी को आत्मज्ञान हो चुका है, उसका मन बिना किसी सहारे के भी बिल्कुल शांत रहता है।
उसकी बुद्धि को टिकने के लिए किसी बैसाखी की ज़रूरत नहीं है। वह आकाश की तरह पूरी तरह आज़ाद और बिना किसी चाहत के हर समय आनंदित रहता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. आलम्बम् अन्तरेण न विद्यते साधनावस्था में प्रतीकोपासना और अभ्यास की अनिवार्यता का निर्देश है। 2. निरालम्बा बुद्धि सिद्धावस्था का लक्षण है जहाँ मन किसी विषय का आश्रय नहीं लेता। 3. निष्कामा यह प्रमाणित करता है कि जहाँ कोई आलंबन नहीं, वहाँ कोई वासना भी नहीं पनप सकती। 4. सर्वदा मुक्तस्य बुद्धिः इस स्वाधीनता की अखंडता और शाश्वतता को सूचित करता है। 5. यह अद्वैत वेदांत के ‘निरालंब-ब्रह्म’ में अंतःकरण के लय की सर्वोच्च स्थिति है। 6. साधक को धीरे-धीरे बाह्य निर्भरताओं से ऊपर उठकर आत्म-निर्भरता की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है।
उदाहरण से समझें: जैसे अंतरिक्ष बिना किसी खंभे के अपने आप टिका हुआ है, वैसे ही मुक्त पुरुष की बुद्धि बिना किसी सहारे के अपनी आत्मा में टिकी रहती है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
साइकिल सीखने के समय जब साइड के सपोर्ट व्हील्स हटा दिए जाते हैं और आप हवा में बिना सहारे संतुलन बना लेते हैं; मुक्त बुद्धि भी समस्त मानसिक बैसाखियों से ऐसे ही मुक्त हो जाती है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: मानसिक बैसाखियों को हमेशा के लिए मत पकड़िए; अपने भीतर की उस असीम शक्ति को पहचानिए जो बिना किसी सहारे के पूर्ण है।
सामान्य गलतफहमी
तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘निरालम्बैव बुद्धिः’ का अर्थ कर्तव्यों और मर्यादाओं का त्याग करना नहीं है; यह मानसिक निर्भरता से मुक्ति की बात है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब मन किसी बाहरी सहारे या प्रशंसा के लिए तरसे, तो कहें: "मेरी आत्मा निरालंब है, मुझे किसी बाहरी सहारे की मोहताजी नहीं।" (असुरक्षा में)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपनी खुशी और शांति के लिए लगातार बाहरी लोगों और चीज़ों के सहारे ढूँढ रहा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर कल्पना करें कि आप खुले नीले आकाश में तैर रहे हैं; कोई ज़मीन नहीं, कोई दीवार नहीं, केवल निरालंब स्वतंत्रता।
एक पंक्ति में सार: साधक की बुद्धि सहारे के बिना नहीं टिकती; मुक्त पुरुष की बुद्धि सदा सहारा-मुक्त और निष्काम रहती है।
English
Translation: The intellect of the seeker cannot abide without support; but the intellect of the liberated one is ever supportless and desireless.
Simple explanation: The intellect of the aspiring seeker cannot stand without leaning upon some object of support; whereas the intellect of the liberated sage is forever supportless, unattached, and free from desire.
विषय और संबंधित श्लोक
- निरालम्ब-बुद्धि
- निष्काम-स्थिति
- मुमुक्षु-मुक्त-भेद
- परम-स्वाधीनता
- श्लोक 18.43: न तु जानन्ति संमोहात्।
- श्लोक 18.45: विषयद्वीपिनो वीक्ष्य।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का चवालीसवाँ श्लोक।