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अध्याय 19 · धारणाओं से परे
अष्टावक्र गीता, श्लोक 19.5
समीक्षा आवश्यक
मूल संस्कृत
क्व स्वप्नः क्व सुषुप्तिर्वा क्व च जागरणं तथा । क्व तुरीयं भयं वापि स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ॥ ५ ॥
IAST लिप्यंतरण
kva svapnaḥ kva suṣuptir vā kva ca jāgaraṇaṃ tathā | kva turīyaṃ bhayaṃ vāpi svamahimni sthitasya me || 5 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
क्व, स्वप्नः, क्व, सुषुप्तिः, वा, क्व, च, जागरणम्, तथा, क्व, तुरीयम्, भयम्, वा, अपि, स्व-महिम्नि, स्थितस्य, मे
- क्व स्वप्नः क्व सुषुप्तिः
- स्वप्न कहाँ, गहरी नींद कहाँ
- क्व जागरणम् तथा
- और जागरण कहाँ
- क्व तुरीयम्
- तुरीय कहाँ
- भयम् वा अपि
- भय भी कहाँ, अपनी महिमा में स्थित मेरे लिए
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
अपनी महिमा में स्थित मेरे लिए स्वप्न कहाँ, सुषुप्ति कहाँ, जागरण कहाँ, तुरीय कहाँ, और भय भी कहाँ?
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय प्रसिद्ध चार नाम हैं। जनक उनमें भय को भी जोड़ देते हैं। इस श्लोक की टीका का पृष्ठ इस सत्र में फिर नहीं देखा गया।
सरल हिन्दी में समझें
सोना, सपना देखना, जागना, और इन तीनों के पार जिस चौथी बात को तुरीय कहते हैं। ये अवस्थाओं के नाम हैं।
जनक पूछते हैं कि अपनी महिमा में ये कहाँ हैं, और भय कहाँ है।
नींद छोड़ना, डर को दवा से न देखना, या जागते हुए सड़क पर असावधान होना इस श्लोक का अर्थ नहीं है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. तीन अवस्थाएँ और तुरीय एक ही प्रश्न में हैं। तुरीय को भी बचाकर अलग सिद्धि नहीं बनाया गया। 2. भयं वापि भय को अवस्थाओं के साथ रखता है। भय भी एक नाम है। 3. अवस्था बदलती है। जनक की महिमा उस परिवर्तन का स्वामी नहीं बनती। 4. सुषुप्ति विश्राम है। उसका प्रश्न विश्राम छीनने का आदेश नहीं है। 5. जागरण व्यावहारिक सावधानी का समय रहता है। 6. यदि भय जीवन को संकुचित करे तो वह चिकित्सा का विषय भी हो सकता है। यह श्लोक उसका विकल्प नहीं है।
आत्मा के शरीर तक सीमित न होने की पहचान का अर्थ स्वास्थ्य, सुरक्षा, विश्राम या आवश्यक उपचार की उपेक्षा को उचित ठहराना नहीं है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें।
उदाहरण से समझें: जैसे समुद्र में लहर, झाग और शांत गहराई तीन दिखते रूप हैं और पानी तीन नहीं हो जाता, वैसे ही अवस्थाएँ चेतना के रूप हैं। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
कोई व्यक्ति ठीक से सोता है और जागकर सड़क सावधानी से पार करता है, पर नींद और डर को अपनी पूरी पहचान नहीं बनाता। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: अवस्थाओं के नाम पहचानें। नींद, सुरक्षा और भय की ज़रूरी मदद बंद न करें।
सामान्य गलतफहमी
क्व भयं का अर्थ खतरे में लापरवाह होना या घबराहट होने पर सहायता न माँगना नहीं है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज सोने का समय रखें, और सोने से पहले एक भय को केवल नाम देकर छोड़ें। (रात को)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं जागने, सोने या निर्भय होने की एक अवस्था को ही अपना स्वरूप माने बैठा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट आँख बंद करें। नींद न दबाएँ। यदि भय तीखा हो तो आँख खोलें और किसी विश्वसनीय व्यक्ति को बताएँ।
एक पंक्ति में सार: अपनी महिमा में मेरे लिए स्वप्न, सुषुप्ति, जागरण, तुरीय और भय कहाँ हैं?
English
Translation: Where are dream, deep sleep, waking, the fourth, or even fear, for me established in my own majesty?
Simple explanation: The states of mind, including the fourth and fear, are named and questioned. Sleep, safety, and help remain.
विषय और संबंधित श्लोक
- तीन-अवस्था
- तुरीय
- भय
- स्वमहिमन्
- श्लोक 19.4: क्व चात्मा क्व च
- श्लोक 19.6: क्व दूरं क्व समीपं
स्रोत और सत्यापन
समीक्षा आवश्यक
संपादकीय टिप्पणी: मूल श्लोक सार्वजनिक अष्टावक्रगीता के नवदश क्रम से। इस सत्र में पुस्तक का स्कैन नहीं देखा गया। समीक्षा आवश्यक।